जेठानी – निभा राजीव “निर्वी”

जैसे ही नववधू अंकिता ने मीनल के पैर छुए उसने पुलकित होकर उसे खींचकर हृदय से लगा लिया। वह बेहद प्रसन्न थी आज! और होती भी क्यों नहीं, नववधू के पदार्पण के साथ ही उसे जेठानी की पदवी जो प्राप्त हो गई थी। उसने मुंह दिखाई में सुंदर से कान के बुंदे देवरानी के हाथों में पकड़ाए और उसका मस्तक चूम लिया।

और यहीं से एक बहुत ही स्नेहपूर्ण संबंध का जैसे बीजारोपण हो गया।

            विवाहोपरांत की सारी विधियांँ भी एक सप्ताह के भीतर समाप्त हो गई और धीरे-धीरे सभी रिश्तेदार भी चले गए। अब दोनों जेठानी और देवरानी मिलजुलकर घर के कार्य करतीं। मीनल तो गृह कार्य में दक्ष थी ही और सब कुछ बहुत ही अच्छे ढंग से उसने अब तक संभाल रखा था और अब अंकिता भी इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए बहुत प्रेम से सारे घर को एक सूत्र में बांधे रखने का प्रयास करती रहती।

यद्यपि वह एक कामकाजी स्त्री थी और देवर पवन के ही कार्यालय में उसकी सहकर्मी थी। वहीं से दोनों की जान पहचान हुई और शीघ्र ही यह जान पहचान प्रणय में परिणत हो गई। दोनों के परिवार भी खुले विचारों के थे, अतः इस संबंध से किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई और शीघ्र ही दोनों का शुभ विवाह संपन्न हो गया। 

          उसकी देवरानी अंकिता बहुत ही व्यवहार कुशल और लगनशील स्त्री थी। वह कार्यालय जाने के पूर्व भी यथासंभव मीनल की सहायता करती थी और कार्यालय से आने के बाद भी वह गृह कार्यों में अपना सहयोग देती थी। जिस दिन छुट्टी होती थी उस दिन वह पूरा दिन मीनल के साथ लगी रहती थी। सास ससुर भी अब मुक्त कंठ से अंकिता की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। साथ ही मीनल भी अपार स्नेह बरसाती हुई अंकिता की खूब प्रशंसा करती थी।

          एक दिन ससुर जी का जन्मदिन था। दोनों भाइयों ने मिलकर घर पर पूजा रखवाई थी। बहुओं भी बड़े आह्लाद और सम्मान से ससुर जी से उनकी पसंद पूछी ताकि उनके लिए उनका मनपसंद और मनचाहा भोजन बना सकें। बच्चों का इतना प्यार पाकर ससुर जी की आंँखें भर आई।

फिर उन्होंने भी बड़े लाड़ से मीनल को कोफ्ते बनाने के लिए कहा और अंकिता को खीर बनाने के लिए कहा। दोनों बहुएंँ झटपट रसोई में घुस गई कुछ ही देर में खाना तैयार हो गया और सब लोग खाने बैठे। कोफ्ते बहुत ही नर्म और बहुत स्वादिष्ट बने थे। सब लोगों ने मीनल की बहुत प्रशंसा की।

फिर भोजन के उपरांत अंकिता ने सबको कटोरों में खीर परोसा। खीर भी देखने में ही बहुत स्वादिष्ट लग रही थी। एकदम गाढ़ी मलाईदार और ऊपर से ढेर सारे मेवे! ससुर जी ने मुस्कुराते हुए खीर का पहला चम्मच मुंह में रखा! अचानक उनके चेहरे के भाव बदल गए लेकिन फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा और पूरी खीर खा ली।

बड़े प्यार से अंकिता की खूब प्रशंसा भी की! फिर जैसे ही सासु मांँ ने खीर का चम्मच मुंँह में रखा कि उन्होंने झट से खीर थूक दिया और थोड़े कुपित स्वर में ही अंकिता से बोली, -” यह क्या है अंकिता बहू, थोड़ा तो ध्यान रखना चाहिए था।

तुमने खीर में चीनी की जगह नमक डाल दिया। आज तुम्हारे ससुर जी का जन्मदिन था। उन्होंने तुम्हें इतने प्यार से खीर बनाने के लिए कही और तुमने उन्हें ऐसी खीर खिला दी।”

हड़बड़ा कर अंकित ने झट से अपने कटोरे से खीर चखी तो खीर वाकई में नमकीन थी। उसे समझ में आ गया कि एक जैसा डब्बा होने के कारण शायद उसने चीनी की जगह नमक डाल दिया परंतु फिर भी उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी भूल उससे कैसे हो गई।

उसने तो ध्यान से चीनी का ही डब्बा उठाया था। लेकिन अब तो जो हो गया, सो हो गया था। देवर पवन का भी चेहरा उतर गया। लेकिन तुरंत मीनल ने सांत्वना देते हुए कहा,-” कोई बात नहीं अंकिता, कभी-कभी काम की अधिकता होने पर ऐसा हो जाता है।” 

अंकिता ने मुस्कुराने का प्रयत्न किया परंतु उसे बहुत बुरा भी लग रहा था कि उससे गलती हो गई और पहली बार सासु मांँ ने उसे ऐसे बात की। 

अभी कार्यालय में भी व्यस्तता बड़ी हुई थी और योग्य पात्र को पदोन्नति भी मिलने की संभावनाएंँ थी, अतः सभी बहुत परिश्रम कर रहे थे। उसे भी लगा कि अधिक परेशानी के कारण शायद ध्यान न रहने से ऐसा हो गया। मन ही मन वह सोच रही थी कि अब आगे से वह और भी ज्यादा ध्यान रखेगी किसी भी काम को करने में।  

       परंतु वह कुछ भी करने का प्रयास करती थी तो कुछ न कुछ गलती हो ही जाती थी। धीरे-धीरे घर में सब चिढ़ने भी लगे अंकिता से.. मात्र एक मीनल ही उससे सहानुभूति रखती थी और उससे स्नेह से बात करती थी। अंकिता का हृदय बहुत ही व्यथित होता था परंतु वह स्वयं को व्यस्त रखते हुए इन सब बातों पर ध्यान न देने का प्रयास करते हुए अपना काम करती रहती थी।

         एक दिन वह काम में बहुत व्यस्त थी और अपना कोई प्रोजेक्ट तैयार कर रही थी। अगले दिन कार्यालय में उसका प्रेजेंटेशन था। यह प्रेजेंटेशन उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था क्योंकि यदि यह सफल हो जाता तो उसकी पदोन्नति की संभावनाएंँ बहुत बढ़ जातीं। वह शाम से ही लैपटॉप पर व्यस्त थी।

मीनल उसके पास गई और बहुत प्यार से उसकी ओर देखा, फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसने कहा, “- कितना परेशान हो जाती है! तू रुक जा, मैं तेरे लिए थोड़े से स्नैक्स, पानी और कॉफी लेकर आती हूंँ, तुझे थोड़ा अच्छा लगेगा।

        अंकिता कृतज्ञ भाव से उसकी ओर देखते हुए मुस्कुरा दी। शीघ्र ही मीनल ट्रे में स्नैक्स, पानी का ग्लास और कॉफी लेकर वहांँ पहुंँच गई। परंतु जैसे ही ट्रे वह मेज पर रखने लगी कि पानी का गिलास लुढ़क कर लैपटॉप के ऊपर ही गिर गया और उसको संभालने की हड़बड़ी में कॉफी भी उस पर ही उलट गई।

अंकित हड़बड़ा कर उठ गई। उसने उसको साफ करने की कोशिश की परंतु पानी गिर जाने के कारण लैपटॉप एकदम से बंद हो गया जैसे तैसे अंकित ने उसे ऑन तो किया परंतु उसमें कुछ भी सही से नहीं हो रहा था।

लैपटॉप पूरी तरह से ही बिगड़ गया। मीनल बार-बार उससे क्षमा मांगती जा रही थी। अंकिता को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे। फिर भी उसने धीमे स्वर में मीनल से कहा, -” कोई बात नहीं है भाभी! आप जाइए…”

 मीनल सब कुछ समेट कर कमरे से बाहर चली गई। अंकित की आंँखों से आंँसू बहने लगे। उसके इतने दिनों का परिश्रम व्यर्थ हो गया। अब तो उसे किसी भी हालत में यह पदोन्नति नहीं मिल पाएगी।

उसकी पूरी रात आंँखों आंँखों में ही कट गई और दूसरे दिन वही हुआ जिसका भय था। और बॉस की डांँट पड़ी वह अलग से।

            जीवन फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगा लेकिन अंकिता के लिए सब कुछ बहुत कठिन सा लग रहा था। वह मानसिक रूप से भी बहुत परेशान रहने लगी थी। अब उसे अनुभव होने लगा था शायद यह सब उसकी योग्यता और लापरवाही का ही परिणाम है। परंतु मीनल ने उसका साथ कभी नहीं छोड़ा। वह उसका हौसला बढ़ाती रहती थी।

          एक दिन सुबह जब मीनल की आंँख खुली तो उसे सुबह से ही अच्छा नहीं लग रहा था और तेज सिर दर्द हो रहा था। अंकित ने उसे आराम करने का कह कर सबके लिए नाश्ता भी बनाया और उसे भी चाय नाश्ते के साथ सिर दर्द की साधारण दवा भी खिला दी! परंतु उसका दर्द बढ़ता ही गया और एक आध घंटे के बाद ही उसे तीव्र ज्वर चढ़ आया।

मीनल के पति तुरंत उसे डॉक्टर के पास ले गए डॉक्टर ने उसे वायरल ज्वर बताया। सारी दवाइयांँ लेते हुए वे मीनल को लेकर वापस घर आ गए। उनके घर आने के बाद सारी बात पता चलते ही अंकिता ने देर न करते हुए तुरंत ही अपने कार्यालय में छुट्टी का आवेदन दे दिया और एक हफ्ते की छुट्टी ले ली।

वायरल बुखार था तो कम से कम पांच-छः दिन तो लग ही जाते। अंकिता ने बहुत ही कुशलता से सब कुछ संभाल लिया। वह मीनल का भी क्षण क्षण ध्यान रखती। अंकिता ने ध्यान दिया कि अब आजकल उससे गलतियांँ भी नहीं हो रही है। वह जो भी काम कर रही है, सब कुछ बहुत अच्छे से हो रहा है।

उसे बहुत सुखद आश्चर्य होता था। मीनल की सेवा पूरे जी जान से कर रही थी। वह तो वैसे भी सबका बहुत ध्यान रखती थी। और विशेषकर मीनल उसे अतुलित स्नेह देती थी। इसके कारण उसके प्रति स्नेह और सम्मान उसके हृदय में बहुत अधिक था। उसे मीनल से अपनी बड़ी बहन की तरह लगाव हो गया था। 

          एक दिन अंकिता मीनल के बगल में बैठकर उसे फल काट कर खिला रही थी। तभी मीनल का ध्यान अंकिता के हाथ पर पड़े फफोले की ओर गया जो शायद कभी खाना बनाने के समय जलने के कारण उभर आया होगा। लेकिन अंकिता उस दर्द की बिल्कुल परवाह न करते हुए पूरे मनोयोग से और प्रेम से मीनल के लिए सेब काट रही थी और बारीक टुकड़े कर रही थी

ताकि उसे खाने में अधिक कष्ट न हो! मीनल ने अचानक भावुक हो गई और अंकिता को खींचकर वक्ष से लगा लिया। हड़बड़ाते हुए चकित होकर अंकिता ने पूछा, -“भाभी, क्या हो गया?? परंतु मीनल की आंँखों से अश्रुओं की धारा बही जा रही थी। किसी प्रकार से उसने स्वयं को संयत करके अंकिता के दोनों हाथ पकड़ लिए और उन्हें अपनी आंखों से लगा लिया, फिर भींगे स्वर में बोल पड़ी,-“मुझे क्षमा कर दो अंकिता, मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया है।मुझे क्षमा कर दो !!!”

   अंकिता ने आश्चर्यमिश्रित स्वर में कहा, -“आपने मेरे साथ क्या अन्याय किया है भाभी! आप ऐसा क्यों बोल रही हैं?? आप तो मुझे इतना प्यार करती हैं। इस घर में एक आप ही हैं, जिनसे मुझे इतना स्नेह मिला।मैं तो आपका ऋण कभी नहीं चुका सकती!” उसकी यह बात सुनते ही मीनल की फिर से रुलाई फूट पड़ी, -“नहीं अंकिता, मैं इस स्नेह और सम्मान के योग्य नहीं हूँ।

बहुत ही गिरी हुई हूंँ मैं ।मैं आज तुम्हें सब कुछ बताती हूंँ। जब तुम इस घर में आई तो मैं सचमुच बहुत प्रसन्न हुई कि मुझे एक प्यारी सी छोटी बहन मिल रही है। परंतु तुम इतनी व्यवहार कुशल और स्नेहिल थी कि घर के सब लोग धीरे-धीरे तुम्हारी प्रशंसा मुझसे ज़्यादा करने लगे।

और यही बात मुझे खलने लगी और मेरे मन में धीरे-धीरे तुम्हारे लिए ईर्ष्या जन्म लेने लगी। जिसका परिणाम यह हुआ कि मैं दिन रात इसी सोच में रहने लगी कि तुम्हारे काम मैं कैसे बिगाड़ूँ, जिससे कि तुम सब की दृष्टि से गिर जाओ। जिस दिन पहली बार खीर में तुमसे नमक डल गया था, वह भी मेरे कारण ही हुआ था।

उस दिन जब तुम चीनी का डब्बा निकालने के बाद इलायची का डब्बा लाने दूसरे शेल्फ तक गई, मैंने झट से चीनी के डब्बे को नमक के डब्बे से बदल दिया था। उसके बाद भी जितने भी गड़बड़ियांँ तुमसे होती रही वह सब भी मेरे कारण ही होती थी, क्योंकि मैं उन्हें कुछ न कुछ करके चोरी से बिगाड़ देती थी। जब तुम्हारी पदोन्नति होने वाली थी तो भी मैंने जानबूझकर तुम्हारा लैपटॉप पर पानी गिरा कर उसे बिगाड़ दिया था।

और ऊपर से सदैव तुम पर प्यार बरसती रहे ताकि तुम्हें कभी मुझ पर संदेह नहीं हो ।मेरे पापों का तो अंत नहीं है अंकिता, क्या-क्या बताऊंँ। किंतु तुम इतनी निश्छल और निर्मल हो कि तुम्हें कभी मुझ पर संदेह तक नहीं हुआ और तुम मुझे इतना आदर और सम्मान देती हो। आज पश्चाताप से मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं जलकर भस्म हो जाऊंगी हो सके तो मुझे क्षमा कर देना बहन! मैं तो जेठानी होकर भी बड़प्पन नहीं दिखा पाई।”

            अंकित विस्फारित नेत्रों से मीनल की ओर देखती रह गई। उसे अपने कानों पर सहसा विश्वास नहीं हो रहा था कि जो कुछ भी उसने सुना वह सच है। उसकी इतना प्यार करने वाली जेठानी के मन में उसके लिए इतनी ईर्ष्या पल रही थी। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह क्या प्रतिक्रिया दे।

परंतु इस बीच में उन दोनों को ही यह आभास नहीं हुआ कि कब उनकी सासु मांँ वहांँ पहुंँच चुकीं थीं और पीछे खड़ी सब कुछ सुन रही थी।क्रोध के अतिरेक से उन्होंने मीनल पर तमाचा मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि बढ़कर अंकिता उनके समक्ष हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। और रूंधे गले से बोल पड़ी,-” मांँजी, मैं मानती हूंँ कि भाभी से गलती हो गई

और सच कहूंँ तो मुझे भी बहुत पीड़ा हो रही है। और मन इतना विचलित हो गया है कि पता नहीं सामान्य होने में कितना समय लगेगा। परंतु जो हो चुका उसे अब वापस तो नहीं लौटाया जा सकता है न, आप गुस्सा मत कीजिए मांँजी! भाभी की तबीयत वैसे ही खराब है और अब जब उन्हें पश्चाताप हो रहा है

तो पश्चाताप स्वयं में ही इतना निर्मल होता है कि वह सभी कलुषों को धो देता है। भाभी को क्षमा कर दीजिए मांँजी! उन्हें अपने भूल का आभास हो चुका है तो अब सब कुछ धीरे-धीरे पुनः सामान्य हो जाएगा।

हम सब नए सिरे से नया जीवन प्रारंभ करेंगे।” मीनल सर झुकाए बैठी थी और उसकी आंँखों से आंँसू बह रहे थे।अंकिता ने बिना कुछ कहे उसकी आंँखों से आंँसू पोंछे और सेब का एक टुकड़ा उठाकर उसके मुंँह में रख दिया। फिर मुस्कुरा कर कहा सब कुछ ठीक हो जाएगा भाभी! आप जल्दी से स्वस्थ हो जाएं!”

✍️निभा राजीव “निर्वी”

       मुंद्रा, गुजरात

स्वरचित और मौलिक रचना

#जलन

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