बुढ़ापे में माता-पिता लाचार हो जाते हैं

“पापा, मम्मी, आप दोनों जल्दी से अपना सामान समेट लीजिए। तीन बजे तक निकलना सही रहेगा। अगर और देर हुई तो एक्सप्रेसवे के ट्रैफिक में बुरी तरह फंस जाएंगे और रात हो जाएगी,” विकास ने अपनी कलाई घड़ी देखते हुए एक व्यापारिक लहजे में कहा। विकास की इस बात को सुनकर दीनानाथ जी का चेहरा एकदम गंभीर हो गया। पास ही बैठी उनकी पत्नी कौशल्या अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेटते हुए बेचैनी से अपने पति का मुंह ताकने लगीं। उनकी आँखों में घर लौटने की कोई खुशी नहीं थी, बल्कि एक अनजाना सा खौफ तैर रहा था।

दीनानाथ जी के साले, प्रभाकर जी (मामाजी), जो अब तक चुपचाप खड़े थे, स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए बोले, “विकास बेटा, अभी तो इन्हें यहां आए हुए बमुश्किल बीस दिन ही हुए हैं। कुछ दिन और रुक जाने दो इन्हें मेरे पास। हम भाई-बहनों को बरसों बाद साथ समय बिताने का मौका मिला है।”

विकास ने एक हल्की सी बनावटी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए कहा, “मामाजी, बीस दिन कम नहीं होते। और फिर मैं कौन सा इन्हें हमेशा के लिए ले जा रहा हूँ। अगली बार फिर चक्कर लगवा दूंगा। अभी मुझे ऑफिस से भी लगातार कॉल्स आ रहे हैं, सोमवार से मेरी एक जरूरी मीटिंग है।”

दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। उन्होंने पास रखी मेज से अपना चश्मा उठाया, उसे साफ किया और पहनते हुए बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “हम अभी तुम्हारे साथ नहीं चल रहे हैं, विकास।”

दीनानाथ जी के इस सीधे इंकार ने विकास को चौंका दिया। उसके माथे पर सिलवटें पड़ गईं और उसकी आवाज़ में खीझ साफ छलकने लगी, “क्यों पापा? क्या आप अब भी उस दिन वाली बात को लेकर मुंह फुलाए बैठे हैं? मैंने सोचा था यहां आकर आपका गुस्सा शांत हो गया होगा।”

“मेरी बात को गहराई से समझने की कोशिश कर बेटे। हम नहीं चाहते कि हमारी वजह से तेरे घर की शांति भंग हो। हमारे कारण तुम्हारे और शिखा के बीच रोज़-रोज़ क्लेश हो, यह हमें बिल्कुल मंजूर नहीं है,” दीनानाथ जी का गला थोड़ा भर्रा गया था, लेकिन उनकी आँखों में एक पिता का स्वाभिमान साफ झलक रहा था।

“अरे पापा! पति-पत्नी के बीच इस तरह की नोकझोंक तो चलती ही रहती है। घर है तो बर्तन खड़केंगे ही। शिखा का स्वभाव थोड़ा तेज जरूर है, पर वह दिल की बुरी नहीं है। इन छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाकर आपका अपना घर छोड़कर यहां मामाजी के पास आकर बैठ जाना कोई समझदारी की बात नहीं है। समाज में लोग क्या कहेंगे कि मेरा बेटा मुझे अपने साथ नहीं रखता?” विकास ने अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए बात को टालना चाहा।

दीनानाथ जी इस बार अपनी जगह से उठ खड़े हुए। उनकी आँखों में वो दर्द था जो पिछले एक साल से उनके सीने में नासूर बन चुका था। “तू इसे छोटी बात कहता है विकास? जिस घर को मैंने अपनी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई से बनाया, उस घर में मुझे और तेरी माँ को एक कोने में पड़े पुराने फर्नीचर की तरह महसूस कराया जाता है। क्या यह छोटी बात है? जब तेरी माँ सुबह उठकर अपनी मर्जी से एक कप चाय भी नहीं बना सकती क्योंकि शिखा को रसोई में उनका जाना पसंद नहीं है, तो क्या यह छोटी बात है? जब मेरे खांसने की आवाज़ से शिखा का मूड खराब हो जाता है और वह टीवी का वॉल्यूम तेज कर देती है, तो क्या वो सिर्फ एक ‘नोकझोंक’ है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। कौशल्या जी की आँखों से आंसू छलक पड़े और उन्होंने अपना चेहरा पल्लू से ढंक लिया। प्रभाकर जी ने भी अपनी नजरें झुका लीं। विकास अवाक रह गया, क्योंकि आज उसके पिता ने वो कड़वा सच सबके सामने रख दिया था जिस पर वह हमेशा पर्दा डालने की कोशिश करता था।

दीनानाथ जी ने अपनी बात जारी रखी, “बेटा, हम बूढ़े जरूर हुए हैं, लेकिन हमारे अंदर का इंसान अभी मरा नहीं है। जब औलाद बड़ी हो जाती है और अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, तो माता-पिता को उनसे पैसों की या किसी ऐशो-आराम की जरूरत नहीं होती। उन्हें सिर्फ दो मीठे बोल और सम्मान की दरकार होती है। तुम्हारे घर में हमें एसी वाले कमरे में जरूर रखा गया था, लेकिन उस कमरे की ठंडक ने हमारे दिलों को जमा दिया था। शिखा के वो ताने, उसका वो हमें देखकर मुंह बनाना, और तेरा सब कुछ देखकर भी खामोश रहना… यह सब हमें हर रोज अंदर ही अंदर मार रहा था।”

विकास ने सफाई देने की कोशिश की, “पापा, आप गलत समझ रहे हैं। शिखा ऑफिस के काम से थक जाती है, इसलिए कभी-कभी चिड़चिड़ी हो जाती है। मैं उसे समझा दूंगा।”

“नहीं विकास,” दीनानाथ जी ने हाथ जोड़ दिए, “तुझे अपनी पत्नी को कुछ भी समझाने की जरूरत नहीं है। हम तेरे और उसके बीच की दीवार नहीं बनना चाहते। एक बाप अपनी औलाद का घर बसता हुआ देखना चाहता है, उजड़ता हुआ नहीं। हमने तय कर लिया है कि अब हम तुम्हारे साथ उस घुटन भरे माहौल में नहीं लौटेंगे। और हां, हम प्रभाकर के पास भी हमेशा नहीं रहने वाले। कल ही मैं अपने गांव वाले पुश्तैनी मकान की चाबियां मंगवा रहा हूँ। वहां की आबो-हवा और मिट्टी में वो सुकून है जो तुम्हारे शहर के उस बड़े से फ्लैट में नहीं है। मेरी पेंशन से हमारा गुजारा आराम से हो जाएगा।”

“पापा, आप जिद कर रहे हैं! गांव में मेडिकल सुविधाएं नहीं हैं। आप दोनों बीमार पड़ गए तो कौन देखेगा?” विकास ने अपनी आखिरी दलील पेश की।

कौशल्या जी ने अपने आंसू पोंछे और पहली बार बीच में बोलते हुए कहा, “बेटा, शरीर की बीमारी का इलाज तो डॉक्टर कर देगा, लेकिन मन को जो रोज़ घाव मिलते हैं, उनका इलाज कौन करेगा? हम गांव में रूखी-सूखी खा लेंगे, लेकिन कम से कम सम्मान के साथ जी सकेंगे। तू अपनी जिंदगी में खुश रह, यही हमारा आशीर्वाद है।”

विकास समझ गया था कि आज उसके माता-पिता का फैसला अटल है। वह हमेशा सोचता था कि बुढ़ापे में माता-पिता लाचार हो जाते हैं और उन्हें हर हाल में बच्चों के आश्रित ही रहना पड़ता है। लेकिन आज दीनानाथ जी ने यह साबित कर दिया था कि जब बात आत्मसम्मान की हो, तो एक कमजोर शरीर वाला बूढ़ा पिता भी दुनिया के सबसे बड़े प्रलोभनों को ठोकर मार सकता है। विकास बिना कुछ कहे अपना सिर झुकाए दरवाजे की तरफ मुड़ गया। दीनानाथ जी ने गहरी सांस ली, जैसे उन्होंने अपने कंधों से एक बहुत बड़ा बोझ उतार दिया हो। आज उन्होंने एक शानदार फ्लैट की सुविधाओं को छोड़कर, अपने स्वाभिमान का एक नया आशियाना चुन लिया था।

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