शांति देवी के पैरों में पिछले पंद्रह दिनों से भयंकर सूजन थी। उम्र पचपन के पार हो चुकी थी और शरीर अब पहले की तरह फुर्तीला नहीं रहा था। लेकिन इकलौते बेटे रोहन की शादी थी, तो घर में बैठकर आराम करना भी मुमकिन नहीं था। हलवाई को राशन देने से लेकर रिश्तेदारों के सोने-बैठने का इंतज़ाम करने तक, सारा काम शांति देवी अपनी निगरानी में ही करवा रही थीं। शाम की चाय का प्याला हाथ में थामे, उन्होंने अपने सूजे हुए पैरों को स्टूल पर फैलाते हुए अपने पति दीनानाथ जी से कहा, “बस, यह शादी निपट जाए और रोहन की बहू घर आ जाए, तो मुझे इस रसोई और घर के जंजाल से मुक्ति मिले। मेरा तो शरीर अब जवाब दे गया है। बहू आएगी, चाबियों का गुच्छा उसे सौंप दूंगी। फिर वो जाने और उसका काम जाने, मैं तो बस आराम करूंगी।”
दीनानाथ जी ने चाय का घूंट भरते हुए अपनी पत्नी की तरफ देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ बोले, “शांति, बहुएं घर की रौनक होती हैं, कोई काम करने की मशीन नहीं। नई बच्ची है, उसे भी इस नए माहौल में ढलने में थोड़ा वक्त लगेगा। आते ही उस पर सारा बोझ डाल देना क्या सही होगा?”
शांति देवी ने तुरंत अपनी बात का बचाव करते हुए कहा, “मैंने भी तो बत्तीस साल इस घर की चक्की पीसी है। जब मैं नई-नवेली आई थी, तब क्या मेरी सास ने मुझे आराम करने दिया था? अगले ही दिन से रसोई में खड़ा कर दिया था। यह तो दुनिया का दस्तूर है। एक औरत थकती है, तो दूसरी उसकी जगह लेती है। मैं कोई ज़ुल्म थोड़े ही करूंगी, बस अपने हिस्से का आराम मांग रही हूँ।” दीनानाथ जी चुप रहे, क्योंकि वह जानते थे कि शांति देवी की इस कड़वाहट के पीछे उनका वह शारीरिक दर्द और थकान है, जिसे उन्होंने उम्र भर बिना किसी शिकायत के सहा है।
आख़िरकार वह दिन भी आ गया। शहनाइयां बजीं, घर मेहमानों से भर गया और रोहन अपनी दुल्हन स्नेहा को ब्याह कर घर ले आया। शादी की रस्मों-रिवाज़ों में शांति देवी इतनी बुरी तरह थक चुकी थीं कि विदाई के बाद जब वह अपने कमरे में आईं, तो उनके घुटनों का दर्द असहनीय हो चुका था। दर्द की गोली खाकर वह बिस्तर पर गिरीं और मन ही मन सोचा कि कल से सुबह उठकर नाश्ता बनाने की चिंता खत्म। कल से स्नेहा रसोई संभालेगी और वह अपनी अधूरी नींद पूरी करेंगी।
अगली सुबह जब शांति देवी की आँख खुली, तो धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ चुकी थी। उन्होंने दीवार घड़ी की तरफ देखा, सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे। वह हड़बड़ा कर उठीं। पिछले बत्तीस सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि वह सुबह छह बजे से पहले न उठी हों। उन्हें अचानक खयाल आया कि आज स्नेहा की पहली रसोई है। उन्होंने जल्दी से अपना जोड़ा ठीक किया और लड़खड़ाते कदमों से कमरे से बाहर आईं।
रसोई की तरफ बढ़ते हुए शांति देवी के मन में कई सवाल चल रहे थे। ‘पता नहीं स्नेहा ने क्या बनाया होगा? कहीं नाश्ता बनाने में उसे कोई परेशानी तो नहीं हो रही होगी? मैंने तो उसे कल कुछ बताया भी नहीं।’ लेकिन जब वह रसोई के दरवाज़े पर पहुँचीं, तो अंदर का नज़ारा देखकर उनके कदम ठिठक गए।
स्नेहा रसोई में नहीं थी। गैस पर चाय की केतली रखी थी, जो शायद अभी-अभी बंद की गई थी। तभी पीछे से एक मीठी सी आवाज़ आई, “माँ जी, आप उठ गईं?”
शांति देवी ने मुड़कर देखा। स्नेहा के हाथों में एक छोटी सी बाल्टी थी, जिसमें से भाप निकल रही थी और दूसरे हाथ में सरसों के तेल की एक शीशी थी। वह बहुत ही साधारण लेकिन सलीके से साड़ी पहने हुए थी।
“तू यहाँ क्या कर रही है बहू? और यह पानी…” शांति देवी ने हैरानी से पूछा।
स्नेहा मुस्कुराई और शांति देवी का हाथ पकड़कर उन्हें सोफे पर ले जाकर बिठा दिया। “माँ जी, रोहन ने मुझे बताया था कि शादी की भागदौड़ में आपके घुटनों का दर्द बहुत बढ़ गया है। कल रात भी जब आप कमरे में जा रही थीं, तो आप ठीक से चल नहीं पा रही थीं। आज मेरी पहली रसोई ज़रूर है, लेकिन इस घर की असली अन्नपूर्णा तो आप ही हैं। मेरी पहली ज़िम्मेदारी रसोई नहीं, बल्कि आपकी सेहत है।”
यह कहते हुए स्नेहा ने गर्म पानी की बाल्टी शांति देवी के पैरों के पास रखी और उनके पैरों को धीरे से उस गुनगुने पानी में डाल दिया। पानी में नमक और फिटकरी मिली हुई थी, जिसकी गर्माहट से शांति देवी की नसों को तुरंत आराम मिलने लगा। इसके बाद स्नेहा ने सरसों का तेल हाथों में लिया और उनके सूजे हुए घुटनों की हल्के हाथों से मालिश करने लगी।
शांति देवी अवाक रह गईं। उनका गला रुंध गया था। जो औरत कल तक इस नई लड़की को महज़ एक ‘रिप्लेसमेंट’ या काम संभालने वाली समझ रही थी, आज उसी लड़की के स्पर्श में उसे अपनी एक बेटी नज़र आ रही थी। शांति देवी ने सोचा था कि बहू के आने से उन्हें रसोई से आज़ादी मिलेगी, लेकिन स्नेहा ने उन्हें इस उम्र में वह सम्मान और परवाह दी थी, जिसकी उन्हें रसोई से आज़ादी से कहीं ज़्यादा ज़रूरत थी।
“अरे बेटा, रहने दे। मेरे कपड़े खराब हो जाएंगे और तुझे भी तो नाश्ता बनाना है,” शांति देवी ने रुंधे गले से औपचारिकता निभाते हुए कहा।
स्नेहा ने ऊपर देखा और प्यार से बोली, “नाश्ता मैंने बना दिया है माँ जी। पोहा और चाय तैयार है। बाबूजी और रोहन भी बस नहा कर आते ही होंगे। और आप कपड़ों की चिंता मत कीजिए। आपके पैर जब तक ठीक नहीं हो जाते, आप कोई काम नहीं करेंगी। हम दोनों मिलकर इस घर को चलाएंगे। आपको काम छोड़ना नहीं है, बस मुझे काम सिखाना है।”
स्नेहा के इन शब्दों ने शांति देवी के भीतर की बरसों पुरानी उस गांठ को खोल दिया, जिसमें वह यह मान बैठी थीं कि सास और बहू का रिश्ता सिर्फ काम के लेन-देन का होता है। उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने स्नेहा का सिर अपने सीने से लगा लिया।
दीनानाथ जी जो कमरे के दरवाज़े से यह सब देख रहे थे, उनकी आँखों में भी नमी तैर गई। शांति देवी ने उन्हें देखकर एक गहरी और सुकून भरी साँस ली। उन्हें समझ आ गया था कि उम्र के इस पड़ाव पर घर चलाने के लिए किसी नौकरानी की नहीं, बल्कि एक ऐसे दिल की ज़रूरत होती है जो दर्द को समझ सके। स्नेहा ने सिर्फ रसोई की चाबियां नहीं, बल्कि शांति देवी के दिल का ताला भी हमेशा के लिए खोल दिया था।
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