आज रश्मि घर के हर कोने में जाकर उन निशानों को ढूंढती है जो कभी उसे चुभते थे। वह डाइनिंग टेबल के कांच को छूकर महसूस करने की कोशिश करती है कि शायद कहीं काव्या की उंगलियों की छाप छूट गई हो। वह अंश के कमरे में जाकर उस खाली बिस्तर को घंटों निहारती है जिस पर अब कोई सिलवट नहीं पड़ती।
उसे अब घर की इस जानलेवा शांति से नफरत हो गई है। वह अब प्रार्थना करती है कि काश कोई चमत्कार हो जाए, बच्चे वापस घर आ जाएं, फिर से पूरे घर में चीजें बिखेर दें, फिर से जोर-जोर से टीवी चलाएं, और फिर से जूतों के निशान पूरे घर में छोड़ दें। वह अब कभी शिकायत नहीं करेगी। वह अब कभी सफाई के लिए उन पर नहीं चिल्लाएगी।
दीवार घड़ी की टिक-टिक आज इतनी तेज लग रही थी जैसे वह सीधे रश्मि के दिमाग पर हथौड़े मार रही हो। उसने हाथ में पकड़े माइक्रोफाइबर कपड़े को कसकर मुट्ठी में भींच लिया और सामने रखी इटैलियन मार्बल वाली सेंटर टेबल को घूरने लगी। टेबल इतनी साफ थी कि उसमें रश्मि अपना अक्स साफ देख सकती थी। कहीं कोई धूल का कण नहीं, पानी का कोई दाग नहीं,
और सबसे बड़ी बात—उन नन्हीं उंगलियों के कोई निशान नहीं जो कभी इस टेबल की चमक को पल भर में गायब कर दिया करते थे। रश्मि ने एक गहरी सांस ली, जो उस बड़े से सजे-धजे ड्राइंग रूम में एक भारी आह बनकर गूंजी। आज से दस साल पहले, अगर उसे कोई ऐसा ही शांत और बेदाग घर दे देता, तो शायद वह दुनिया की सबसे खुशकिस्मत औरत महसूस करती। लेकिन आज, यह चमकता हुआ घर उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
रश्मि हमेशा से ही सलीके और सफाई की दीवानी थी। घर की हर चीज अपनी निर्धारित जगह पर होनी चाहिए, सोफे के कवर पर एक सिलवट भी उसे बर्दाश्त नहीं थी, और कांच की डाइनिंग टेबल पर अगर किसी ने गलती से भी बिना कोस्टर के पानी का गिलास रख दिया, तो समझो उस दिन घर में कयामत आ गई। उसके पति, विकास, एक बहुत ही शांत और सुलझे हुए इंसान थे।
वे बैंक में मैनेजर थे और दिन भर की भागदौड़ के बाद जब घर आते, तो बस थोड़ा सुकून चाहते थे। उनके दो बच्चे थे—बेटा अंश, जो तब बारह साल का था, और बेटी काव्या, जो आठ साल की थी। दोनों बच्चे उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ ऊर्जा का कोई अंत नहीं होता। वे घर में दौड़ते, खेलते, चीजों को यहाँ-वहाँ फेंकते और अपनी ही धुन में मगन रहते। लेकिन रश्मि के लिए उनकी यह मासूमियत एक रोजमर्रा की सिरदर्दी बन चुकी थी।
“अंश! तुम्हारे जूते फिर से सोफे के पास पड़े हैं? मैंने कितनी बार कहा है कि शू-रैक में रखा करो!” रश्मि की तेज आवाज अक्सर सुबह-सुबह घर की शांति को चीर देती थी। बच्चे सहम जाते। अगर काव्या अपने क्रेयॉन्स लेकर डाइनिंग टेबल पर ड्राइंग करने बैठती, तो रश्मि का पहला वाक्य यही होता, “टेबल पर निशान मत डाल देना, नीचे बैठकर करो।” घर में जैसे एक अघोषित कर्फ्यू लगा रहता था।
विकास अगर ऑफिस से थके-हारे आकर अखबार सोफे पर छोड़ देते, तो रश्मि उन्हें भी चाय देने से पहले घर के अस्त-व्यस्त होने का ताना मारना नहीं भूलती थी। वह अक्सर अपनी सहेलियों से फोन पर शिकायत करती थी कि वह इस घर में एक नौकरानी बनकर रह गई है, जिसे हर वक्त बस दूसरों का फैलाया हुआ समेटना पड़ता है। उसे लगता था कि कोई उसकी मेहनत की कद्र नहीं करता।
रश्मि की दिनचर्या बस इसी में सिमट गई थी कि घर कैसे चमके। उसने यह ध्यान ही नहीं दिया कि उसकी इस सफाई की सनक और हर वक्त की टोका-टाकी का परिवार पर क्या असर हो रहा है। धीरे-धीरे, घर के माहौल में एक अजीब सा बदलाव आने लगा। जो बच्चे स्कूल से लौटते ही पूरे घर में अपनी चहचहाहट से रौनक भर देते थे,
वे अब चुपचाप अपने जूते बाहर उतारते, बिना कोई आवाज किए अपने कमरे में जाते और दरवाजा बंद कर लेते। अंश ने ड्राइंग रूम में वीडियो गेम खेलना छोड़ दिया था क्योंकि रश्मि को रिमोट के बटन दबने की आवाज से चिढ़ होती थी। काव्या ने घर के अंदर दौड़ना-भागना बंद कर दिया था,
क्योंकि उसे डर रहता था कि कहीं कोई शोपीस हिल न जाए या कालीन पर उसके पैरों के निशान न पड़ जाएं। बच्चे अब उससे कोई बात साझा करने से कतराने लगे थे। उन्हें लगता था कि माँ हर बात में कोई न कोई गलती निकाल कर फिर से सफाई का लेक्चर शुरू कर देगी। जब भी रश्मि उनसे पूछती, “स्कूल में क्या हुआ?” तो उनका जवाब बस एक नीरस ‘ठीक था’ तक ही सीमित रह जाता।
विकास ने भी खुद को इस माहौल के अनुकूल ढाल लिया था। या यूँ कहें कि उन्होंने घर से मानसिक रूप से दूरी बना ली थी। ऑफिस से आने के बाद वे चुपचाप खाना खाते और अपने लैपटॉप में उलझ जाते। अगर वे कभी वीकेंड पर घर पर होते, तो किसी न किसी बहाने से बाहर निकल जाते ताकि रश्मि की शिकायतों की फेहरिस्त से बच सकें। घर में मेहमानों का आना भी लगभग बंद हो गया था। रश्मि को लगता था कि मेहमान आएंगे तो उनके बच्चे घर गंदा करेंगे,
सोफे के कवर खराब होंगे और उसे बाद में घंटों सफाई करनी पड़ेगी। उसने धीरे-धीरे अपने आप को एक ऐसे बुलबुले में कैद कर लिया था, जहाँ सिर्फ वह थी, और उसका चमकता हुआ बेदाग घर। उसे लगने लगा था कि यही तो वह शांति थी जिसकी उसे हमेशा से तलाश थी। उसे लगा कि उसने अपने परिवार को अनुशासन सिखा दिया है। सब कुछ उसके हिसाब से चल रहा था।
समय पंख लगाकर उड़ने लगा। साल दर साल बीतते गए और घर की वह खामोशी जो कभी एक रक्षात्मक दीवार थी, अब एक स्थायी आदत बन गई। अंश बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु चला गया। जब वह जा रहा था, तो रश्मि ने उसे गले तो लगाया, लेकिन अंश की आँखों में वह विदाई की तड़प नहीं थी जो एक बच्चे के घर छोड़ने पर होती है। वह जैसे इस घुटन भरे अनुशासन से आजाद होने के लिए बेताब था। दो साल बाद काव्या भी फैशन डिजाइनिंग के कोर्स के लिए दिल्ली चली गई। घर अब पूरी तरह से खाली हो गया था।
अब घर में सिर्फ रश्मि और विकास थे। विकास अब भी अपने उसी रूटीन में थे—सुबह ऑफिस जाना और रात को आकर चुपचाप सो जाना। अब रश्मि के पास पूरा दिन होता था। कोई उसके बिछाए हुए कालीन पर गंदे पैर नहीं रखता था। डाइनिंग टेबल के कांच पर कोई उंगलियों के निशान नहीं होते थे। सोफे के कुशन बिल्कुल अपनी जगह पर टिके रहते थे, मानो उन्हें फेविकोल से चिपका दिया गया हो। घर के हर कोने से फिनाइल और रूम फ्रेशनर की मिली-जुली महक आती थी। यह बिल्कुल वैसा ही घर था, जैसा रश्मि हमेशा से चाहती थी—एकदम परफेक्ट, किसी होम डेकोर मैगजीन के कवर पेज जैसा।
लेकिन, इस परफेक्शन की कीमत उसे अब समझ आ रही थी। शुरू के कुछ महीने तो उसे बहुत सुकून मिला। उसे लगा कि अब वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी सकती है। उसने कुछ टीवी सीरियल्स देखने शुरू किए, दोपहर में अपनी सहेलियों के साथ किट्टी पार्टी में जाने लगी। लेकिन यह सब भी कुछ ही दिनों का आकर्षण था। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, घर की वह खामोशी उसे काटने दौड़ने लगी। टीवी की आवाजें भी उसे अब शोर लगने लगी थीं। किट्टी पार्टी की गपशप में भी उसका मन नहीं लगता था। जब वह घर लौटती, तो वही सन्नाटा बाहें पसारे उसका स्वागत करता।
आज जब वह उस मार्बल की टेबल को पोंछ रही थी, तो उसकी आँखों से अचानक आँसू छलक पड़े और टेबल पर गिर गए। उसने उस पानी की बूंद को पोंछने की कोशिश नहीं की। वह बस उसे देखती रही। उसे अचानक वह दिन याद आ गया जब अंश ने स्कूल से आकर खुशी से दौड़ते हुए अपने कीचड़ सने जूते इसी कालीन पर रख दिए थे, क्योंकि वह अपनी क्लास में फर्स्ट आया था। वह यह खुशखबरी रश्मि को सुनाने आया था, लेकिन रश्मि ने उसकी खुशी देखने के बजाय कालीन पर लगे दाग देखकर उसे बुरी तरह डांट दिया था। अंश का वह उतरा हुआ चेहरा आज रश्मि की आँखों के सामने तैर गया। उसे काव्या का वह दिन याद आया जब उसने पहली बार अपने नन्हे हाथों से चाय बनाने की कोशिश की थी और आधी चाय ट्रे पर गिरा दी थी। रश्मि ने उस दिन काव्या की मेहनत को नहीं, बल्कि गंदी हुई ट्रे को देखा था।
“मैंने क्या कर दिया?” रश्मि ने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और फफक कर रो पड़ी। उसने अपने ही हाथों से अपने घर को एक जेल में बदल दिया था। एक ऐसी जेल जिसकी दीवारें चमकती थीं, लेकिन अंदर कोई जिंदगी नहीं थी। वह हर रोज फोन हाथ में लिए बैठी रहती, इस उम्मीद में कि शायद अंश या काव्या का फोन आ जाए। लेकिन बच्चों के पास अब अपनी दुनिया थी। वे हफ्ते में एक बार रस्मी तौर पर फोन करते, चंद मिनटों में हाल-चाल पूछते और फिर अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर फोन रख देते। रश्मि उनसे बहुत कुछ कहना चाहती थी। वह बताना चाहती थी कि वह उन्हें कितना याद करती है, वह बताना चाहती थी कि अब उसे उनके बिखरे हुए जूतों से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन उसके और उसके बच्चों के बीच संवाद की वह कड़ी बहुत पहले ही टूट चुकी थी, जब उसने बच्चों को चुप रहना सिखा दिया था।
शाम को जब विकास ऑफिस से आए, तो उन्होंने देखा कि रश्मि सोफे पर गुमसुम बैठी है। घर में अजीब सा अंधेरा था। विकास ने लाइट जलाई और रश्मि की तरफ देखा।
“क्या हुआ? आज चाय नहीं पीनी क्या?” विकास ने हमेशा की तरह एक सपाट स्वर में पूछा।
रश्मि ने उनकी तरफ देखा, उसकी आँखें सूजी हुई थीं। “विकास, क्या हम बच्चों को घर नहीं बुला सकते? कुछ दिनों के लिए ही सही। यह घर मुझे अब खाने को दौड़ता है।”
विकास ने एक ठंडी सांस ली और अपना लैपटॉप बैग साइड में रखते हुए बोले, “रश्मि, बच्चे अब बड़े हो गए हैं। उनकी अपनी जिंदगी है, अपना रूटीन है। और वैसे भी, जब वे यहाँ होते थे, तब भी तो तुम उनके होने से परेशान ही रहती थी। अब जब घर बिल्कुल तुम्हारे हिसाब से है, तो तुम्हें क्या दिक्कत है?”
विकास के इन शब्दों ने रश्मि के दिल में एक तीर की तरह वार किया। सच तो यही था। उसने खुद ही यह दूरियां पैदा की थीं।
आज रश्मि घर के हर कोने में जाकर उन निशानों को ढूंढती है जो कभी उसे चुभते थे। वह डाइनिंग टेबल के कांच को छूकर महसूस करने की कोशिश करती है कि शायद कहीं काव्या की उंगलियों की छाप छूट गई हो। वह अंश के कमरे में जाकर उस खाली बिस्तर को घंटों निहारती है जिस पर अब कोई सिलवट नहीं पड़ती। उसे अब घर की इस जानलेवा शांति से नफरत हो गई है। वह अब प्रार्थना करती है कि काश कोई चमत्कार हो जाए, बच्चे वापस घर आ जाएं, फिर से पूरे घर में चीजें बिखेर दें, फिर से जोर-जोर से टीवी चलाएं, और फिर से जूतों के निशान पूरे घर में छोड़ दें। वह अब कभी शिकायत नहीं करेगी। वह अब कभी सफाई के लिए उन पर नहीं चिल्लाएगी।
लेकिन बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इंसान अक्सर उन चीजों की कीमत तब समझता है, जब वे उसके हाथ से निकल जाती हैं। रश्मि को यह समझ आ गया था कि घर की सुंदरता बेदाग दीवारों और चमकते फर्श में नहीं होती, बल्कि उन दीवारों के बीच गूंजने वाली हंसी, उन फर्शों पर पड़ने वाले गंदे कदमों और अपनों के साथ होने वाली छोटी-छोटी नोंक-झोंक में होती है। वह समझ चुकी है कि जब तक घर में जिंदगी रहती है, तब तक चीजें बिखरती हैं। और जब सब कुछ एकदम अपनी जगह पर स्थिर हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि वहाँ से जिंदगी रुखसत हो चुकी है। अब वह बस एक चमकते हुए, साफ-सुथरे म्यूजियम की अकेली रखवाली बनकर रह गई है, जहाँ हर रोज वह उन उंगलियों के निशानों को याद करके रोती है, जिन्हें मिटाने में उसने अपनी पूरी जवानी निकाल दी।
क्या आपके घर में भी सफाई को लेकर ऐसी ही नोकझोंक होती है या कभी आपने भी अपने बच्चों को उनकी चंचलता के लिए डांटा है और बाद में पछतावा हुआ है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। हमें आपके जवाब का इंतजार रहेगा!
लेखिका : रमा शुक्ला
#चमकता घर और वो उंगलियों के निशान