जलन – सुदर्शन सचदेवा

जलन किसी एक रिश्ते की जागीर नहीं होती। वह कभी सहेली बनकर आती है, कभी रिश्तेदार बनकर, कभी पड़ोसी बनकर और कभी-कभी तो अपने ही मन में चुपचाप बैठ जाती है।

सीमा और रमा बचपन की सहेलियाँ थीं। दोनों ने साथ पढ़ाई की, साथ कॉलेज गईं और शादी के बाद भी एक-दूसरे के सुख-दुःख में खड़ी रहीं। सीमा स्कूल में शिक्षिका थी। उसे पढ़ाने का बहुत शौक था। बच्चे उसे पसंद करते थे और कुछ ही वर्षों में उसकी गिनती स्कूल की अच्छी शिक्षिकाओं में होने लगी।

एक दिन सीमा को स्कूल की ओर से “सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका” का पुरस्कार मिला।

घर लौटते ही उसने सबसे पहले रमा को फोन किया।

“रमा! आज मुझे अवॉर्ड मिला है।”

रमा ने खुशी जताई, लेकिन उसकी आवाज में वह गर्माहट नहीं थी जो सीमा ने हमेशा महसूस की थी।

“अच्छा है… बधाई हो।”

बस दो शब्द।

सीमा ने फोन रख दिया। उसे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

अगले रविवार दोनों सहेलियाँ एक साथ बैठी थीं। सीमा ने अपना पुरस्कार दिखाया। रमा ने उसे देखा और मुस्कुराकर कहा—

“अरे, ये तो स्कूल वाले ऐसे ही दे देते हैं। आजकल तो हर किसी को कोई न कोई अवॉर्ड मिल जाता है।”

सीमा चुप हो गई।

कुछ दिनों बाद रमा के घर एक रिश्तेदार आए। बातचीत में सीमा की नौकरी और पुरस्कार का जिक्र हुआ।

रिश्तेदार बोले, “सीमा तो बहुत आगे निकल गई। अच्छी सैलरी भी है और स्कूल में नाम भी है।”

रमा तुरंत बोली—

“अरे, सैलरी से क्या होता है? नौकरी तो नौकरी है। घर संभालना भी कोई छोटी बात नहीं।”

किसी ने रमा से यह नहीं कहा था कि उसका घर संभालना कम है। फिर भी उसे अपने बारे में सफाई देने की जरूरत महसूस हुई।

असल में जलन अक्सर वहीं जन्म लेती है जहाँ तुलना शुरू होती है।

किसी की नई कार देखकर मन कहता है—”मेरे पास क्यों नहीं?”

किसी की ज्यादा सैलरी सुनकर मन कहता है—”उसे इतना कैसे मिल गया?”

किसी को बच्चों की सफलता मिले तो मन पूछता है—”मेरे बच्चे पीछे क्यों हैं?”

और जब कोई महिला अपने काम में निपुण हो, खूबसूरत लगे, आत्मनिर्भर हो या लोगों के बीच सम्मान पाए, तो दूसरी महिला के मन में कभी-कभी अनजाने में एक सवाल उठ जाता है—”मुझमें क्या कमी है?”

यही सवाल धीरे-धीरे जलन बन जाता है।

एक दिन सीमा ने रमा से सीधे पूछ लिया—

“रमा, क्या तुम मुझसे नाराज़ हो?”

“नहीं तो!”

“फिर जब भी मेरी कोई उपलब्धि होती है, तुम उसे छोटा क्यों कर देती हो?”

रमा कुछ देर चुप रही।

फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

“क्योंकि…” वह रुककर बोली, “मुझे तुम्हारी सफलता से ज्यादा अपनी असफलता दिखाई देती है।”

सीमा उसे देखती रह गई।

रमा बोली—

“जब तुम्हें पुरस्कार मिलता है तो मुझे लगता है कि मैंने जिंदगी में क्या किया? जब तुम्हारी सैलरी बढ़ती है तो लगता है कि मैं वहीं की वहीं रह गई। जब लोग तुम्हारी तारीफ करते हैं तो मुझे लगता है कि शायद मुझे कोई देखता ही नहीं।”

सीमा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तो मेरी खुशी तुम्हारी हार कैसे हो गई, रमा?”

रमा के पास कोई जवाब नहीं था।

उस दिन दोनों ने पहली बार समझा कि जलन हमेशा दूसरे के प्रति नफरत नहीं होती। कई बार वह अपने ही अधूरे सपनों का दर्द होती है।

उसके बाद जब भी सीमा को कोई उपलब्धि मिलती, वह रमा को बताती। लेकिन अब रमा उसकी उपलब्धि को अपने खिलाफ नहीं देखती थी।

और रमा ने भी अपने भीतर झाँकना शुरू कर दिया। उसने पुरानी सिलाई मशीन निकाली, सिलाई का काम फिर शुरू किया और धीरे-धीरे अपने हुनर को पहचान दिलाने लगी।

कुछ महीनों बाद रमा ने अपनी पहली कमाई सीमा के हाथ पर रखी।

“देख, मैंने भी कुछ किया।”

सीमा मुस्कुराई।

“तूने कुछ किया नहीं रमा… तूने खुद को फिर से पहचान लिया।”

दोनों हँस पड़ीं।

क्योंकि उस दिन उन्हें समझ आ गया था—

दूसरे की रोशनी कम करने से हमारी जिंदगी उजली नहीं होती।

बेहतर है कि हम अपनी बुझी हुई लौ को फिर से जला लें।

जलन तब तक रहती है, जब तक हम दूसरों की जिंदगी को अपनी जिंदगी का पैमाना बनाए रखते हैं।

जिस दिन हम समझ जाते हैं कि हर किसी की मंजिल अलग है, उस दिन किसी की सफलता चुभती नहीं…

बल्कि रास्ता दिखाती है।

सुदर्शन सचदेवा

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