वक्त का पहिया

 पार्वती ने यह सुनकर एक पल के लिए आसमान की तरफ देखा और सुकून से मुस्कुराती हुई बोली, “ईश्वर की माया भी कितनी अजीब है न! जो अपनी रफ्तार और मशीन पर इतना इतरा रहा था, वो आज पैदल हो गया। और हम, जो सोच रहे थे कि हमारी जिंदगी अब खत्म हो गई, भगवान ने हमें बुढ़ापे में इतनी आरामदायक जिंदगी दे दी। सच में, ईमानदारी की रोटी में जो सुकून है, वो किसी दिखावे में नहीं।”

शहर की सबसे पुरानी और व्यस्त थोक मंडी में सुबह से ही गहमागहमी शुरू हो गई थी। चारों तरफ ट्रकों के हॉर्न, कुलियों की चिल्ला-चोट और व्यापारियों की सौदेबाजी की आवाजें गूंज रही थीं। इसी शोरगुल के बीच, पचपन साल के दीनानाथ अपनी पुरानी लकड़ी की हाथ-ठेली (रेहड़ी) के पास उदास बैठे थे। उनके चेहरे की झुर्रियों में बरसों की थकान साफ झलक रही थी और उनकी धोती पसीने से भीग चुकी थी। तभी पीछे से एक तेज हॉर्न की आवाज आई और धूल उड़ाता हुआ एक नया, चमचमाता सीएनजी लोडिंग ऑटो उनके पास आकर रुका। ऑटो से पच्चीस साल का नौजवान रमन बाहर निकला। उसके चेहरे पर एक अजीब सा गुरूर और खुशी थी।

“देखा काका! कल ही फाइनेंस करवाया है अपना नया ‘छोटा हाथी’। अब वो लकड़ी की ठेली खींचने वाली जानवरों जैसी मेहनत से मुझे हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया।” रमन ने अपनी कॉलर खड़ी करते हुए कहा। उसकी आंखों में एक चमक थी जो दीनानाथ को भीतर तक चुभ गई।

दीनानाथ ने एक फीकी सी मुस्कान अपने होठों पर लाते हुए कहा, “बहुत-बहुत बधाई हो बेटा। भगवान तुम्हारी खूब तरक्की करे।”

“अरे काका, अब देखना! ठेली से दिन भर में दो चक्कर लगते थे, अब इस गाड़ी से दिन भर में दस चक्कर मारूंगा। हवा से बातें करेगी मेरी गाड़ी और शाम तक नोटों की गड्डी जेब में होगी।” रमन ने बड़े उत्साह से कहा और अपनी गाड़ी में माल भरवाने के लिए आगे बढ़ गया।

रमन के जाने के बाद दीनानाथ की वह फीकी मुस्कान भी गायब हो गई। उनकी बूढ़ी और निस्तेज आंखों में आंसू तैरने लगे। वे मन ही मन अपनी किस्मत को कोसने लगे। ‘जवानी में तो खूब ठेले खींचे, लेकिन अब इस बुढ़ापे में शरीर साथ नहीं देता। घुटनों में दर्द रहता है। सोचता तो मैं भी हूँ कि कोई ऐसी ही मशीन वाली गाड़ी ले लूं, लेकिन उसके लिए शुरुआत में पैसा कहाँ से लाऊंगा? और अगर ले भी ली, तो हर महीने बैंक की किश्त कैसे भरूंगा?’ उनका मन भारी हो उठा। उनकी तीन बेटियां थीं, जिनके हाथ पीले करके वे उन्हें उनके ससुराल विदा कर चुके थे। जिंदगी भर की जमा-पूंजी बेटियों की शादियों में खर्च हो गई थी। उनके पास कोई बेटा नहीं था जो इस बुढ़ापे में उनका सहारा बनता या उन्हें इस हाड़-तोड़ मेहनत से आराम दिलाता। “काश! मेरा भी कोई बेटा होता, तो क्या आज मुझे इस उम्र में भरी दुपहरी में ये भारी ठेला खींचना पड़ता?” अपनी नम आंखों को गमछे से पोंछते हुए दीनानाथ बुदबुदाए और फिर से कोई सवारी या माल की आस में मंडी के दरवाजे की तरफ देखने लगे।

समय बीतता जा रहा था। दोपहर ढलने को थी, लेकिन दीनानाथ को एक भी काम नहीं मिला था। आजकल हर कोई जल्दी में था। हर व्यापारी अपना माल जल्दी से जल्दी दुकान तक पहुंचाना चाहता था। कोई भी हाथ-ठेले वाले को माल नहीं देना चाहता था क्योंकि उसमें समय ज्यादा लगता था। सबको रमन जैसे तेज रफ्तार वाले ऑटो चाहिए थे। दीनानाथ को चिंता सताने लगी कि अगर आज कोई कमाई नहीं हुई, तो घर पर उनकी पत्नी पार्वती को वो क्या जवाब देंगे? रात का चूल्हा कैसे जलेगा? पैसों की कमी और भूख का डर उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

तभी एक गाड़ी मंडी के गेट पर रुकी और उसमें से एक संभ्रांत सी दिखने वाली महिला बाहर निकलीं। उनका नाम अंजलि था। वे शहर के बाहर एक बड़ा एनजीओ और हैंडीक्राफ्ट (हस्तशिल्प) का कारखाना चलाती थीं। अंजलि जी मंडी में मिट्टी के महंगे और बेहद नाजुक सजावटी बर्तन और कलाकृतियां खरीदने आई थीं। उन्होंने कई ऑटो वालों से बात की, लेकिन सभी ने या तो मुंहमांगा किराया मांगा या फिर इतनी तेज गाड़ी चलाने वाले थे कि अंजलि जी को डर था कि उनका कीमती और नाजुक माल टूट जाएगा।

अंजलि जी परेशान सी खड़ी थीं, तभी उनकी नजर उदास बैठे दीनानाथ पर पड़ी। वे दीनानाथ के पास आईं और बोलीं, “बाबा! मेरा कुछ माल है, मिट्टी के बेहद नाजुक बर्तन हैं। मुझे शहर से दस किलोमीटर दूर मेरे कारखाने तक ले जाने हैं। क्या आप ले चलेंगे?”

दीनानाथ ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “मालकिन, आप जो भी मजूरी दे देंगी, मैं ले लूंगा। बस माल सही-सलामत पहुंच जाएगा, इसकी मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।”

अंजलि जी ने दीनानाथ की तरफ ध्यान से देखा। उनके चेहरे पर छाई निराशा और शरीर की थकान साफ बता रही थी कि वे कितने मजबूर हैं। अंजलि जी ने पूछा, “बाबा, क्या बात है? आप इतने परेशान क्यों लग रहे हैं?”

दीनानाथ से रहा नहीं गया। उनके मन का गुबार आंसुओं के रूप में बह निकला। “क्या बताऊं मालकिन… आजकल सब मशीन और रफ्तार के दीवाने हो गए हैं। कोई हम जैसे हाथ-ठेले वालों को काम ही नहीं देता। उम्र हो गई है, शरीर में अब पहले जैसी ताकत नहीं रही। लेकिन पेट की आग तो नहीं बुझती न? इसी ठेले की कमाई से मुझे अपना और अपनी बूढ़ी पत्नी का पेट पालना है। अगर आज काम नहीं मिला, तो शायद रात को हमें भूखा ही सोना पड़े।”

दीनानाथ की बातें सुनकर अंजलि जी का दिल पसीज गया। उन्होंने उस बूढ़े इंसान की आंखों में एक गजब की सच्चाई और ईमानदारी देखी। वे कुछ देर सोचती रहीं, फिर बोलीं, “बाबा, मेरा कारखाना शहर के बाहर है। वहां सौ से ज्यादा गरीब महिलाएं काम करती हैं। मुझे वहां के लिए एक ऐसे भरोसेमंद इंसान की जरूरत है जो कारखाने की देखभाल कर सके, रात को वहां की चौकीदारी कर सके और महिलाओं के बनाए हुए माल का हिसाब-किताब रख सके। वहां ऑटो वाले जल्दी जाते नहीं हैं और मुझे एक ईमानदार आदमी चाहिए। अगर मैं आपको अपने कारखाने में पक्की नौकरी पर रख लूं, तो क्या आप वहां काम करेंगे? मैं आपको हर महीने पगार भी दूंगी और रहने के लिए कारखाने के पीछे बना हुआ एक पक्का कमरा भी दूंगी।”

दीनानाथ को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्हें लगा जैसे साक्षात भगवान ने अंजलि जी के रूप में आकर उनकी सुन ली हो। उनके हाथ अपने आप जुड़ गए और आवाज रुंध गई। “मालकिन… आप सच कह रही हैं? मैं जिंदगी भर आपका यह अहसान नहीं भूलूंगा। मुझे दर-दर भटकने से फुरसत मिल जाएगी। मैं पूरी ईमानदारी से आपका काम करूंगा।”

अंजलि जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो ठीक है बाबा, आज से आप मेरे कारखाने के केयरटेकर हुए। अब ये ठेला यहीं छोड़िए और मेरे साथ चलिए।”

दीनानाथ की जिंदगी में जैसे एक नया सवेरा हो गया था। अंजलि जी के कारखाने में काम करते हुए दीनानाथ और उनकी पत्नी पार्वती को छह महीने बीत चुके थे। अंजलि जी ने उन्हें न सिर्फ चौकीदारी का काम दिया, बल्कि कारखाने के स्टोर रूम की जिम्मेदारी भी सौंप दी। दोनों पति-पत्नी को रहने के लिए एक हवादार कमरा मिल गया था, बिजली-पानी की कोई कमी नहीं थी। दीनानाथ अब ठेला नहीं खींचते थे। वे साफ-सुथरे कपड़े पहनकर स्टोर रूम में बैठते, माल की गिनती करते और रात को आराम से कारखाने का चक्कर लगाते। उनकी पत्नी पार्वती भी कारखाने की महिलाओं के साथ मिलकर छोटे-मोटे काम कर लेती थीं, जिससे उनका समय भी अच्छा कट जाता था।

एक शाम, हल्की-हल्की ठंड थी। दीनानाथ अपने कमरे के बाहर कुर्सी पर बैठे आराम से टीवी देख रहे थे और पार्वती उनके लिए अदरक वाली गर्म चाय लेकर आई थीं। चाय का पहला घूंट लेते ही दीनानाथ के चेहरे पर एक असीम सुकून फैल गया।

तभी दीनानाथ ने पार्वती की तरफ देखकर कहा, “पार्वती, तुझे पता है आज मंडी में मुझे कौन मिला था?”

पार्वती ने उत्सुकता से पूछा, “कौन मिला था?”

दीनानाथ ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “वो रमन मिला था… जिसने नया ऑटो लिया था। उसकी हालत बहुत खराब थी। कह रहा था कि ऑटो की किश्तें नहीं भर पाया, तो बैंक वाले उसकी गाड़ी खींच कर ले गए। नई गाड़ी के चक्कर में उसने बहुत कर्जा ले लिया था। अब काम भी नहीं मिल रहा। मेरे हाथ जोड़कर कह रहा था, ‘काका! मुझे भी अपनी मालकिन से कहकर कोई काम दिला दो, चाहे साफ-सफाई का ही क्यों न हो।'”

पार्वती ने यह सुनकर एक पल के लिए आसमान की तरफ देखा और सुकून से मुस्कुराती हुई बोली, “ईश्वर की माया भी कितनी अजीब है न! जो अपनी रफ्तार और मशीन पर इतना इतरा रहा था, वो आज पैदल हो गया। और हम, जो सोच रहे थे कि हमारी जिंदगी अब खत्म हो गई, भगवान ने हमें बुढ़ापे में इतनी आरामदायक जिंदगी दे दी। सच में, ईमानदारी की रोटी में जो सुकून है, वो किसी दिखावे में नहीं।”

दीनानाथ ने हामी में सिर हिलाया और अपनी चाय का लुत्फ उठाने लगे। उनके दिल में अब कोई मलाल नहीं था। न बेटे की चाहत थी, न भविष्य की चिंता। उन्होंने समझ लिया था कि वक्त का पहिया जब घूमता है, तो इंसान की नीयत और उसकी मेहनत ही उसे सही मंजिल तक पहुंचाती है।

क्या आपने भी कभी अपनी जिंदगी में ऐसा महसूस किया है जब आपको लगा हो कि सब कुछ खत्म हो गया है, लेकिन अचानक किसी अजनबी के रूप में ईश्वर ने आपकी मदद की हो? अपने विचार हमें जरूर बताएं!

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लेखिका : वर्षा मंडल

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