पिता की सीख
“पापा, बस बहुत हो गया! मैं अब इस घर में एक पल भी और नहीं रह सकती। रोहन और उसके परिवार की पिछड़ी हुई सोच के साथ मेरा दम घुटता है। अगर आप कल सुबह तक यहाँ नहीं आए, तो मैं अकेले ही डिवोर्स के पेपर फाइल कर दूँगी।” काव्या ने बिना कोई जवाब सुने … Read more
पराए की पहचान
कौशल्या देवी अपने बहुमंजिला इमारत की बालकनी में बैठी शून्य में ताक रही थीं। सामने शहर की चमचमाती रोशनियां थीं, लेकिन उनके भीतर एक अजीब सा अंधेरा पसरा हुआ था। उनके हाथ में फोन था, जिस पर अभी-अभी उनकी बेटी रितु का कॉल कटा था। रितु की बातें उनके कानों में किसी विषैले बाण की … Read more
संस्कारों की कद्र
“सुषमा जी, देखिए हमारे पंडित जी ने कहा है कि अगले महीने की पंद्रह तारीख का मुहूर्त सबसे उत्तम है। इसके बाद तो सीधा छह महीने तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं है। हम चाहते हैं कि शादी इसी मुहूर्त में हो जाए। आखिर हमें भी तो अपने रिश्तेदारों को जवाब देना होता है।” फोन के … Read more
*कब तक आत्मसम्मान खोकर जियोगी* – तोषिका
सुबह सुबह ये क्या हो गया? प्रीति ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोला। तभी वहां उसकी बेटी रैना आई, उसने चिंतित होते हुए पूछा “क्या हुआ मां, ये कौन सी आवाज आई। प्रीति बोली “कुछ नहीं बेटा, तुम्हारे लिए दूध डाल रही थी कि अचानक से हाथ से पतीला गिर गया और सारा … Read more
आत्मसम्मान – खुशी
रितु एक सीधी साधी लड़की थी।घर में पिताजी श्याम मां सुनीता थे।पिता जी की इच्छा सुपुत्र की थी परंतु वो नहीं हो पाया ।मां सुनीता रितु के बाद दो बार गर्भवती रही पर दोनों बार लड़कियां होने के कारण दादी ने गर्भपात करवा दिया।फिर चौथी बार बेटा था परंतु सातवें महीने में सीढ़ियों से गिरने … Read more
अंधी दौड़ – गरिमा चौधरी
आलोक एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर था। उसकी ज़िंदगी सुबह मोबाइल के अलार्म से शुरू होती थी और रात को लैपटॉप की स्क्रीन बंद होने पर खत्म होती थी। अपनी माँ, सुमित्रा देवी को गाँव में अकेला न छोड़कर वह शहर अपने साथ तो ले आया था, लेकिन उन्हें देने … Read more
दूसरा पिता – मुकेश पटेल
“बाबूजी! बाबूजी! बाहर बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी है, शायद दीदी के होने वाले ससुर जी आए हैं!” बारह साल के रोहन ने हांफते हुए घर के छोटे से आंगन में आकर आवाज़ लगाई। आंगन में खटिया पर बैठे रमाकांत जी के हाथ से अख़बार छूट कर नीचे गिर गया। उनकी पत्नी सुशीला, जो रसोई … Read more
एक नया रिश्ता
सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड के बावजूद मेघा के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। गैस के एक बर्नर पर कुकर सीटी दे रहा था और दूसरे पर वह तेजी से रोटियां सेंक रही थी। आज ऑफिस में मेघा का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन था, जिसके लिए … Read more
फैमिली कोर्ट
पारिवारिक अदालत के बाहर आज एक अजीब सी तपिश थी। धूप से ज्यादा गर्मी सुमित्रा देवी के चेहरे की चमक में थी। वो अदालत की सीढ़ियां ऐसे उतर रही थीं जैसे कोई बहुत बड़ा युद्ध जीतकर आई हों। उनकी चाल में एक गुरूर था, आंखों में एक विजयी चमक और होंठों पर एक ऐसी मुस्कान … Read more