शादी को छह महीने बीत चुके थे, लेकिन नेहा के हिस्से में अब तक सिर्फ जिम्मेदारियां ही आई थीं। रसोई, पूजा-पाठ, रिश्तेदारों का आना-जाना और घर की अनगिनत उलझनों के बीच वह जैसे अपनी नई-नवेली शादीशुदा जिंदगी के वो सुनहरे पल जीना ही भूल गई थी, जिनके सपने उसने मायके में बुने थे। आज सुबह-सुबह जब समीर ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, तो नेहा से रहा नहीं गया। वह आईने के सामने बाल संवारते समीर के पीछे जाकर खड़ी हो गई और हल्की सी नाराजगी जताते हुए बोली, “समीर, आपने तो कहा था कि शादी के तुरंत बाद हम कहीं दूर घूमने जाएंगे। अब तो छह महीने से ज्यादा हो गए, रोज वही सुबह, वही शाम। क्या हम कभी अपने लिए भी वक्त निकाल पाएंगे?”
समीर ने आईने में नेहा के उदास चेहरे को देखा और मुस्कुराते हुए पलटा। उसने नेहा के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मुझे पता था मेरी प्यारी बीवी का सब्र अब टूटने वाला है। इसलिए मैंने तुम्हें सरप्राइज देने के लिए कल रात ही अंडमान का पूरा टूर पैकेज बुक कर लिया है। अगले हफ्ते हम दोनों नीले समंदर की लहरों के बीच होंगे।”
यह सुनते ही नेहा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “सच में समीर? आपने सच में टिकट बुक कर लिए?”
“हाँ मेरी जान, बिल्कुल सच। अब जल्दी से अपनी पैकिंग शुरू कर दो,” समीर ने प्यार से उसके गाल थपथपाए और अपना बैग लेकर ऑफिस निकल गया।
समीर के जाने के बाद नेहा का मन किसी पंछी की तरह हवा में उड़ने लगा। अंडमान! उसने तुरंत अपना फोन उठाया और अपनी सबसे करीबी दोस्त को यह खुशखबरी दी। दोस्त ने उसे चिढ़ाते हुए कहा, “वाह नेहा! फाइनली तुम्हारा हनीमून प्लान हो ही गया। लेकिन सुन, वहाँ जाकर वो अपनी भारी-भरकम साड़ियाँ और सूट मत पहन लेना। समंदर किनारे फ्लोरल मैक्सी ड्रेसेज, शॉर्ट्स और हैट पहनना, जैसे हमने कॉलेज के दिनों में सपने देखे थे। मेरी इंस्टाग्राम की तस्वीरें देखी थीं ना तूने? बिल्कुल वैसी ही तस्वीरें आनी चाहिए तेरी भी।”
फोन रखने के बाद नेहा ने अपनी अलमारी खोली। वहां सिल्क की साड़ियां, भारी कढ़ाई वाले सूट और पारंपरिक परिधानों की कतार लगी थी। उसके पास एक भी ऐसी ड्रेस नहीं थी जिसे पहनकर वह बीच पर रिलैक्स कर सके या किसी क्रूज पर डिनर कर सके। शादी से पहले जो थोड़े बहुत मॉडर्न कपड़े थे, वो मायके में ही रह गए थे और इस घर में आने के बाद उसने अपनी सास, सुमित्रा देवी के सामने हमेशा साड़ी या सूट ही पहना था। सुमित्रा देवी स्वभाव से थोड़ी सख्त और पुरानी विचारधारा वाली महिला थीं। घर के कायदे-कानून बहुत पक्के थे।
नेहा के मन में कश्मकश शुरू हो गई। क्या वो सच में समंदर किनारे साड़ी पहनकर घूमेगी? नहीं, उसे तो अपनी दोस्तों की तरह खूबसूरत और फैशनेबल दिखना था। उसने झिझकते हुए समीर को फोन मिलाया। “समीर, आप बिजी तो नहीं हैं?”
“बोलो नेहा, क्या हुआ? सब ठीक है ना?” समीर की आवाज़ में काम की जल्दबाज़ी थी।
“वो… मुझे पूछना था कि अगर मैं अंडमान में वेस्टर्न ड्रेसेज पहनूं… मेरा मतलब है कुछ मॉडर्न कपड़े, तो आपको कोई ऐतराज तो नहीं होगा? आप समझ रहे हैं ना, वहां बीच पर साड़ियां पहनना अजीब लगेगा।”
समीर जोर से हंसा, “अरे पगली! इसमें पूछने वाली क्या बात है? तुम जो चाहो पहन सकती हो। तुम हर लिबास में खूबसूरत लगती हो। जाओ, अपने लिए अच्छी सी शॉपिंग कर लो। अभी मेरी एक मीटिंग है, मैं शाम को बात करता हूं।”
समीर की रजामंदी मिलने के बाद नेहा के मन का आधा बोझ तो हल्का हो गया, लेकिन असली पहाड़ तो अभी पार करना बाकी था—उसकी सासू मां। सुमित्रा देवी को अगर पता चल गया कि उनकी बहू छोटे और वेस्टर्न कपड़े खरीदने जा रही है, तो ना जाने क्या बवाल होगा। कहीं वो इस ट्रिप पर ही रोक ना लगा दें। नेहा ने तय किया कि वह उन्हें बिना बताए चुपचाप शॉपिंग करके आ जाएगी और कपड़ों को अपने सूटकेस में सबसे नीचे छिपा देगी।
दोपहर का वक्त था। सुमित्रा देवी अपने कमरे में रामायण पढ़ रही थीं। नेहा ने जल्दी से एक साधारण सा सूट पहना, अपना पर्स लिया और दबे पांव घर के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी। तभी पीछे से सुमित्रा देवी की कड़क आवाज़ आई, “कहां जा रही हो बहू इतनी दोपहर में?”
नेहा के कदम वहीं ठिठक गए। उसका दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने पलटकर घबराहट को छिपाते हुए कहा, “मांजी… वो मैं… समीर के दोस्त अमित के घर जा रही हूं। समीर ने सुबह कहा था कि अमित को एक बहुत जरूरी पेन-ड्राइव देनी है, वो ऑफिस ले जाना भूल गए थे। मैं बस देकर अभी आधे घंटे में लौट आऊंगी।”
सुमित्रा देवी ने अपनी ऐनक के ऊपर से नेहा को गौर से देखा। नेहा का चेहरा पीला पड़ रहा था, उसकी नजरें झुक रही थीं और सबसे बड़ी बात, उसके हाथों में पर्स के अलावा कोई पेन-ड्राइव या लिफाफा नहीं था। सुमित्रा देवी जीवन के इतने बसंत देख चुकी थीं कि उन्हें इंसानी चेहरों को पढ़ने में देर नहीं लगती थी। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “ठीक है, जल्दी लौट आना। धूप बहुत तेज है।”
नेहा के घर से बाहर निकलते ही सुमित्रा देवी ने फोन उठाया और समीर को मिलाया। “हैलो समीर, बेटा ये तूने अपनी कौन सी जरूरी पेन-ड्राइव घर छोड़ दी थी जो बहू को इतनी धूप में अमित के घर जाना पड़ा?”
दूसरी तरफ से समीर हैरानी से बोला, “पेन-ड्राइव? अमित के घर? मां आप क्या कह रही हैं, मैंने तो नेहा से ऐसा कुछ नहीं कहा। और अमित तो खुद आज शहर से बाहर गया हुआ है।”
फोन कट गया। सुमित्रा देवी के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गईं। एक नई-नवेली बहू आखिर घर में इतना बड़ा झूठ बोलकर कहां गई होगी? क्या वो किसी मुसीबत में है? या फिर कुछ ऐसा है जो वो इस घर के लोगों से छिपा रही है? सुमित्रा देवी का मन कई तरह की आशंकाओं से घिर गया, लेकिन उन्होंने तय किया कि वह कोई भी राय बनाने से पहले नेहा के लौटने का इंतजार करेंगी और सच का पता लगाएंगी।
उधर, मॉल में नेहा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने अपने लिए खूबसूरत फ्लोरल ड्रेसेज, एक बड़ा सा सन हैट, ट्रेंडी सनग्लासेस और कुछ स्टाइलिश टॉप्स खरीदे। शॉपिंग बैग्स को देखकर उसे बहुत सुकून मिल रहा था। घर लौटते हुए उसने मॉल से एक बड़ा सा जूट का थैला खरीदा और सारे कपड़े उसमें डाल लिए ताकि बाहर से किसी को कुछ पता न चले।
जब नेहा घर पहुंची तो शाम होने लगी थी। उसने बहुत धीरे से दरवाजा खोला ताकि आवाज़ न हो। वह दबे पांव अपने कमरे की तरफ जा ही रही थी कि हॉल की लाइट जल गई। सोफे पर सुमित्रा देवी गंभीर मुद्रा में बैठी थीं।
“आ गई बहू? अमित को पेन-ड्राइव दे दी?” सुमित्रा देवी की आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी थी।
नेहा के पैर जमीन में गड़ गए। उसके हाथ से जूट का थैला फिसल कर नीचे गिर गया और उसमें से एक चमकीली लाल रंग की मॉडर्न ड्रेस बाहर झांकने लगी। “मांजी… वो… मैं…” नेहा के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे। उसकी आंखों में आंसू भर आए। उसे लगा कि आज तो घर में महाभारत होने वाली है। उसका अंडमान जाना, उसके सारे सपने, सब कुछ इस एक झूठ की वजह से खत्म हो जाएगा।
“समीर ने मुझे बता दिया था कि तुमने झूठ बोला है,” सुमित्रा देवी अपनी जगह से उठीं और नेहा के पास आकर खड़ी हो गईं। “क्या इस घर में तुम्हें इतनी भी आजादी नहीं है कि तुम सच बोल सको? क्या हम तुम्हारे अपने नहीं हैं, जो तुम्हें झूठ का सहारा लेना पड़ा?”
नेहा फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दीजिए मांजी। मैं अमित के घर नहीं गई थी। समीर ने मुझे अंडमान जाने का सरप्राइज दिया है। मेरी सारी सहेलियां जब घूमने जाती हैं तो वहां के हिसाब से कपड़े पहनती हैं। मेरे पास सिर्फ साड़ियां और भारी सूट थे। मैं वहां बीच पर साड़ियां नहीं पहनना चाहती थी। लेकिन मुझे डर था कि आप मेरे ये वेस्टर्न कपड़े देखकर गुस्सा हो जाएंगी, आप मुझे गलत समझेंगी। इसलिए मैंने झूठ बोला। मुझे माफ कर दीजिए, मैं अभी ये सारे कपड़े वापस कर आऊंगी। मुझे कहीं नहीं जाना।” नेहा ने दोनों हाथ जोड़ लिए।
कमरे में कुछ पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। सुमित्रा देवी ने धीरे से नीचे झुककर उस लाल ड्रेस को उठाया। उन्होंने उस कपड़े की बनावट को छुआ और फिर नेहा की तरफ देखा। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, बल्कि आंखों में एक अजीब सी नमी थी।
“तुम्हें पता है नेहा,” सुमित्रा देवी धीमी आवाज़ में बोलीं, “जब मेरी शादी तुम्हारे ससुर जी से हुई थी, तब हम भी शिमला गए थे। उस समय मैं तुम्हारी ही उम्र की थी। मेरा भी बहुत मन था कि मैं वहां बर्फ के बीच सलवार-कमीज और वो सुंदर से कश्मीरी कोट पहनूं। लेकिन मेरी सास, यानी तुम्हारी दादी-सास ने मुझे साफ हिदायत दी थी कि घर की बहू घर के बाहर भी अपनी मर्यादा नहीं भूलती। मुझे उस कड़ाके की ठंड में भारी रेशमी साड़ियां पहनकर जाना पड़ा था। साड़ी के पल्लू को संभालते हुए मैं ना तो बर्फ में खेल पाई और ना ही उस ट्रिप का आनंद ले पाई। मेरी वो घुटन, वो मायूसी, मैं आज तक नहीं भूल पाई हूं।”
नेहा हैरानी से अपनी सास को देख रही थी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उस सख्त आवरण के पीछे एक ऐसा अतीत भी छिपा होगा।
सुमित्रा देवी ने नेहा के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “मैं नहीं चाहती कि जो मेरे साथ हुआ, वो मेरी बहू के साथ भी हो। समय बदल गया है नेहा। ये तुम्हारे जीवन के सबसे खूबसूरत पल हैं। इन्हें किसी के डर या झिझक के कारण खराब मत होने दो। कपड़े इंसान की सहूलियत और खुशी के लिए होते हैं, किसी को साबित करने के लिए नहीं। तुम वहां आराम से ये कपड़े पहनना। बस एक बात का ध्यान रखना, जो भी पहनना, उसमें तुम्हारा आत्मविश्वास छलकना चाहिए।”
यह कहते हुए सुमित्रा देवी ने अपने पास से एक छोटा सा डिब्बा निकाला। “ये मैं दोपहर में बाजार से तुम्हारे लिए लाई थी। जब मुझे लगा कि तुम झूठ बोल रही हो, तो मैं तुम्हारा पीछा करने नहीं गई, बल्कि बाजार गई। मुझे लगा कि शायद मेरे व्यवहार ने तुम्हें डरा दिया है।”
नेहा ने कांपते हाथों से वो डिब्बा खोला। उसमें एक बेहद खूबसूरत, आधुनिक डिज़ाइन वाला नेकपीस था जो उन वेस्टर्न ड्रेसेज के साथ बहुत जंचता। नेहा की आंखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार ये खुशी और सम्मान के आंसू थे। वह सुमित्रा देवी के गले लग गई। “आप दुनिया की सबसे अच्छी मां हैं। मैं वादा करती हूं, अब कभी आपसे कुछ नहीं छिपाऊंगी।”
तभी पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। समीर अंदर दाखिल हुआ और दोनों को इस तरह गले मिलते और हंसते हुए देखकर हैरान रह गया। “अरे, यहां तो मेरे बिना ही पार्टी चल रही है? क्या मैं जान सकता हूं कि मेरी मां और बीवी के बीच क्या पक रहा है?”
सुमित्रा देवी ने हंसते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटा, बस हम सास-बहू मिलकर तुम्हारी जेब ढीली करने का नया प्लान बना रहे हैं। अब तू अंडमान ले जा ही रहा है, तो मैंने भी सोच लिया है कि अगली बार मैं भी तुम्हारे साथ मॉरीशस जाऊंगी, और वो भी नए स्टाइलिश कपड़ों में!”
पूरे घर में हंसी की लहर दौड़ गई। उस रात नेहा ने सिर्फ अपने कपड़े ही सूटकेस में नहीं रखे, बल्कि एक ऐसा आत्मविश्वास भी पैक किया जो उसे अपनी सासू मां से उपहार में मिला था। एक छोटा सा झूठ, जिसने शुरुआत में तो डर पैदा किया था, लेकिन अंत में उसने दो पीढ़ियों के बीच की दीवार को हमेशा के लिए गिरा दिया था। उस दिन नेहा को समझ आ गया था कि परिवार सिर्फ बंधनों का नाम नहीं है, बल्कि वो एक खुली आसमां है जहां हर किसी को अपने पंख फैलाने की आजादी होती है, बस जरूरत होती है तो एक-दूसरे को समझने और दिल की बात कहने की।
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