स्मृतियों की वसीयत

वैदेही की आंखें आंसुओं से सूज चुकी थीं और उसका सिर अपनी छाती तक झुका हुआ था। सामने बाबूजी क्रोध से कांप रहे थे। “तूने सोच भी कैसे लिया कि इस घर की बेटी उस साधारण से मास्टर के बेटे के साथ अपना जीवन बिताएगी? हमारी और उनके परिवार की जो पीढ़ियों पुरानी खटास है, क्या तू उसे भूल गई?” बाबूजी की गरजती हुई आवाज हवेली की मोटी दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थी। वैदेही के होंठ सिले हुए थे। वह जानती थी कि उसके और माधव के बीच पनपा वह कोमल अहसास इन ऊंची दीवारों और झूठी शान के आगे कभी टिक नहीं पाएगा। उसने माधव से प्रेम कब और कैसे कर लिया, यह तो वह स्वयं भी नहीं जानती थी, लेकिन अब यह प्रेम एक अपराध बन चुका था। तभी उसकी बड़ी बुआ ने आगे बढ़कर वैदेही के कंधे को झकझोरा, “आज जो सुन लिया, सुन लिया। आइंदा इस माधव का नाम भी तेरे होठों पर आया, तो याद रखना कि तू अपने बाबूजी का मरा मुंह देखेगी। इस बात को इसी रात के अंधेरे में दफना दे।” वैदेही ने एक गहरी और कांपती हुई सांस ली, अपने भीतर उठते हुए आंसुओं के समंदर को रोका और पत्थर सी आवाज में कहा, “ठीक है बुआ, आज के बाद यह नाम मेरे होठों पर कभी नहीं आएगा।” और इसी एक वाक्य के साथ वैदेही और माधव की दुनिया हमेशा के लिए अलग हो गई। उन दोनों के बीच प्रेम का एक ऐसा मौन और अलिखित समझौता था, जिसे समाज के तराजू में तौला नहीं जा सकता था। उन्होंने बिना कुछ कहे एक-दूसरे को विदा कर दिया था।

समय अपनी गति से चलता रहा और देखते ही देखते इस बात को चौबीस वर्ष बीत गए।

वैदेही अब समय की भट्टी में तपकर एक अत्यंत शांत, गंभीर और सुलझी हुई महिला बन चुकी थी। उसके चेहरे पर एक ठहराव था, जैसे किसी गहरी नदी का शांत जल हो। आज उसके बाइस वर्षीय बेटे, रुद्रांश के वास्तुकला (आर्किटेक्चर) कॉलेज में दीक्षांत समारोह और राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनी का आयोजन था। रुद्रांश को उसके बेहतरीन डिजाइन के लिए पूरे राज्य में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था। पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। जैसे ही रुद्रांश अपना मॉडल लेकर मंच पर मुख्य अतिथि की ओर बढ़ा, तो मुख्य अतिथि के हाथ अचानक हवा में ही ठिठक गए।

मुख्य अतिथि कोई और नहीं, देश के जाने-माने उद्योगपति माधव थे। माधव की नजरें रुद्रांश के चेहरे पर मानो जम सी गई थीं। रुद्रांश की आंखें, उसका चौड़ा माथा, उसके मुस्कुराने का ढंग और यहां तक कि उसके खड़े होने का अंदाज… सब कुछ हूबहू वैसा ही था जैसा पच्चीस साल पहले माधव का हुआ करता था। मंच पर खड़ा वह नौजवान माधव को अपने ही अतीत का आईना लग रहा था। कोई भी अनजान व्यक्ति उन्हें देखकर यही कहता कि वे दोनों सगे बाप-बेटे हैं। फर्क सिर्फ उम्र की रेखाओं और बालों की सफेदी का था। माधव ने अपने कांपते हाथों से रुद्रांश को ट्रॉफी दी और उससे कुछ देर बहुत आत्मीयता से बात की।

रात को घर लौटने पर रुद्रांश बहुत उत्साहित था। उसने ट्रॉफी और समारोह की तस्वीरें अपनी मां को दिखाते हुए कहा, “मां, आज का दिन मेरे लिए बहुत खास था। और पता है, जो मुख्य अतिथि थे, उन्होंने मुझसे बहुत देर तक बात की।” वैदेही ने जैसे ही तस्वीरों में माधव का चेहरा देखा, उसके हाथों की नसें तन गईं और दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक सी गई। चौबीस साल बाद वह चेहरा उसके सामने था, वही आंखें, वही शालीनता, बस उम्र ने अपना असर दिखा दिया था। वैदेही समझ गई कि आज नियति ने एक बहुत बड़ा खेल खेला है। उसने खुद को संभालते हुए और पूरी तरह अनजान बनते हुए पूछा, “अच्छा? कौन थे ये मुख्य अतिथि बेटा?” रुद्रांश ने अपनी जेब से एक विजिटिंग कार्ड निकालते हुए कहा, “अरे मां, मैं तो आपको बताना ही भूल गया। इन्होंने मुझे अपना पर्सनल नंबर दिया है और कहा है कि मेरी परवरिश करने वाली मां से वो एक बार जरूर बात करना चाहेंगे। उन्हें मेरे करियर और डिजाइन को लेकर आपसे कुछ चर्चा करनी है।”

वैदेही के मन में स्मृतियों का तूफान उमड़ पड़ा, लेकिन चेहरे पर वही पुराना ठहराव था। अगले दिन शहर के बाहरी हिस्से में बनी एक शांत और हरी-भरी नर्सरी के कोने वाले बेंच पर दो लोग बैठे थे। वैदेही और माधव। दोनों के बीच कोई झिझक नहीं थी, कोई गिला-शिकवा नहीं था। बस वह अलिखित और निशर्त प्रेम था, जो आज भी उनके बीच एक अदृश्य धागे की तरह बंधा था। माधव ने सफेद रंग का एक सूती कुर्ता पहना हुआ था, आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा था और बालों में चांदी सी चमक आ गई थी। वैदेही उसे बहुत ध्यान से देख रही थी। दोनों अपनी-अपनी गृहस्थी और मर्यादाओं का पूरा सम्मान कर रहे थे। उनके चेहरों पर एक अजीब सी शांति और होठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी।

“तुम्हारा बेटा रुद्रांश…” माधव ने बात शुरू ही की थी कि वैदेही ने उसकी बात बीच में काटते हुए एक गहरी सांस ली। “हां माधव, यह इस सृष्टि का और प्रकृति का एक बहुत ही रहस्यमयी चमत्कार है। जब मैं तुम्हारे परिवार से दूर होकर एक नए जीवन में बंधी, तो मैंने कभी तुम्हारा जिक्र नहीं किया। लेकिन तुम्हारा वह शांत व्यक्तित्व, तुम्हारी वह छवि मेरे अंतर्मन में इतनी गहराई तक बस गई थी कि मुझे खुद भी इसका आभास नहीं हुआ। जब रुद्रांश का जन्म हुआ और वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगा, तो घर के सभी लोग हैरान थे। सब यही कहते थे कि इसका चेहरा, इसके नैन-नक्श तो परिवार में किसी से भी नहीं मिलते, न मुझ पर गए हैं न इसके पिता पर। ऐसा कहते हैं माधव, कि एक मां जब अपने गर्भ में किसी शिशु को धारण करती है, तो वह जिस व्यक्ति के बारे में सबसे ज्यादा सोचती है, जिसके विचारों को जीती है, उस शिशु पर उसी व्यक्ति की छाप पड़ जाती है। हम दोनों शारीरिक और सामाजिक रूप से जरूर अलग हो गए थे, लेकिन मैंने अपने भीतर के उस एकांत में तुम्हें हमेशा जिंदा रखा। मेरी हर सांस, हर सोच में सिर्फ तुम थे। शायद इसलिए, मेरी कोख से जन्म लेने के बाद भी रुद्रांश के रूप में तुम्हारा ही अक्स दुनिया के सामने आया है।” यह सब कहते हुए वैदेही की आंखें भीग गईं और उसका सांवला चेहरा किसी ईश्वरीय तेज से चमक उठा।

उसने खुद को संभालते हुए बात बदली, “खैर, ये सब पुरानी बातें हैं। तुम अपनी सुनाओ माधव, तुम्हारा परिवार कैसा है?”

माधव हल्का सा मुस्कुराया। उसने अपनी जगह से थोड़ा खिसक कर वैदेही के करीब अपना मोबाइल किया और कहा, “मुझे तुम्हें कुछ दिखाना है।” मोबाइल की स्क्रीन पर एक बाइस-तेईस साल की खूबसूरत लड़की की तस्वीर थी। उस लड़की को देखते ही वैदेही के मुंह से एक हल्की सी चीख निकल गई। वह लड़की हूबहू वैदेही के यौवन के दिनों की परछाई लग रही थी। वही बड़ी-बड़ी आंखें, वही घुंघराले बाल और वही सादगी। वैदेही अवाक होकर माधव का चेहरा देखने लगी।

“यह मेरी बेटी है…” माधव ने धीरे से कहा। अचानक ही उन दोनों की आंखों से आंसू छलक पड़े और फिर दोनों एक साथ मुस्कुरा उठे। माधव ने शून्य में देखते हुए कहा, “हम दोनों ने ही एक-दूसरे को अपनी आत्मा में इतना गहरा उतार लिया था वैदेही, कि हमारी वह खामोश इबादत हमारी संतानों के रूप में साकार हो गई। जैसा तुमने अभी कहा, गर्भ में पल रहे बच्चे पर मां के विचारों का गहरा असर होता है। वैदेही, जब मेरी शादी हुई, तो मैंने अपनी पत्नी से अपने और तुम्हारे अतीत के बारे में कुछ भी नहीं छिपाया। मैंने उसे सब कुछ बता दिया था। मेरी पत्नी बहुत समझदार और सुलझी हुई महिला है। जब वह गर्भवती थी, तो वह अक्सर मुझसे तुम्हारी ही बातें पूछा करती थी। वह तुम्हारी वह पुरानी तस्वीर, जो मेरे पास थी, घंटों देखती रहती थी और तुम्हारी उस निस्वार्थ भावना का सम्मान करती थी। शायद इसलिए… मेरी पत्नी के विचारों और मेरी आत्मा की सच्चाई ने मिलकर मेरी बेटी को तुम्हारा रूप दे दिया।”

माधव ने वैदेही की आंखों में देखते हुए कहा, “तुम्हें पता है मेरी बेटी का नाम क्या है? मेरी पत्नी ने ही उसका नाम रखा है… वैदेही।”

यह सुनकर वैदेही निःशब्द रह गई। दोनों की आंखें प्रेम, श्रद्धा और पूर्णता के आंसुओं से झिलमिला रही थीं। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे आज उनके जीवन का हर अधूरापन पूरा हो गया हो। उनके बीच कोई शारीरिक बंधन नहीं था, कोई सामाजिक स्वीकृति नहीं थी, लेकिन उनका प्रेम इतना पवित्र और गहरा था कि उसने प्रकृति के नियमों को भी अपने रंग में रंग दिया था। नर्सरी के बाहर सूरज ढल रहा था, और दूर क्षितिज पर ऐसा लग रहा था मानो धरती और आसमान, जो कभी मिल नहीं सकते, वे भी किसी अदृश्य प्रेम के धागे में बंधकर एक हो रहे हों।

क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्रेम कभी मरता नहीं, बल्कि वह समय और परिस्थितियों को चीरकर अपना अस्तित्व साबित कर ही देता है? आपके इस कहानी के बारे में क्या विचार हैं, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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लेखिका : मीना सहाय

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