*कब तक आत्मसम्मान खोकर जियोगी* – तोषिका

सुबह सुबह ये क्या हो गया? प्रीति ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोला। तभी वहां उसकी बेटी रैना आई, उसने चिंतित होते हुए पूछा “क्या हुआ मां, ये कौन सी आवाज आई। प्रीति बोली “कुछ नहीं बेटा, तुम्हारे लिए दूध डाल रही थी कि अचानक से हाथ से पतीला गिर गया और सारा … Read more

आत्मसम्मान – खुशी

रितु एक सीधी साधी लड़की थी।घर में पिताजी श्याम मां सुनीता थे।पिता जी की इच्छा सुपुत्र की थी परंतु वो नहीं हो पाया ।मां सुनीता रितु के बाद दो बार गर्भवती रही पर दोनों बार लड़कियां होने के कारण दादी ने गर्भपात करवा दिया।फिर चौथी बार बेटा था परंतु सातवें महीने में सीढ़ियों से गिरने … Read more

अंधी दौड़ – गरिमा चौधरी 

आलोक एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर था। उसकी ज़िंदगी सुबह मोबाइल के अलार्म से शुरू होती थी और रात को लैपटॉप की स्क्रीन बंद होने पर खत्म होती थी। अपनी माँ, सुमित्रा देवी को गाँव में अकेला न छोड़कर वह शहर अपने साथ तो ले आया था, लेकिन उन्हें देने … Read more

दूसरा पिता – मुकेश पटेल

“बाबूजी! बाबूजी! बाहर बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी है, शायद दीदी के होने वाले ससुर जी आए हैं!” बारह साल के रोहन ने हांफते हुए घर के छोटे से आंगन में आकर आवाज़ लगाई। आंगन में खटिया पर बैठे रमाकांत जी के हाथ से अख़बार छूट कर नीचे गिर गया। उनकी पत्नी सुशीला, जो रसोई … Read more

 एक नया रिश्ता

सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड के बावजूद मेघा के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। गैस के एक बर्नर पर कुकर सीटी दे रहा था और दूसरे पर वह तेजी से रोटियां सेंक रही थी। आज ऑफिस में मेघा का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन था, जिसके लिए … Read more

फैमिली कोर्ट

पारिवारिक अदालत के बाहर आज एक अजीब सी तपिश थी। धूप से ज्यादा गर्मी सुमित्रा देवी के चेहरे की चमक में थी। वो अदालत की सीढ़ियां ऐसे उतर रही थीं जैसे कोई बहुत बड़ा युद्ध जीतकर आई हों। उनकी चाल में एक गुरूर था, आंखों में एक विजयी चमक और होंठों पर एक ऐसी मुस्कान … Read more

दर्द के आँसू

“अरे सुधा दीदी, ज़रा फोन में देखिए तो, कल्याणी की बहू अंजलि ने अपनी सास के साथ की फोटो लगाकर स्टेटस में लिखा है- ‘मिस यू माँ, आपकी जगह कोई नहीं ले सकता।’ अब आप ही बताइए, क्या कभी किसी बहू को सास के मरने का सच में कोई दुख होता है? ये सब तो … Read more

सिल्क की साड़ी – सुदर्शन सचदेवा

दुकान में रंग-बिरंगी सिल्क की साड़ियाँ रोशनी में ऐसी दमक रही थीं, मानो इंद्रधनुष धरती पर उतर आया हो। कहीं आसमानी रंग था, कहीं पिस्ता हरा, कहीं बैंगनी, कहीं सुनहरी कढ़ाई वाली रेशमी साड़ी। हर साड़ी अपनी ओर बुला रही थी। दुकानदार ने मुस्कुराकर पूछा, “मैडम, कौन-सा रंग दिखाऊँ?” मैंने बिना एक पल गँवाए कहा, … Read more

 प्यार भरे झूठ का सहारा

“आरव, बेटा वो आखिरी गुलाब जामुन नानी का है। तुमने पहले ही दो खा लिए हैं, अब और नहीं।” मैंने अपने सात साल के बेटे को प्यार से डांटते हुए कहा। हम सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे और रात के खाने के बाद मीठे का आनंद ले रहे थे। लेकिन मेरे टोकने का कोई … Read more

एक बेटी के आत्मसम्मान की जीत

“मीरा, कल तू बैंक से छुट्टी ले लेना। कल शाम को वर्मा जी के बेटे वाले तुझे देखने आ रहे हैं। लड़का सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, पैकेज भी बहुत अच्छा है।” डाइनिंग टेबल पर खाना परोसते हुए सुशीला जी ने अपनी तीस वर्षीय बेटी से कहा। लैपटॉप पर अपनी कल की अहम मीटिंग की प्रेजेंटेशन तैयार … Read more

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