न्यायाधीश महोदय ने दोनों पक्षों के वकीलों की लंबी बहस सुनी। दोनों ही पक्ष बच्ची को अपने साथ रखने के लिए पूरी तरह सक्षम साबित हो रहे थे। दोनों के पास पैसा था, घर था और सामाजिक रुतबा था। तब न्यायाधीश महोदय ने एक गहरा विचार करते हुए कहा, “कागज़ और दौलत किसी बच्चे के बेहतर पालन-पोषण का अकेला पैमाना नहीं हो सकते। कानून के लिए बच्चे की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा सर्वोपरि है। मैं स्वयं उस बच्ची से बात करना चाहता हूँ।”
बेंगलुरु शहर की रफ्तार आम शहरों से बिल्कुल अलग थी। यहाँ सुबह की पहली किरण सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि लैपटॉप की नीली चमक और अलार्म की तीखी आवाज़ से तय होती थी। ऊँची-ऊँची शीशे की इमारतें, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर, चौड़ी सड़कों पर रेंगती महँगी गाड़ियाँ और उन गाड़ियों के भीतर बैठे ऐसे लोग जिनकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ तरक्की का नशा तैरता था। इसी आधुनिक और बेतहाशा भागती ज़िंदगी के दो अहम चेहरे थे सिद्धांत और अनन्या।
सिद्धांत एक जानी-मानी फिनटेक कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था, वहीं अनन्या एक प्रमुख सॉफ्टवेयर कंसल्टेंसी में सीनियर डायरेक्टर के पद पर आसीन थी। दोनों ने लगभग सात साल पहले प्रेम विवाह किया था। दोनों की सोच, महत्वाकांक्षा और जीवन को देखने का नज़रिया एक जैसा था। वे मानते थे कि जीवन में सफलता का पैमाना केवल इस बात से तय होता है कि आपका बैंक बैलेंस कितना बड़ा है और समाज में आपका ओहदा कितना ऊँचा है। शहर के सबसे पॉश इलाके में उनका पेंटहाउस था, जिसमें स्विमिंग पूल, जिम, होम थिएटर और आधुनिक सुख-सुविधाओं का हर सामान मौजूद था। दोनों का संयुक्त पैकेज साल के करोड़ों रुपयों में था।
सफलता की इस अंधी दौड़ में दिन, महीने और साल कब बीत गए, उन्हें अंदाज़ा ही नहीं हुआ। परिवार के बुज़ुर्गों के लगातार कहने और समझाइश के बाद, शादी के पाँच साल बाद उनके घर एक नन्ही परी ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया मायरा। मायरा के आने से कुछ दिनों के लिए उस बड़े से खाली घर में खिलौनों की खुशबू और बच्चों की हँसी गूंजी। लेकिन यह ठहराव बहुत लंबा नहीं चल सका। कॉर्पोरेट जगत किसी के मातृत्व या पितृत्व के लिए अपनी गति धीमी नहीं करता। अनन्या को मातृत्व अवकाश समाप्त होते ही अपनी पुरानी परियोजना की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए दफ्तर लौटना पड़ा, क्योंकि कंपनी में बड़े फेरबदल हो रहे थे और वह अपनी कुर्सी किसी और को नहीं सौंपना चाहती थी। सिद्धांत भी एक अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट के साथ नई डील फाइनल करने में दिन-रात एक किए हुए था।
सिद्धांत के माता-पिता विदेश में अपने बड़े बेटे के पास बसे हुए थे और वहीं की जीवनशैली में ढल चुके थे, इसलिए उनका यहाँ आकर रहना संभव नहीं था। अनन्या की माँ अकेले रहती थीं और गठिया के पुराने दर्द की वजह से बिस्तर से उठने में भी लाचार थीं। इस स्थिति में एक ही रास्ता नज़र आया—पैसे के दम पर देखभाल खरीदना। एक अत्यंत प्रतिष्ठित और महँगी एजेंसी के ज़रिये एक अनुभवी महिला, प्रभावती जी, को नैनी के रूप में नियुक्त किया गया। सत्तर हज़ार रुपये महीना, एक अलग वातानुकूलित कमरा और सभी सुविधाएँ देकर प्रभावती जी को घर में रखा गया ताकि मायरा की देखरेख में कोई कमी न रहे।
माह बीतते गए। छह महीने की मायरा जब करवट लेना सीख रही थी, तब उसके पास प्रभावती जी थीं। जब उसने पहली बार घुटनों के बल चलना सीखा, तो उस पल की गवाह भी प्रभावती जी ही थीं। अनन्या सुबह सात बजे तैयार होकर निकल जाती थी। जाने से पहले वह पालने में सो रही मायरा के माथे को हल्के से चूमती और अपनी फाइलों के साथ कार में बैठ जाती। सिद्धांत देर रात जब घर लौटता, तो मायरा गहरी नींद में सो चुकी होती थी।
मायरा के लिए माँ का स्पर्श, माँ की आवाज़ और पिता की बाहें केवल धुंधली यादों जैसी थीं। उसके लिए दिन की शुरुआत प्रभावती जी की लोरी से होती थी और रात का अंत उन्हीं की गोद की गर्माहट में। प्रभावती जी एक संवेदनशील, सरल और ममतामयी बुज़ुर्ग महिला थीं। अपने खुद के बच्चों के बड़े होकर दूर चले जाने के बाद, उन्होंने अपनी सारी बची हुई ममता उस नन्ही बच्ची पर उड़ेल दी थी। मायरा जब भी रोती, मचलती या उसे भूख लगती, वह सीधे प्रभावती की साड़ी का पल्लू थाम लेती। कभी कभार अनन्या जब शाम को जल्दी आ जाती और मायरा को गोद में लेने की कोशिश करती, तो बच्ची उसकी गोद में जाने के बजाय प्रभावती की छाती से चिपक जाती। यह देखकर अनन्या कभी-कभी असहज होती, लेकिन अगली ही सुबह के क्लाइंट प्रेज़ेंटेशन की चिंता उसके मातृत्व पर भारी पड़ जाती।
वीकेंड्स यानी शनिवार और इतवार का दिन भी मायरा के लिए कोई खास बदलाव नहीं लाता था। पूरे हफ्ते की थकान उतारने के लिए सिद्धांत और अनन्या दोपहर तक सोते रहते। उठने के बाद उनका शेड्यूल्ड रूटीन शुरू हो जाता—स्पा सेशन, गोल्फ क्लब, जिम, ब्यूटी सैलून और दोस्तों के साथ हाई-प्रोफाइल नेटवर्किंग डिनर। मायरा उस आलीशान फ्लैट के बड़े से हॉल में अपने महँगे रिमोट वाले खिलौनों के बीच बैठी रहती। उसे सिखा दिया गया था कि जब मम्मी-पापा तैयार होकर दरवाजे की तरफ बढ़ें, तो हाथ हिलाकर “बाय-बाय” कहना है। वह एक छोटी सी मशीन की तरह अपना नन्हा हाथ हिला देती और फिर प्रभावती जी के कंधे पर सिर रखकर उन्हें जाते हुए देखती रहती।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। मायरा अब तीन वर्ष की हो चुकी थी। शहर के सबसे महंगे और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्री-स्कूल में उसका दाखिला करा दिया गया था। स्कूल की फीस इतनी थी जितने में एक छोटे शहर का परिवार साल भर आराम से गुज़र-बसर कर ले। लेकिन पैसे कभी भी माता-पिता की मौजूदगी का विकल्प नहीं बन सकते। स्कूल में जब दूसरे बच्चों के माता-पिता उन्हें लेने आते, तो मायरा की आँखें भी भीड़ में किसी जाने-पहचाने चेहरे को तलाशतीं, लेकिन वहाँ हमेशा प्रभावती जी ही उसका बस्ता थामे खड़ी मिलतीं।
मायरा अब धीरे-धीरे चीज़ों को समझने लगी थी। वह अक्सर ज़िद करती कि पापा उसे पार्क लेकर चलें या मम्मी उसे स्कूल छोड़ने जाएँ। लेकिन हर बार जवाब में उसे आश्वासन, डाँट या फिर कोई नया महँगा खिलौना थमा दिया जाता। एक दिन अनन्या ऑफिस की एक बड़ी कॉल पर थी। मायरा ने आकर उसकी बाँह खींची और अपनी ड्राइंग बुक दिखाने की ज़िद करने लगी। झुँझलाहट में अनन्या का हाथ मायरा के नन्हे गाल पर पड़ गया। वह ज़ोर से रो पड़ी। आवाज़ सुनकर सिद्धांत कमरे से बाहर आया, लेकिन उसने बच्ची को चुप कराने के बजाय अनन्या पर चिल्लाना शुरू कर दिया कि वह घर को ठीक से संभाल नहीं पाती। अनन्या ने पलटकर जवाब दिया कि क्या सारा ठेका उसी ने ले रखा है, सिद्धांत भी तो पिता है, वह अपनी ज़िम्मेदारियों से क्यों भागता है।
उस थप्पड़ और उस रोज़ के झगड़े ने जैसे घर की नींव ही हिला दी। धीरे-धीरे दोनों के बीच काम का तनाव, थकान, ईगो और एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारियाँ थोपने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ गई कि घर किसी युद्ध के मैदान में बदल गया। रोज़ की तकरारें, बच्चों के पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में जाने को लेकर बहस और एक-दूसरे के करियर को कम आंकने की आदत ने उनके रिश्ते की बची-खुची डोर को भी तोड़ दिया। प्यार की जगह कड़वाहट ने ले ली और संवाद की जगह सन्नाटे ने।
अंततः वह दिन भी आ गया जब दोनों ने आपसी सहमति से अलग होने का फैसला कर लिया। वकीलों के नोटिस भेजे गए, संपत्तियों का बँटवारा कागज़ों पर तय हो गया। सबसे बड़ा सवाल था तीन साल की मायरा का। दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं था। सिद्धांत का कहना था कि उसके पास बेहतर आर्थिक साधन हैं, वह मायरा को दुनिया की सबसे बेहतरीन ज़िंदगी दे सकता है। अनन्या का तर्क था कि वह माँ है और कानूनन बच्ची की कस्टडी पर उसका पहला हक़ है। दोनों की यह लड़ाई अपने अहंकार को जीतने की लड़ाई ज़्यादा लग रही थी और बच्ची के भविष्य की कम।
फैमिली कोर्ट का वह कमरा बेहद शांत और गंभीर था। चारों तरफ मोटी-मोटी कानून की किताबें, वकीलों की दलीलें और गंभीर चेहरे लिए बैठे न्यायाधीश महोदय। कटघरे के बाहर एक बेंच पर सिद्धांत और अनन्या अपने-अपने वकीलों के साथ बैठे थे। दोनों के चेहरों पर तनाव, अनिद्रा और ज़िद के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे। वहीं थोड़ी दूरी पर प्रभावती जी मायरा को अपनी गोद में लिए बैठी थीं। मायरा गुलाबी फ्रॉक पहने, अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों से उस अजनबी और डरावने माहौल को सहमी हुई नज़रों से देख रही थी।
न्यायाधीश महोदय ने दोनों पक्षों के वकीलों की लंबी बहस सुनी। दोनों ही पक्ष बच्ची को अपने साथ रखने के लिए पूरी तरह सक्षम साबित हो रहे थे। दोनों के पास पैसा था, घर था और सामाजिक रुतबा था। तब न्यायाधीश महोदय ने एक गहरा विचार करते हुए कहा, “कागज़ और दौलत किसी बच्चे के बेहतर पालन-पोषण का अकेला पैमाना नहीं हो सकते। कानून के लिए बच्चे की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा सर्वोपरि है। मैं स्वयं उस बच्ची से बात करना चाहता हूँ।”
न्यायाधीश महोदय ने अपने चेंबर के बजाय अदालत के खुले और शांत हिस्से में मायरा को अपने पास बुलाया। प्रभावती जी धीरे से मायरा का हाथ पकड़कर आगे ले आईं। जज साहब ने मुस्कुराते हुए अपनी मेज़ से एक चॉकलेट उठाई और मायरा की तरफ बढ़ाई। मायरा ने संकोच से चॉकलेट ले ली।
जज साहब ने बहुत ही कोमल और वात्सल्य भरे स्वर में पूछा, “मायरा बेटा, आप बहुत प्यारी बच्ची हो। मुझे एक बात बताओ, अगर आपको किसी एक के साथ रहना हो, तो आप किसके पास रहना पसंद करोगी? अपनी प्यारी मम्मी के पास, या अपने अच्छे पापा के पास?”
अदालत के उस विशाल कमरे में अचानक एक गहरा सन्नाटा छा गया। सिद्धांत की साँसें जैसे थम सी गईं। अनन्या ने अपने दोनों हाथ भींच लिए, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। दोनों को पूरा भरोसा था कि खून का रिश्ता अपना असर दिखाएगा और बच्ची उन्हीं में से किसी एक का नाम लेगी।
मायरा चुपचाप खड़ी रही। उसने अपनी मासूम, गोल-मटोल आँखों से पहले अपनी दाईं ओर देखा, जहाँ उसकी माँ अनन्या की आँखें उम्मीद से भरी थीं। फिर उसने बाईं ओर देखा, जहाँ उसके पिता सिद्धांत एकटक उसे देख रहे थे। दोनों चेहरों पर मायरा के लिए प्यार तो था, लेकिन उस प्यार में बीते तीन सालों की अनुपस्थिति की एक बहुत गहरी खाई थी।
मायरा ने उन दोनों चेहरों को देखा, लेकिन उसके चेहरे पर कोई पहचान भरी मुस्कान नहीं उभरी। उसने धीरे से अपने कदम पीछे खींचे। उसने पीछे मुड़कर देखा, जहाँ कुछ दूरी पर सफेद सूती साड़ी पहने प्रभावती जी अपनी भीगी आँखों से उसे देख रही थीं। मायरा के चेहरे पर अचानक वही जानी-पहचानी सुरक्षा और सुकून का भाव लौट आया जो एक बच्चा अपनी माँ की गोद में महसूस करता है।
मायरा बिना एक पल गँवाए तेज़ी से दौड़ पड़ी। वह न तो सिद्धांत की तरफ गई, न ही अनन्या की तरफ। वह सीधे जाकर प्रभावती जी के घुटनों से लिपट गई और उनकी साड़ी में अपना मुँह छिपाते हुए सिसक कर बोली, “मुझे आजी माँ के पास रहना है… मुझे घर नहीं जाना, मुझे बस आजी माँ की गोदी में रहना है!”
वृद्ध प्रभावती जी अपने आँसू नहीं रोक पाईं। उन्होंने झुककर उस नन्ही जान को अपनी छाती से चिपका लिया, उसके सिर को सहलाया और फूट-फूट कर रो पड़ीं। “मेरी बच्ची… मेरी जान…” उनके मुँह से केवल यही शब्द निकल पाए।
अदालत के उस सन्नाटे में बच्ची की वह मासूम आवाज़ किसी भारी हथौड़े की तरह गूंजी। सिद्धांत और अनन्या अपनी जगह पर मानो पत्थर के बुत बन गए। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी।
यह दृश्य उन दोनों के अंतर्मन को भीतर तक चीर गया। जिस बच्ची को वे अपनी जागीर समझकर अदालत में लड़ रहे थे, उसके दिल में उन दोनों के लिए कोई जगह ही नहीं थी। उन्होंने जिस दौलत, जिन पैकेज और जिस स्टेटस के लिए अपने जीवन के सारे पल कुर्बान कर दिए थे, उस दौलत ने उनकी कोख से जन्मी औलाद को ही उनसे पराया कर दिया था। मायरा के लिए माँ कोई जन्म देने वाली औरत नहीं थी, बल्कि वह हाथ थे जो उसे खाना खिलाते थे, जो रात को बुखार में उसके माथे पर गीली पट्टी रखते थे। मायरा के लिए पिता वह नहीं था जो हज़ारों के खिलौने लाता था, बल्कि वह था जो उसके साथ बैठकर बात करता था।
अनन्या के सब्र का बाँध टूट गया। वह वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और अपने दोनों हाथों से मुँह ढककर फफक-फफक कर रोने लगी। उसकी आत्मा पर जैसे किसी ने सच का आईना दे मारा था। सिद्धांत ने अपनी कांपती उंगलियों से अपना माथा पकड़ लिया। उसकी आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। वह कॉर्पोरेट जगत का एक बड़ा अधिकारी था, जो हज़ारों लोगों को निर्देश देता था, लेकिन एक पिता के रूप में वह पूरी तरह से कंगाल साबित हो चुका था।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। आँखों ही आँखों में बरसों की कड़वाहट, गुस्सा और ईगो बहते हुए आंसुओं में पिघलकर बह गया। आज पहली बार उन्हें समझ आया कि उनकी असली हार कहाँ हुई थी। वे एक-दूसरे से जीतने की कोशिश में अपनी सबसे अनमोल धरोहर को गँवा चुके थे।
सिद्धांत धीरे-धीरे चलकर अनन्या के पास पहुँचा। उसने अपना कांपता हुआ हाथ अनन्या के कंधे पर रखा। अनन्या ने ऊपर देखा और दोनों ने बिना एक शब्द कहे एक-दूसरे से उन अनकहे अपराधों की माफी मांग ली जो वे एक-दूसरे के और अपनी बच्ची के खिलाफ अनजाने में करते आ रहे थे। दोनों ने अपनी आँखों से एक-दूसरे को यह भरोसा दिलाया कि अब और नहीं… अब इस बिखरी हुई ज़िंदगी को फिर से समेटना ही होगा।
वे दोनों उठे और एक साथ, धीमे कदमों से प्रभावती जी की ओर बढ़े। मायरा अभी भी प्रभावती के आंचल में मुँह छिपाए हुए थी। सिद्धांत और अनन्या दोनों उस नन्ही बच्ची के सामने ज़मीन पर बैठ गए। अनन्या ने बहुत ही भीगे हुए, कोमल स्वर में पुकारा, “मायरा… मेरी बच्ची…”
मायरा ने धीरे से मुँह घुमाकर अपनी माँ की तरफ देखा। अनन्या की आँखों में पश्चाताप का गहरा समंदर था। सिद्धांत ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए और रुंधे हुए गले से कहा, “पापा को माफ कर दो बेटा… पापा अब आपको कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। कभी आपसे दूर नहीं जाएँगे।”
अनन्या ने भी अपनी बाँहें फैला दीं। मायरा ने अपनी दोनों नन्ही हथेलियों से अपनी माँ के गालों पर बहते आँसू पोंछे, फिर अपने पिता की उंगली पकड़ ली। उस नन्हे से स्पर्श ने उन दोनों के भीतर के सारे घावों को जैसे एक पल में भर दिया। मायरा की सूनी आँखों में एक चमक कौंधी और वह अपनी दोनों छोटी बाहें फैलाकर उन दोनों के सीने से चिपक गई। परिवार का वह अधूरा वृत्त आज पहली बार पूरा हो गया था।
कोर्ट रूम में बैठे न्यायाधीश, दोनों पक्षों के वकील और वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें इस मार्मिक दृश्य को देखकर नम हो गईं। किसी के चेहरे पर कानून की औपचारिकता नहीं बची थी, हर कोई उस प्रेम के पुनर्जन्म का गवाह बन रहा था। पूरे कमरे में एक राहत भरी खामोशी और फिर वकीलों और उपस्थित लोगों की धीमी तालियों की गूँज फैल गई।
सिद्धांत और अनन्या ने तुरंत अपने वकीलों से कागज़ात वापस लेने को कहा। उन्होंने न्यायाधीश महोदय के सामने सिर झुकाकर वादा किया कि अब से उनकी ज़िंदगी की प्राथमिकता कोई पद या कंपनी नहीं, बल्कि उनका परिवार और उनकी बेटी होगी। उन्होंने प्रभावती जी के हाथ जोड़कर उनका आभार व्यक्त किया और यह तय किया कि प्रभावती जी अब केवल एक आया बनकर नहीं, बल्कि उस घर की बुज़ुर्ग सदस्य, यानी मायरा की ‘आजी’ बनकर हमेशा उनके साथ ही रहेंगी।
उस दिन अदालत की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए सिद्धांत और अनन्या के कदम हल्के थे। उनके हाथों में अपनी बेटी का नन्हा हाथ था। धूप पहले जैसी ही तेज़ थी, शहर की गाड़ियाँ उसी रफ्तार से दौड़ रही थीं, लेकिन उस परिवार के भीतर भागती हुई अंधी दौड़ हमेशा के लिए थम चुकी थी। उन्होंने समझ लिया था कि दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी उस सुकून को नहीं खरीद सकती जो अपनों के साथ बिताए दो पलों में मिलता है।
प्रिय पाठकों, आज की इस भागदौड़ भरी कॉर्पोरेट ज़िंदगी में क्या हम भी अपने बच्चों को महंगे खिलौने और गैजेट्स देकर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं? क्या पैसे की अंधी दौड़ में हमारे पारिवारिक रिश्ते और बच्चों का मासूम बचपन कहीं पीछे छूटता जा रहा है? इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके ज़रूर बताएँ।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद