सुनीता देवी अपनी इकलौती बेटी काव्या को लेकर पारिवारिक न्यायालय के बाहर बने काउंसलिंग सेंटर में बैठी थीं। उनके चेहरे पर गुस्सा, चिंता और एक अजीब सी जिद साफ झलक रही थी। उनके ठीक सामने वाली कुर्सी पर उनका दामाद रोहन और उसके माता-पिता खामोश बैठे थे। काव्या की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह कई रातों से सोई न हो। शादी को अभी मुश्किल से आठ महीने ही हुए थे, लेकिन नौबत तलाक और घरेलू हिंसा की शिकायत तक आ पहुँची थी। सुनीता देवी ने ठान लिया था कि वे अपनी लाडली बेटी को इस “नरक” में और नहीं रहने देंगी। उनका मानना था कि रोहन और उसका परिवार उनकी फूल सी बच्ची को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सीधे केस दर्ज करने से पहले उन्हें एक वरिष्ठ और बेहद अनुभवी काउंसलर, श्री रामनाथ त्रिपाठी जी के पास भेजा था। त्रिपाठी जी एक सुलझे हुए, शांत और जीवन के हर रंग को करीब से देखने वाले बुजुर्ग व्यक्ति थे। उनके बाल सफेद हो चुके थे और उनके चेहरे की झुर्रियों में हजारों परिवारों को टूटने से बचाने का तजुर्बा छिपा था। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया और फाइल को किनारे रखते हुए गहरी सांस ली। उन्हें पता था कि इस तरह के मामलों में अक्सर सच वह नहीं होता जो सतह पर दिखाई देता है, बल्कि सच वह होता है जो भावनाओं के शोर में कहीं दब जाता है।
त्रिपाठी जी ने सबसे पहले रोहन और उसके माता-पिता को बाहर इंतज़ार करने को कहा। उन्होंने काव्या को अपने पास बिठाया और सुनीता देवी को भी सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। कमरे में एक भारी खामोशी छा गई जिसे तोड़ते हुए त्रिपाठी जी ने बेहद मधुर और शांत स्वर में काव्या से बात करना शुरू किया। उनका पहला सवाल बहुत सीधा था, “बेटा, मुझे सच-सच बताना, बिना किसी डर के। क्या तुम्हारा पति तुम्हारे साथ मारपीट करता है?”
काव्या ने तुरंत सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं सर, उन्होंने आज तक मुझ पर हाथ नहीं उठाया।”
त्रिपाठी जी ने अगला सवाल दागा, “क्या वो तुम्हें किसी तरह का ताना मारता है? तुम्हारे मायके वालों को बुरा-भला कहता है या दहेज की कोई मांग करता है?”
काव्या ने फिर से ना में सिर हिलाया और रुंधे हुए गले से बोली, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। वो कभी दहेज या पैसों की बात नहीं करते।”
“तो क्या तुम्हारे सास-ससुर तुम्हें घर का सारा काम करने पर मजबूर करते हैं? क्या तुम्हें खाना नहीं दिया जाता या तुम्हें बीमार होने पर डॉक्टर के पास नहीं ले जाया जाता?” त्रिपाठी जी ने सवालों का दायरा बढ़ाया।
काव्या की आँखों से आंसू छलक पड़े, उसने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते हुए कहा, “नहीं सर, मेरी सास तो मुझे सुबह की चाय भी खुद बनाकर देती हैं। जब मैं पिछले महीने बीमार हुई थी, तो रोहन ने दो दिन की छुट्टी लेकर मेरी पूरी देखभाल की थी।”
त्रिपाठी जी थोड़ा मुस्कुराए और उन्होंने आखिरी सवाल पूछा, “तो क्या रोहन का कोई बाहर चक्कर है? या वो शराब पीकर घर में हंगामा करता है?”
काव्या ने इस बार थोड़ी झिझक के साथ कहा, “नहीं सर, वो सीधे ऑफिस से घर आते हैं और उन्होंने कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाया।”
यह सब सुनकर सुनीता देवी का धैर्य जवाब दे गया। वे अपनी जगह से उठीं और गुस्से में त्रिपाठी जी से बोलीं, “आप ये कैसे फालतू सवाल पूछ रहे हैं मेरी बेटी से? मेरी बच्ची वहां घुट रही है। वो लोग मेरी बेटी को आज़ादी नहीं देते। जब भी मैं इसे फोन करती हूँ, ये परेशान लगती है। वो इसे खुश नहीं रख पा रहे हैं और आप कह रहे हैं कि सब ठीक है? आप मेरी बेटी को उलझा रहे हैं।”
त्रिपाठी जी ने सुनीता देवी को शांत होने का इशारा किया और उन्हें वापस कुर्सी पर बैठने को कहा। वे अब पूरी कहानी समझ चुके थे। यह कहानी किसी अत्याचार की नहीं थी, बल्कि यह कहानी एक ऐसे रिश्ते की थी जो अत्यधिक देखभाल और दखलंदाजी के कारण अपना दम तोड़ रहा था। त्रिपाठी जी ने पानी का एक गिलास सुनीता देवी की तरफ बढ़ाया और बोले, “सुनीता जी, आप अपनी बेटी से बहुत प्यार करती हैं, इसमें कोई शक नहीं है। आपकी चिंता एक माँ होने के नाते बिल्कुल जायज़ है। लेकिन क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हूँ?”
सुनीता देवी ने थोड़ा शांत होते हुए कहा, “जी, पूछिए।”
त्रिपाठी जी ने कहा, “सुनीता जी, मैंने सुना है कि आपको बागवानी का बहुत शौक है। क्या आपने कभी किसी नर्सरी से एक सुंदर सा और नाजुक पौधा लाकर अपने घर के बगीचे में लगाया है?”
सुनीता देवी थोड़ा अचकचा गईं कि इस गंभीर माहौल में पौधों की बात कहाँ से आ गई, लेकिन फिर भी उन्होंने जवाब दिया, “जी हाँ, मुझे पेड़-पौधों का बहुत शौक है। मैं अक्सर नए पौधे लाती हूँ।”
त्रिपाठी जी ने चेहरे पर हल्की मुस्कान लाते हुए पूछा, “तो सुनीता जी, जब आप एक नया पौधा नर्सरी की मिट्टी से निकालकर अपने बगीचे की नई मिट्टी में रोपती हैं, तो क्या आप रोज़ सुबह-शाम उस पौधे की मिट्टी को खोदकर ये चेक करती हैं कि उसकी जड़ें कितनी गहरी हुई हैं? क्या आप बार-बार उसकी जड़ों को बाहर निकालकर देखती हैं कि उसने नई मिट्टी को पकड़ा है या नहीं?”
सुनीता देवी ने तुरंत जवाब दिया, “अरे नहीं भाई साहब! अगर मैं रोज़-रोज़ मिट्टी खोदकर उसकी जड़ें चेक करूंगी, तब तो वो पौधा सूख कर मर ही जाएगा। जब हम किसी पौधे को नई जगह लगाते हैं, तो उसे खाद-पानी देकर कुछ दिनों के लिए उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए। उसे नई मिट्टी और नए माहौल में अपनी जड़ें जमाने में थोड़ा वक्त लगता है। बार-बार छेड़छाड़ करने से तो हरा-भरा पौधा भी दम तोड़ देता है।”
इस जवाब को सुनते ही त्रिपाठी जी के चेहरे की मुस्कान गहरी हो गई। उन्होंने एक गहरी नज़र सुनीता देवी पर डाली और बहुत ही ठहराव के साथ बोले, “सुनीता जी, आपकी बेटी काव्या भी तो उसी नर्सरी के पौधे की तरह है ना? जिसे आपने अपने घर (नर्सरी) के सुरक्षित माहौल से निकालकर शादी के बाद एक नए घर (बगीचे) की नई मिट्टी में रोपा है।”
सुनीता देवी एकदम से खामोश हो गईं। उनके चेहरे के भाव बदलने लगे। त्रिपाठी जी ने अपनी बात जारी रखी, “सुनीता जी, रोहन का घर कोई नरक नहीं है, वो बस एक नई ज़मीन है जहाँ काव्या को अपनी जड़ें जमानी हैं। लेकिन आप एक आशंकित माली की तरह रोज़ उस मिट्टी को खोद रही हैं। दिन में दस बार फोन करके पूछना कि ‘सास ने क्या कहा?’, ‘रोहन ने तुम्हें घुमाने क्यों नहीं ले गया?’, ‘तुम्हें वो सब्जी क्यों बनानी पड़ी जो तुम्हें पसंद नहीं है?’… आपकी ये रोज़-रोज़ की पूछताछ, आपकी ये हर छोटी बात में दखलंदाजी ही वो ‘मिट्टी खोदना’ है, जो इस नए रिश्ते को पनपने नहीं दे रही है।”
कमरे में सन्नाटा पसरा था। काव्या भी अब चुपचाप त्रिपाठी जी की बातें सुन रही थी। त्रिपाठी जी ने काव्या की ओर देखते हुए कहा, “बेटा, जब दो लोग एक साथ रहना शुरू करते हैं, तो शुरुआत में विचारों का टकराव होता है। कभी पसंद का खाना नहीं मिलता, कभी सोने-जागने के तरीके अलग होते हैं। ये सब अत्याचार नहीं है, ये एडजस्टमेंट है। तुम्हारी माँ तुमसे बहुत प्यार करती हैं, लेकिन उनके उस प्यार ने तुम्हें कभी ये महसूस ही नहीं करने दिया कि अब तुम्हें एक नई दुनिया में अपने फैसले खुद लेने हैं। जब भी तुम्हें कोई छोटी सी परेशानी आई, तुमने उसे सुलझाने के बजाय अपनी माँ को फोन मिला दिया। और तुम्हारी माँ ने उस छोटी सी परेशानी को एक बड़ा मुद्दा बना दिया।”
त्रिपाठी जी फिर सुनीता देवी की तरफ मुड़े, “बहन जी, आपको अपनी बेटी को ये सिखाना चाहिए था कि नए घर में कैसे तालमेल बिठाया जाता है। अगर रोहन की कोई बात बुरी लगी, तो काव्या को खुद रोहन से लड़ना या बात करना सीखना चाहिए था। लेकिन आप उनके बीच की दीवार बन गईं। आपने बार-बार उनकी गृहस्थी की मिट्टी को इतना खोदा कि काव्या का मन उस घर से उखड़ने लगा। आपकी बेटी ससुराल में परेशान नहीं थी, सच कहूँ तो आपकी अत्यधिक दखलंदाजी और ओवर-प्रोटेक्शन ने इसे परेशान कर दिया है। आपने इसे अपनी जड़ों पर खड़ा होना सिखाया ही नहीं।”
सुनीता देवी की आँखों से अब पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। उन्हें अचानक अपने किए पर गहरा अफसोस होने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे एक बार जब काव्या ने कहा था कि उसे रविवार को देर तक सोने को नहीं मिला क्योंकि सास के रिश्तेदार आ गए थे, तो उन्होंने फोन पर रोहन को खूब खरी-खोटी सुना दी थी। कैसे उन्होंने हर उस छोटी बात को तूल दिया, जिसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता था। उन्हें त्रिपाठी जी के पौधे वाले उदाहरण ने अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।
काव्या ने भी अब स्थिति को समझ लिया था। उसने महसूस किया कि रोहन ने कभी उसे तकलीफ नहीं दी, बल्कि वह खुद अपनी माँ के चश्मे से अपने ससुराल को देख रही थी। उसने उठकर त्रिपाठी जी के पैर छुए और रोते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए सर, मैं समझ गई हूँ कि मेरी शादी में कोई खोट नहीं था, मेरी सोच में खोट आ गया था। मैं अपने पति और परिवार के पास वापस जाना चाहती हूँ।”
सुनीता देवी ने भी हाथ जोड़कर त्रिपाठी जी से कहा, “आपने मेरी आँखें खोल दीं भाई साहब। मैं अनजाने में अपनी ही बेटी का घर उजाड़ने जा रही थी। मैं वादा करती हूँ कि आज के बाद मैं इनकी जिंदगी में बेवजह दखल नहीं दूंगी। मैं अपने इस पौधे को नई मिट्टी में फलने-फूलने का पूरा मौका दूंगी।”
त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए रोहन और उसके परिवार को अंदर बुलाया। उन्होंने रोहन को भी समझाया कि नई शादी में पत्नी को थोड़ा वक्त और समझ की जरूरत होती है। रोहन ने भी बड़ी परिपक्वता से काव्या का हाथ थाम लिया। एक टूटने के कगार पर पहुँच चुका रिश्ता आज एक सही मार्गदर्शन से फिर से जुड़ गया था। काव्या और रोहन खुशी-खुशी अपने घर वापस लौट गए और सुनीता देवी अपने घर, लेकिन इस बार उनके दिल में कोई कड़वाहट या चिंता नहीं थी, बल्कि एक सुकून था कि उनका ‘पौधा’ अब सही हाथों में है और धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमा रहा है।
दोस्तों, आज के समय में यह कहानी सिर्फ काव्या और सुनीता देवी की नहीं है, बल्कि घर-घर की कहानी बन चुकी है। माता-पिता का प्यार अपनी जगह है, लेकिन बच्चों को उनकी नई जिंदगी में अपने हिस्से के संघर्ष और समझौते खुद करने देने चाहिए। रिश्तों को वक्त और स्पेस की जरूरत होती है।
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