कविता मन ही मन सोचने लगी कि आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी परेशानियों में टूट जाते हैं, अपनों से शिकायतें करने लगते हैं और अकेलेपन का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं यह दोनों बुजुर्ग कितने आत्मविश्वासी और संतुष्ट हैं। वे अपनी ढलती उम्र को किसी लाचारी की तरह नहीं, बल्कि एक सुंदर उत्सव की तरह जी रहे थे। उसने सोचा कि काश, जब वह और उसका परिवार भी कभी जीवन के इस मोड़ पर पहुंचे, तो उनके भीतर भी ऐसी ही आत्मनिर्भरता, ऐसा ही संतोष और एक-दूसरे के प्रति ऐसा ही अटूट समर्पण हो। जहां किसी तीसरे सहारे की प्रतीक्षा करने के बजाय इंसान खुद में ही संपूर्ण रहे।
शाम के करीब चार बज रहे थे। आकाश में हल्की-हल्की बादलों की परत थी और फ्लैट की तीसरी मंजिल की बालकनी में लगे चमेली के पौधों से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। दरवाजे की घंटी की टन-टनाहट सुन कर मनोरमा जी ने छड़ी को एक तरफ टिकाया और आहिस्ता-आहिस्ता कदमों से मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ीं। उनके दाहिने पैर में घुटने के नीचे एक सफेद रंग का प्लास्टर बंधा हुआ था। दरवाजे की जाली से बाहर झांका तो पड़ोस के डी-ब्लॉक में रहने वाली कविता खड़ी थी। चेहरे पर चिर-परिचित सादगी और हल्की मुस्कान लिए।
दरवाजा खोलते ही कविता ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। मनोरमा जी के चेहरे पर भी वात्सल्य भरी चमक आ गई। मनोरमा जी और उनके पति सदानंद जी दोनों लगभग सत्तर के करीब पहुंच चुके थे। सदानंद जी शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे। रिटायरमेंट के कई सालों बाद जब पुराना पैतृक मकान बहुत बड़ा लगने लगा और उसकी देखभाल करना उम्र के साथ भारी पड़ने लगा, तो उन्होंने शहर के उसी छोर पर एक शांत बहुमंजिला अपार्टमेंट में दो कमरों का छोटा सा फ्लैट ले लिया। उनका बेटा अनिकेत बैंगलोर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और बेटी स्निग्धा अपने परिवार के साथ कनाडा में बस चुकी थी। दोनों बच्चे अक्सर माता-पिता को अपने साथ रहने का आग्रह करते रहते, लेकिन सदानंद जी की जड़ें इसी मिट्टी से जुड़ी थीं। वे अपने शहर, अपनी पुरानी यादों और अपनी स्वतंत्र दिनचर्या को छोड़ना नहीं चाहते थे। बच्चों ने भी जब देखा कि माता-पिता अपनी ही दुनिया में ज्यादा तृप्त हैं, तो उन्होंने इसी सुरक्षित सोसायटी में उनके लिए यह आशियाना तय करवा दिया था ताकि सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कोई चिंता न रहे।
सोसायटी के दर्जनों परिवारों के बीच यह वृद्ध जोड़ा अपनी ही धुन में मगन रहता था। गिने-चुने लोगों से ही उनका मिलना-जुलना था और उन्हीं में से एक थी कविता। कविता एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाती थी और उसकी उम्र भी लगभग स्निग्धा जितनी ही थी। महीने-दो महीने में जब भी उसे फुरसत मिलती, वह मनोरमा जी से मिलने जरूर आ जाती। कभी कोई किताब लौटाने, कभी यूं ही दो बातें करने।
“प्रणाम मौसी जी! अरे यह क्या? आपके पैर में यह प्लास्टर कैसे बंध गया?” कविता ने कमरे में कदम रखते ही चौंकते हुए पूछा। उसकी निगाहें सीधे मनोरमा जी के बंधे हुए पैर पर टिक गई थीं।
मनोरमा जी ने उसे सोफे पर बैठने का इशारा किया और खुद भी धीरे से पास की आरामकुर्सी पर बैठते हुए मुस्कुराईं, “आओ बेटी, बैठो। कुछ खास नहीं, बस पिछले इतवार को बालकनी में गमलों को पानी देते हुए पैर जरा सा फिसल गया। हल्की सी हेयरलाइन फ्रैक्चर आ गई। डॉक्टर बाबू ने कहा है कि तीन हफ्ते तक पैर पर ज्यादा जोर न दें, बाकी सब कुशल-मंगल है। तुम बताओ, तुम्हारा कॉलेज कैसा चल रहा है? बहुत दिनों बाद आई।”
कविता की नजरें अभी भी चिंता से भरी हुई थीं। उसने तुरंत पूछा, “मौसी जी, आप तो घर का सारा काम खुद ही संभालती थीं। खाना बनाना, साफ-सफाई… अब जब डॉक्टर ने चलने-फिरने से मना किया है, तो यह सब कैसे हो रहा है? भैया और दीदी को खबर दी आपने? अनिकेत भैया तो आ ही सकते थे कुछ दिन के लिए।”
मनोरमा जी ने अपने पल्लू को ठीक करते हुए सहज भाव से कहा, “अरे नहीं कविता, अनिकेत को नाहक परेशान करके क्या मिलता? अभी पिछले महीने ही तो वह अपनी कंपनी के किसी बड़े प्रोजेक्ट में उलझा था। स्निग्धा के भी बच्चों के इम्तिहान चल रहे हैं। इतनी छोटी सी बात के लिए वे हजारों किलोमीटर का सफर तय करके भागते हुए आते, दफ्तर से छुट्टियां लेते, उनका सारा काम अस्त-व्यस्त हो जाता। जब कोई गंभीर बात हो तब तो समझ आता है, पर इस उम्र में ऐसी छोटी-मोटी चोटें तो लगती ही रहती हैं। ऊपर वाले की दया से सब संभल रहा है।”
“लेकिन खाना कौन बना रहा है मौसी जी? मौसा जी तो कभी रसोई के पास भी नहीं फटकते थे ना? और आपके हाथ के बिना तो वे एक निवाला भी नहीं खाते।” कविता ने आश्चर्य से पूछा।
मनोरमा जी हंस पड़ीं, उनके चेहरे की झुर्रियों में एक गहरी आत्मीयता तैर गई। बोलीं, “वही तो सबसे मजेदार बात है। अब तुम्हारे मौसा जी पूरी तरह बावर्ची बन गए हैं। सुबह उठते ही चाय का पानी चढ़ा देते हैं। फिर मैं यहीं बैठक में बैठी-बैठी बताती जाती हूं कि दाल में कितना नमक डलेगा, हल्दी कितनी जाएगी, और वे चौके में खड़े होकर बड़े चाव से चमचा चलाते हैं। दाल-चावल तो उन्होंने पहले ही दिन सीख लिया। रोटी बेलने में पहले दो दिन थोड़ी दिक्कत हुई, नक्शा भारत से बाहर का बन रहा था, पर अब तो गोल-गोल रोटियां सेक लेते हैं। मैंने तो कहा भी था कि नीचे वाली कामवाली से कह देती हूं, पंद्रह दिन के लिए खाना बना जाएगी। पर तुम्हारे मौसा जी का उसूल जानते ही हो, जब तक अपने हाथ-पैर चल रहे हैं, किसी और की मोहताजी क्यों पालनी। कहते हैं कि दो प्राणियों का खाना ही कितना होता है, थोड़ा समय लगेगा पर हम खुद ही कर लेंगे।”
कविता ने जब यह सुना तो उसकी आंखों में हैरानी के साथ-साथ श्रद्धा का भाव उभर आया। उसने झिझकते हुए कहा, “मौसी जी, आप मुझे एक फोन कर देतीं। मैं तो पास के ही ब्लॉक में रहती हूं। रोज सुबह-शाम आपके लिए टिफिन तैयार करके भिजवा देती। मुझे बिल्कुल भी परेशानी नहीं होती।”
“जानती हूं बेटी, तुम्हारा दिल बहुत साफ है। पर तुम भी तो सुबह से शाम तक कॉलेज में व्यस्त रहती हो, घर आकर खुद थक जाती होगी। फिर हमारे स्वाभिमान को भी तो समझो, जब तक ईश्वर ने हमारे साथी को स्वस्थ रखा है, हम एक-दूसरे का सहारा क्यों न बनें? यह जो जीवन का सांझ का समय होता है ना कविता, इसमें एक-दूसरे के काम आना ही तो असली पूजा है। कभी मैंने उनकी सेवा की, आज वे मेरी तीमारदारी कर रहे हैं। इसमें जो एक अनोखा सुख और अपनापन है, वह बाहर के बने-बनाए खाने में कहां मिलेगा?” मनोरमा जी ने इतने शांत और संतुष्ट स्वर में कहा कि कविता निरुत्तर हो गई।
तभी अंदर के कमरे से सफेद कुर्ते-पायजामे में सदानंद जी हाथ में चश्मा लिए बाहर बैठक में आए। चेहरे पर वही चिर-परिचित सौम्यता और आंखों में जीवन का अनुभव।
“अरे कविता बेटी! तुम कब आईं? बहुत अच्छा हुआ जो आ गईं। देखो जरा अपनी मौसी को, दिन भर हुक्म चलाती रहती हैं मुझ पर। कहती हैं राई ज्यादा चटक गई, धनिया बाद में डालना था।” सदानंद जी ने हंसते हुए चुटकी ली।
कविता मुस्कुरा उठी, “मौसा जी, मौसी जी तो आपकी तारीफों के पुल बांध रही थीं कि आप बहुत स्वादिष्ट खाना बनाने लगे हैं। पर मुझे बहुत संकोच हो रहा है कि आपको इस उम्र में रसोई संभालनी पड़ रही है।”
सदानंद जी ने चश्मा अपनी जेब में रखा और सोफे के हत्थे पर हाथ टिकाते हुए बोले, “संकोच कैसा बेटी? यह तो हमारे लिए एक नया इम्तिहान है और सच कहूं तो मुझे बड़ा मजा आ रहा है। चालीस साल तक तुम्हारी मौसी ने मुझे बिना मांगे थाली सजाकर दी। कभी मैंने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि आटा कैसे गूंथा जाता है या दाल में छौंक कैसे लगता है। अब जाकर समझ आया कि रसोई का काम कोई छोटा काम नहीं है, यह तो एक कला है। और फिर जब हम दोनों एक साथ हैं, तो कोई भी काम बोझ कैसे लग सकता है? तुम बैठो, मैं तुम्हारे लिए आज अपने खास हाथ की अदरक और इलायची वाली चाय बनाकर लाता हूं।”
“अरे नहीं मौसा जी, आप बैठिए। चाय मैं बना लाती हूं, मुझे पता है रसोई में डिब्बे कहां रखे हैं।” कविता उठते हुए बोली।
“बिल्कुल नहीं! हमारे घर मेहमान आए और हम उसे चाय न पिलाएं, यह तो हो ही नहीं सकता। और आज तो तुम्हें मेरे हुनर का नमूना देखना ही पड़ेगा। बैठो तुम दोनों, बस पांच मिनट लगेंगे।” सदानंद जी ने लाड़ भरे अधिकार से कहा और गुनगुनाते हुए रसोई की तरफ बढ़ गए।
कविता खामोशी से उन्हें जाते हुए देखती रही। उसने अपने आसपास देखा। छोटा सा घर, बेहद सीमित सामान, लेकिन हर कोने से एक अजीब सा सुकून और गरिमा झलक रही थी। न कोई शिकायत, न बच्चों के दूर होने का मलाल, न बीमारी का रोना-धोना और न ही किसी पर निर्भर होने की लाचारी। जीवन की तमाम आपाधापी और आधुनिक दिखावे से परे, यह जोड़ा एक-दूसरे की शक्ति बना हुआ था। एक पैर से लाचार थीं तो दूसरे ने उनकी लाठी बनकर पूरा घर संभाल लिया था।
कविता मन ही मन सोचने लगी कि आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी परेशानियों में टूट जाते हैं, अपनों से शिकायतें करने लगते हैं और अकेलेपन का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं यह दोनों बुजुर्ग कितने आत्मविश्वासी और संतुष्ट हैं। वे अपनी ढलती उम्र को किसी लाचारी की तरह नहीं, बल्कि एक सुंदर उत्सव की तरह जी रहे थे। उसने सोचा कि काश, जब वह और उसका परिवार भी कभी जीवन के इस मोड़ पर पहुंचे, तो उनके भीतर भी ऐसी ही आत्मनिर्भरता, ऐसा ही संतोष और एक-दूसरे के प्रति ऐसा ही अटूट समर्पण हो। जहां किसी तीसरे सहारे की प्रतीक्षा करने के बजाय इंसान खुद में ही संपूर्ण रहे।
कुछ ही देर में सदानंद जी एक ट्रे में तीन कप चाय और बिस्कुट लेकर बाहर आ गए। चाय से उठती सौंधी खुशबू पूरे कमरे में फैल गई थी।
“लीजिए भाई, गरमा-गरम चाय हाजिर है। पीकर बताओ कि मास्टर जी चाय बनाने में पास हुए या फेल।” सदानंद जी ने मुस्कुराते हुए कप आगे बढ़ाए।
मनोरमा जी ने पति की ओर एक प्यार भरी कृतज्ञ दृष्टि से देखा और कविता ने कप थामते हुए महसूस किया कि यह सिर्फ चाय नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और जीवन की सबसे सुंदर सीख से भरा हुआ एक अनमोल घूंट था।
जीवन के इस पड़ाव पर जहां कई लोग अपनों की दूरी को अपनी बेबसी बना लेते हैं, वहीं कुछ लोग अपने भीतर के प्रेम और स्वाभिमान से हर मुश्किल को सहज बना देते हैं। आपको क्या लगता है, क्या आज के समय में बुजुर्गों का यह आत्मनिर्भर रवैया और एक-दूसरे का सच्चा साथी बनना ही असली सुख की कुंजी है? या फिर बच्चों को अपनी व्यस्तताओं को छोड़कर हर हाल में माता-पिता के पास ही रहना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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