जीवन में अब तक बहुत से दोस्त मिले। कुछ अच्छे और कुछ बहुत अच्छे। लेकिन वह दोस्त भले ही हमारे ऑफिस के सहकर्मी थे या हम जब सरकारी मकान में रहते थे,
वहां के पड़ोसी लेकिन यह बात नितांत सत्य है कि जब जब भी वह सहकर्मी ट्रांसफर होकर दूसरे विभाग में चले जाते थे या हम सरकारी मकान छोड़कर दूसरे में चले जाते थे तो उन दोस्तों की याद बहुत आती थी।
ऐसी ही एक ही याद है मेरी स्कूल की सहेली मान्यता की। हम छठी से ग्यारहवीं तक साथ पढ़े थे।(जी हां उस समय में 12वीं कक्षा नहीं हुआ करती थी, 11वीं कक्षा के बाद ही हम दिल्ली यूनिवर्सिटी कॉलेज में चले गए थे) तब मान्यता मैं और हमारी तीन और सहेलियां हम सब साथ ही लंच करते थे और साथ ही पढ़ते थे।
हम चार तो सरकारी मकान में ही रहते थे और मान्यता हमारे घर से थोड़ी दूर पर एक कोठी में रहती थी लेकिन वह पढ़ने के लिए हमारे साथ ही आ जाती थी। हम सब मिलकर साथ ही मार्केट जाते ट्यूशन जाते यहां तक की अच्छी पिक्चर लगने पर एकसाथ सिनेमा भी जाते थे।
वह जीवन का बहुत अच्छा समय था। हम जिसके भी घर में जाते थे वही खाना वगैरह या कुछ भी खा भी लेते थे, वह आज के जैसा समय नहीं था कि कोई किसी के घर जाए ना और जाए तो खाना खाए ना। उस समय टेलीविजन तो था पर हर समय नहीं चलता था और ना ही आज के जैसे बहुत सारे प्रोग्राम आते थे।
हम मनोरंजन के लिए खेलते पढ़ते साथ लाइब्रेरी जाते और घूमते ही थे। तब घरों में काम वालियों का भी इतना चलन नहीं था हमारी माताएं अपने आप ही घर का काम करा करती थी और हमको उनका हाथ बटवाना होता था लेकिन हम पांचों सहेलियां जहां भी मिल जाती थी बिना यह सोचे कि हम दूसरे के घर में काम करवा रहे हैं हम अपनी सहेली का सारा काम
निबटवाना अपना फर्ज समझते थे।
ग्यारहवीं के बाद हमारा सबका तो कॉलेज में एडमिशन हो गया था। मान्यता के माता पिता ने उसे सिलाई कढ़ाई के स्कूल में डाल दिया था। वहीं वह चित्रकारी इत्यादि भी सीख रही थी। हम तो कॉलेज चले जाते थे उसने हमारे लिए बहुत सुंदर वॉल पेंटिंग और रूमाल कढ़ाई करके बनाए थे।
धीरे धीरे मान्यता के साथ हमारा मेल जो कम ही होता जा रहा था हम तब कॉलेज के सेकंड ईयर में ही होंगे कि मान्यता ने हम को सूचित किया कि अब उसकी शादी होने वाली है। वह बड़ी खुशी खुशी बता रही थी कि उसकी शादी जयपुर की बहुत बड़ी हवेली में होने जा रही है।
अब हम सब मान्यता के साथ उसकी शादी के लिए सामान खरीदते थे और बहुत खुश होते थे। हम जब मान्यता के घर गए तो मान्यता की मम्मी ने बताया कि मान्यता के ससुराल वाले बेहद अमीर हैं। उनकी जयपुर में बहुत बड़ी हवेली है। इसके अतिरिक्त उनके बहुत सारे और भी व्यापार है।
मान्यता की माताजी ने मान्यता के ससुराल से आए हुए बहुत से खूबसूरत गहने और कपड़े भी दिखाएं। इतनी सुंदर साड़ियां और लहंगे हम सबको बहुत लुभा रहे थे। मान्यता ने हंसते हुए हमें कहा की कपड़ों पर कारीगरी और लाख का काम भी हमारे ससुराल में होता है।
उसने हम सब से कहा कि शादी के बाद तुम सब एक बार जयपुर जरूर आना। मान्यता की मम्मी और भाभी ने भी कहा कि शादी के बाद पहली बार जब हम सब मान्यता को लेने के लिए जयपुर जाएंगे तो तुम भी हमारे साथ ही चलना।
हम मान्यता की शादी की तैयारी खुशी खुशी कर रहे थे , इस चक्कर में हमारी पढ़ाई का कितना हर्जा हो रहा था इस बारे में तो हमें ख्याल भी नहीं आता था बस एक ही धुन सवार थी कि मान्यता की शादी में हम क्या पहनेंगे कैसे करेंगे शायद वह किसी सहेली की पहली शादी थी जो कि हम लोगों ने अटेंड की थी।
इससे पहले तो हम रिश्तेदारों की शादी में ही गए थे। पहली बार कोई कार्ड हमारे नाम से आया था। उसकी शादी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हुई और हम चारों उसके घर में पूरी रात भी रुके थे। जाते हुए जब उस से गले मिले तो उसने हमसे वचन लिया था कि
भैया भाभी के साथ तुम भी मेरे ससुराल में मुझे लेने के लिए जरूर आना। हम सब ने भी अपनी मम्मियों को जयपुर जाने के लिए मना लिया था।
तब इतना फ़ोनों का चलन तो नहीं था केवल किसी किसी घर में लैंडलाइन होते थे। हम सब उसके घर से उसकी भाभी के फोन का इंतजार कर रहे थे कि हमको मान्यता को लेने के लिए कब जाना है लेकिन उसकी भाभी का तो कोई फोन आया ही नहीं।
काफी दिन बीत जाने के बाद हम चारों ने सोचा कि क्यों ना हम मान्यता के घर जाएं और उनसे मान्यता का हाल पूछ कर आए। हम जब मान्यता के घर गए तो उसकी भाभी ने इधर उधर की बातें करते हुए कहा कि हमारा जयपुर जाने का अचानक से प्रोग्राम बना इसलिए तुम सब को नहीं बुला पाए।
कोई बात नहीं यह कोई इतना बड़ा कारण तो नहीं था कि भाभी को शर्मिंदा होना पड़े। हमने मान्यता के बारे में पूछा तो उसकी भाभी ने बताया वह ठीक है और बहुत खुश है अभी पीछे 2 दिन के लिए वह और कुंवर साहब भी घर पर आए भी थे। तो आपने हमको क्यों नहीं बुलाया?
मान्यता ने भी हमें नहीं बुलाया हम हैरान थे। हमारी दूसरी सहेली मिनी ने भाभी से कहा हमें मान्यता का नंबर तो दो हम उससे पूछेंगे कि तू हमसे मिली क्यों नहीं? तब भाभी ने बताया नहीं, उसके घर में फोन तो बहुत है लेकिन हम ऐसे नंबर दे नहीं सकते क्योंकि उनके घर में बहुएं ऐसे ही फोन नहीं कर सकती।
हम हैरान तो थे लेकिन फिर उसकी भाभी ने बताया कि वह लोग बहुत अमीर है ना इसलिए वह सब के साथ इतना अधिक रिश्ता नहीं रखते। हमें तो यह भी नहीं पता कि अब मान्यता बाई जी यहां कब आएंगी लेकिन जब भी यहां आएंगी मैं आप सब को जरूर बुलवाऊंगी।
हम सब वापस आ गए। उसके बाद हम कभी भी मान्यता से नहीं मिले। कभी रास्ते में उसकी भाभी या भैया कोई मिल भी जाते थे तो हम मान्यता के बारे में पूछते थे वह यही कहती थी कि वह बहुत खुश है और उसके दो बच्चे भी हो चुके हैं।
वह घर आती भी होगी तो हमें कभी सूचना नहीं दी गई। समय के साथ हमारी भी शादियां हो चुकी थी और रिटायर होने के बाद हमारे पिताजी ने भी उन सरकारी मकानों को खाली कर दिया था।
आज भी कभी भी मान्यता की याद आती है तो यह सोच कर बहुत मन बेचैन होता है की क्या मान्यता को हमारी याद नहीं आती होगी? हम झटपट उस ख्याल को अपने मन से निकाल देते थे कि मान्यता दुखी भी हो सकती है। हम यही सोचते हैं कि शायद इतना अच्छा घर और इतनी अमीरी पाकर वह खुशी में सब कुछ भूल गई हो
और अपने नए जीवन में व्यस्त हो गई हो। काश कि ऐसा ही हुआ हो। लेकिन उसकी बहुत सी यादें हम सब के पास रह गई थी। हम चारों आज भी व्हाट्सएप पर एक दूसरे से बातें कर लेते हैं तो कभी-कभी मान्यता को भी याद जरूर करते हैं। किसी को भी यह कहानी सुनने या लिखने के बाद मैं उम्मीद करती हूं की कोई ना कोई मुझे मान्यता के बारे में जरुर सूचना देगा।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा