सात समंदर पार का स्वार्थ

“राधिका, बाबूजी का फोन आया था। वो और माँ अगले महीने से हमारे पास मुंबई ही आ रहे हैं, हमेशा के लिए।” निखिल ने अपने लैपटॉप से नज़रें हटाते हुए, बहुत ही सामान्य स्वर में यह बात कही, मानो यह कोई रोज़मर्रा की बात हो।

“हमारे पास? मतलब वो लोग हमेशा के लिए इसी फ्लैट में रहेंगे?” राधिका के हाथ में पकड़ी कॉफी की मग छलकते-छलकते बची। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी तीक्ष्णता और घबराहट थी।

निखिल के इस एक वाक्य ने जैसे उसके सपनों के आशियाने में आग लगा दी थी। “अपना इतना बड़ा पुश्तैनी घर, अपनी पहचान, अपना शहर छोड़कर वो अचानक यहाँ मुंबई की इस भागदौड़ में क्यों बसना चाहते हैं?” राधिका ने सवालों की बौछार कर दी।

निखिल ने गहरी साँस ली और राधिका के पास सोफे पर बैठते हुए बोला, “राधिका, बाबूजी अब रिटायर हो चुके हैं। पिछले महीने उन्हें जो हल्का हार्ट अटैक आया था,

उसके बाद से डॉक्टर ने उन्हें अकेले रहने से मना किया है। माँ के घुटनों में दर्द रहता है, वो अब अकेले पूरे घर और बाबूजी की ज़िम्मेदारी नहीं संभाल सकतीं। ऐसे में उनका अपने इकलौते बेटे के पास आना ही तो स्वाभाविक है ना। वो वहाँ बनारस में अकेले बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं।”

“लेकिन निखिल, यह टू-बीएचके का फ्लैट है! हम दोनों वर्किंग हैं। हमारा वीकेंड्स का अपना एक रूटीन होता है। इतने छोटे से घर में चार लोग, वो भी दो पीढ़ियों के अंतर के साथ, कैसे एडजस्ट करेंगे?

” राधिका का पारा चढ़ता जा रहा था। उसे निखिल की बातों में कोई तर्क नज़र नहीं आ रहा था, उसे बस अपना छिनता हुआ स्पेस और आज़ादी दिख रही थी।

निखिल को उस दिन दफ्तर में बहुत थकान हुई थी और वो इस समय किसी भी तरह की बहस के मूड में नहीं था। वह जानता था कि राधिका जब एक बार किसी बात पर अड़ जाती है, तो उसे समझाना पत्थर से सिर फोड़ने के बराबर होता है। इसलिए, वह बिना कुछ और कहे चुपचाप बेडरूम से बाहर बालकनी में चला गया।

राधिका कमरे में अकेली मानो किसी पिंजरे में कैद शेरनी की तरह चक्कर काटने लगी। उसे अपना पूरा भविष्य अंधकारमय लगने लगा। उसे यकीन था कि बनारस से आए

उसके सास-ससुर उसके रहन-सहन, उसके कपड़ों, उसके काम के घंटों और उसकी आज़ादी पर पाबंदियाँ लगाएँगे। उसे लगने लगा कि उसका घर अब उसका नहीं रहेगा। घबराहट में उसने तुरंत अपनी माँ को फोन लगाया और सारी दास्तान सुना दी।

उसकी माँ ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “बेटा, अभी शांत रह। सीधे-सीधे मना करोगी तो निखिल को बुरा लगेगा और वो अड़ जाएगा। आदमियों को सीधे नहीं, अक्ल से हैंडल किया जाता है। तू कोई ऐसा रास्ता निकाल जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।”

माँ की इस बात ने राधिका को सोचने पर मजबूर कर दिया। कई दिनों तक घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहा। निखिल और राधिका के बीच बातचीत सिर्फ काम-काज तक सीमित रह गई थी। राधिका ऊपर से तो बहुत मीठी और समझदार दिखने का नाटक करती थी, लेकिन अंदर से वह सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे में सोचती थी।

उसे किसी की बीमारी या बुढ़ापे से कोई हमदर्दी नहीं थी। उसे बस अपनी वो आज़ादी चाहिए थी जहाँ वो अपनी मर्जी से उठ सके, अपने मनमुताबिक कपड़े पहन सके और वीकेंड्स पर देर रात तक पार्टियाँ कर सके।

तभी राधिका के दिमाग में एक तरकीब आई। वह एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में काम करती थी और पिछले दो सालों से उसकी कंपनी उसे टोरंटो (कनाडा) ब्रांच में ट्रांसफर का ऑफर दे रही थी।

राधिका को भारत में ही रहना पसंद था और वह अपने मायके वालों से दूर नहीं जाना चाहती थी, इसलिए वह हर बार यह ऑफर ठुकरा देती थी। लेकिन अब, सास-ससुर के साथ रहने के डर ने उसे इतना डरा दिया था कि उसे अपना देश छोड़ना मंज़ूर था, लेकिन सास-ससुर के साथ एक छत के नीचे रहना नहीं।

अगले ही दिन उसने ऑफिस जाकर अपने बॉस से बात की और अपना ट्रांसफर टोरंटो के लिए अप्रूव करवा लिया। घर आकर उसने बहुत ही चालाकी से निखिल के सामने यह बात रखी। “निखिल, आज ऑफिस में मुझे टोरंटो हेडक्वार्टर से सीनियर पोज़िशन का ऑफर आया है। यह मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मौका है। पैकेज भी तीन गुना है। मुझे लगता है हमें यह मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।”

निखिल हैरान रह गया। “लेकिन राधिका, मैं अपना जमा-जमाया बिज़नेस यहाँ कैसे छोड़ सकता हूँ? और सबसे बड़ी बात, बाबूजी और माँ अगले महीने यहाँ आ रहे हैं। इस उम्र में वो लोग विदेश के मौसम और माहौल में कैसे ढलेंगे? उन्हें यहाँ मुंबई आने में ही इतनी हिचकिचाहट थी।”

राधिका ने अपनी चाल चलते हुए कहा, “कौन कह रहा है कि हम उन्हें वहाँ ले जाएँगे? उन्हें बनारस में ही रहने दो। हम उनके लिए वहाँ 24 घंटे की एक अच्छी नर्स और केयरटेकर रख देंगे। पैसों की कोई कमी तो होगी नहीं। और जहाँ तक तुम्हारे बिज़नेस की बात है, तुम टोरंटो में कुछ नया शुरू कर लेना। वैसे भी तुम हमेशा से इंटरनेशनल मार्केट में एक्सपैंड करना चाहते थे। क्या तुम मेरी तरक्की के लिए इतना भी नहीं कर सकते?”

निखिल समझ गया था कि राधिका ने यह ट्रांसफर अचानक नहीं लिया है। यह माता-पिता के यहाँ आने की खबर का ही नतीजा था। उसने राधिका को बहुत समझाने की कोशिश की, उसे बाबूजी की गिरती सेहत का वास्ता दिया, लेकिन राधिका टस से मस नहीं हुई। उसने साफ कह दिया कि अगर निखिल उसके साथ नहीं जाना चाहता, तो वो अकेली टोरंटो चली जाएगी, लेकिन वो अपने करियर (असल में अपनी आज़ादी) के साथ कोई समझौता नहीं करेगी।

निखिल एक भयानक धर्मसंकट में फँस गया था। एक तरफ उसके बूढ़े माता-पिता थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन उसे एक काबिल इंसान बनाने में लगा दिया था, और दूसरी तरफ उसकी पत्नी थी, जिसके साथ उसने जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाई थीं। अगर वह राधिका को रोकता है, तो उसका वैवाहिक जीवन टूट जाएगा, और अगर वह राधिका के साथ जाता है, तो उसके माता-पिता बुढ़ापे में अकेले रह जाएँगे। कई रातों तक निखिल सो नहीं पाया। वह अंदर ही अंदर घुटता रहा।

अंततः, एक टूटते हुए परिवार को बचाने के लिए निखिल ने खुद की बलि चढ़ाने का फैसला किया। उसने भारी मन से राधिका के साथ कनाडा जाने की हामी भर दी। उसने अपना सालों की मेहनत से खड़ा किया हुआ स्टार्टअप औने-पौने दामों में अपने पार्टनर को बेच दिया।

कनाडा की फ्लाइट से कुछ दिन पहले, निखिल ने अपने पिता को बनारस फोन किया। फोन की घंटी बजते ही उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।

“हैलो बाबूजी…” निखिल की आवाज़ काँप रही थी।

“हाँ बेटा निखिल, बोल। हम तो बस पैकिंग ही कर रहे थे। तेरी माँ ने तेरे लिए बनारसी पापड़ और अचार भी डिब्बों में भर लिए हैं,” पिता की आवाज़ में एक अजीब सा उत्साह था, जो निखिल को अंदर तक चीर गया।

निखिल ने अपनी आँखों से गिरते आँसुओं को रोका और एक बहुत बड़ा झूठ बोला, “बाबूजी… वो… वो दरअसल, मेरी कंपनी में कुछ क्राइसिस आ गया है। मैनेजमेंट ने मुझे अचानक टोरंटो प्रोजेक्ट के लिए ट्रांसफर कर दिया है। अगर मैं नहीं गया तो मेरी नौकरी चली जाएगी। राधिका को भी अपनी जॉब से इस्तीफा देना पड़ रहा है मेरी वजह से। हम लोग अगले हफ्ते ही कनाडा शिफ्ट हो रहे हैं।”

निखिल ने यह झूठ इसलिए बोला ताकि उसके माता-पिता को यह न लगे कि उनकी बहू उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहती। वह नहीं चाहता था कि उसके परिवार में कोई कड़वाहट पैदा हो। उसने सारा इल्ज़ाम अपनी नौकरी और अपनी किस्मत पर ले लिया।

फोन के दूसरी तरफ कुछ पलों के लिए भारी सन्नाटा छा गया। निखिल महसूस कर सकता था कि उसके पिता के हाथ से उम्मीदों का धागा छूट गया है।

“बाबूजी…?”

“हाँ बेटा,” पिता की आवाज़ अब धीमी और बोझिल हो चुकी थी। “कोई बात नहीं। नौकरी और करियर सबसे पहले है। हम तो यहाँ ठीक ही हैं। तू हमारी चिंता मत करना। बस वहाँ जाकर अपना और बहू का ख्याल रखना।”

निखिल ने फोन काटा और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपनी पत्नी की ज़िद के आगे अपने माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया था। राधिका खुश थी कि उसकी आज़ादी बच गई, लेकिन निखिल हमेशा के लिए अपराधबोध के एक ऐसे पिंजरे में कैद हो गया था, जिसकी चाबी किसी के पास नहीं थी। वह शारीरिक रूप से तो सात समंदर पार जा रहा था, लेकिन उसकी आत्मा हमेशा के लिए बनारस के उस पुश्तैनी घर की चौखट पर ही अटक गई थी, जहाँ दो बूढ़ी आँखें अब दरवाज़े की तरफ देखना छोड़ चुकी थीं।

दोस्तों, क्या अपनी ব্যক্তিগত सुख-शांति और आज़ादी के लिए किसी भी इंसान का इतना बड़ा कदम उठाना सही था, जो राधिका ने उठाया? या फिर निखिल को अपनी पत्नी के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने बूढ़े माता-पिता का साथ देना चाहिए था, भले ही इसके लिए उसे अपना घर क्यों न तोड़ना पड़ता? रिश्तों की इस जटिल उलझन में आप किसे सही और किसे गलत मानते हैं? अपने विचार और राय हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ।

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