मेरी शादी को मुश्किल से एक साल हुआ था, जब मैं अपने पति रोहन के साथ इस नई कॉलोनी में रहने आई थी। नया शहर, नए लोग और एक बिल्कुल नया माहौल। शुरुआत में मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता था। दिन भर घर के काम करने के बाद जब मैं शाम को बालकनी में बैठती, तो अक्सर सोचती कि काश यहाँ कोई ऐसा हो जिससे मैं अपने मन की बातें साझा कर सकूँ। मेरी इसी तलाश को जैसे एक दिन मंजिल मिल गई, जब मेरी मुलाकात कॉलोनी की सबसे सम्मानित महिला, मालती ताई से हुई।
मालती ताई उम्र में साठ के पार थीं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा तेज रहता था। सफेद सूती साड़ी, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और होठों पर हमेशा एक शांत, सौम्य मुस्कान। वह हमारी कॉलोनी के ‘महिला सेवा मंडल’ की अध्यक्ष थीं। उनका काम गरीब बच्चों के लिए चंदा इकट्ठा करना, मोहल्ले के मंदिर में सत्संग का आयोजन करवाना और हर त्योहार पर बढ़-चढ़कर दान-पुण्य करना था। मैं पहली बार उनसे मंदिर के एक कार्यक्रम में मिली थी। उस दिन उन्होंने गीता के ज्ञान और ‘निस्वार्थ कर्म’ पर ऐसा भावपूर्ण प्रवचन दिया था कि मेरी आँखें छलक आई थीं। उन्होंने कहा था, “इंसान का जन्म केवल अपने पेट भरने के लिए नहीं हुआ है। जो इंसान दूसरे के दुख को अपना दुख न समझ सके, जो रास्ते में पड़े काँटे को इसलिए न हटाए क्योंकि वह उसके पैर में नहीं चुभा, वह इंसान कहलाने के लायक ही नहीं है। दुनिया में अगर रहना है, तो दूसरों के लिए जीना सीखो।”
उनके ये शब्द मेरे दिल में सीधे उतर गए थे। मुझे लगा कि जैसे मुझे मेरी गुरु मिल गई हैं। उस दिन के बाद से मैं मालती ताई की परछाई बन गई। उनके हर कीर्तन में जाना, उनके साथ चंदा इकट्ठा करने जाना, उनके हर उपदेश को डायरी में लिखना मेरी दिनचर्या बन गई थी। रोहन अक्सर मुझे टोकता था। वह कहता, “मीरा, लोगों को उनके शब्दों से नहीं, उनके व्यवहार से मापना चाहिए। जो लोग समाज में बहुत ज्यादा आदर्शवादी होने का दिखावा करते हैं, असल जिंदगी में वे उतने ही खोखले होते हैं।” लेकिन मैं रोहन की बातों को अनसुना कर देती थी। मैं सोचती थी कि रोहन की सोच ही नकारात्मक है, वह ताई की महानता को समझ ही नहीं सकता। मालती ताई मेरे लिए दया और करुणा की एक जीती-जागती मूरत बन चुकी थीं।
वक्त बीतता गया। मैं मालती ताई के इतनी करीब आ गई कि वह मुझे अपनी बेटी की तरह मानने लगी थीं। कम से कम मुझे तो यही लगता था। उनकी हर बात में परमार्थ झलकता था। वह अक्सर कहती थीं कि दुनिया एक परिवार है और हमें हर किसी की भलाई के लिए सोचना चाहिए। ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ (सभी का हित, सभी का सुख) यही उनका जीवन मंत्र लगता था।
फिर एक दिन वह घटना घटी, जिसने मेरे बनाए हुए सारे आदर्शों के महल को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया।
सर्दियों के दिन थे। कॉलोनी के पास वाले बड़े मंदिर में एक विशाल भंडारे का आयोजन होने वाला था। मालती ताई इस आयोजन की मुख्य प्रभारी थीं। भंडारे के लिए कुछ खास पीतल के बर्तन और विशेष पूजा सामग्री लानी थी, जो सिर्फ शहर के पुराने बाजार ‘चौक मंडी’ में ही मिलती थी। ताई ने मुझे अपने साथ चलने को कहा। मैं तो जैसे इसी इंतज़ार में रहती थी कि किसी तरह ताई के साथ समय बिताने का मौका मिले। मैं तुरंत तैयार हो गई।
हम दोनों सुबह-सुबह ई-रिक्शा लेकर पुरानी मंडी पहुँच गए। मंडी का रास्ता बहुत संकरा और घुमावदार था। वहाँ ई-रिक्शा नहीं जा सकता था, इसलिए हमें पैदल ही अंदर की गलियों में जाना पड़ा। ठंड की वजह से सुबह के वक्त गलियों में ज्यादा भीड़ नहीं थी। कोहरा अभी भी छंट रहा था। मैं और ताई बातें करते हुए चल रहे थे। ताई मुझे बता रही थीं कि कैसे उन्होंने एक बार एक गरीब कन्या की शादी में अपने सारे जमा किए हुए पैसे दे दिए थे। उनकी बातें सुनकर मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा और गहरी हो रही थी।
हम एक पुरानी, संकरी गली से गुजर रहे थे। दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पुराने मकान थे और गली इतनी पतली थी कि एक बार में सिर्फ दो लोग ही साथ चल सकते थे। तभी अचानक एक मोड़ पर आकर ताई के कदम ठिठक गए। उन्होंने इतनी जोर से मेरा हाथ पकड़ा कि मेरी कलाइयों पर उनकी उंगलियों के निशान छप गए।
“रुक जा मीरा!” ताई की आवाज़ में अचानक एक अजीब सी घबराहट और सख्ती थी।
मैं एकदम से रुक गई। “क्या हुआ ताई? आपके पैर में कुछ चुभ गया क्या?” मैंने फिक्र से पूछा।
ताई ने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी आँखें फटी की फटी थीं और वह गली के बीचों-बीच घूर रही थीं। मैंने उनकी नजरों का पीछा किया। सामने गली के ठीक बीच में, जहाँ से रास्ता मुड़ रहा था, एक काला कपड़ा बिछा हुआ था। उस कपड़े के ऊपर एक मिट्टी का फूटा हुआ मटका रखा था, जिसमें से कुछ राख, लाल सिंदूर, उबले हुए चावल और नींबू-मिर्च बाहर बिखरे हुए थे। आसपास पानी और कुछ अजीब से काले दाने पड़े थे। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि यह किसी तांत्रिक या ओझा द्वारा किया गया कोई ‘टोटका’ या ‘उतारा’ था। अक्सर लोग अपने घरों की बीमारी या बुरी नजर उतार कर ऐसे चौराहों या रास्तों पर फेंक देते हैं।
मैं पढ़ी-लिखी लड़की थी। इन सब अंधविश्वासों को मैं बिल्कुल नहीं मानती थी। मेरे लिए वह सिर्फ गली में पड़ा हुआ कूड़ा था जिसे किसी जाहिल इंसान ने रास्ते में फेंक दिया था।
मैंने ताई का हाथ हल्के से छुड़ाया और मुस्कुराते हुए कहा, “ओह ताई, आप इससे डर गईं? कुछ नहीं है, किसी ने ऐसे ही कूड़ा और टोटका फेंक दिया है। हम किनारे से होकर निकल जाते हैं, काफी जगह है वहाँ।”
मैंने आगे बढ़ने के लिए कदम उठाया ही था कि ताई ने मुझे लगभग झकझोरते हुए पीछे खींच लिया।
“पागल हो गई है क्या तू?” ताई फुसफुसाते हुए चिल्लाईं, लेकिन उनकी आवाज़ में डर साफ छलक रहा था। “तुझे पता नहीं है ये क्या बला है! किसी ने घर की सबसे बड़ी बीमारी, कोई भयंकर मनहूसियत उतारी है। अगर हमने इसे पार किया या इसकी परछाई भी हम पर पड़ गई, तो वो सारी बीमारी, सारा दुर्भाग्य हमारे सिर आ जाएगा! मेरे बेटे का अगले हफ्ते इतना बड़ा व्यापारिक सौदा होने वाला है, मैं अपने घर में पनौती नहीं ले जा सकती।”
मैं हैरान रह गई। ताई के चेहरे का रंग उड़ चुका था। उनके हाव-भाव में वह सौम्यता नहीं, बल्कि एक स्वार्थी और डरी हुई औरत का चेहरा नज़र आ रहा था।
मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, “ताई, ये सब अंधविश्वास है। इन सब से कुछ नहीं होता। और अगर आप मानती भी हैं, तो हम थोड़ा और किनारे से होकर निकल जाते हैं। हमारा कौन सा पैर उस पर पड़ रहा है?”
“नहीं!” ताई ने सख्ती से कहा। “जब तक कोई और इस रास्ते को पहले पार नहीं कर लेता, हम यहाँ से नहीं हिलेंगे।”
“कोई और पार कर ले? मतलब?” मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी।
ताई मुझे गली के किनारे एक बंद दुकान के चबूतरे की आड़ में खींच ले गईं और छिपकर खड़ी हो गईं। उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए बड़ी बेरुखी से कहा, “हाँ। जब कोई भी दूसरा इंसान इस टोटके के ऊपर से या इसके पास से गुजरेगा, तो यह उतारा हुआ दुर्भाग्य उसके सिर चला जाएगा। ये बुरी बला उसे पकड़ लेगी। उसके बाद रास्ता साफ हो जाएगा और हम आराम से निकल जाएंगे। तब तक हम यहीं रुकेंगे।”
मेरे कानों पर मुझे यकीन नहीं हुआ। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मैं स्तब्ध होकर उस महिला को देख रही थी जिसे मैं कुछ पलों पहले तक साक्षात देवी मान रही थी।
मैंने कांपती हुई आवाज़ में पूछा, “ताई… आप ये क्या कह रही हैं? अगर आपके अनुसार इस टोटके में सच में कोई बीमारी या दुर्भाग्य है, तो आप जानबूझकर यह क्यों चाह रही हैं कि कोई और इसके ऊपर से गुजरे? क्या आप जानबूझकर किसी निर्दोष, अनजान इंसान की जिंदगी में दुख और दुर्भाग्य भेजना चाहती हैं, ताकि आप और आपका परिवार सुरक्षित रहे?”
ताई ने मेरी तरफ ऐसी नज़र से देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी बेवकूफी की बात कर दी हो। “अरे! दुनिया में इतने लोग हैं, कोई न कोई तो मरेगा ही! अकलमंदी इसी में है कि अपना परिवार सुरक्षित रहे। हमें क्या लेना-देना कि कौन इस पर पैर रखता है। हमें तो भंडारे का सामान लेने जाना है, हमारे पास बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य है। पुण्य का काम करने जा रहे हैं, हमारे साथ कुछ बुरा नहीं होना चाहिए। कोई और भुगते, हमें क्या!”
‘कोई और भुगते, हमें क्या!’ ताई के ये शब्द मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगे।
यह वही महिला थी जो सत्संग में माइक पर गला फाड़-फाड़ कर कहती थी कि ‘दूसरों का दुख अपना दुख समझो’। जो दुनिया को एक परिवार बताती थी। आज जब एक मामूली से अंधविश्वास, एक छोटे से डर की बात आई, तो उनका वह सारा परमार्थ, सारा त्याग हवा में उड़ गया था। वह बेझिझक किसी अनजान इंसान की जिंदगी दांव पर लगाने को तैयार थीं, सिर्फ इसलिए ताकि उनके बेटे का व्यापारिक सौदा सुरक्षित रहे। कहाँ गया उनका ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’? कहाँ गया उनका वह आदर्श कि रास्ते का कांटा दूसरों के लिए हटाना चाहिए? यहाँ तो वह खुद इंतज़ार कर रही थीं कि कोई आए और उस कांटे पर पैर रख दे, ताकि उनका रास्ता साफ हो जाए।
तभी मेरी नज़र गली के दूसरे छोर पर पड़ी। एक स्कूल की यूनिफॉर्म पहने, कंधे पर भारी बस्ता लटकाए एक छोटा सा बच्चा तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा था। शायद उसे स्कूल के लिए देर हो रही थी। उसकी नज़र ज़मीन पर पड़े उस टोटके पर नहीं थी।
मेरा दिल धक से रह गया। मैंने आगे बढ़कर उस बच्चे को रुकने के लिए आवाज़ लगानी चाही, लेकिन ताई ने तेजी से अपना हाथ मेरे मुँह पर रख दिया और मुझे पीछे धकेल दिया। “चुप कर बेवकूफ लड़की! अगर वो रुक गया तो हमें फिर से किसी और का इंतज़ार करना पड़ेगा। जाने दे उसे।”
ताई की पकड़ बहुत मजबूत थी। मैं कुछ बोल नहीं पाई। मेरे देखते ही देखते वह मासूम बच्चा दौड़ता हुआ उस टोटके के ठीक ऊपर से गुजर गया। उसका एक पैर उस फूटे हुए मटके पर पड़ा और राख हवा में उड़ गई। बच्चा बिना रुके दौड़ता हुआ गली के बाहर निकल गया।
ताई ने एक गहरी राहत की सांस ली। उन्होंने मेरी कलाई छोड़ी और अपने कपड़े ठीक करते हुए बड़े आराम से बोलीं, “चलो भगवान का शुक्र है, रास्ता साफ हो गया। बला टल गई। चलो मीरा, अब हम निकल सकते हैं, अब कोई खतरा नहीं है।”
वह आगे बढ़ गईं, लेकिन मेरे पैर ज़मीन से चिपक गए थे। मैं एक कदम भी नहीं हिला सकी। मैं बस ताई की पीठ को देखती रही जो अब बहुत सामान्य तरीके से चल रही थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। मुझे अचानक ताई के सफेद कपड़ों पर स्वार्थ और पाखंड के काले दाग साफ-साफ नज़र आने लगे थे। मुझे रोहन की बात याद आ गई—”जो लोग बहुत ज्यादा आदर्शवादी होने का दिखावा करते हैं, असल जिंदगी में वे उतने ही खोखले होते हैं।”
उस दिन मैंने पहली बार इंसानियत का सबसे कड़वा सच देखा था। धर्म, उपदेश, और परमार्थ की बड़ी-बड़ी बातें करना बहुत आसान है, लेकिन जब खुद पर कोई आंच आती है, चाहे वह एक झूठे अंधविश्वास की ही क्यों न हो, तो इंसान का असली और घिनौना स्वार्थ बाहर आ ही जाता है। मालती ताई कोई संत नहीं थीं, वह बस एक डरी हुई, स्वार्थी महिला थीं, जिन्होंने समाज में सम्मान पाने के लिए आदर्शों का एक बहुत खूबसूरत मुखौटा पहन रखा था।
“तू आ क्यों नहीं रही मीरा? जल्दी चल!” ताई ने पीछे मुड़कर आवाज़ लगाई।
मैंने एक गहरी सांस ली। मेरा मन उस पाखंडी औरत के साथ एक पल भी बिताने को नहीं कर रहा था। मैंने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “आप जाइए ताई। मेरा रास्ता और मेरी मंजिल अब आपसे अलग है। मुझे उस रास्ते पर नहीं चलना, जो दूसरों की बर्बादी पर अपना महल बनाता हो।”
यह कहकर मैं पीछे मुड़ी और बिना एक बार भी ताई की तरफ देखे, अपने घर की तरफ लौट पड़ी। उस दिन के बाद मैंने कभी किसी सत्संग में हिस्सा नहीं लिया, न ही कभी मालती ताई से बात की। मुझे समझ आ गया था कि सच्ची अच्छाई शब्दों के शोर में नहीं, बल्कि उन शांत कर्मों में होती है जो किसी को दिखाए बिना, दूसरों के भले के लिए किए जाते हैं।
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