दूसरा पिता – मुकेश पटेल

“बाबूजी! बाबूजी! बाहर बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी है, शायद दीदी के होने वाले ससुर जी आए हैं!” बारह साल के रोहन ने हांफते हुए घर के छोटे से आंगन में आकर आवाज़ लगाई।

आंगन में खटिया पर बैठे रमाकांत जी के हाथ से अख़बार छूट कर नीचे गिर गया। उनकी पत्नी सुशीला, जो रसोई में पूड़ियां तल रही थीं, उनके हाथ भी अचानक कांपने लगे। घर के कोने में खड़ी उनकी बड़ी बेटी मेघा की आँखों में एक अजीब सा डर बैठ गया।

रमाकांत जी एक साधारण से क्लर्क थे, जो कुछ ही महीनों में रिटायर होने वाले थे। उन्होंने अपनी पाई-पाई जोड़कर मेघा को पढ़ाया-लिखाया था। मेघा शहर के एक स्कूल में शिक्षिका थी। जब मेघा के लिए शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी, कैलाश नाथ जी के बेटे सिद्धार्थ का रिश्ता आया, तो रमाकांत जी को लगा जैसे ईश्वर ने उनकी सारी तपस्या का फल दे दिया हो। सिद्धार्थ एक बहुत ही सुलझा हुआ और होनहार लड़का था, और कैलाश नाथ जी का परिवार शहर के सबसे रसूखदार परिवारों में गिना जाता था।

लेकिन कल शाम जब कैलाश नाथ जी का फोन आया, तो रमाकांत जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। कैलाश नाथ जी ने भारी आवाज़ में कहा था, “रमाकांत जी, कल सुबह मैं आपके घर आ रहा हूँ। शादी की तैयारियों और ‘लेन-देन’ के विषय में कुछ ज़रूरी और साफ़ बात करनी है।”

‘लेन-देन की बात!’ ये तीन शब्द किसी भी मध्यमवर्गीय पिता के लिए मौत के फरमान जैसे होते हैं। रमाकांत जी रात भर सो नहीं पाए थे। उन्होंने अपनी जीवन भर की जमापूंजी और पीएफ का पैसा पहले ही शादी के लिए निकाल लिया था, लेकिन वो कैलाश नाथ जी जैसे अमीर आदमी के रुतबे के आगे ऊंट के मुँह में जीरा ही था। रमाकांत जी ने रात में ही फैसला कर लिया था कि वो अपना पुश्तैनी मकान गिरवी रख देंगे। शहर के मशहूर सूदखोर, लाला धनीराम से उन्होंने बात भी पक्की कर ली थी। उन्हें डर था कि अगर लेन-देन की कमी के कारण यह रिश्ता टूट गया, तो मेघा जीते जी मर जाएगी और समाज में उनकी बहुत बदनामी होगी।

रमाकांत जी ने जल्दी से अपना चश्मा सीधा किया और दरवाज़े की तरफ दौड़े। कैलाश नाथ जी अपनी शानदार सफेद कार से बाहर उतर रहे थे। उनके साथ उनका मुनीम भी था।

“आइए, आइए समधी जी! हमारा तो अहोभाग्य जो आपके चरण इस गरीब के घर पड़े,” रमाकांत जी ने हाथ जोड़कर और कमर को लगभग आधा झुकाकर उनका स्वागत किया।

कैलाश नाथ जी के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी। वे बिना कुछ बोले अंदर आए और सोफे पर बैठ गए। घर में एक भयानक सन्नाटा पसरा था। सुशीला जी कांपते हाथों से पानी का गिलास और नाश्ते की प्लेट लेकर आईं।

कैलाश नाथ जी ने पानी का एक घूंट पिया और प्लेट को एक तरफ सरकाते हुए बोले, “रमाकांत जी, मैं यहाँ नाश्ता करने नहीं आया हूँ। मैंने आपसे कल ही कहा था कि मुझे लेन-देन पर बात करनी है। शादी में अब सिर्फ पंद्रह दिन बचे हैं।”

रमाकांत जी का गला सूखने लगा। उन्होंने पसीने से भीगे अपने हाथ जोड़े और रुंधे हुए गले से बोले, “समधी जी… मैं जानता हूँ कि आपकी हैसियत के सामने मेरी कोई औकात नहीं है। लेकिन आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मेघा मेरी इकलौती बेटी है। मैं उसे खाली हाथ नहीं भेजूंगा। मैंने शहर के लाला धनीराम से बात कर ली है। कल अपने इस मकान के कागज़ात उनके पास गिरवी रखकर मैं दस लाख का इंतज़ाम कर रहा हूँ। सिद्धार्थ बाबू के लिए एक बढ़िया गाड़ी और आपकी पसंद के गहनों का सारा इंतज़ाम हो जाएगा… बस आप ये रिश्ता मत तोड़िएगा…” कहते-कहते रमाकांत जी की आँखों से आँसू छलक पड़े।

दरवाज़े के पीछे खड़ी मेघा ने जब अपने पिता के मुँह से मकान गिरवी रखने की बात सुनी, तो उसका दिल जैसे धड़कना भूल गया। जिस घर में उसका बचपन बीता, उसके पिता उस घर को उसके लिए नीलाम कर रहे थे।

कैलाश नाथ जी ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने मुनीम को इशारा किया। मुनीम ने एक लाल रंग की फाइल बैग से निकाली और टेबल पर रख दी।

“ये देखिए रमाकांत जी,” कैलाश नाथ जी ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊंची करते हुए कहा। “मुझे पता था कि आप ऐसा ही कुछ मूर्खतापूर्ण कदम उठाएंगे। कल शाम लाला धनीराम के मुनीम ने मेरे ही आढ़त पर आकर बताया था कि आप अपना मकान गिरवी रख रहे हैं। इसीलिए मैं आज सुबह-सुबह यहाँ आया हूँ।”

रमाकांत जी डर के मारे थर-थर कांपने लगे। उन्हें लगा अब कैलाश नाथ जी सरेआम उनका अपमान करेंगे और रिश्ता तोड़कर चले जाएंगे।

लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसकी कल्पना उस घर के किसी भी सदस्य ने नहीं की थी।

कैलाश नाथ जी अपनी जगह से उठे और उन्होंने रमाकांत जी के जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया। उनके गंभीर चेहरे पर अब एक बेहद आत्मीय और सौम्य मुस्कान थी।

“रमाकांत जी! आप मुझे इतना लालची और गिरा हुआ इंसान कैसे समझ बैठे?” कैलाश नाथ जी की आवाज़ में एक हल्की सी नाराज़गी और बहुत सारा स्नेह था। “क्या मैं अपने बेटे का सौदा करने आया हूँ? मैंने आपके घर की चौखट इसलिए चुनी थी क्योंकि आपकी बेटी मेघा के संस्कार मेरी करोड़ों की दौलत से कहीं ज्यादा कीमती हैं। मुझे अपने घर को रोशन करने के लिए एक पढ़ी-लिखी और संस्कारी बेटी चाहिए, कोई सोने की खदान नहीं।”

रमाकांत जी अवाक रह गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

कैलाश नाथ जी ने आगे कहा, “रमाकांत जी, अगर मैं आपसे दहेज में गाड़ी और गहने लेकर यह शादी कर भी लूँ, तो क्या आपकी बेटी मेरे घर में कभी चैन से जी पाएगी? क्या वो कभी मुझे एक पिता की तरह इज़्ज़त दे पाएगी, यह जानते हुए कि उसी के ससुर ने उसके असली पिता को बेघर कर दिया और उम्र भर के लिए कर्ज़े में डुबो दिया? एक बेटी जो अपने पिता के आंसुओं और उसके कर्ज़ की बुनियाद पर ससुराल में कदम रखती है, वो मेरे लिए ‘लक्ष्मी’ नहीं हो सकती। मैं अपने घर में किसी की हाय और किसी के कर्ज़ का पैसा नहीं लाना चाहता।”

कैलाश नाथ जी ने मुनीम की लाई हुई वह लाल फाइल रमाकांत जी के हाथ में थमा दी। “ये आपके लाला धनीराम के पास रखे मकान के ओरिजिनल कागज़ हैं। मैंने लाला को सख्त हिदायत दे दी है कि वो आपको एक रुपया भी कर्ज़ नहीं देगा। आप इस शादी में एक पैसा भी खर्च नहीं करेंगे। मुझे सिर्फ आपकी बेटी चाहिए, वो भी उन्हीं कपड़ों में जो वो उस दिन पहने होगी। बारात का सारा खर्च भी मैं खुद उठाऊंगा। अगर आप मेरी एक भी बात टालेंगे, तो मैं सच में ये रिश्ता तोड़ दूँगा।”

कमरे में खामोशी छा गई, लेकिन यह सन्नाटा डर का नहीं, बल्कि राहत और सम्मान का था। रमाकांत जी फूट-फूट कर रोने लगे, पर ये आँसू उनके स्वाभिमान के बचने की खुशी के थे। दरवाज़े के पीछे खड़ी मेघा दौड़कर आई और कैलाश नाथ जी के पैरों में गिर पड़ी। उसे आज अपने ससुर में एक और पिता मिल गया था।

कैलाश नाथ जी ने मेघा को सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और मुस्कुराते हुए बोले, “अब जल्दी से मेरे लिए चाय लाओ बहू, बहुत ज़ोर की भूख लगी है।”

उस दिन उस छोटे से घर में जो खुशबू फैली, वो पकवानों की नहीं, बल्कि रिश्तों की सच्चाई और एक पिता के बचे हुए सम्मान की थी।

***

क्या हमारे समाज में हर ससुर को कैलाश नाथ जी जैसा नहीं होना चाहिए? क्या आपको नहीं लगता कि दहेज के नाम पर लड़के वालों का घमंड आज भी कई रमाकांत जैसे पिताओं को कर्ज़ में डूबने पर मजबूर कर देता है? क्या मेघा भाग्यशाली थी या समाज को ही अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है? इस मार्मिक कहानी के बारे में आपकी क्या राय है, कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं, हमें आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा।

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लेखक : मुकेश पटेल

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