भरोसे की डोर – सुदर्शन सचदेवा
“मम्मी जी, आप आराम कर लीजिए… दुकान मैं संभाल लूंगी।” रिया ने धीरे से कहा तो सविता जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन मन में सवाल भी था। आजकल की बहुएँ कहाँ घर और कारोबार दोनों संभालती हैं? दो दिन जोश दिखाती हैं, फिर अपने फोन और … Read more