रिश्तों की अनकही धूप-छांव
देवेन्द्र ने अपमान से बचने का एक ही रास्ता निकाला था—मौन। उन्होंने धीरे-धीरे बोलना ही बंद कर दिया था। वह केवल उतना ही बोलते जितना बेहद जरूरी होता। कादम्बरी का मूड देखकर ही कमरे में कदम रखते। कई बार उन्होंने हाथ जोड़कर कादम्बरी से कहा भी, “कादम्बरी, जिंदगी की शाम हो चुकी है। अब तो … Read more