मुझे माफ कर दो नीरजा

फोन की घंटी बजी तो सुलोचना जी ने जल्दी से गैस की आंच धीमी की और पल्लू से हाथ पोंछते हुए फोन उठाया। स्क्रीन पर लंदन का नंबर चमक रहा था। सुलोचना जी के चेहरे पर एकाएक एक मीठी सी मुस्कान तैर गई। “हैलो विकास बेटा, जीते रहो! कैसे हो तुम? आज चार महीने बाद … Read more

अपनापन के आँसू

अपनापन के आँसू  लाल सुर्ख लहंगे में लिपटी, सोलह श्रृंगार किए मीरा जब गाड़ी से उतरी, तो उसके कदमों में एक अजीब सी झिझक थी। पायल की झंकार के साथ उसके दिल की धड़कनें भी तेज़ हो रही थीं। अपनी नम आँखों में मायके से विदाई का दुख और इस नई दुनिया को लेकर अनगिनत … Read more

*कुलकलंकिनी* – तोषिका

ये इस घर की *कुलकलंकिनी* नहीं है। साहिल ने रीमा का हाथ पकड़ते हुए बोला। तो फिर क्या है? उनकी मां ने गुस्से में बोला। साहिल बोला “आप लोग हर बार दीदी से ऐसे क्यों बात करते हो, और आखिर वेस्टर्न कपड़े पहन ने से कोई कुलकलंकिनी कैसे हो सकता है?” साहिल ने अपनी मां … Read more

कुलकलंकिनी – बीना शुक्ला अवस्थी

पूरे गांव में  हलचल मची थी। लोग डॉक्टर दामिनी को देखने दौड़े आ रहे थे। अस्पताल के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी, सब एक झलक दामिनी को देखना चाहते थे लेकिन अस्पताल में पता नहीं क्यों आज पुलिस लगा दी गई थी और डॉक्टर दामिनी कुर्सी पर बैठी कई वर्ष पीछे जाकर गुम … Read more

संस्मरण – मधु वशिष्ठ

 जीवन में अब तक बहुत से दोस्त मिले। कुछ अच्छे और कुछ बहुत अच्छे। लेकिन वह दोस्त भले ही हमारे ऑफिस के सहकर्मी थे या हम जब सरकारी मकान में रहते थे, वहां के पड़ोसी लेकिन यह बात नितांत सत्य है कि जब जब भी वह सहकर्मी ट्रांसफर होकर दूसरे विभाग में चले जाते थे … Read more

कुलकलकंनी – सुदर्शन सचदेवा

सुबह की पहली किरण आँगन में उतर आई थी, लेकिन घर के भीतर पसरा सन्नाटा किसी अमावस्या की रात जैसा था। तुलसी के चौरे पर रखा दीपक बुझ चुका था और उसके पास बैठी शारदा की आँखों में भी जैसे उजाला समाप्त हो गया था। उसने धीरे से अपने माथे का सिंदूर छुआ। वर्षों से … Read more

कुलकलंकिनी – खुशी

मंदा ओ मंदा कहा मर गई कब तक सोती रहेगी।कल्याणी चिल्लाते हुए मंदा के कमरे में आई पर मंदा अपने बिस्तर पर नहीं थी।पास एक चिट्ठी पड़ी थी भाभी मै अपने सपनों को पूरा करने जा रही हूं।मै तुम्हारे शराबी भाई के साथ अपना जीवन नरक नहीं बना सकती क्योंकि मां बाबा के जाने के … Read more

कुलकलंकिनी – डाॅ संजु झा

जीवन की आपाधापी में  व्यक्ति अपनी इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए गलत कदम उठाने से भी नहीं डरता है।परिणामस्वरूप अपनी जिंदगी तो बर्बाद होती ही है, परिवार और समाज में भी बदनामी हो जाती है।उसके कुकृत्यों के कारण समाज उसे कुलकलंक या कुलकलंकिनी का नाम दे देता है। सोलह वर्षीया रीना बड़ी-बड़ी ऑंखें, … Read more

आँखों पर बंधी पट्टी

“अगर तुम्हें इस घर की छत के नीचे रहना है, तो मेरी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर रसोई संभालनी होगी। तुम बाहर जाकर महारानी की तरह कुर्सी तोड़ो और मेरी बूढ़ी माँ यहाँ चूल्हे के आगे अपनी हड्डियाँ गलाए, यह तमाशा अब इस घर में और नहीं चलेगा!” विकास की दहाड़ से ड्रॉइंग … Read more

खूबसूरत रिश्तें

सुलोचना जी आज सुबह से ही थोड़ी परेशान और घबराई हुई थीं। घर में सब कुछ सामान्य था, लेकिन उनका मन एक अजीब सी उलझन में फंसा था। उन्होंने अपने पति रमेश जी को आवाज़ दी, “सुनिए जी, कल छोटी बहू अंजलि के मम्मी-पापा आ रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि नाश्ते और … Read more

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