निधि अपने माता-पिता की इकलौती और सबसे लाडली बेटी थी। उसके मायके का माहौल ऐसा था कि अगर वह सुबह के दस बजे तक भी सोती रहे, तो उसकी माँ दबे पाँव कमरे में आती और बहुत ही प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरकर कहती, “बेटा उठ जा, चाय ठंडी हो रही है।” निधि ने जीवन में कभी कोई भारी ज़िम्मेदारी नहीं उठाई थी।
उसके हर आँसू पर पूरा घर एक पैर पर खड़ा हो जाता था। वह एक ऐसी नाज़ुक कली थी जिसे धूप की तेज़ किरणों से भी बचाकर रखा गया था। फिर एक दिन वह समय आया जब निधि की शादी एक बहुत ही प्रतिष्ठित और बड़े परिवार में हो गई। उसके पति का नाम सुमित था,
जो एक समझदार और सुलझा हुआ इंसान था। सुमित की माँ, यानी निधि की सास, विमला देवी एक बहुत ही अनुशासन प्रिय और सख्त मिज़ाज की महिला थीं। उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे और एक बड़े संयुक्त परिवार को बहुत ही सलीके से पिरोकर रखा था।
शादी के बाद जब निधि अपने ससुराल आई, तो उसकी आँखों में ढेरों सपने थे। उसने टीवी सीरियल्स और फिल्मों में सास-बहू के ड्रामे बहुत देखे थे, लेकिन उसके मन में यही था कि वह अपनी सास को अपनी माँ की तरह प्यार करेगी और बदले में उसे भी एक माँ मिल जाएगी।
लेकिन हकीकत के धरातल पर जब उसकी उम्मीदों ने कदम रखा, तो उन्हें करारा झटका लगा। शादी के तीसरे ही दिन सुबह के छह बजे विमला देवी ने निधि के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। निधि जो अपने मायके में देर तक सोने की आदी थी, हड़बड़ा कर उठ बैठी। दरवाज़ा खोलते ही विमला देवी ने एक सपाट लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “हमारे घर में सूरज निकलने के बाद बिस्तर पर पड़े रहना बीमारियों और दरिद्रता को न्योता देना माना जाता है।
जल्दी नहाकर रसोई में आओ, आज से घर की सुबह तुम्हारे हाथों से शुरू होगी।” निधि की आँखों में आँसू आ गए। उसे अपनी माँ की बहुत याद आई जो कभी उसे नींद से नहीं जगाती थी। उस दिन रसोई में काम करते हुए निधि को लगा कि उसकी सास दुनिया की सबसे क्रूर महिला है।
दिन बीतते गए और निधि के लिए हर दिन एक नई परीक्षा लेकर आता। निधि को फोन पर अपनी सहेलियों और माँ से घंटों बातें करने की आदत थी। मायके में कोई उसे नहीं टोकता था, लेकिन ससुराल में जैसे ही वह काम छोड़कर फोन पर लगती, विमला देवी की तेज़ आवाज़ गूँज उठती, “निधि! समय को इस तरह व्यर्थ बातों में मत बहाओ। एक घर की मालकिन अगर अपना समय नहीं संभालेगी, तो वह घर को कैसे संभालेगी?
जाकर देखो कि शाम के खाने की तैयारी में क्या कमी है।” निधि झुँझला जाती। उसे लगता कि उसकी सास उसे नौकरानी समझती है और उसकी आज़ादी छीन रही है। वह रोते हुए सुमित से शिकायत करती, लेकिन सुमित हमेशा मुस्कुराकर टाल देता और कहता, “माँ की बातों का बुरा मत मानो, उनके तरीके थोड़े सख्त हैं पर दिल की बुरी नहीं हैं।” लेकिन निधि को यह सब सिर्फ एक खोखली दिलासा लगता था।
एक बार घर में सुमित के ताऊ जी और उनके परिवार के लोग अचानक रहने के लिए आ गए। घर में पंद्रह से बीस लोगों का जमावड़ा हो गया। निधि घबरा गई। उसे लगा कि अब विमला देवी सारा मोर्चा संभाल लेंगी और वह बस उनकी मदद करेगी, ठीक वैसे ही जैसे मायके में जब मेहमान आते थे तो उसकी माँ सारा काम खुद करती थी और निधि को बस आराम से बैठने देती थी। लेकिन यहाँ विमला देवी ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने रसोई की चाबियाँ निधि के सामने रखीं और कहा, “आज से तीन दिन तक जब तक मेहमान यहाँ हैं, रसोई और उनके स्वागत की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। मैं सिर्फ बाहर बैठकर मेहमानों से बात करूँगी।” निधि के तो जैसे हाथ-पैर फूल गए। उसने घबराहट में कई गलतियाँ कीं।
कभी दाल में नमक कम होता, तो कभी रोटियाँ जल जातीं। हर बार जब वह गलती करती, विमला देवी रसोई में आतीं, गलती सुधारने का तरीका बतातीं, लेकिन खुद हाथ नहीं लगाती थीं। वे बस पास खड़ी होकर उसे कड़े शब्दों में निर्देश देती रहतीं। उन तीन दिनों में निधि बुरी तरह थक गई और मन ही मन अपनी सास को कोसने लगी कि मुसीबत के समय में उन्होंने उसका साथ नहीं दिया और उसे आगे कर दिया।
महीने साल में बदलते गए। निधि के मन में अपनी सास के लिए एक गहरी कड़वाहट बैठ गई थी। उसे लगने लगा था कि विमला देवी कभी उसकी माँ नहीं बन सकतीं। एक दिन निधि ने सुमित के सामने ज़िद पकड़ ली कि वह इस घर में घुटन महसूस कर रही है और उसे अब अलग घर में रहना है। उसने कहा, “मैं तुम्हारी माँ के रोज़-रोज़ के तानों और हुक्म से तंग आ चुकी हूँ। मुझे मेरी आज़ादी चाहिए। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं किसी जेल में हूँ जहाँ एक वार्डन हर वक्त मुझ पर नज़र रखे हुए है।” सुमित ने बहुत समझाया, लेकिन निधि नहीं मानी। यह बात किसी तरह विमला देवी के कानों तक पहुँच गई। उन्होंने कोई हंगामा नहीं किया, कोई ताना नहीं मारा। अगले दिन उन्होंने सुमित और निधि को अपने कमरे में बुलाया। विमला देवी के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जो निधि ने पहले कभी नहीं देखी थी।
विमला देवी ने घर की तिजोरी की चाबियाँ, सारे कागज़ात और बैंक की पासबुक निधि के हाथों में रख दी। निधि हैरान रह गई। विमला देवी ने शांत स्वर में कहा, “तुम अलग रहना चाहती हो, यह तुम्हारा फैसला है। लेकिन अलग होने से पहले छह महीने के लिए इस पूरे घर की, इसके खर्चों की, और हर एक फैसले की ज़िम्मेदारी तुम निभाओगी। अगर तुम इसमें सफल रहीं, तो तुम खुशी-खुशी अलग घर ले लेना, मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी।” निधि ने चुनौती स्वीकार कर ली। उसे लगा कि यह तो बहुत आसान काम है, अब उसे किसी की रोक-टोक नहीं सहनी पड़ेगी।
लेकिन जैसे ही घर का पूरा बोझ निधि के कंधों पर आया, उसे समझ में आने लगा कि एक परिवार को चलाना कितना मुश्किल होता है। सुबह से लेकर रात तक, हर छोटे-बड़े फैसले उसे लेने पड़ते। सुमित के व्यापार में अचानक एक बड़ा नुकसान हो गया और घर में पैसों की भारी किल्लत आ गई। मायके में जब ऐसी स्थिति आती थी, तो निधि के पिता सब संभाल लेते थे और निधि की माँ उसे कभी इसकी भनक भी नहीं लगने देती थी। लेकिन यहाँ निधि को सामने आकर लड़ना था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि बजट कैसे संभाला जाए, रिश्तेदारों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरा जाए।
उसी दौरान, सुमित की छोटी बहन की शादी तय हो गई। घर में पैसों की तंगी और ऊपर से शादी का खर्च। निधि बुरी तरह टूट गई। एक रात वह अपने कमरे में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे लगा कि वह यह सब नहीं कर पाएगी और उसे अपनी माँ की बहुत याद आ रही थी। तभी विमला देवी कमरे में आईं। उन्होंने निधि को रोते हुए देखा, लेकिन हमेशा की तरह वह उसके आँसू पोंछने या उसे गले लगाने नहीं दौड़ीं। इसके बजाय, उन्होंने निधि के कंधे पर हाथ रखा और एक ऐसी आवाज़ में बात की जिसमें सख्ती नहीं, बल्कि एक गहरे अनुभव का ठहराव था।
“अगर तुम्हारी माँ यहाँ होती, तो वह तुम्हें गले लगाती, तुम्हारे हिस्से का रोती और शायद तुम्हारे हिस्से का काम खुद करने लगती। लेकिन मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ, निधि। मैं तुम्हारी सास हूँ। माँ तुम्हें गिरते ही उठा लेती है, पर सास तुम्हें खुद उठना सिखाती है। जब तुम पर कोई मुसीबत आती है, तो माँ ढाल बनकर खड़ी हो जाती है, ताकि तुम्हें खरोंच न आए। लेकिन मैं तुम्हें ही ढाल बनाकर लड़ना सिखा रही थी, ताकि कल को जब कोई ढाल तुम्हारे पास न हो, तो तुम खुद एक अभेद्य किला बन सको।”
निधि अवाक होकर विमला देवी को देख रही थी। विमला देवी ने आगे कहा, “तुम सुबह देर तक सोना चाहती थी, मैं तुम्हें जगाती थी। इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हें परेशान करना था, बल्कि इसलिए ताकि तुम वक्त से दो कदम आगे चलना सीख सको। तुम फोन पर वक्त बर्बाद करती थी, मैं तुम्हें टोकती थी ताकि तुम अपनी ज़िम्मेदारियों की कीमत समझ सको। जिस दिन मेहमान आए थे, मैंने तुम्हारी मदद नहीं की, क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम भीड़ को संभालना सीखो, तुम घबराहट पर काबू पाना सीखो। क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब इस परिवार के ऊपर कोई बड़ी मुसीबत आएगी और तब मैं शायद न रहूँ। उस दिन तुम्हें इस परिवार को टूटने से बचाना होगा।”
विमला देवी की बातें सुनकर निधि के अंदर जैसे कोई तूफ़ान शांत हो गया हो। उसे अचानक अपनी सास के उस कठोर व्यवहार के पीछे छिपी एक ऐसी ममता दिखाई दी, जो उसकी अपनी माँ की ममता से भी कहीं ज़्यादा गहरी और दूरदर्शी थी। विमला देवी ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “निधि, एक पतंग आसमान में बहुत ऊँचाई तक उड़ती है। उसे लगता है कि जो डोर उसे बाँधे हुए है, वह उसकी आज़ादी छीन रही है। वह डोर उसे जहाँ चाहे वहाँ जाने से रोकती है। कभी-कभी वह पतंग उस डोर से टूटकर अलग हो जाना चाहती है। लेकिन जो पतंग अपनी डोर से टूट जाती है, वह कुछ पल के लिए तो हवा के साथ बहुत दूर तक आज़ादी से उड़ती है, लेकिन अंत में उसका हश्र क्या होता है? वह किसी पेड़ में उलझ जाती है या ज़मीन पर गिरकर मिट्टी में मिल जाती है। एक परिवार में भी सास उसी डोर की तरह होती है। वह तुम्हें तुम्हारी मनचाही दिशा में उड़ने से ज़रूर रोकती है, तुम्हें खींचती है, तुम्हें दर्द भी देती है, लेकिन वह तुम्हें कभी ज़मीन पर गिरने नहीं देती। जब तक तुम उस डोर से बंधी हो, तुम हमेशा ऊंचाइयों को छूती रहोगी।”
इन शब्दों ने निधि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। वह समझ गई कि उसकी सास ने उसे कभी अपनी बेटी नहीं माना, बल्कि उसे एक ‘लीडर’, एक ‘मालकिन’ और एक मज़बूत इंसान बनाने की ट्रेनिंग दी। विमला देवी ने अपनी पूरी उम्र जिस परिवार को एक धागे में पिरोकर रखा था, वह उसकी चाबी किसी ऐसे कमज़ोर हाथों में कैसे सौंप सकती थीं जो ज़रा सी परेशानी में टूट जाए? उन्होंने निधि को तपाकर कुंदन बनाया था।
अगले दिन से निधि का नज़रिया पूरी तरह बदल गया। उसने विमला देवी के तजुर्बे का इस्तेमाल किया। उसने बड़ी ही सूझबूझ से घर के खर्चे कम किए, अपनी कुछ पुरानी बचत और विमला देवी की दी हुई सलाह से सुमित की बहन की शादी बहुत ही शानदार तरीके से संपन्न कराई। शादी वाले दिन जब सभी मेहमान घर की नई बहू निधि की तारीफ कर रहे थे, तो निधि ने जाकर अपनी सास विमला देवी के पैर छू लिए। विमला देवी की आँखों में पहली बार अपनी बहू के लिए फख्र के आँसू थे।
निधि ने समझ लिया था कि सास को माँ बनाने की ज़िद एक बेवकूफी है। सास का अपना एक अलग मुकाम है, एक अलग रुतबा है। वह एक ऐसी गुरु है जो खुद बुरी बनकर अपनी शिष्या को दुनिया के तानो-बाणों से लड़ना सिखाती है। टीवी सीरियल्स और समाज की बातों ने हमेशा एक सास की छवि को नकारात्मक रूप में पेश किया है, लेकिन हकीकत में, जब एक माँ अपनी बेटी को विदा करती है तो वह उसे सिर्फ प्यार देती है, लेकिन एक सास जब अपनी बहू को परिवार सौंपती है, तो वह उसे उस परिवार के लायक बनाती है।
एक दिन वह सख्त सास इस दुनिया से चली जाती है, दुनिया भर की बुराई और ताने अपने सिर लेकर… लेकिन पीछे छोड़ जाती है एक ऐसी मज़बूत औरत, जो अब अगली सास बनने के काबिल हो चुकी होती है।
इसलिए, सास को सास ही रहने दो, उन्हें माँ की कसौटी पर मत तौलो। उनकी कड़कती आवाज़ के पीछे छिपी उस फिक्र को समझो जो तुम्हें कल के तूफानों के लिए तैयार कर रही है।
क्या आप भी अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसी स्थिति से गुज़रे हैं जहाँ आपको लगा हो कि आपके बड़ों की सख्ती के पीछे असल में उनकी गहरी फिक्र छुपी थी?
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#मज़बूत नींव की खुरदरी ईंट
लेखिका : गरिमा चौधरी