नैना ने नज़रें चुराते हुए कहा, “नहीं दीदी… समर बहुत अच्छे हैं। वो मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। लेकिन समस्या वो नहीं, उनका परिवार है। मैं शादी के बाद अपनी तरह से जीना चाहती थी। मैं क्यों किसी के खाने-पीने, दवाइयों और तौर-तरीकों के हिसाब से अपनी ज़िंदगी ढालूं? सलोनी का हर वक्त घर में रहना, सासू माँ का टोकना… मुझे घुटन होती है दीदी।”
दोपहर के करीब तीन बज रहे थे। बालकनी में रखी अपनी पसंदीदा आर्मचेयर पर बैठी अवंतिका के हाथ में चाय का कप कब का ठंडा हो चुका था। खिड़की से छनकर आती धूप अब धीरे-धीरे दीवार पर तिरछी हो रही थी, लेकिन अवंतिका का मन किसी गहरे, अनसुलझे भंवर में उलझा हुआ था। अभी आधा घंटा पहले ही उसकी बड़ी बहन रागिनी का फोन आया था। रागिनी की आवाज़ में जो हड़बड़ाहट, बेबसी और भारीपन था, वह अवंतिका के कानों में लगातार गूंज रहा था। रागिनी ने बताया था कि उनके चाचा जी की लाडली बेटी, नैना, अपने वैवाहिक जीवन को हमेशा के लिए समाप्त करने जा रही है। उसने अपने पति समर के खिलाफ तलाक की अर्जी दाखिल करने का अंतिम मन बना लिया है।
यह खबर अवंतिका के लिए किसी अप्रत्याशित आघात से कम नहीं थी। अभी बमुश्किल डेढ़ साल ही तो हुआ था नैना के ब्याह को। कितनी धूमधाम, गाजे-बाजे और शानो-शौकत के साथ चाचा जी ने अपनी इकलौती बेटी को विदा किया था। समर जैसे दामाद को पाकर पूरा परिवार खुद को भाग्यशाली समझ रहा था। बेंगलुरु में एक प्रसिद्ध टेक कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत समर न सिर्फ आर्थिक रूप से बेहद संपन्न था, बल्कि स्वभाव से भी अत्यंत सौम्य, संस्कारी और सुलझा हुआ इंसान था। उसकी बातचीत में ठहराव था और आँखों में बड़ों के प्रति आदर।
समर के परिवार में उसकी बुजुर्ग मां थीं, जो घुटनों के दर्द से परेशान रहती थीं, और उसकी एक छोटी बहन सलोनी थी, जो अपनी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही थी। समर के पिता का देहांत उसके इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में ही हो गया था। उस कठिन दौर में समर ने ट्यूशन पढ़ा-पढ़ाकर, दिन-रात मेहनत करके न केवल अपनी डिग्री पूरी की, बल्कि अपनी मां को संभाला और बहन की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। पिता की असमय विदाई के बाद उस घर की हर जिम्मेदारी समर के कंधों पर आ गई थी, जिसे उसने कभी बोझ नहीं, बल्कि अपना पावन धर्म समझा।
अवंतिका ने जब रागिनी से इस अलगाव की वजह जाननी चाही, तो जो उत्तर मिला, उसने उसे भीतर तक झकझोर दिया। रागिनी ने बताया कि नैना को समर की मां और बहन की उस घर में मौजूदगी अपनी आज़ादी पर बंदिश जैसी लगती थी। नैना कॉर्पोरेट कल्चर में पली-बढ़ी, स्वतंत्र विचारों वाली युवती थी। वह चाहती थी कि शादी के बाद वे दोनों एक अलग फ्लैट में रहें, जहां कोई रोक-टोक न हो, जब चाहे देर रात पार्टियां हों, वीकेंड्स पर बिना किसी जिम्मेदारी के बाहर जाया जा सके और घर की व्यवस्था केवल उसके मनमुताबिक चले।
नैना का तर्क था कि समर अपनी मां और बहन के लिए अलग घर की व्यवस्था कर दे, उनका पूरा खर्च उठाए, पर साथ न रहे। लेकिन समर के लिए अपनी उस बुजुर्ग मां को अलग कर देना असंभव था, जिसने अपनी चूड़ियां बेचकर उसकी फीस भरी थी। साथ ही सलोनी अभी पढ़ाई कर रही थी, उसे अपने बड़े भाई के साए और मार्गदर्शन की जरूरत थी। समर ने नैना को बार-बार समझाया कि परिवार कोई दीवार नहीं होता जो आज़ादी को रोके, बल्कि वह तो वह छत है जो हर धूप-छांव में सहारा देती है। लेकिन नैना अपनी इस ज़िद पर अड़ी रही कि “या तो तुम्हारी मां-बहन इस घर में रहेंगी, या मैं।” रोज़-रोज़ के तानों, मनमुटाव और मानसिक तनाव से तंग आकर नैना अपना सामान समेटकर मायके आ गई थी और अब दोनों परिवारों के बीच अदालती अलगाव की बातें चल रही थीं।
अवंतिका अपनी जगह से उठी और बालकनी की रेलिंग पकड़कर दूर आसमान को देखने लगी। उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी और क्रोध की लहर दौड़ गई। उसने सोचा, “आखिर आज की पीढ़ी को हो क्या गया है? जहां थोड़ी सी समझदारी, थोड़ा सा धीरज और प्रेम से एक पूरा घर स्वर्ग बन सकता था, वहां सिर्फ अपने ‘अहं’ और ‘निजी स्पेस’ के नाम पर इतने प्यारे और जिम्मेदार इंसान को ठुकराया जा रहा है!”
अचानक अवंतिका की स्मृति के पटल पर अपने ही परिवार के पुराने पन्ने फड़फड़ाने लगे।
उसे अपनी माँ, सावित्री देवी, की याद आई। सावित्री देवी एक बेहद सीधे-सादे, ग्रामीण पृष्ठभूमि के परिवार से थीं। उन्होंने किसी तरह दसवीं तक की पढ़ाई की थी और उनका सारा संसार घर, रसोई और संस्कारों तक ही सीमित था। दूसरी ओर, अवंतिका के पिताजी, प्रोफ़ेसर देवेश शास्त्री, शहर के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष थे। देश-विदेश के सेमिनारों में उनके शोध पत्र पढ़े जाते थे। अंग्रेज़ी और अर्थशास्त्र के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद, पिताजी ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी एक क्षण के लिए भी माँ को यह महसूस नहीं होने दिया कि वे उनसे कमतर हैं।
अवंतिका को अच्छी तरह याद था, जब भी यूनिवर्सिटी के कुलपति या विदेशी प्रोफ़ेसर घर आते, तो पिताजी बड़े गर्व के साथ माँ का परिचय अपनी धर्मपत्नी के रूप में कराते। माँ अपनी सादगी में हाथ जोड़कर मुस्कुरातीं और सभी के लिए अपने हाथों से स्वादिष्ट व्यंजन बनातीं। कई बार माँ अंग्रेज़ी के कठिन शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाती थीं, पर पिताजी कभी झेंपे नहीं, बल्कि प्रेम से मुस्कुराकर बात को संभाल लेते थे। माँ ने भी कभी यह हीनभावना नहीं पाली; उन्होंने पिताजी के अध्ययन, उनकी किताबों और उनकी दिनचर्या को अपनी साधना बना लिया। वह कोई बराबरी की होड़ नहीं थी, वह तो दो बिल्कुल अलग व्यक्तित्वों का एक-दूसरे में घुल-मिल जाना था।
फिर अवंतिका की आँखों के सामने अपनी मौसी, कल्याणी जी, का चेहरा घूम गया। कल्याणी मौसी अपने समय की गज़ब की सुंदरी थीं। तीखे नैन-नक्श, गोरा रंग और साथ ही संगीत में पोस्ट ग्रेजुएट। उस ज़माने में जब लड़कियों की शादियाँ कम उम्र में कर दी जाती थीं, मौसी ने शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल की थी। उनके लिए कई बड़े घरानों से रिश्ते आए थे, लेकिन भाग्य का खेल देखिए, उनका विवाह अवंतिका के मौसा जी, हरिशंकर जी से हुआ।
मौसा जी का अपना कपड़ों का एक छोटा सा थोक व्यापार था। स्वभाव से बेहद सीधे, कद-काठी में साधारण, रंग सांवला और पढ़ाई के नाम पर सिर्फ किसी तरह आठवीं पास। कहाँ कल्याणी मौसी का वह परिष्कृत संगीत और कहाँ मौसा जी का दिन-रात बही-खातों और गद्दों पर बैठकर हिसाब लगाना। देखने में वह पूरी तरह से एक ‘बेमेल’ जोड़ी थी। मोहल्ले की औरतें दबी ज़ुबान में कहती थीं कि रूपवती कल्याणी का भाग्य कैसा फूटा। लेकिन मौसी ने कभी किसी की बात पर कान नहीं दिया।
मौसी ने मौसा जी की ईमानदारी, उनकी निश्छल आँखों और उनके भीतर छिपे अथाह प्रेम को पहचाना। मौसा जी जब बाज़ार से थके-हारे लौटते, तो मौसी उनके लिए चाय बनाकर लातीं और चुपचाप उनके सिर पर हाथ फेर देतीं। मौसा जी भी मौसी के संगीत का इतना आदर करते थे कि उन्होंने अपनी सीमित कमाई से मौसी के लिए एक शानदार तानपूरा लाकर दिया था। मौसा जी को राग-रागिनियों की समझ नहीं थी, लेकिन जब मौसी रियाज़ करतीं, तो वे एक कोने में बैठकर मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहते। दोनों ने मिलकर अपने तीन बच्चों को पाला, उन्हें उच्च शिक्षा दिलाई और आज भी दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे शाम को मंदिर जाते हैं। क्या वहाँ समझौते नहीं थे? बिल्कुल थे! लेकिन उन समझौतों में कोई मजबूरी या कड़वाहट नहीं थी, बल्कि एक-दूसरे के प्रति अगाध निष्ठा और आदर था।
और फिर अवंतिका को अपनी दादी जानकी देवी का स्मरण हो आया। दादी के दौर में तो लड़की से उसकी पसंद पूछना तो दूर, शादी के मंडप में ही पहली बार पति का चेहरा देखने को मिलता था। दादाजी बेहद कड़क मिज़ाज, अनुशासनप्रिय और बड़े संयुक्त परिवार के मुखिया थे। घर में आठ देवर-जेठ, सास-ससुर और दर्जनों रिश्तेदार। दादी ने अपनी पूरी जवानी उस भरे-पूरे चौके-चूल्हे में झोंक दी। सुबह चार बजे उठकर रात के ग्यारह बजे तक बिना किसी शिकायत के सबकी सेवा करना ही उनकी दिनचर्या थी। दादाजी कभी सबके सामने खुलकर प्रेम नहीं जताते थे, पर जब दादी बीमार पड़तीं, तो पूरी रात जागकर उनके सिरहाने बैठे रहते थे। दादी कहती थीं, “रिश्ते कच्ची मिट्टी की हांडी की तरह होते हैं, ज़रा सी आंच लगी नहीं कि चटक जाते हैं। उन्हें पकाने के लिए सब्र की आंच चाहिए होती है, आग का शोला नहीं।”
उस पुरानी पीढ़ी के पास न तो डिग्रियां थीं, न आधुनिक मनोवैज्ञानिक परिभाषाएं, और न ही ‘मी-टाइम’ जैसी कोई अवधारणा। लेकिन उनके पास एक चीज़ थी—’निभाने की ज़िद’। उनके शब्दकोश में ‘तलाक’ या ‘डाइवोर्स’ नाम की कोई जगह ही नहीं थी। वे जानती थीं कि इंसान संपूर्ण नहीं होता, हर किसी में कमियां होती हैं, और दो अलग-अलग माहौल से आए लोगों के बीच विचार मिलना हमेशा संभव नहीं होता। लेकिन वे कमियों को तराशती थीं, उन्हें तोड़ती नहीं थीं।
और आज? अवंतिका ने ठंडी सांस भरी। आज ज़रा सी बात पर, एक छोटे से अहंकार के टकराव पर, या अपने आराम में तनिक सी रुकावट आते ही लोग सात फेरों के पवित्र वचनों को कचरे के डिब्बे में फेंकने को तैयार हो जाते हैं। आज़ादी का मतलब अपनों को छोड़ देना कब से हो गया? क्या किसी की माँ का बेटा होना उसका गुनाह है?
अवंतिका को लगा कि वह चुप नहीं बैठ सकती। नैना सिर्फ उसकी चचेरी बहन नहीं थी, उसने बचपन में अवंतिका की उंगली पकड़कर चलना सीखा था। अगर आज वह गलत रास्ते पर कदम बढ़ा रही है, तो एक बड़ी बहन होने के नाते उसका यह फर्ज़ बनता है कि वह उसे आईना दिखाए। यदि आज कोई नहीं बोला, तो कल एक खूबसूरत परिवार हमेशा के लिए बिखर जाएगा और पीछे रह जाएगा सिर्फ खालीपन, पछतावा और तन्हाई।
अवंतिका ने तुरंत अपना फोन उठाया और नैना का नंबर मिलाया।
दो-तीन बार घंटी बजने के बाद नैना ने फोन उठाया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा रूखापन और बेचैनी थी, “हाँ दीदी… रागिनी दी ने आपको सब बता ही दिया होगा? प्लीज आप मुझे समझाने की कोशिश मत कीजिएगा। मैंने अपना फैसला ले लिया है। मैं किसी की सेवादार बनकर अपनी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकती।”
अवंतिका ने आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं आने दिया। उसने बेहद शांत और वात्सल्य भरे स्वर में कहा, “नैना, मैं तुझे कोई नसीहत देने या तुझ पर फैसला थोपने के लिए फोन नहीं कर रही हूँ। मैं तो बस अपनी छोटी बहन से मिलने आ रही हूँ। क्या मैं आधे घंटे में तेरे पास आ सकती हूँ?”
नैना कुछ पल खामोश रही, फिर धीरे से बोली, “ठीक है दीदी, आ जाइए।”
अवंतिका ने तुरंत अपनी गाड़ी निकाली और चाचा जी के घर की ओर चल पड़ी। रास्ते भर वह सोचती रही कि उसे नैना को किस तरह समझाना है। आज की पीढ़ी तर्कों से समझती है, केवल भावनात्मक दबाव से नहीं।
जब अवंतिका चाचा जी के घर पहुँची, तो घर का माहौल बेहद गमगीन था। चाचा जी अपने कमरे में उदास बैठे थे और चाची की आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। नैना अपने कमरे में बैठी सूटकेस से कुछ कपड़े बाहर निकाल रही थी। अवंतिका चुपचाप जाकर उसके पास बैठ गई।
अवंतिका ने नैना के हाथ से कपड़े लिए, उन्हें एक तरफ रखा और उसका हाथ अपने हाथों में थाम लिया।
“नैना, तू सच-सच बता, क्या समर तुझसे प्यार नहीं करता? क्या उसने कभी तेरे साथ कोई दुर्व्यवहार किया? या उसने तुझे अपनी नौकरी करने, आगे बढ़ने से रोका?” अवंतिका ने सीधे उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा।
नैना ने नज़रें चुराते हुए कहा, “नहीं दीदी… समर बहुत अच्छे हैं। वो मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। लेकिन समस्या वो नहीं, उनका परिवार है। मैं शादी के बाद अपनी तरह से जीना चाहती थी। मैं क्यों किसी के खाने-पीने, दवाइयों और तौर-तरीकों के हिसाब से अपनी ज़िंदगी ढालूं? सलोनी का हर वक्त घर में रहना, सासू माँ का टोकना… मुझे घुटन होती है दीदी।”
अवंतिका मुस्कुराई, एक गहरी और आत्मीय मुस्कान।
“नैना, तुझे पता है हमारे मम्मी-पापा और कल्याणी मौसी की ज़िंदगी कैसी थी?” अवंतिका ने पूछा और फिर उसने नैना को विस्तार से अपनी माँ, मौसी और दादी के जीवन के वे प्रसंग सुनाए जो वह अभी थोड़ी देर पहले सोच रही थी। उसने बताया कि कैसे माँ ने पिताजी के ऊँचे बौद्धिक स्तर के बीच भी कभी खुद को कम नहीं आंका और पिताजी ने उन्हें रानी बनाकर रखा। कैसे रूपवती कल्याणी मौसी ने एक साधारण, अल्पशिक्षित व्यापारी के साथ अपनी पूरी ज़िंदगी संगीत जैसी मधुर बना ली।
नैना चुपचाप सुन रही थी, उसकी पलकें झुक गई थीं।
अवंतिका ने आगे कहा, “नैना, आज हम सब ‘आज़ादी’ और ‘स्पेस’ की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन कभी सोचा है कि यह आज़ादी किसके खिलाफ है? उन अपनों के खिलाफ जिन्होंने समर को पाल-पोसकर इतना काबिल इंसान बनाया जिससे तूने शादी की? अगर समर अपनी उस लाचार माँ को छोड़ सकता है जिसने उसके लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया, तो सोच, कल को जब तू किसी मुश्किल में होगी, या जब तू बूढ़ी होगी, तो क्या गारंटी है कि वह तुझे नहीं छोड़ेगा?”
नैना का दिल इस तर्क पर ज़ोर से धड़का।
अवंतिका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद प्यार से समझाया, “मेरी बच्ची, समर अपनी माँ और बहन का साथ इसलिए नहीं दे रहा कि वह तुझसे कम प्यार करता है, बल्कि इसलिए दे रहा है क्योंकि वह एक ज़िम्मेदार और चरित्रवान पुरुष है। एक ऐसा बेटा जो अपनी माँ का सम्मान करता है, वही अपनी पत्नी को भी ताउम्र सच्चा मान और सुरक्षा दे सकता है। परिवार कोई जेल नहीं होता नैना। अगर तू उनकी माँ को अपनी माँ समझकर थोड़ा सा प्यार और सम्मान देगी, तो बदले में तुझे जो आशीष और ममता मिलेगी, उसका मोल दुनिया की कोई आज़ादी नहीं चुका सकती। क्या कभी सलोनी को एक छोटी बहन की तरह गले लगाकर देखा है? कभी सासू माँ के घुटनों पर तेल लगाकर उनसे उनके ज़माने की बातें पूछी हैं?”
नैना की आँखों से एक आंसू ढुलक कर उसके गाल पर आ गिरा। उसने सिसकते हुए कहा, “दीदी… मुझे लगा कि समर के जीवन में मेरा पहला हक होना चाहिए। जब भी वह माँ या सलोनी के लिए कुछ करता, तो मुझे लगता कि वह मुझे नज़रअंदाज़ कर रहा है। मेरा अहंकार इतना बढ़ गया था कि मैंने कभी उनके नज़रिए से सोचा ही नहीं।”
“अहंकार रिश्तों का सबसे बड़ा दीमक होता है, नैना,” अवंतिका ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा। “शादी कोई दो दिन का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है कि शर्तें पूरी न हुईं तो निरस्त कर दिया। शादी का मतलब है दो आत्माओं का एक होना, जिसमें एक-दूसरे के सुख-दुख, कमियों और ज़िम्मेदारियों को अपनाना पड़ता है। हमारी पुरानी पीढ़ी इसलिए खुश नहीं थी कि उन्हें सब कुछ मनमुताबिक मिला था, बल्कि इसलिए खुश थी क्योंकि उन्होंने जो मिला, उसे अपनी मुहब्बत और समझदारी से खूबसूरत बना लिया था। तू आज तलाक देकर अलग हो भी जाएगी, कल दूसरा जीवनसाथी तलाश लेगी, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि वहाँ कोई दूसरी चुनौती नहीं होगी? भागना किसी समस्या का हल नहीं होता, नैना। हल होता है जुड़ने में, संवारने में।”
नैना फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने अवंतिका को कसकर गले लगा लिया। उसके दिल पर पड़ा वह स्वार्थ और भ्रम का पर्दा पूरी तरह हट चुका था। उसे अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ। उसे याद आया कि समर किस तरह ऑफिस से लौटते वक्त उसके लिए पसंदीदा फूल लाता था, कैसे जब वह बीमार पड़ी थी तो समर की माँ ने पूरी रात उसके सिर पर गीली पट्टियां रखी थीं और सलोनी ने उसके लिए दलिया बनाया था। उसने उस प्यार को देखा ही नहीं, केवल अपनी ज़िद को देखा था।
“दीदी… क्या अब बहुत देर हो चुकी है? क्या समर मुझे माफ करेंगे?” नैना ने डरते हुए पूछा।
अवंतिका ने मुस्कुराकर उसका सिर चूमा, “सच्चा प्यार कभी देर नहीं करता, नैना। बस इंसान को अपनी गलती मानकर झुकना आना चाहिए।”
अवंतिका ने खुद समर को फोन लगाया और उसे कॉन्फ्रेंस पर लिया। नैना ने कांपती आवाज़ में समर से बात की। उसने बिना किसी शर्त, बिना किसी बहाने के समर से अपनी नासमझी, ज़िद और कटु व्यवहार के लिए दिल से माफी मांगी। फोन के उस पार कुछ पल का सन्नाटा रहा, और फिर समर की रुंधी हुई आवाज़ आई, “नैना… मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं थी। मैं तो बस चाहता था कि मेरा परिवार तुम्हारा भी परिवार बने। तुम घर आ जाओ, माँ और सलोनी रोज़ तुम्हारी ही राह तकती हैं।”
उस शाम, चाचा जी के घर में जो घुटन और मातम छाया हुआ था, वह एकाएक खुशियों की बहार में बदल गया। नैना ने अपना सामान समेटा, लेकिन इस बार मायके रहने के लिए नहीं, बल्कि अपने असली घर, अपने ससुराल लौटने के लिए। चाचा और चाची की आँखों में अवंतिका के लिए कृतज्ञता के आंसू थे।
जब अवंतिका अपने घर लौटी, तो शाम के सात बज चुके थे। बाहर ठंडी हवा चलने लगी थी। उसने देखा कि उसके पति, अनिमेष, ऑफिस से लौट आए थे और सोफे पर बैठकर किसी फाइल का अध्ययन कर रहे थे।
अवंतिका के चेहरे पर एक असीम शांति और तृप्ति की मुस्कान तैर गई। वह सीधे रसोई में गई। उसने अनिमेष की पसंद की अदरक और इलायची वाली कड़क चाय चढ़ाई और साथ में गरमा-गरम प्याज़ के पकौड़े तलने लगी।
जब वह चाय की ट्रे लेकर लिविंग रूम में पहुँची, तो अनिमेष ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, “अरे वाह! आज तो मेरी मनपसंद चाय और पकौड़े बने हैं। क्या बात है, आज तुम्हारा चेहरा इतना खिला हुआ क्यों लग रहा है?”
अवंतिका ने अनिमेष के पास बैठकर चाय का कप उनके हाथों में थमाया, उनका हाथ धीरे से अपने हाथों में दबाया और प्यार से बोली, “कुछ नहीं… बस आज यह समझ आया कि रिश्तों की असली मिठास एक-दूसरे को बदलने में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अपनों को अपना बनाकर साथ चलने में है।”
अनिमेष ने प्यार से उसका माथा चूम लिया। घर में चाय की भीनी-भीनी खुशबू और दो दिलों के बीच का अटूट विश्वास एक नए सवेरे की तरह महक रहा था।
पाठकों से संवाद:
आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो छोटी-छोटी बातों पर बिखरते हुए परिवारों की तादाद देखकर दिल दहल जाता है। क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता और निजी आज़ादी की दौड़ में हम रिश्तों को निभाने का वह धैर्य और समर्पण खोते जा रहे हैं जो हमारी पुरानी पीढ़ियों की सबसे बड़ी ताकत थी? क्या शादी में केवल दो लोगों का तालमेल काफी है, या परिवार को साथ लेकर चलना ही सच्चे दांपत्य की नींव है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।
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