भाभी माँ

आज जब मैं घर में घुसा, तो मैंने देखा कि बाहर बरामदे में ताई जी के परिवार की गाड़ियां खड़ी थीं, जो शायद अभी-अभी निकले थे। मुझे समझते देर नहीं लगी कि घर में मेहमान आए थे। और मुझे यह भी पता है कि जब घर में मेहमान आते हैं, तो आप किस तरह उनकी आवभगत में खुद को भूल जाती हैं।

जब आपने मुझे कोफ्ते परोसे, तो मेरी नजर आपकी आंखों की उस छुपी हुई खुशी पर गई, जो केवल एक माँ की आंखों में ही हो सकती है, 

दोपहर की चिलचिलाती धूप में पूरा शहर जैसे एक गहरी नींद की आगोश में समा रहा था। गर्मी अपने चरम पर थी और बाहर सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। घर के भीतर, सीलिंग फैन की हल्की गड़गड़ाहट के बीच एक अजीब सा सुकून था। रेवती रसोई में खड़ी अपने पल्लू से माथे का पसीना पोंछ रही थी। सुबह से ही घर के कामों में उसका समय कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला। आज का दिन थोड़ा ज्यादा ही व्यस्त रहा था, क्योंकि शहर के दूसरे छोर से उनके कुछ दूर के रिश्तेदार, जिन्हें वे ताई जी कहते थे, अपने पूरे परिवार के साथ अचानक ही घर आ गए थे।

भारतीय घरों में अतिथि को भगवान का दर्जा दिया जाता है, और रेवती ने भी इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए मेहमानों की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सुबह-सुबह जब समीर, रेवती का देवर, अपने कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रहा था, तो उसने बड़े लाड़ से कहा था, “भाभी, आज बहुत दिनों बाद लौकी के कोफ्ते खाने का मन कर रहा है। आज तो मैं आपके हाथ के बने कोफ्ते ही खाऊंगा।” रेवती ने भी मुस्कुराते हुए हामी भर दी थी। समीर उसके लिए सिर्फ एक देवर नहीं था, बल्कि जब रेवती ब्याह कर इस घर में आई थी, तब समीर महज बारह साल का एक अबोध बालक था, जिसने बचपन में ही अपनी माँ को खो दिया था। रेवती ने ही उसे एक माँ की तरह पाला-पोसा था।

मेहमानों के अचानक आ जाने से घर में चहल-पहल बढ़ गई। रेवती के ससुर जी भी मेहमानों के साथ गपशप में मशगूल हो गए और उसके पति राघव तो अपने ऑफिस के टूर पर शहर से बाहर गए हुए थे। रेवती ने बहुत ही प्यार से लौकी के कोफ्ते, दाल-मखनी, पुलाव और रायता बनाया था। जब दोपहर का भोजन परोसा गया, तो ताई जी और उनके बच्चों को रेवती के हाथ के बने कोफ्ते इतने पसंद आए कि सबने जमकर तारीफ की। बच्चों ने तो दो-दो बार कटोरी भरकर कोफ्ते खाए। रेवती को उन्हें खिलाकर बहुत संतोष मिल रहा था। अन्नपूर्णा का सच्चा सुख तो इसी में है कि उसके हाथ का बना खाना कोई इतने चाव से खाए। लेकिन मेहमानों के जाने के बाद, जब रेवती रसोई समेटने आई, तो उसने देखा कि भारी-भरकम कड़ाही में अब कोफ्ते की सब्जी नाम मात्र की ही बची थी।

मुश्किल से एक छोटी कटोरी कोफ्ते ही बचे थे। रेवती ने एक गहरी सांस ली। उसने खुद भी अभी तक भोजन नहीं किया था। घर की औरतें अक्सर यही करती हैं, सबको खिलाने के बाद जो बचता है, उसी में संतोष कर लेती हैं। रेवती ने उस बची हुई सब्जी को देखा और उसके जेहन में तुरंत समीर का चेहरा घूम गया। “कितने चाव से आज सुबह उसने कोफ्ते बनाने की फरमाइश की थी,” रेवती ने मन ही मन सोचा। “वह सुबह से कॉलेज में है, फिर वहाँ से अपनी पार्ट-टाइम जॉब के लिए भी गया होगा। इतनी भयंकर गर्मी में जब वह थका-हारा घर लौटेगा, तो उसे अपने मनपसंद कोफ्ते देखकर कितनी खुशी होगी। अगर मैं यह सब्जी खा लूंगी, तो समीर क्या खाएगा?”

बिना एक भी पल गंवाए, रेवती ने उस एक कटोरी सब्जी को एक छोटे बर्तन में निकाला और उसे एक प्लेट से ढककर एक तरफ रख दिया। उसने तय किया कि वह खुद केवल दाल और रोटी खा लेगी, लेकिन यह कोफ्ते वह अपने समीर के लिए ही रखेगी। उसने बाकी बचे हुए काम निपटाए, बर्तन धोए और रसोई को साफ किया। ससुर जी अपने कमरे में आराम करने चले गए थे। रेवती भी सब काम निपटाकर बस समीर के आने का ही इंतजार कर रही थी।

तकरीबन साढ़े तीन बजे दरवाजे की घंटी बजी। रेवती तुरंत दौड़कर दरवाजे की तरफ गई। दरवाजा खोला तो देखा सामने समीर खड़ा था। गर्मी से उसका चेहरा लाल हो रहा था और माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। कंधे पर भारी बैग लटकाए वह बुरी तरह थका हुआ लग रहा था।

“आ गया मेरा बच्चा,” रेवती ने स्नेह से कहा और उसके हाथ से बैग लेते हुए अंदर आ गई। “जल्दी से हाथ-मुंह धो ले समीर, बहुत गर्मी है बाहर। मैं तेरे लिए ठंडा पानी और खाना निकालती हूँ।”

“बस भाभी, अभी आया,” समीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा और तौलिया लेकर वॉशरूम की तरफ बढ़ गया।

रेवती तुरंत रसोई में गई। उसने एक थाली में दो रोटियां, थोड़ा सा पुलाव और वह एक कटोरी लौकी के कोफ्ते परोस दिए। उसने बहुत ही सलीके से थाली सजाई ताकि समीर को देखकर ही भूख लग जाए। समीर हाथ-मुंह धोकर डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गया। रेवती ने उसके सामने थाली रखी और साथ में ठंडे पानी का एक गिलास भी रख दिया।

“अरे वाह भाभी! कोफ्ते! सुबह से बस इसी की महक मेरे ख्यालों में घूम रही थी,” कोफ्ते देखकर समीर के चेहरे पर जो थकान थी, वह पल भर में गायब हो गई। उसकी आंखों में एक चमक आ गई।

रेवती उसे देखकर मुस्कुरा दी। “हाँ, तू खा ले आराम से। मैं जरा कमरे में जाकर मीठी को देख आती हूँ, कहीं वो उठ न गई हो। अगर और रोटी चाहिए हो तो कैसरोल में रखी है, निकाल लेना।” मीठी रेवती की तीन साल की बेटी थी, जो उस वक्त सो रही थी।

“ठीक है भाभी, आप जाइए,” समीर ने रोटी का पहला निवाला तोड़ते हुए कहा।

रेवती अपने कमरे में चली गई। उसे भीतर ही भीतर एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था। किसी अपने को उसकी मनपसंद चीज खाते हुए देखना दुनिया का सबसे बड़ा सुख होता है। कुछ देर बाद, रेवती को लगा कि समीर ने खाना खा लिया होगा। वह कमरे से बाहर आई। डाइनिंग टेबल पर थाली नहीं थी, समीर उसे धोकर सिंक में रख चुका था और खुद अपने कमरे में पढ़ाई करने चला गया था।

रेवती रसोई में गई ताकि कैसरोल और बाकी चीजें समेट सके। जैसे ही उसने कैसरोल उठाया, उसकी नजर उसके पास रखी एक छोटी सी प्लेट पर पड़ी। उसने प्लेट को हटाया तो वह हैरान रह गई। वहां वही कटोरी रखी थी, जिसमें उसने समीर के लिए कोफ्ते परोसे थे। कटोरी में कोफ्ते लगभग उतने ही थे, जितने उसने दिए थे, बल्कि यूं कहें कि समीर ने शायद एक चम्मच के अलावा उसे छुआ भी नहीं था।

रेवती का मन एक पल के लिए घबरा गया। “क्या हुआ? क्या सब्जी में नमक कम था? या समीर की तबीयत ठीक नहीं है?” अनेक सवाल उसके मन में उठने लगे। तभी उसकी नजर उस कटोरी के नीचे दबे एक कागज के टुकड़े पर पड़ी।

रेवती ने अपने कांपते हाथों से उस कागज को उठाया। कागज पर नीले पेन से कुछ पंक्तियां लिखी हुई थीं। वह समीर की ही लिखावट थी। रेवती की नजरें उन शब्दों पर टिक गईं और वह पढ़ने लगी:

“भाभी, आपको पता है दुनिया में माँ का दर्जा सबसे ऊंचा क्यों होता है? क्योंकि माँ का दिल समंदर से भी गहरा होता है। आज जब मैं घर में घुसा, तो मैंने देखा कि बाहर बरामदे में ताई जी के परिवार की गाड़ियां खड़ी थीं, जो शायद अभी-अभी निकले थे। मुझे समझते देर नहीं लगी कि घर में मेहमान आए थे। और मुझे यह भी पता है कि जब घर में मेहमान आते हैं, तो आप किस तरह उनकी आवभगत में खुद को भूल जाती हैं।

जब आपने मुझे कोफ्ते परोसे, तो मेरी नजर आपकी आंखों की उस छुपी हुई खुशी पर गई, जो केवल एक माँ की आंखों में ही हो सकती है, जब वह अपने बच्चे के लिए कुछ बचाकर रखती है। लेकिन भाभी, मैंने रसोई में झांककर देख लिया था। कड़ाही खाली पड़ी थी। मुझे पता है कि वह आखिरी कटोरी कोफ्ते आपने मेरे लिए बचाए थे, और आप खुद शायद दाल के साथ सूखी रोटी खाने वाली थीं।

भाभी, अगर आप मेरे भूखे पेट की इतनी परवाह कर सकती हैं, तो क्या मेरा यह फर्ज नहीं बनता कि मैं भी अपनी ‘माँ’ का पेट खाली न रहने दूं? जिस अधिकार से एक माँ अपने बेटे के लिए अपनी पसंद की चीज छोड़ देती है, उसी अधिकार से आज इस बेटे ने अपनी माँ के लिए यह कोफ्ते छोड़े हैं। प्लीज, इन्हें खा लीजिएगा। मुझे कसम है आपको, अगर आपने इसे नहीं खाया तो। मैंने दाल और चावल से पेट भर लिया है, और सच कहूं भाभी, वो दाल भी मुझे आज दुनिया का सबसे स्वादिष्ट खाना लगा। इसे खा लीजिएगा… आपके बेटे की जिद है।”

कागज का वह टुकड़ा पढ़ते-पढ़ते रेवती की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस अपार स्नेह और सम्मान के थे, जो उसे इस घर में मिला था। उसके होंठ कांप रहे थे और मन में भावनाओं का एक ऐसा ज्वार उठ रहा था, जिसे शब्दों में पिरोना नामुमकिन था। उसने उस कटोरी को अपने सीने से लगा लिया।

“पागल लड़का…” उसके मुंह से बस यही दो शब्द निकले, लेकिन इन दो शब्दों में ब्रह्मांड का सारा वात्सल्य छिपा था। आज उसे महसूस हुआ कि उसने केवल एक देवर को नहीं पाला, बल्कि एक ऐसे बेटे को बड़ा किया है, जो उसकी खामोशी और उसके त्याग को बिना कहे ही समझ लेता है। खून का रिश्ता न होते हुए भी, उनके बीच का यह बंधन दुनिया के किसी भी रिश्ते से कहीं ज्यादा पवित्र और मजबूत था।

उस दिन जब रेवती ने वह कोफ्ते खाए, तो उसे लगा जैसे वह कोई साधारण भोजन नहीं, बल्कि ईश्वर का दिया हुआ कोई अनमोल प्रसाद ग्रहण कर रही हो, जिसमें ममता, सम्मान और एक अनकहे प्यार की मिठास घुली हुई थी।

क्या आपने भी कभी अपने परिवार में ऐसे निःस्वार्थ प्रेम और त्याग का अनुभव किया है? जब किसी अपने ने बिना कहे आपकी भावनाओं को समझ लिया हो? अपने विचार और अपने जीवन के ऐसे खूबसूरत पल कमेंट्स में जरूर साझा करें।

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लेखक : मुकेश पटेल

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