एक बेटी के आत्मसम्मान की जीत

“मीरा, कल तू बैंक से छुट्टी ले लेना। कल शाम को वर्मा जी के बेटे वाले तुझे देखने आ रहे हैं। लड़का सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, पैकेज भी बहुत अच्छा है।” डाइनिंग टेबल पर खाना परोसते हुए सुशीला जी ने अपनी तीस वर्षीय बेटी से कहा।

लैपटॉप पर अपनी कल की अहम मीटिंग की प्रेजेंटेशन तैयार कर रही मीरा की उंगलियां कीबोर्ड पर अचानक रुक गईं। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें बंद कीं और लैपटॉप की स्क्रीन को नीचे गिरा दिया। कमरे में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया।

“माँ, और कितनी बार?” मीरा की आवाज़ में थकावट और झुंझलाहट साफ झलक रही थी। “और कितनी बार मुझे अपने ऑफिस से झूठे बहाने बनाकर छुट्टियां लेनी पड़ेंगी? और कितनी बार मुझे उस भारी सिल्क की साड़ी में सज-धज कर, एक सजी हुई गुड़िया की तरह चाय की ट्रे लेकर उन अजनबियों के सामने जाना होगा?”

सुशीला जी ने रोटियों का डिब्बा वहीं छोड़ा और मीरा के पास आकर खड़ी हो गईं। “बेटा, ये तो दुनिया का दस्तूर है। लड़कियाँ तो ऐसे ही देखी जाती हैं। तू तीस की हो गई है, समाज में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। हमें भी तो तेरी ज़िम्मेदारी से मुक्त होना है। और फिर, बिना देखे कौन रिश्ता पक्का करता है?”

मीरा अपनी कुर्सी से उठी। उसकी आँखों में आंसू तैरने लगे थे, जिन्हें वो बड़ी मुश्किल से रोक रही थी। “माँ, ज़िम्मेदारी से मुक्त होना? क्या मैं कोई बोझ हूँ? मैं शहर के सबसे बड़े बैंक में ब्रांच मैनेजर हूँ। मेरे नीचे पच्चीस लोग काम करते हैं। मैंने अपनी मेहनत से अपना मुकाम बनाया है। लेकिन जब भी ये ‘लड़के वाले’ आते हैं, मेरा वजूद सिर्फ इस बात पर सिमट कर रह जाता है कि मेरी रोटियां कितनी गोल हैं, मेरी लंबाई कितनी है, मेरा रंग कैसा है और मैं उनके परिवार के रीति-रिवाजों में ढल पाऊंगी या नहीं!”

सुशीला जी अपनी बेटी का यह रूप देखकर थोड़ी सहम गईं, लेकिन समाज का डर उनके भीतर इतना गहरा था कि उन्होंने फिर से समझाने की कोशिश की। “मीरा, कैसी बातें कर रही है? कल का लड़का बहुत अच्छे खानदान से है। उन्होंने खुद तेरी तस्वीर देखकर पसंद किया है। बस एक बार मिल ले।”

“तस्वीर देखकर पसंद किया है ना माँ, तो फिर ये कल का तमाशा क्यों?” मीरा का दर्द अब आंसुओं के रूप में छलक पड़ा था। “पिछली बार जो लोग आए थे, उन्होंने क्या कहा था? ‘लड़की की तनख्वाह तो अच्छी है, पर क्या शादी के बाद वो अपनी नौकरी छोड़ पाएगी? हमें तो घर संभालने वाली बहू चाहिए।’ उससे पहले वाले परिवार ने मेरे चश्मे पर सवाल उठा दिए थे। कोई मेरी उम्र पर टिप्पणी कर जाता है, तो कोई मेरे आत्मविश्वास को मेरा घमंड बता देता है। माँ, मैं थक चुकी हूँ इस प्रदर्शन से। हर बार मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं किसी बाज़ार में रखी कोई वस्तु हूँ, जिसे हर कोई अपनी सहूलियत और पसंद के हिसाब से तौल रहा है।”

मीरा ज़मीन पर बैठ गई और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढंक कर फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे नहीं मिलना किसी से। मुझे किसी को ये साबित नहीं करना कि मैं कितनी संस्कारी हूँ। जब मैं ऑफिस में एक बड़े क्लाइंट की मीटिंग हैंडल करती हूँ, तब मेरे अंदर कोई डर नहीं होता। लेकिन चाय की वो ट्रे लेकर जब मैं उन अजनबी नज़रों के सामने से गुज़रती हूँ, तो मेरा आत्मविश्वास कांपने लगता है। हर बार के उस ‘रिजेक्शन’ या बेतुके सवालों से मेरी रूह छिल जाती है माँ। मेरा आत्मसम्मान हर बार मरता है।”

सुशीला जी के पास अपनी बेटी के इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। वो बस चुपचाप खड़ी अपनी बेटी को रोता हुआ देख रही थीं। उन्हें पहली बार एहसास हो रहा था कि जिस प्रक्रिया को वो एक आम ‘दस्तूर’ समझ रही थीं, वो उनकी मज़बूत और आत्मनिर्भर बेटी को अंदर से कितना खोखला कर रही थी।

तभी दरवाज़े पर आहट हुई। मीरा के पिता, दीनानाथ जी, जो कुछ देर से दरवाज़े के बाहर खड़े सब सुन रहे थे, अंदर आए। उन्होंने अपना ब्रीफकेस मेज़ पर रखा और ज़मीन पर बैठी अपनी बेटी के पास आकर बैठ गए। उन्होंने प्यार से मीरा के सिर पर हाथ फेरा और उसे उठाया।

“सुशीला,” दीनानाथ जी की आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। “वर्मा जी को फोन कर दो और कह दो कि कल आने की ज़रूरत नहीं है।”

सुशीला जी ने घबराकर कहा, “पर जी, वो लोग क्या सोचेंगे? बहुत अच्छा रिश्ता है, हाथ से निकल गया तो…”

“निकल जाने दो,” दीनानाथ जी ने बीच में ही उन्हें टोक दिया। “मेरी बेटी कोई नुमाइश की चीज़ नहीं है जिसका हर कोई आकर मोलभाव करे। हमने अपनी बच्ची को पढ़ा-लिखाकर एक काबिल इंसान बनाया है। उसने अपने दम पर इस समाज में अपनी एक पहचान बनाई है। मैं अपनी बेटी के आत्मसम्मान को इस तरह चाय की प्यालियों में रोज़-रोज़ नीलाम नहीं होने दूंगा।”

उन्होंने मीरा के आंसू पोंछे और कहा, “मुझे मेरी बेटी की शादी की कोई जल्दी नहीं है। जिस इंसान को या जिस परिवार को मेरी बेटी के असली गुणों की कद्र होगी, वो उसे किसी ड्राइंग रूम में सिर झुकाए चाय लाते हुए नहीं, बल्कि बराबरी के साथ उसका सम्मान करते हुए अपनाएगा। और अगर ऐसा कोई नहीं मिलता, तो मेरी बेटी इतनी काबिल है कि अपनी ज़िंदगी शान से अकेले जी सकती है। अब तुम्हें किसी के सामने ट्रे लेकर जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।”

अपने पिता के ये शब्द सुनकर मीरा ने उन्हें कसकर गले लगा लिया। सालों से उसके सीने पर रखा एक भारी पत्थर आज खिसक गया था। सुशीला जी भी अब समझ चुकी थीं। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा और फोन की तरफ वर्मा जी को ना कहने के लिए बढ़ गईं। उस रात, उस घर में समाज की रूढ़ियों की हार हुई थी और एक बेटी के आत्मसम्मान की जीत।

क्या आपके घर या आपके आस-पास भी बेटियों को इसी तरह की मानसिक प्रताड़ना से गुज़रना पड़ता है? क्या आपको नहीं लगता कि रिश्ते जोड़ने के ये तरीके अब बदलने चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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