मैली हवेली का उजला सूरज

उस अंधेरी और तूफानी रात में, बिना कोई गहना लिए, बिना कोई धन-दौलत छुए, रागिनी सिर्फ तन पर लिपटी एक साधारण साड़ी में उस विशाल हवेली का भारी दरवाजा लांघकर बाहर निकल गई। पीछे भंवर सिंह की गालियां और धमकियां गूंजती रहीं कि वह भूखों मर जाएगी, लेकिन रागिनी ने एक बार भी पीछे मुड़कर … Read more

राख में दबी चिंगारी

जानकी ने हाथ जोड़कर अत्यंत संयत स्वर में कहा, “अम्माँ जी, आप मेरी सास नहीं, मेरी माँ हैं। बापूजी मेरे पिता हैं। पिछले बारह वर्षों में मैंने इस घर की हर मर्यादा को सिर माथे रखा। पर आज आप मुझसे वह माँग रही हैं जो मेरे पास बचा ही नहीं है। जब इन्होंने एक रात … Read more

जब घर की धड़कन रूठ गई

 “भैया, मुझसे अब नहीं सहा जाता। मुझे बहुत तेज भूख लगी है और मेरा पूरा शरीर दुख रहा है। मां कैसे करती हैं यह सब? सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह बिना रुके चलती रहती हैं। कभी हमारे लिए नाश्ता, कभी पापा का टिफिन, कभी कपड़े धोना, कभी झाड़ू-पोंछा… … Read more

मुखौटे के पीछे का सच

 सामने का नजारा उनकी सोच की धज्जियां उड़ा रहा था। जमीन पर गिरा, धूल में लथपथ, गिड़गिड़ाता हुआ वह शख्स वही सुसंस्कृत, इत्र की खुशबू वाला, सभ्य विक्रम सेठ था, जिसकी नजरें शर्म और खौफ से जमीन में गड़ी थीं। और उसके ऊपर, अपनी जान की परवाह किए बिना उस रईस को दबोचे बैठा वह … Read more

धूप-छाँव की देहरी

“सही कह रही हो मनोरमा। आज की बहुओं को सास-ससुर फूटी आँख नहीं सुहाते। ज़रूर रागिनी ने ही शर्त रखी होगी कि जब तक तुम्हारे माँ-बाप घर खाली नहीं करेंगे, मैं पाँव नहीं रखूँगी। तभी तो बेचारी सुमित्रा को भरी दुपहरी से पहले ही घर छोड़ना पड़ा। ऊपर से नाम लगा दिया बेटी का! अरे … Read more

समझौतों की धूप-छांव

 सत्यनारायण जी की आंखों में अंगारे दहक उठे। उन्होंने भरे गले से कहा, “यह घर तुम्हारी माँ के कंगन और मेरी उम्र भर की कमाई से बना है समर। मर्यादा और संस्कारों से समझौता करने की एक सीमा होती है। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि तुम्हें इस तरह जीना है, तो … Read more

धूप-छाँव का नया सवेरा

अनुराग और वंदना ने आगे बढ़कर एक साथ दोनों के पैर छुए। वंदना की आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसने कहा, “पापा, मम्मी… आज आपने हमें सिखाया कि प्यार सिर्फ जवानी का आकर्षण नहीं होता। असली प्यार तो वह है जो उम्र के पतझड़ में भी एक-दूसरे की छांव बनकर खड़ा रहे। हमें … Read more

ममता की छांव

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने हिम्मत जुटाकर टॉर्च की रोशनी उस अंधेरे कोने में डाली। वहां कोई भूत या साया नहीं था, बल्कि लगभग बारह-तेरह वर्ष का एक दुबला-पतला, मैले कपड़ों में लिपटा लड़का बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए थे और वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था। उसके हाथ में … Read more

धूप की चौखट

“तो फिर आज इस बात से तकलीफ़ क्यों?” रश्मि ने अपनी आवाज़ में दृढ़ता लाते हुए कहा, “इंसान को दूसरों के साथ वही बर्ताव करना चाहिए, जो वह कल अपने लिए चाहता है। कर्म लौटकर ज़रूर आते हैं। अगर हम आज अपने बड़ों को यह संदेश देंगे कि उनका वक़्त ख़त्म हो चुका है और … Read more

लहू की छांव

 आलोक की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने कहा, “सुमित, परिवार मुनाफे और घाटे पर चलने वाली कोई कॉर्पोरेट कंपनी नहीं होती। परिवार एक ऐसा वटवृक्ष होता है जिसकी छांव में जब एक डाल सूखने लगे, तो दूसरी डालियां उसे सहारा देती हैं, उसे काटकर अलग नहीं फेंका जाता। जिस भाई ने अपनी … Read more

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