माधव रुंधे हुए गले से बोला, “मुझे छोड़ दो राधिका… तुम अब एक बहुत बड़ी अधिकारी हो। यहाँ सारे लोग तुम्हें देख रहे हैं। मेरे जैसे एक मामूली मजदूर का तुम्हारे साथ होना तुम्हारी इज्जत खराब कर देगा।”
राधिका ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कौन सी इज्जत? यह पद, यह रुतबा, यह गाड़ी, यह सब तुम्हारी उस कालिख और पसीने की देन है माधव। तुम मेरे पति नहीं, मेरे भगवान हो। अगर इमारत की बुनियाद ही छुप जाए, तो इमारत किस काम की? तुमने मेरी खातिर खुद को मिटा दिया और मैं तुम्हें ऐसे ही छोड़ दूँगी?”
सर्दियों की एक ठिठुरती हुई सुबह थी। गाँव के एक कच्चे मकान में जब मुर्गे ने बाँग भी नहीं दी थी, तब से अठारह साल की राधिका उठकर घर के कामों में जुट गई थी। राधिका के माता-पिता का देहांत तब हो गया था, जब वह बहुत छोटी थी। उसके बाद से उसके ताऊ और ताई ने उसे पालने की जिम्मेदारी तो ली, लेकिन एक बेटी की तरह नहीं, बल्कि एक मुफ्त की नौकरानी की तरह। ताई का स्वभाव बहुत ही कठोर और क्रूर था। घर में झाड़ू-पोछा लगाने से लेकर, गाय का गोबर उठाने, खेत में चारा काटने और पूरे परिवार के लिए चूल्हे पर रोटियाँ सेंकने तक का सारा काम राधिका के ही जिम्मे था। ताई अपने सगे बेटे और बेटी को तो नाश्ते में दूध-मलाई और टिफिन में पराठे देती थी, लेकिन राधिका के हिस्से में अक्सर रात की बची हुई सूखी रोटियाँ ही आती थीं। राधिका को इस बात का कोई मलाल नहीं था। उसे अगर किसी बात की सबसे ज्यादा कसक थी, तो वह थी अपनी पढ़ाई। राधिका पढ़ने में गाँव के स्कूल में सबसे मेधावी थी, लेकिन ताई ने आठवीं के बाद उसकी पढ़ाई छुड़वा दी थी। फिर भी, राधिका के भीतर ज्ञान की भूख ऐसी थी कि वह अपने चचेरे भाई की पुरानी किताबें रात के अँधेरे में डिबरी की मद्धिम रोशनी में छुप-छुप कर पढ़ा करती थी।
वक्त गुजरता गया और राधिका सयानी हो गई। ताऊ को उसके विवाह की चिंता होने लगी, लेकिन वह किसी भी हाल में राधिका की शादी में एक रुपया भी खर्च नहीं करना चाहते थे। एक दिन ताऊ ने ताई से कहा कि राधिका के लिए कोई ऐसा घर ढूँढो जहाँ बिना दहेज के काम चल जाए। ताई के दूर के रिश्ते में एक परिवार था। लड़का, जिसका नाम माधव था, शहर के एक छोटे से कारखाने में लोहे की कटिंग का काम करता था। माधव के परिवार में केवल उसकी एक बूढ़ी और बीमार माँ थी। घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। ताई ने झट से रिश्ता पक्का कर दिया, क्योंकि माधव ने साफ कह दिया था कि उसे दहेज में एक सुई भी नहीं चाहिए। राधिका के मन में एक आस थी कि शायद वह आगे पढ़ सके, लेकिन उसे बिना कुछ पूछे, राधिका को एक साधारण से मंदिर में ले जाकर माधव के साथ ब्याह दिया गया और उसकी विदाई कर दी गई।
ससुराल पहुँचकर राधिका ने अपनी किस्मत को चुपचाप स्वीकार कर लिया। उसने सोच लिया था कि अब शायद उसकी दुनिया इस छोटे से कच्चे घर के आँगन और धुएँ वाले चूल्हे तक ही सिमट कर रह जाएगी। वह बिना किसी शिकायत के सुबह से रात तक अपनी बीमार सास की सेवा करती और घर का सारा काम संभालती। माधव स्वभाव से बहुत ही शांत, सीधा और मेहनती इंसान था। वह सुबह ही कारखाने चला जाता और देर रात थका-हारा लौटता। एक रात, जब माधव की आँख खुली, तो उसने देखा कि राधिका जमीन पर बैठकर, कारखाने से लाए गए एक पुराने अखबार के पन्ने को बड़े ध्यान से पढ़ रही है, जिसमें किसी परीक्षा के परिणाम और कुछ सामान्य ज्ञान के प्रश्न छपे थे। माधव कुछ देर उसे देखता रहा और फिर धीमी आवाज में बोला, “क्या तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है?”
राधिका अचानक घबरा गई और अखबार छिपाते हुए बोली, “नहीं, वो तो बस ऐसे ही देख रही थी।” माधव उसके पास आया और बड़ी ही शालीनता से बोला, “मुझसे डरने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारा पति हूँ। मुझे बताओ, तुम क्या बनना चाहती थी?” माधव के स्नेह भरे शब्दों ने राधिका के अंदर सालों से दबे हुए दर्द का बाँध तोड़ दिया। वह फफक-फफक कर रो पड़ी और बोली कि वह आगे पढ़कर एक बड़ा अधिकारी (PCS) बनना चाहती थी, लेकिन उसकी किस्मत में सिर्फ बर्तन मांजना ही लिखा था। माधव ने गहरी साँस ली, राधिका के सिर पर हाथ रखा और कहा, “तुम्हारे हाथ बर्तन मांजने के लिए नहीं, बल्कि कलम पकड़ कर देश का भविष्य बदलने के लिए बने हैं। मैं गरीब जरूर हूँ, मेरे कपड़ों में कारखाने की कालिख लगी होती है, लेकिन मेरी सोच छोटी नहीं है। तुम जहाँ से अपनी पढ़ाई छोड़कर आई हो, वहीं से फिर शुरुआत करो।”
राधिका हैरान रह गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस दुनिया ने उसे हमेशा दबा कर रखा, वहाँ एक अनजान व्यक्ति, जो अब उसका पति है, उसे पंख देने की बात कर रहा है। उस रात के बाद से माधव की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई। उसने कारखाने में अपनी शिफ्ट आठ घंटे से बढ़ाकर बारह घंटे कर दी। दिन में वह लोहे की कटिंग करता और रात को एक गोदाम के बाहर चौकीदारी का काम करने लगा। माधव ने अपनी जरूरतें बिल्कुल खत्म कर दीं। वह फटे हुए कपड़े पहनकर काम चला लेता, कभी-कभी एक वक्त का खाना खाकर सो जाता, लेकिन राधिका की किताबों और ट्यूशन की फीस में कभी कोई कमी नहीं आने दी।
राधिका ने भी माधव के इस तप को व्यर्थ नहीं जाने दिया। वह दिन-रात किताबों में डूबी रहती। उसने घर का काम भी संभाला और अपनी पढ़ाई भी। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद, माधव ने राधिका का दाखिला राज्य लोक सेवा आयोग (PCS) की तैयारी के लिए शहर के सबसे बड़े कोचिंग सेंटर में करवा दिया और उसे एक छोटे से हॉस्टल में भेज दिया, ताकि वह एकाग्रता से पढ़ सके। राधिका हॉस्टल में रहकर दिन-रात एक कर रही थी, और माधव गाँव में अपनी बीमार माँ की देखभाल के साथ-साथ दोहरी मेहनत कर रहा था। महीने की हर पहली तारीख को माधव शहर आता, लेकिन वह कभी राधिका के हॉस्टल के अंदर नहीं जाता था। उसे डर था कि कहीं उसके फटे-पुराने कपड़े और कालिख लगे हाथों को देखकर राधिका की सहेलियाँ उसका मजाक न उड़ाएँ और राधिका को शर्मिंदगी न उठानी पड़े। वह हमेशा हॉस्टल के गेट के बाहर, पेड़ के नीचे खड़ा होकर राधिका को बुलाता, उसके हाथ में पैसों की एक पोटली रखता, उसकी एक झलक देखकर मुस्कुराता और बिना कुछ खाए-पिए वापस अपनी कर्मभूमि लौट जाता। राधिका हमेशा उससे कहती कि वह अंदर चले, पर वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता।
चार साल की इस कठोर तपस्या के बाद आखिरकार वह दिन आ ही गया, जब राधिका की मेहनत और माधव के पसीने ने रंग दिखाया। राधिका का चयन राज्य लोक सेवा आयोग में हो गया और उसे डिप्टी कलेक्टर (SDM) का पद मिला। राधिका की सफलता की खबर अखबारों की सुर्खियों में थी। राधिका तुरंत अपनी ट्रेनिंग पर चली गई। जब उसकी ट्रेनिंग पूरी हुई और उसे एक दूसरे जिले में पहली पोस्टिंग मिली, तो वह सबसे पहले माधव और अपनी सास को अपने साथ ले जाने के लिए वापस गाँव आई। लेकिन गाँव पहुँचकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके कच्चे घर के दरवाजे पर ताला लटका हुआ था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि राधिका की परीक्षा से कुछ महीने पहले ही माधव की माँ का बीमारी के कारण निधन हो गया था। माधव ने यह खबर राधिका को इसलिए नहीं बताई क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी परीक्षा की तैयारी में कोई भी बाधा आए। माँ के जाने के बाद, माधव ने गाँव का वह छोटा सा घर भी बेच दिया था ताकि राधिका के इंटरव्यू और आगे की व्यवस्थाओं का कर्ज चुका सके, और खुद न जाने कहाँ चला गया था।
राधिका अंदर से टूट गई। एक बड़ी अधिकारी बनने का सारा गुरूर उसके आँसुओं में बह गया। उसने ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, वह अपने उस भगवान को ढूँढ कर लाएगी जिसने उसे इस मुकाम तक पहुँचाया है। राधिका ने अपने जिले का कार्यभार संभाला। एक तरफ वह एक बेहद सख्त और ईमानदार अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी निभा रही थी, दूसरी तरफ उसकी आँखें हर भीड़ में अपने माधव को तलाशती रहती थीं। उसने अपने स्तर पर हर मुमकिन कोशिश की, पुलिस से पता करवाया, लेकिन माधव का कोई सुराग नहीं मिला। माधव दरअसल यह सोचकर राधिका की जिंदगी से दूर चला गया था कि अब वह एक बहुत बड़ी अफसर बन चुकी है। माधव को लगता था कि उसका एक अनपढ़, गरीब और मजदूर पति राधिका के बड़े ओहदे और उसकी प्रतिष्ठा के लिए एक कलंक बन जाएगा। इसलिए उसने अपनी पहचान छुपा ली थी और उसी शहर में एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में गुमनाम जिंदगी जी रहा था, ताकि दूर से ही सही, वह अपनी राधिका को कामयाब और खुश देख सके।
वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा। दिसंबर का महीना आ गया था और शहर में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। कोहरे और शीत लहर के कारण प्रशासन ने गरीबों के लिए विशेष इंतजाम किए थे। राधिका (SDM साहिबा) खुद शहर के अलग-अलग रैन बसेरों का निरीक्षण कर रही थीं और बेसहारा लोगों को कंबल और गर्म कपड़े बाँट रही थीं। शहर के चौराहे पर एक बड़ा सा टेंट लगा था, जहाँ सैकड़ों गरीब लोग कतार में खड़े थे। राधिका अपनी गाड़ी से उतरीं और अपने अधिकारियों के साथ एक-एक करके लोगों को कंबल देने लगीं। कतार में बहुत पीछे एक दुबला-पतला आदमी खड़ा था। ठंड से वह काँप रहा था और उसने अपने चेहरे को एक पुराने और फटे हुए मफलर से पूरी तरह बाँध रखा था ताकि कोई उसे पहचान न सके।
जब कंबल देते-देते राधिका उस आदमी के पास पहुँचीं, तो उस आदमी ने कंबल लेने के लिए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए। जैसे ही राधिका ने कंबल उसके हाथों पर रखा, उनकी नजर उस आदमी के दाहिने हाथ पर गई। उस हाथ की कलाई पर एक गहरा जलने का निशान था। राधिका का दिल जोरों से धड़कने लगा। यह वही निशान था जो एक बार माधव को तब लगा था, जब वह राधिका के लिए पहली बार खुद चाय बना रहा था और गर्म चाय का बर्तन उसके हाथ पर गिर गया था। राधिका के हाथ वहीं ठिठक गए। उसने काँपती हुई आवाज में कहा, “माधव?”
वह आदमी यह नाम सुनते ही बुरी तरह घबरा गया। उसने कंबल वहीं छोड़ा और पीछे मुड़कर तेजी से भीड़ में भागने की कोशिश करने लगा। लेकिन राधिका ने अपनी मर्यादा और पद की परवाह किए बिना दौड़कर उसे पीछे से पकड़ लिया। जैसे ही उसने उस आदमी के चेहरे से मफलर खींचा, उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह माधव ही था। कमजोर, थका हुआ और अपनी ही नजरों में शर्मिंदा। राधिका वहीं सैकड़ों लोगों और अपने मातहत कर्मचारियों के सामने फफक कर रो पड़ी। उसने माधव के दोनों मैले और खुरदरे हाथों को पकड़कर अपने माथे से लगा लिया।
माधव रुंधे हुए गले से बोला, “मुझे छोड़ दो राधिका… तुम अब एक बहुत बड़ी अधिकारी हो। यहाँ सारे लोग तुम्हें देख रहे हैं। मेरे जैसे एक मामूली मजदूर का तुम्हारे साथ होना तुम्हारी इज्जत खराब कर देगा।”
राधिका ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कौन सी इज्जत? यह पद, यह रुतबा, यह गाड़ी, यह सब तुम्हारी उस कालिख और पसीने की देन है माधव। तुम मेरे पति नहीं, मेरे भगवान हो। अगर इमारत की बुनियाद ही छुप जाए, तो इमारत किस काम की? तुमने मेरी खातिर खुद को मिटा दिया और मैं तुम्हें ऐसे ही छोड़ दूँगी?”
राधिका ने उसी वक्त अपने गनर को आदेश दिया कि वह गाड़ी का दरवाजा खोले। उसने माधव को पूरे सम्मान के साथ अपनी सरकारी गाड़ी में बिठाया और अपने सरकारी आवास ले गई। राधिका ने अपने हाथों से माधव को नहलाया, उसे नए कपड़े पहनाए और उसके सामने हाथ जोड़कर बैठ गई। राधिका ने समाज को यह दिखा दिया कि एक सच्चा जीवनसाथी वही है जो आपके बुरे वक्त में आपको सँवारे और जब आपका अच्छा वक्त आए, तो आप उसे उसका हक और सम्मान दें। माधव के निस्वार्थ प्रेम ने एक अनाथ और ठुकराई हुई लड़की को पूरे जिले की मालकिन बना दिया था, और राधिका के सच्चे समर्पण ने एक गरीब मजदूर को दुनिया का सबसे खुशनसीब पति बना दिया।
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