सुमित के ये शब्द मेरे कानों में सीसे की तरह पिघल कर गिर रहे थे। मैं कुछ जवाब देने ही वाला था कि तभी फ्लैट की घंटी बजी। सुमित ने उठकर दरवाज़ा खोला। मैं भी उसके पीछे-पीछे हॉल में आ गया। शिखा भी किचन से बाहर आ गई थी।
दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर सुमित के चेहरे का रंग उड़ गया। वो सुमित के पिता, रामदीन काका थे।
गुरुग्राम के उस जगमगाते और आलीशान मॉल में वीकेंड की भीड़ अपने चरम पर थी। मैं बस यूं ही अपनी ज़रूरत का कुछ सामान लेने गया था, तभी मेरी नज़र सामने से आते हुए सुमित पर पड़ी। सुमित मेरा कॉलेज का पुराना दोस्त था। हम दोनों ने साथ में इंजीनियरिंग की थी। उसके साथ एक बेहद आधुनिक और सलीके से तैयार हुई लड़की भी चल रही थी। सुमित की जीवनशैली और उसके कपड़ों से साफ झलक रहा था कि उसने कुछ ही सालों में बहुत तरक्की कर ली है। मैं दरअसल उसे अनदेखा करके आगे निकल जाना चाहता था क्योंकि मुझे लगा कि शायद इतने सालों बाद, इतने बड़े शहर में वो मुझे पहचानना न चाहे, या शायद मैं उसके इस नए ‘क्लास’ में फिट न बैठूँ। लेकिन सुमित कहाँ मानने वाला था। उसने भीड़ में ही मुझे देखकर आवाज़ लगा दी, “अरे रवि, कहाँ छुप कर निकल रहा है भाई? अपने पुराने यार को भूल गया क्या?”
अब मेरे पास कोई और चारा नहीं था। मुझे मुस्कुराते हुए उसके पास जाना ही पड़ा। हम दोनों गले मिले। सुमित ने अपने साथ खड़ी लड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा, “रवि, मिलो शिखा से। शिखा मेरी ही कंपनी में है और हम दोनों दिल्ली से ही हैं।” सुमित की इस बात पर मुझे अंदर ही अंदर बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि सुमित दिल्ली का नहीं, बल्कि कानपुर के पास के एक बहुत ही छोटे से गाँव का रहने वाला था। कॉलेज के दिनों में वो अक्सर अपने गाँव, खेतों और अपनी माँ के हाथ के खाने की बातें किया करता था। लेकिन उसे हमेशा से इस बात का एक अजीब सा कॉम्प्लेक्स था कि लोग उसे ‘गंवार’ न समझें। इसलिए वो अक्सर अनजान लोगों के सामने खुद को किसी बड़े शहर का निवासी बताने की कोशिश करता था। खैर, मैंने शिखा को नमस्ते किया। शिखा ने मुस्कुराते हुए सुमित को टोका, “सुमित, तुम भी ना! आधी बात बताते हो। हाय रवि, मैं शिखा हूँ, और मैं सुमित की टीम लीडर ही नहीं, बल्कि हम दोनों बहुत जल्द शादी भी करने वाले हैं।”
सुमित ने झेंपते हुए कहा, “हाँ यार, बस यही सब चल रहा है। तू बता, तू कैसा है? आज तो बहुत दिनों बाद मिले हैं। चल आज शाम का खाना मेरे घर पर ही खाते हैं। शिखा भी बहुत अच्छा पास्ता बनाती है, और आज तो वैसे भी वीकेंड है, पुरानी यादें ताज़ा करेंगे।” मैंने पहले तो मना करने की कोशिश की, लेकिन सुमित के ज़िद करने पर मुझे हामी भरनी पड़ी। उसने मुझे अपने अपार्टमेंट का पता मैसेज कर दिया और कहा कि मैं शाम को सीधे वहीं पहुँच जाऊं।
शाम को जब मैं सुमित के बताए हुए पते पर पहुँचा, तो मैं उस गगनचुंबी और बेहद आलीशान रिहायशी इमारत को देखकर दंग रह गया। ये गुरुग्राम के सबसे महंगे इलाकों में से एक था। पच्चीसवीं मंजिल पर उसका पेंटहाउस था। दरवाज़ा सुमित ने ही खोला। अंदर का नज़ारा किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं था। इटैलियन मार्बल, विदेशी झूमर, और शहर का एक शानदार नज़ारा दिखाती शीशे की बड़ी-बड़ी दीवारें। शिखा किचन में कुछ तैयार कर रही थी। सुमित मुझे लेकर बालकनी की तरफ आ गया। हम दोनों कुर्सियों पर बैठ गए और शहर की जगमगाती रोशनियों को देखने लगे।
अकेले पाकर मैंने सुमित से पूछ ही लिया, “भाई, ये सब क्या है? नौकरी लगे हुए अभी बमुश्किल तीन-चार साल ही हुए हैं, और ये पेंटहाउस, ये गाड़ियाँ, ये ठाठ-बाट! तूने इतनी जल्दी ये सब कैसे कर लिया? कोई लॉटरी लग गई क्या?”
सुमित ने एक रहस्यमयी सी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा और अपनी ड्रिंक का घूंट लेते हुए बोला, “अरे मेरे भोले दोस्त, आज के ज़माने में सिर्फ मेहनत से कुछ नहीं होता। कॉर्पोरेट की दुनिया में ‘प्रेजेंटेशन’ ही सब कुछ है। तू खुद को कैसे बेचता है, ये मायने रखता है। शिखा हमारी कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट की बेटी है। जब मैंने इस कंपनी में कदम रखा था, तभी समझ गया था कि अगर जल्दी सीढ़ियां चढ़नी हैं, तो कुछ अलग करना होगा। मैंने शिखा के सामने खुद को साउथ दिल्ली के एक बहुत रईस परिवार का लड़का बताया, जिसके माता-पिता विदेश में सेटल हैं और वो यहाँ अपने दम पर कुछ करने आया है। मेरी वो नकली चमक उस पर काम कर गई। अब हमारी शादी होने वाली है, कंपनी में मुझे सीधा सीनियर मैनेजर बना दिया गया है और ये फ्लैट शिखा के पापा ने हमें तोहफे में दिया है। बस थोड़ा सा दिमाग और किस्मत का जादू, और देख आज तेरा भाई कहाँ से कहाँ पहुँच गया है!”
मुझे सुमित की बातें सुनकर एक अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। जो सुमित कभी अपनी सादगी और अपनी सच्चाई के लिए जाना जाता था, आज वो एक झूठ के महल में रह रहा था। मैंने उससे पूछा, “लेकिन सुमित, तुम्हारे माता-पिता? काका-काकी तो गाँव में रहते हैं। उन्हें शिखा के बारे में कुछ पता है? और जब शिखा को तुम्हारी असलियत पता चलेगी, तो क्या होगा?”
सुमित ने बड़ी लापरवाही से हाथ हिलाते हुए कहा, “अरे यार, उन्हें क्या बताना। बाबूजी को तो ठीक से शहर के रास्ते भी नहीं पता। वो गाँव में ही खुश हैं। मैं उन्हें हर महीने अच्छे पैसे भेज देता हूँ। और शिखा को कभी कुछ पता नहीं चलेगा। मैं शादी के बाद भी यही कहूँगा कि मेरे माता-पिता आना नहीं चाहते। मैं इस शहर की इस हाई-सोसाइटी में उन गाँव वालों को लाकर अपनी बेइज़्ज़ती थोड़ी कराऊंगा।”
सुमित के ये शब्द मेरे कानों में सीसे की तरह पिघल कर गिर रहे थे। मैं कुछ जवाब देने ही वाला था कि तभी फ्लैट की घंटी बजी। सुमित ने उठकर दरवाज़ा खोला। मैं भी उसके पीछे-पीछे हॉल में आ गया। शिखा भी किचन से बाहर आ गई थी।
दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर सुमित के चेहरे का रंग उड़ गया। वो सुमित के पिता, रामदीन काका थे। उनके पैरों में घिसी हुई चप्पलें थीं, धोती-कुर्ता मटमैला हो चुका था और चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान साफ दिख रही थी। उनके हाथों में कपड़े का एक पुराना झोला था, जिसमें से शुद्ध देसी घी और बेसन के लड्डुओं की महक आ रही थी। काका की आँखों में अपने बेटे को इतने सालों बाद देखने की जो चमक और प्यार था, वो साफ झलक रहा था।
“सुमित बेटा! कैसा है तू?” काका ने रुंधे हुए गले से कहा और आगे बढ़कर सुमित को गले लगाना चाहा।
सुमित एक कदम पीछे हट गया। उसके चेहरे पर घबराहट और शर्मिंदगी के भाव थे। शिखा ने पास आकर अंग्रेजी में पूछा, “सुमित, हू इज़ ही? क्या ये तुम्हारे गाँव से कोई मदद मांगने आया है?”
उस एक पल में, उस सजे-धजे आलीशान कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। सुमित ने मेरी तरफ देखा, फिर शिखा की तरफ, और फिर अपने पिता की तरफ। उसके बाद सुमित ने जो कहा, उसने उस कमरे की सारी चमक को हमेशा के लिए फीका कर दिया। सुमित ने शिखा से कहा, “हाँ शिखा, ये… ये हमारे गाँव की ज़मीन की देखभाल करते हैं। रामदीन नाम है इनका। शायद किसी काम से आए होंगे।”
सुमित के मुंह से निकले ये शब्द किसी तेज़ धार वाले खंजर की तरह काका के सीने में उतर गए। काका के हाथ हवा में ही रुक गए थे। उनके चेहरे की वो खुशी, वो पिता होने का गर्व, सब कुछ एक सेकंड में राख हो गया। उनकी बूढ़ी आँखों में जो सूनापन अचानक उतर आया, उसे देखकर मेरा दिल चीख पड़ा। काका समझ गए थे कि उनका बेटा, जिसे उन्होंने अपनी खून-पसीने की कमाई से पढ़ाया-लिखाया, आज इस बड़े शहर में उन्हें अपना पिता मानने से शर्मिंदा हो रहा था।
काका ने कुछ नहीं कहा। उनके होंठ कांपे, लेकिन आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने चुपचाप अपने झोले से वो लड्डुओं का डब्बा निकाला और सेंटर टेबल पर रख दिया। उन्होंने सुमित की तरफ एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें कोई गुस्सा नहीं था, बस एक अथाह और कभी न खत्म होने वाली पीड़ा थी।
“मैं… मैं तो बस रास्ते से गुज़र रहा था, सोचा बाबू को ये लड्डू दे दूँ। बहुत पसंद थे उसे।” काका ने शिखा की तरफ देखकर बहुत धीमी आवाज़ में कहा, और बिना सुमित की तरफ देखे, बिना उसे आशीर्वाद दिए, उल्टे पाँव उस दरवाज़े से बाहर निकल गए।
सुमित मूर्ति की तरह खड़ा रहा। शिखा ने अजीब सी शक्ल बनाते हुए कहा, “हाउ वियर्ड! ये गाँव के लोग भी ना, बिना बताए कहीं भी आ जाते हैं।”
मुझसे अब और वहाँ रुका नहीं गया। मैं तेज़ी से सुमित के पास गया। मैंने उसे कोई गाली नहीं दी, कोई डांट नहीं लगाई, बस इतना कहा, “तूने आज एक झूठी लड़की और एक झूठे महल के लिए अपने भगवान को सड़क पर धकेल दिया है सुमित। तेरी ये कामयाबी, ये तेरा झूठा रुतबा, एक दिन इसी इटैलियन मार्बल पर ताश के पत्तों की तरह बिखरेगा। और तब, तुझे उठाने के लिए वो घिसी हुई चप्पलों वाले हाथ नहीं मिलेंगे।”
मैं वहां से तुरंत निकल गया। लिफ्ट से नीचे भागकर मैंने काका को बहुत ढूँढा, लेकिन वो उस बड़े शहर की भीड़ में कहीं खो चुके थे। उस दिन मुझे समझ में आ गया कि सफलता की सीढ़ियां चढ़ना गलत नहीं है, लेकिन अगर उन सीढ़ियों को बनाने के लिए अपने ही माँ-बाप के स्वाभिमान को कुचलना पड़े, तो वो सफलता किसी कब्र से कम नहीं होती। आज सुमित बहुत बड़ा आदमी बन गया था, लेकिन असल में, उसने अपनी इंसानियत को हमेशा के लिए मार दिया था।
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