वह छाँव जिसे हम बेड़ियाँ समझ बैठे

“रोज-रोज की ये किचकिच अब और बर्दाश्त नहीं होती!” शिखा ने अपना हैंडबैग सोफे पर जोर से पटकते हुए कहा था। आज फिर वही बात हुई थी। ऑफिस से आने में थोड़ी देर क्या हो गई, उसकी माँ ने लगातार दस बार फोन कर दिया था। जब शिखा घर पहुंची, तो माँ दरवाजे पर ही … Read more

दरकती दीवारें और मीठा ज़हर

इन तीखे शब्दों में सुभद्रा के चोटिल अहंकार और अपनी बात न रखे जाने का मलाल साफ झलकता था। नीता उनकी आँखों में हमेशा एक खटकने वाले कांटे की तरह रही। भले ही नीता कितनी भी समझदारी और सलीके से घर का काम कर ले, सुभद्रा के मुँह से उसके लिए कभी प्रशंसा का एक … Read more

रिश्तों की बंजर ज़मीन

कुछ दिनों बाद, एक शाम रामदीन को अचानक सीने में बहुत तेज़ दर्द उठा। वे पसीने से तर-बतर होकर ज़मीन पर गिर पड़े। सुमित्रा की चीख निकल गई। पड़ोसियों की मदद से उन्हें तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने बताया कि उन्हें एक गंभीर हार्ट अटैक आया है और उनकी हालत बहुत … Read more

प्यार की बेड़ियाँ

शाम ढलते ही भैरवगढ़ की संकरी और पुरानी गलियों में एक अजीब सी खामोशी छा जाती थी। यह वह कस्बा था जहाँ समय जैसे दशकों पहले ठहर गया था। इसी कस्बे में एक नया सरकारी बैंक खुला था, जिसके नवनियुक्त मैनेजर अनिरुद्ध ने अभी हफ्ते भर पहले ही यहाँ अपना कार्यभार संभाला था। अनिरुद्ध शहर … Read more

राखी का धागा – डॉ बीना कुण्डलिया

बबीता के परिवार में वो दो बहनें, तीन भाई, एक सबसे बड़ी बहन फिर तीन भाई फिर सबसे छोटी थी बबीता। बड़े ही लाड़ प्यार से माता-पिता ने परवरिश की उन सबकी । एक दूसरे को समझता, एक दूसरे पर निछावर, जान छिड़कता ऐसा था उनका परिवार। पिता मनोज जी सरकारी आफिसर माँ पार्वती घरेलू … Read more

रिश्तों की अटूट डोर

 सुलोचना झेंप गई और मेहमानों के सामने अपनी इज्जत बचाते हुए धीरे से फुसफुसाई, “तू पागल हो गई है शिखा? तमाशा मत बना। तुझे पता है न कि हमारे उनके बीच कोई रिश्ता नहीं है। वे लोग नहीं आएंगे। तू चुपचाप रस्म के लिए बैठ जा।” “रिश्ता कैसे नहीं है माँ?” शिखा की आँखों से … Read more

प्यार का ज़ायका: एक अनकही वसीयत

 रिया को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर, घर का सबसे बुजुर्ग और सम्मानीय व्यक्ति, सुबह-सुबह रसोई में नाश्ता बना रहा था! शर्म, संकोच और अपराधबोध से रिया का चेहरा लाल हो गया। वह तुरंत रसोई के अंदर गई और कांपती हुई आवाज़ में बोली, “बाबूजी! ये… ये आप क्या कर … Read more

सपनों की उड़ान और एक अजनबी का साथ

 सूरज की यह बात सुनकर दीनदयाल सन्न रह गया। एक छोटा सा बच्चा, जो खुद ठंड से कांप रहा है, वह अपने भविष्य, अपनी पढ़ाई और अपनी मां के सपनों के लिए अपने शरीर को गर्माहट देने वाले इकलौते सहारे को बेचने निकल पड़ा था। दीनदयाल को अचानक अपना वो बेटा याद आ गया, जिसे … Read more

वो ‘निकम्मा’ बेटा

रात के करीब ढाई बज रहे थे। अचानक मास्टर महेश जी  जी के सीने में तेज दर्द उठा। दर्द इतना भयानक था कि वे बिस्तर पर ही तड़पने लगे। उनकी पत्नी कौशल्या घबराहट में उठ बैठीं। वे समझ नहीं पा रही थीं कि इतनी रात गए, इस भयंकर तूफ़ान में क्या करें। उनके दो बड़े … Read more

एक माँ का इंतज़ार

देहरादून की शांत वादियों के बीच बसा वह बड़ा सा पुश्तैनी घर अब और भी ज्यादा खामोश लगने लगा था। साठ साल की शांति देवी रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले उस पुरानी लकड़ी की आराम कुर्सी को साफ करती थीं, जिस पर बैठकर कभी उनके पति अखबार पढ़ा करते थे। घर के हर कोने में … Read more

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