भरोसे की डोर – सुदर्शन सचदेवा

“मम्मी जी, आप आराम कर लीजिए… दुकान मैं संभाल लूंगी।” रिया ने धीरे से कहा तो सविता जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन मन में सवाल भी था। आजकल की बहुएँ कहाँ घर और कारोबार दोनों संभालती हैं? दो दिन जोश दिखाती हैं, फिर अपने फोन और … Read more

मोह से मुक्ति – शुभ्रा बैनर्जी 

शिवांश इस अगले हफ्ते सेवानिवृत्त हो रहे थे। छह महीने पहले ही से पार्टी की लिस्ट बना रहे थे।किसे-किसे बुलाना है?कैटरिंग किसे देना है? मेनू में क्या रहेगा? सुषमा अपने पति की आदत से भलीभांति परिचित थी।बस बहाना चाहिए, खिलाने का।अपने पैसे खर्च होने पर इतना खुश होने वाला इंसान शिवांश ही हो सकता था।बच्चों … Read more

*जिंदगी की दूसरी पारी* – तोषिका

कमाल है, आप इतनी मशहूर है, फिर भी कितने सभ्य तरीके से बात करती है और इतनी ज्यादा उम्र में आपने लंच सर्विस जैसा कारोबार शुरू किया और कुछ सालों में इतना बड़ा किया ये बहुत ही काबिल्य तारीफ है। हस्ते हुए एक रिपोर्टर ने राशि को बोला। राशि हल्का सा मुस्कुराई और बोली “इस … Read more

भरोसा – संध्या सिन्हा 

हेलो जय! भैया की तबियत ठीक नहीं है.. किसी बड़े डॉक्टर को दिखा दो। ठीक है भा… भी, (जय पूरी बात भी ना कर पाया था कि… उसकी पत्नी नीता ने फ़ोन काट दिया और बोली  “क्या ठीक है.. तुम भी ना जय समझते नहीं हो… ये भाभी का शहर आने का बहाना है और … Read more

भरोसा – नेहा जैन

बरसात की हल्की बूंदें शहर की ऊंची इमारतों पर गिर रही थीं। रात के करीब ग्यारह बजे थे, लेकिन “सिटी केयर हॉस्पिटल” की चौथी मंजिल पर हलचल अभी भी जारी थी। कमरा नंबर 407 के बाहर एक आदमी बेचैनी से टहल रहा था। उसकी आंखों में डर था… और माथे पर पसीना। वो बार-बार डॉक्टर … Read more

जिंदगी की दूसरी पारी – आरती निलेश खरबडकर

वृंदा हाथ में बड़ी सी अटैची लेकर घर से बाहर निकल रही थी। उसका भाई उसे लेने आया था। आंसू भरी निगाहों से उसने विनय की ओर देखा। लेकिन आज वो वृंदा से नजरे नही मिला पा रहा था। क्योंकि आज वृंदा की आंखो में अनगिनत सवाल थे और अपार दुःख भी। कितना प्यार किया … Read more

निर्णय – संगीता त्रिपाठी

  “सुलभा तुम ..”एक जानी पहचानी आवाज उसके कानों में टकराई   ,कैसे भूल सकती है इस आवाज को ,जिसकी वो दीवानी थी ,।    पलट कर देखा तो नितांत अजनबी सा बिखरे  सफेद बालों वाला ,मोटे फ्रेम का चश्मा लगाए ,एक प्रौढ़ व्यक्ति खड़ा था । न ये सुशांत नहीं हो सकते……,उसके कानों ने गलत सुना … Read more

आउट डेटेड बुढ़िया – कविता भड़ाना

रीमा और सीमा की आँखें विस्मय से फ़टी रह गयी जब उन्होंने रेस्टोरेंट के सामने वाली टेबल पर सासु माँ दामिनी जी को अपनी सखियों के साथ खिलखिलाते हुए गरम गरम छोले भटूरे खाते हुए देखा, उससे भी ज्यादा हैरानी उनके कपड़ो को देख कर हो रही थी, गुलाबी रंग की शिफान की साडी, उम्र … Read more

बोया, वो पाया – सुदर्शन सचदेवा

“मम्मी, ये पुरानी सिलाई मशीन कब तक संभालकर रखोगी? अब तो कोई इसका इस्तेमाल भी नहीं करता।” संजय ने स्टोर रूम की धूल साफ़ करते हुए झुंझलाकर कहा। नीरा मुस्कुराई, मशीन पर हाथ फेरा और बोली, “कुछ चीज़ें सिर्फ़ सामान नहीं होतीं बेटा… उनमें किसी की पूरी ज़िंदगी सिलाई हुई होती है।” संजय ने बात … Read more

जो बोया, वही पाया – बिमला रावत जड़धारी

रामेश्वरी की अंतिम विदाई थी। सभी रिश्तेदार और दोनों बेटियाॅं भी पहुॅंच गयी थी। सभी कह रहें थे अच्छा हुआ मुक्ती मिल गयी, बहुत कष्ट में थी। दोनों बेटियाॅं आपस में बोली, मम्मी ने जो बोया था वही पाया। दादी को कितना परेशान किया था।दादा जी तो थे नहीं, दादी जी ही थी जो गाॅंव … Read more

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