अब मां की तबीयत दिन ब दिन खराब ही होती जा रही है।कभी शुगर बिल्कुल कम हो जाता है,तो हाइपो में चली जाती हैं।अस्पताल में भर्ती करना उन्हें ,कोई कम टेढ़ी खीर नहीं।इस असंभव से काम को करने की जिम्मेदारी भी शुभा पर ही थी।इनके बेटे की भी यही आदत थी, इंजेक्शन लगवाने से और एडमिट करवाने से बहुत खिसियाते थे।
खैर इस बार मां लो शुगर की वजह से बेहोश हो गईं थीं।तुरंत ही बेटे(मां के पोते ने)और शुभा ने मिलकर किसी तरह अस्पताल में एडमिट किया। ड्रिप जाते ही शरीर की सारी इंद्रियां मानो फिल्टर्ड हो गई हों।
आधे घंटे भी बीते नहीं थे कि मां ,पोते से गुहार लगाते हुए बोलीं”अब तो मैं अच्छा महसूस कर रही हूं।घर ले चल मुझे।तेरी दादी इतनी जल्दी तुम लोगों को छोड़कर जाने नहीं वाली।”
अब अग्नि परीक्षा तो शुभा को देनी ही थी।इस बार को लेकर ऐसा पांच बार हुआ कि मां का शुगर डिस्टर्ब हो रहा है।शुभा को इतना तो समझ आ ही गया था कि मां पूरी तरह से ठीक नहीं हैं।
शुभा ने साफ-साफ डाक्टर की हिदायत बता दी अपने बेटे से”डाॅक्टर साहब ने कहा है कि इन्हें कम से कम तीन दिन तो हास्पिल में आब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा।अभी नहीं ले जा सकते।” अब यह सुनकर मां और उनका पोता बड़े निराश हुएं।
आखिर में डाक्टरों और नर्सों की निगरानी में वे बेमन से रुक ही गईं हास्पिटल।
मां की छोटी बेटी ने सामान्य रूप से फोन पर जब मां का हाल-चाल जानना चाहा,तब शुभा ने अपने मन में चल रहे नकारात्मक विचारों को साझा किया उससे।वो तुरंत बोली”ठीक है भाभी हम जल्दी से जल्दी आने की व्यवस्था करते हैं। डायरेक्ट ट्रेन मिलते ही नहीं।दो -दो जगह उतरकर आना पड़ेगा।
तुम चिंता मत करो,मैं कैसे भी करके पहुंच जाऊंगीं।तब तक मां को बताया नहीं था शुभा ने कि छोटी ननद आने वाली है।समय बुरा कुछ ज्यादा ही देखा है मां ने।शुभा ने सीधे संवादों से ननद को मां को देख जाने का कर्तव्य समझाया।
इधर हास्पिटल में पड़ी हुईं बीमार हमारी मां,हर काम उसी अनुसार करतीं जैसे घर में।सारा दिन उनके निर्देश पालन करने का जिम्मा शुभा के ऊपर थे।सुबह से ताला लगाकर जो आकर बैठती,सीधे शाम को ही जाती घर।
इधर छोटी के आने का कंफर्म हो गया।ट्रेन शहडोल में रुकती है।वहां से घर तक आने में काफी रात हो जाती,और इधर शुभा के बेटे को परीक्षा देने भोपाल जाना पड़ गया।ख़ुद ट्रेन में बैठकर बार-बार आगाह करता गया”मम्मी ,नया ड्राइवर है,दोनों अकेलीं कैसे आएंगीं?तुम चली जाती लेने तो अच्छा होता।”
बेटे की बात से सहमत थी शुभा,पर जब घर से बाहर जाएगी,तो क्या बताकर निकलेगी।शुभा और छोटी ननद ने इस मिलन को पूर्णतः गोपनीय रखा था।रात ग्यारह बज चुके थे,घर पहुंचने में।शुभा दस बजे ही पहुंच गई थी स्टेशन उन्हें लेने।रास्ते में भांजी(शादीशुदा)को भी आगाह कर दिया था कि अभी नानी से बात ना करें।
वैसे तो मिल रहीं थीं सगी मां और बेटी,परंतु शुभा को ना जाने क्यों इतनी खुशी,इतना उत्साह हो रहा था।एक बहू के रूप में वह अपनी मां के चेहरे की उस उत्सुकता और खुशी को देखना चाहती थी।अठासी साल की महिला,जिसका निन्यानबे प्रतिशत जीवन अपने घर के अंदर ही बीत गया।और ऊपर से स्वाभिमानी इतनी कि किसी और के पास जाने को तैयार ही नहीं।
घर में घुसते ही शुभा ने छोटी ननद और भांजी को पहले भेजा मां के कमरे में,ताकि उन्हें देखकर मन को शांति मिले।जैसे ही दोनों(मां,बेटी)मां के कमरे में पहुंचे,लाइट जलाई,तब उन्होंने बड़े विनम्रता से कहा”अरे तुम लोग आए हो।
बहू ने बताया भी नहीं,ना तुमने बताया।मैं भी तो मां हूं रे।देख ना कुकू,तेरी भाभी एक घंटे से स्टेशन का बोलकर गईं हैं अकेली।इतनी रात को भटक रही है।तू फोन लगा तो जरा छोटी।पता कर कहां है वह?”
शुभा ने कमरे में घुसते ही मां के माथे पर पवित्र मन से चूमा और बोली”” तुम कब सास बनोगी?मेरी मां बनी रहती हो हमेशा।अब बताओ सरप्राइज कैसा लगा तुम्हें?बेटी को देखकर तो तबीयत अच्छी होने लगी होगी।”
उन्होंने उस दिन शुभा को एक सरप्राइज दे डाला” अरे बेटी को देखकर मैं क्यूं सरप्राइज होने लगूं।मेरी बेटी में और तुझमें कोई अंतर है।चलो सो जाओ तुम सब।पोता गया है,आएगा तो घुमाने ले जाएगा कल ।”
वहीं शांत चित्त और चेहरे में हंसी लिए सो गईं मां।
शुभा को लगा कि ननद और उसकी बेटी को बुरा लगा होगा,मां के बर्ताव से।पता नहीं इस बार मिलने पर वह उत्तेजना या खुशी प्रकट भी नहीं कर रही।ये क्या मोह -माया के त्याग की
तैयारी कर रहीं हैं।छोटी ने भी सहमति जताते हुए कहा”अच्छा ही हुआ मोह छूटेगा,तभी शांति से जा पाएंगीं।तुमने सही समय बुलवा लिया भाभी,कम से कम देख लिया ,बात कर ली ।”
अगले दिन मोह -माया के बंधन काटने और मोक्ष प्राप्ति की बातें चल ही रहीं थीं कि, उन्होंने बेटी और शुभा को बुलवाया अपने कमरे में, बिस्तर के पास।भांजी हंसकर ताने देने लगी कि नानी अपना छिपाया खजाना बेटी और बहू में बांटना चाहती हैं।अंदर जाते ही उन्होंने दोनों से एक ही सवाल पूछा”अच्छा तुम दोनों एक चेन पहने हो ना, ऐसा ही एक चेन अभी कितने का मिलेगा? पचास हजार तक हो जाएगा क्या?”
दोनों ननद भाभी सन्न रह गए।फिर सोचा दाम बताने से मां वैसे भी शांत हो जाएगी।उनके पास चेन तो है नहीं। उन्होंने एक बहुत पुराना पर्स अपनी अलमारी से निकाला।दिखाकर बोलीं”तुम में से किसी को पता नहीं है,इसमें मैंने पैसे जमा किए हैं।
जहां कहीं से मिलते हैं,मैं इसी पर्स में रखती हूं।बस तुम लोग पता करो,कि इस पैसे में आ जाएगा ना?कब से पैसे जमा कर रही हूं।मेरे श्रवण कुमार पोते को जब तक मैं एक चेन ना दे दूं,मैं दुनिया से कहीं नहीं जाने वाली।”
अब ननद और भाभी दोनों रोते हुए एक दूसरे को देख रहे थे।यह मोह -माया से मुक्ति है,या प्रेम की भक्ति । उन्होंने बंधन तोड़े नहीं थे,ईश्वर ने ही उनकी पूंजी कम कर दी।पहले पति,फिर बेटा,दामाद और अब बड़ी बेटी।इतना सब खोने के बाद भी यक्ष की तरह अपने पोते को छिपाकर रखती है,अभी भी।यही मोह माया के बंधन हैं या बंधन से मुक्ति?
शुभ्रा बैनर्जी
#कुछ बंधन तोड़ देना अच्छा होता है।