रिश्तों की राख पर – वर्षा मंडल

शाम के धुंधलके ने पूरे घर को अपनी चादर में लपेट लिया था, लेकिन उस दिन घर के भीतर का सन्नाटा किसी आने वाले भयानक तूफान की गवाही दे रहा था। बैठक में भारी खामोशी पसरी थी। सोफे पर ससुर जी, दीनानाथ जी, सिर पकड़े बैठे थे। उनके सामने उनके ही पुराने मित्र और उनके … Read more

सम्मान का मोल – रीमा साहू

सर्दियों की एक सर्द शाम थी, जब सुमेधा अपने कमरे में बैठी हुई फोन के रिसीवर को अपने हाथों में पकड़े हुए सुन्न सी रह गई थी। बाहर हल्की-हल्की धुंध छाने लगी थी, लेकिन सुमेधा के मन के भीतर विचारों का एक घना कोहरा उमड़ पड़ा था। फोन कट चुका था, लेकिन दूसरी तरफ से … Read more

बटवारा – एम. पी. सिंह 

सोहन के गुज़र जाने के बाद उसकी पत्नी कमला ने अकेले दोनों बेटों राम और मोहन क़ो सम्भला. उस समय राम 10 और मोहन 8 साल का था. कमला ने बच्चों की परवरिश में खुद क़ो पूरी तरह समर्पित कर दिया. सुबह 10 से शाम 5 बजे तक स्कूल में पढ़ाती ओर रात 8 से … Read more

*अपने और पराए – वक्त ने बताए* – तोषिका

आज मुझे *अपने और पराए – वक्त ने बताए* वरना मैं हमेशा ही धोखे में ही रहती रोते हुई मुस्कान बोली। उसकी साथ बैठी दोस्त रूपा ने उस से पूछा “ऐसे क्यों बोल रही हो? क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा क्या?” मुस्कान चाह कर भी अपने मुख से एक शब्द भी नहीं निकाल पा … Read more

अपनेपन की छांव का अहसास – डॉ बीना कुण्डलिया 

दरवाजे पर खटखटाहट और एक बुलन्द सी आवाज की चहक कुरियर कुरियर को सुनकर माया जी ने दरवाजा खोला कुरियर वाले से कुरियर लेकर अभी सोच ही रहीं थीं क्या होगा ? किसने भेजा होगा । दरवाजे पर आवाज सुनकर शुलभ बाबू भी जल्दी से बहार आ गये। अरे माया दिखाओ तो सही जरा किसने … Read more

खामोश ढाल: एक अनकहे समर्पण की दास्तान

सुहासिनी अक्सर खिड़की के पास बैठकर बाहर के कोलाहल को देखती रहती थी। शादी के छह साल बीत चुके थे, लेकिन उसे लगता था जैसे उसके और उसके पति, समर के बीच एक अदृश्य दीवार सी खड़ी है। समर एक बेहद शांत, काम में डूबा रहने वाला और कम बोलने वाला इंसान था। सुहासिनी को … Read more

**सोने का पिंजरा: एक खोखली मुस्कान का सच**

बारिश की बूंदें कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर टकरा रही थीं। शहर के सबसे पॉश इलाके में बना ‘मल्होत्रा विला’ बाहर से जितना भव्य और खूबसूरत दिखता था, आज अंदर से उतना ही शांत और सर्द महसूस हो रहा था। इटालियन मार्बल से सजे उस विशाल ड्रॉइंग रूम में बैठी नंदिनी के हाथ में कॉफी … Read more

 खामोश दीवारों का दर्द – अर्चना खंडेलवाल

खिड़की के बाहर सावन की झमाझम बारिश हो रही थी, लेकिन काव्या के अंदर जैसे एक सूखा रेगिस्तान पसर चुका था। उसकी छोटी बहन श्रुति, जो अपनी कॉलेज की छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए दीदी के घर रहने आई थी, सोफे पर बैठी स्तब्ध थी। उसने अभी-अभी जो देखा था, उस पर उसे यकीन … Read more

**चमकते ख्वाब और घर की चौखट** – अर्चना खंडेलवाल

“निहारिका, इस तरह आधी रात को अचानक घर छोड़ कर जाना ठीक नहीं होगा,” अनिरुद्ध की आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी पीड़ा थी। “अभी बाबूजी और माँ सो गए हैं, सुबह उठकर जब वे तुम्हारे बारे में पूछेंगे तो मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा? वे सब तुमसे कितना प्यार करते हैं, तुम्हारा कितना … Read more

अदालत का फैसला – एम. पी. सिंह

जीवन भोपाल के पास एक छोटे से गावं मैं रहता था और पशु आहार का कारोबार करता था. पंजाब से माल आता था ओर आस पास के छोटे पशु पालक माल ले जाते थे. बिक्री बहुत ज्यादा नहीं थीं पर कमाई काफ़ी ज्यादा थीं. जीवन की पत्नी ज्योति अपना घर ओर  बच्चे नीता व नितिन … Read more

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