जिस रिश्ते में सम्मान और भरोसा न हो… – निधि गुप्ता

शादी के शुरुआती दिन किसी खूबसूरत ख्वाब की तरह होते हैं, लेकिन रोहन और निध‍ि के लिए यह ख्वाब बहुत जल्दी एक डरावनी हकीकत में बदलने लगा था। दोनों ने एक-दूसरे को पसंद करके शादी की थी। निध‍ि एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर मैनेजर थी—आत्मविश्वासी, बेबाक और अपने उसूलों पर जीने वाली लड़की।

रोहन एक शांत स्वभाव का बैंक अधिकारी था। शादी के कुछ महीनों बाद ही रोहन की माँ, सुमित्रा देवी, उनके साथ शहर वाले फ्लैट में रहने आ गईं। सुमित्रा देवी पुरानी सोच की महिला थीं, जिन्हें लगता था कि बहू का मतलब है जो सिर झुकाकर रहे, नौकरी छोड़ दे और दिन भर रसोई में खटे।

सुमित्रा देवी को निध‍ि का ऑफिस जाना, उसका आत्मविश्वास और रोहन के साथ बराबरी का बर्ताव खटकने लगा था। उन्होंने बहुत ही चालाकी से मीठे ज़हर की तरह रोहन के कान भरने शुरू कर दिए। “रोहन बेटा, तू दिन भर ऑफिस में खटता है और तेरी बीवी बाहर दोस्तों के साथ कॉफी पीकर आती है।

देख, आज फिर उसने बाहर से खाना मंगा लिया, इसे तो घर संभालने का कोई शौक ही नहीं है। तूने कैसी लड़की से शादी कर ली, जिसे बड़ों का कोई लिहाज़ ही नहीं है?”

शुरुआत में रोहन इन बातों को टाल देता था, लेकिन जब दिन-रात एक ही बात हथौड़े की तरह दिमाग पर बजती है, तो इंसान का नज़रिया बदलने लगता है। निध‍ि सुबह जल्दी उठकर नाश्ता बनाती, ऑफिस जाती और शाम को आकर फिर घर का काम संभालती। लेकिन सुमित्रा देवी हमेशा उसमें नुक्स निकाल देतीं। जब निध‍ि रोहन से शिकायत करती, तो रोहन अपनी माँ का पक्ष लेता। “निध‍ि, वो मेरी माँ हैं, बुजुर्ग हैं, तुम थोड़ा एडजस्ट क्यों नहीं कर लेतीं?”

यही ‘एडजस्ट’ करने की नसीहतें धीरे-धीरे झगड़ों में बदलने लगीं। रोहन और निध‍ि के बीच मीलों की दूरी आ गई। वे एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहने लगे। दोनों को ही ऐसा लगने लगा था कि उन्होंने लव मैरिज करके अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी है। घर का माहौल इतना घुटन भरा हो गया था कि निध‍ि के लिए वहां सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।

शादी की पहली सालगिरह आने में बस एक हफ्ता ही बचा था। उस दिन निध‍ि को ऑफिस में एक अहम मीटिंग के कारण देर हो गई। जब वह घर लौटी, तो सुमित्रा देवी ने एक बड़ा तमाशा खड़ा कर दिया और निध‍ि के चरित्र पर उंगली उठा दी। रोहन वहां खड़ा सब सुनता रहा, लेकिन उसने निध‍ि के बचाव में एक शब्द नहीं कहा। बस, उस दिन निध‍ि के सब्र का बांध टूट गया। उसने रात को ही अपना सूटकेस पैक किया और रोहन की तरफ देखते हुए कहा, “जिस रिश्ते में सम्मान और भरोसा न हो, उसे ढोने का कोई मतलब नहीं है। मैं जा रही हूँ रोहन, और बहुत जल्द तुम्हें तलाक के कागज़ात मिल जाएंगे।” निध‍ि उस घर से हमेशा के लिए चली गई।

रोहन ने भारी मन से यह खबर अपनी माँ सुमित्रा देवी को सुनाई। रोहन को लगा था कि उसकी माँ इस बात पर दुखी होंगी, लेकिन सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी और सुकून था। वो तपाक से बोलीं, “अरे बेटा, बहुत अच्छा हुआ! वो एक मॉडर्न कामकाजी लड़की थी, वो कभी हमारे तौर-तरीकों में नहीं ढल सकती थी। क्यों एक ऐसे रिश्ते में रहता तू जिसमें रोज़-रोज़ की चिकचिक हो? चलो, जो हुआ अच्छे के लिए हुआ, एक बड़ी बला टली। अब तू चिंता मत कर, मैं अपनी पसंद की लड़की से तेरी शादी करवाऊंगी, जो इतनी मॉडर्न न हो और घर को स्वर्ग बना कर रखे। तू कुछ दिन के लिए गाँव आ जा, तेरा दिमाग भी शांत हो जाएगा।”

रोहन अपनी माँ की यह बात सुनकर सुन्न रह गया। जिस निध‍ि के जाने से उसका दिल अंदर तक टूट गया था, उसी के जाने पर उसकी माँ जश्न मना रही थीं। रोहन ने भारी मन से अपना सामान पैक करना शुरू किया। गाँव जाने के लिए सूटकेस से कपड़े निकालते वक्त, उसे अलमारी के सबसे निचले हिस्से में एक लाल रंग का लिफाफा मिला। उस पर लिखा था, ‘मेरे रोहन के लिए – हमारी पहली सालगिरह पर’।

रोहन के हाथ कांपने लगे। उसने लिफाफा खोला। अंदर एक ग्रीटिंग कार्ड और कुछ रसीदें थीं। कार्ड में निध‍ि ने लिखा था—”रोहन, जानती हूँ हमारे बीच आजकल बहुत दूरियां आ गई हैं। माँ जी को मेरा खाना पसंद नहीं आता और तुम्हें लगता है कि मैं कोशिश नहीं कर रही। लेकिन पिछले दो महीने से मैं ऑफिस से छुट्टी लेकर छुपकर कुकिंग क्लासेस जा रही थी, ताकि सालगिरह वाले दिन मैं माँ जी और तुम्हारे लिए तुम्हारे गाँव का पारंपरिक खाना अपने हाथों से बना सकूँ और तुम दोनों का दिल जीत सकूँ। मैं तुम्हारे लिए खुद को बदलना चाहती थी रोहन, क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। काश तुमने एक बार मुझ पर भरोसा किया होता।”

उन रसीदों और निध‍ि के शब्दों ने रोहन के दिमाग पर पड़े भ्रम के सारे जाले साफ कर दिए। उसे समझ आ गया कि निध‍ि अपना सौ प्रतिशत दे रही थी, लेकिन उसकी माँ ने अपने अहंकार और नियंत्रण की चाह में उन दोनों के बीच गलतफहमियों की इतनी बड़ी दीवार खड़ी कर दी थी जिसे वो देख ही नहीं पाया। रोहन फूट-फूट कर रोने लगा। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था कि उसने अपनी पत्नी का साथ उस वक्त छोड़ दिया जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।

रोहन ने गाँव जाने का टिकट फाड़ दिया। वह सीधा अपनी माँ के कमरे में गया और बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोला, “माँ, आपने मेरे घर को स्वर्ग बनाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी हुकूमत चलाने के लिए निध‍ि को निकाला है। आपको बहू नहीं, एक कठपुतली चाहिए थी। लेकिन मुझे मेरी पत्नी चाहिए।”

सुमित्रा देवी अवाक रह गईं। रोहन उसी वक्त घर से निकला और सीधा निध‍ि के पीजी पहुंच गया। निध‍ि ने जब दरवाज़ा खोला, तो रोहन उसके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने वो कार्ड निध‍ि के हाथों में रखा और अपने आंसुओं से माफी मांगने लगा। उसने वादा किया कि अब वह कभी किसी तीसरे को उनके रिश्ते के बीच नहीं आने देगा, चाहे वो उसकी खुद की माँ ही क्यों न हो। निध‍ि ने रोहन की आँखों में सच्चा पछतावा देखा। उस रात दोनों ने एक नई शुरुआत करने का फैसला किया, लेकिन इस बार अपने प्यार की शर्तों पर, एक अलग घर में।

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लेखिका : निधि गुप्ता

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