उम्र की ढलान

“ये आप क्या कर रहे हैं? इस उम्र में आकर हाथ जोड़ने शोभा नहीं देते। पति-पत्नी का रिश्ता तो एक गाड़ी के दो पहियों जैसा होता है। कभी एक पहिया घिस जाता है, तो दूसरा उसका भार सँभाल लेता है। इसमें माफी कैसी?” सावित्री की आवाज़ में एक अजीब सा सुकून था। “और वैसे भी, … Read more

बदला हुआ इंसान – रमा शुक्ला

“हाँ, मैंने गलती की। मैं धन बटोरने में अंधा हो गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है।” रघुनाथ जी का गला रुंध गया। “लेकिन सबसे बड़ा पाप जो हमने किया है, वह विक्रम को बिगाड़ना नहीं है। वह पाप है इस मासूम लड़की मीरा की जिंदगी बर्बाद करना। याद है तुम्हें? जब विक्रम … Read more

अहंकार – गरिमा चौधरी

“अरे रूचि, खुशकिस्मत तो ये हैं कि इन्हें मेरे जैसा पति मिला,” विक्रांत ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा, “वर्ना सोचो, किसी और से शादी होती तो आज भी किसी दो कमरों के फ्लैट में बर्तन मांज रही होतीं। ये तो मेरा विजन है, मेरी मेहनत है, जो आज ये महारानियों की तरह इस … Read more

जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा

सुबह के आठ बज रहे थे, लेकिन मास्टर रघुनाथ जी के भीतर जैसे कोई तूफ़ान उबल रहा था। उनकी पत्नी सुमित्रा ने मेज़ पर चाय का प्याला रखते हुए कहा, “चाय ठंडी हो रही है, इसे तो पी लीजिए। सुबह से उस कागज़ में सिर खपाए बैठे हैं, जैसे आज ही कोई बड़ा किला फतह … Read more

खोखली बुनियाद – मंजू अग्रवाल

“भाभी, मुझे पता है आज आपको अपने भैया की बहुत याद आ रही होगी। लेकिन आप उदास मत होइए, समर भैया हैं ना, वो भी तो आपके भाई जैसे ही…” विशाखा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि उसे लगा उसने कुछ गलत कह दिया। लेकिन काव्या ने बहुत ही शांत स्वर में … Read more

बाबूजी की ज़िद

रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने चाय का कप लिया और बेंच पर बैठ गए। “हम्म… सूजन आ गई है। मैंने कल ही कहा था कि डॉक्टर के पास चलते हैं, लेकिन मेरी सुनती कहाँ है वो।” मीरा ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “बाबूजी, अगर आप बुरा ना मानें तो … Read more

गुस्सा – खुशी

राजन इतना गुस्सा अच्छी बात नहीं है ये सब बर्बाद कर देगा समझो जरा।क्या समझू वो सतीश अपनी पत्नी को छोड़ तुम्हारी प्लेट में खाना क्यों लगा रहा था।सतीश मेरी प्लेट में खाना नहीं लगा रहा था वो माधवी के लिए ही ले जा रहा था उसके हाथ में बोल था इसलिए मैने उनकी प्लेट … Read more

अपनत्व

शारदा स्तब्ध रह गई। वह सुमेधा को और फिर उसके हाथ में उस चाय के कप और ताजे खाने को अवाक होकर देखती रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। कहाँ सुबह से वह एक-एक घूंट चाय के लिए तरस रही थी, जलालत सह रही थी, और कहाँ इस अनजान लड़की … Read more

 दिल का दर्द

“अबे ओए किताबी कीड़े! तुझे क्या लगा, तू आवाज़ बदलेगा और मूंछें बढ़ा लेगा तो हम तुझे पहचान नहीं पाएंगे? साले, पच्चीस साल तो क्या, अगर पच्चीस जनम भी बीत जाते, तो भी तेरी ये झुकी हुई शक्ल और सहमी हुई आँखें हम दूर से पहचान लेते। तू हमें खाना परोस रहा था, ये देखकर … Read more

 प्रेम की शुरुआत

लेकिन जब बुआ जी ने कहा, “ये हमारी मीता है,” तो समीर के माथे पर भी सिलवटें पड़ गईं। उसे थोड़ा बुरा भी लगा। क्या लड़की वालों ने उसे इतना हल्के में लिया है कि वे ठीक से तैयार भी नहीं हो सकते? क्या उसके पास पहनने के लिए एक ढंग का सूट नहीं था? … Read more

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