प्रतीक्षा के उस पार: एक अनकही दास्तां

 उस दिन उन दोनों के बीच जो बातें शुरू हुईं, वो सिर्फ एक परिचय नहीं, बल्कि दो ऐसी आत्माओं का मिलन था जो बिना बोले भी एक-दूसरे के बहुत करीब थीं। काव्या ने वेदांत के विचारों, उसकी सादगी और समाज के प्रति उसके समर्पण को जाना, तो उसके प्रति उसका सम्मान और भी बढ़ गया। … Read more

राख से उपजा पारिजात

 अवनि ने समर का हाथ एक झटके से पीछे धकेल दिया और अपनी आवाज़ को बेहद संयत रखते हुए कहा, “बस समर, बहुत हो चुका। आज तक तुमने मेरे शरीर पर अधिकार जमाया, मेरे मन को रौंदा, लेकिन मेरी आत्मा अब भी आज़ाद है। आज इस घर की दहलीज के साथ मैं तुम्हारे इस सड़े … Read more

महलों की छाँव और मिट्टी की धूप

गंगा की तराई वाले एक छोटे से कस्बे में सुबह की पहली किरण जब कच्ची दीवारों पर पड़ती, तो कंचन के घर की रसोई से छन-छनकर इलायची और ताज़ी चाय की महक गली तक फैल जाती थी। कंचन का संसार सीमित था, पर उसकी सीमाएँ कभी किसी तंगी की वजह से संकरी नहीं हुईं। उसके … Read more

दिलों की सरहदें

 बद्रीप्रसाद जी की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। उन्होंने थरथराते हुए हाथ उठाकर देवाशीष के कंधे पर रख दिए और रोते हुए बोले, “बेटा, मैंने दौलत के नशे में अंधा होकर हीरे को कंकड़ समझ लिया था। मैंने हमेशा इंसानियत को पैसों से तौला, लेकिन आज मेरे पास न वह दौलत बची है … Read more

दहलीज का मान

 “मेरा दिमाग अब जाकर सही ठिकाने पर आया है, फैजान। जो लड़की अपने उन माँ-बाप के प्यार और भरोसे की नहीं हो सकी जिन्होंने उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वह कल तुम्हारी कैसे हो सकती है? और तुम… अगर तुम मुझसे वाकई सच्चा प्यार करते, तो मुझे इस तरह रात के अंधेरे में अपनों की … Read more

अपना पराया

 घर के इस तनाव का सबसे आसान और मूक शिकार बना माधव। सरिता को लगता था कि घर के सारे संकटों की जड़ माधव ही है। “यह दिन भर खाता है, कपड़े गंदे करता है, कभी नल खुला छोड़ देता है तो कभी बर्तन तोड़ देता है! इसके इलाज और दवाओं में हर महीने दो-तीन … Read more

राख में दबी चिंगारी

“नहीं नितेश,” मैंने गर्व से भीगे स्वर में कहा। “भाभी हारी हुई नहीं थीं। अवधेश भैया ने जिस औरत को अनपढ़ और बेमेल समझकर फेंक दिया था, उसी औरत ने गाँव की सौ लड़कियों का भविष्य संवारा। आज जब उनका अंतिम संस्कार हो, तो उनके पार्थिव शरीर को किसी असहाय परित्यक्ता की तरह विदा मत … Read more

कंक्रीट का जंगल और उम्मीद की धूप

 शारदा जी के भीतर न जाने कहाँ से एक अजीब सा साहस जागा। उन्होंने व्हीलचेयर को बिस्तर के पास लगाया। अपने पूरे शरीर का बल लगाकर, हांफते हुए उन्होंने ओंकारनाथ जी को सहारा दिया और खींचकर व्हीलचेयर पर बिठाया। ओंकारनाथ जी डर गए कि कहीं वे गिर न जाएं, पर शारदा जी के चेहरे पर … Read more

छाले और सितारे

 रूही ने अपनी माँ के पैर छुए। जानकी ने कांपते हाथों से अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा। जब रूही ने अपना लैपटॅाप बैग संभाला और मुस्कुराते हुए एयरपोर्ट के स्वचालित दरवाज़ों की ओर कदम बढ़ाए, तो जानकी की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। यह आँसू उन पुराने दुखों, जिल्लतों और … Read more

चूल्हे की पहली महक

  हर दिन की तरह, कौशल्या जी की आँखें बिना किसी अलार्म के खुल गईं। उम्र के पैंसठवें पड़ाव पर पहुंचकर शरीर में जोड़ों का दर्द और थकान तो आम बात हो गई थी, लेकिन दशकों पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ छूटती हैं। वे धीरे से बिस्तरे से उठीं, अपनी सूती साड़ी का पल्लू संभाला और … Read more

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