विरासत का ऋण और तराशा हुआ हीरा

दीनानाथ जी की आँखें एक बार फिर भर आईं, पर आज उन आंसुओं में बुढ़ापे की बेबसी या लाचारी नहीं थी, बल्कि एक पिता का गर्व और एक गुरु की सार्थकता छलक रही थी। उन्होंने कांपते हाथों से राघव का सिर उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। पूरे सभागार में उपस्थित लोग खड़े हो गए और तालियों की गड़गड़ाहट से वह विशाल भवन गूंज उठा।

राघव ने सिद्ध कर दिया था कि गुरु का दिया हुआ ज्ञान और संस्कार कभी व्यर्थ नहीं जाते। उसने न केवल दीनानाथ जी के ऋण को एक सच्चे बेटे की तरह अपनी कृतज्ञता से चुकाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह मिसाल भी कायम कर दी कि हुनर तभी सार्थक होता है जब उसमें सेवा, समर्पण और कृतज्ञता की आत्मा बसती हो। उसका जीवन अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के हर उस बच्चे के लिए एक प्रकाश स्तंभ बन चुका था जो अभावों के अंधेरे में अपनी राह तलाश रहा था।

रात का तीसरा पहर ढल रहा था और हवेली के पुराने दालान में मिट्टी के दीये की मद्धिम लौ थरथरा रही थी। बाहर हल्की-हल्की ठंडी हवा नीम की शाखों से टकराकर सरसरा रही थी। सात दशकों की धूप-छांव देख चुके वयोवृद्ध दीनानाथ जी की आँख खुली, तो उन्हें अपने पैरों पर किसी के कोमल हाथों का चिर-परिचित स्पर्श महसूस हुआ। उन्होंने अपनी धुंधली नज़रों से देखा कि लालटेन की धीमी पीली रोशनी में चौदह वर्षीय राघव उनके पैरों को पूरी तन्मयता से सहला रहा था। दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी उस बालक के चेहरे पर रत्ती भर थकान न थी, बल्कि उसकी आँखों में भक्ति और कृतज्ञता का एक अनोखा ही भाव तैर रहा था।

दीनानाथ जी ने करवट बदलते हुए धीमी और स्नेहसिक्त आवाज़ में कहा, “अरे राघव, तू अभी तक जागा हुआ है? रात का पिछला पहर बीतने को आया। जा पगले, जाकर अपनी कोठरी में सो जा। अगर तू रात भर मेरे बूढ़े पैरों को ही दबाता रहेगा, तो सुबह बही-खाते और हुनर सीखने का काम कब करेगा?”

राघव ने संकोच से अपना सिर झुका लिया। उसके हाथ वैसे ही चलते रहे। उसके लिए दीनानाथ जी केवल एक आश्रयदाता नहीं थे, बल्कि उस अंधकारमय जीवन में सूर्य के समान थे, जहाँ उसके माता-पिता के गुजर जाने के बाद घोर सन्नाटा और भुखमरी के सिवा कुछ न बचा था। राघव का रोज़ का यही नियम था। शाम ढलते ही वह पहले दीनानाथ जी के लकड़ी के तख्त को साफ़ करता, उनके लिए तांबे के लोटे में ताजा पानी भर कर रखता, उनके चश्मे को मुलायम सूती कपड़े से चमकाता और फिर अपने हाथों से पकाई सादी रसोई का कौर उनके मुँह तक पहुँचाता। जब दीनानाथ जी खा-पीकर आराम करने बैठते, तो राघव चुपचाप उनके पैरों के पास बैठ जाता। दीनानाथ जी लेटे-लेटे उसे जीवन की समझ, व्यवहार कुशलता, लकड़ी की बारीकियों और जीवन की गणित के गुर सिखाते। कभी-कभार बात करते-करते वृद्ध की आँख लग जाती, परंतु राघव तब तक उनके पैर दबाता रहता जब तक कि दीनानाथ जी की नींद खुद न खुल जाती।

उस रात भी जब दीनानाथ जी ने उसे डांटते हुए प्यार से सोने को कहा, तो राघव ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, “बाबूजी, जब तक आपकी थकान दूर नहीं होती, मुझे नींद कैसे आ सकती है? मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब आपकी ही तो दी हुई सांसें हैं। आपकी सेवा में मुझे जो सुकून मिलता है, वह मखमली बिस्तरों पर भी नहीं मिल सकता।”

यह सुनते ही दीनानाथ जी का गला रुंध गया। वे उठकर बैठ गए और उन्होंने अनायास ही राघव को अपनी छाती से चिपका लिया। सत्तर बरस के उस बूढ़े कारीगर की आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सफ़ेद घनी मूंछों और झुर्रियों से भरे गालों पर आंसुओं की धारा बह निकली। राघव सकपका गया। उसने कभी बाबूजी को इस तरह भावुक होते नहीं देखा था।

दीनानाथ जी ने रोते हुए राघव का माथा चूमा और थरथराती आवाज़ में बोले, “राघव, लगता है पिछले जनम का कोई बहुत बड़ा कर्ज़ मुझ पर बाकी था, जो विधाता ने तुझे मेरे पास भेजकर चुकाया है। मेरे अपने सगे भतीजे और रिश्तेदार तो मेरी संपत्ति और इस पुश्तैनी हुनर को कौड़ियों के मोल बेचने पर तुले रहे, पर तू… तू तो एक अनगढ़ हीरा है जिसे ईश्वर ने मेरे आँगन में तराशने के लिए डाल दिया। तूने मेरी जितनी निस्वार्थ सेवा की है, उतनी तो कोई अपना सगा बेटा भी नहीं करता। तू बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है न, अपनी खुद की पहचान बनाना चाहता है? मेरा आशीर्वाद गाँठ बाँध ले, तू सिर्फ अपने पाँव पर ही नहीं खड़ा होगा, बल्कि एक दिन इस पूरे शहर में तेरी कला, तेरे नाम और तेरी इंसानियत का डंका बजेगा। लोग उदाहरण देंगे कि इंसान ऐसा होना चाहिए।”

दीनानाथ जी शहर के एक नामी काष्ठ-शिल्पी थे। उनके बनाए नक्काशीदार झूले, चंदन के संदूक और मंदिर के दरवाजों की मांग दूर-दूर तक थी। राघव जब आठ वर्ष का था, तब एक महामारी में उसके माता-पिता चल बसे थे। दूर के एक रिश्तेदार ने उसे अनाथ समझकर बेसहारा छोड़ दिया था। उसी समय दीनानाथ जी ने उस मासूम को अपने घर में पनाह दी थी। उन्होंने न केवल उसे खाना और छत दी, बल्कि उसे स्थानीय पाठशाला में नाम लिखवाकर पढ़ाया भी।

पाठशाला की पढ़ाई के साथ-साथ दीनानाथ जी ने राघव को लकड़ी की पहचान, आरी चलाने का संतुलन और छेनी-हथौड़े से बेजान लट्ठों में जान फूंकने का हुनर सिखाना शुरू किया। राघव कुशाग्र बुद्धि का था। वह दिन में पाठशाला जाता और शाम को दीनानाथ जी की पुरानी कार्यशाला में बैठकर हुनर के गूढ़ रहस्य सीखता। गणित के हिसाब-किताब में भी उसका दिमाग कंप्यूटर की तरह दौड़ता था। नाप-जोख की एक इंच की गलती भी उसकी नज़रों से छुप नहीं पाती थी।

मैट्रिक की परीक्षा राघव ने पूरे जिले में सर्वोच्च अंकों से पास की। इसके बाद उच्च तकनीकी शिल्प विद्यालय में प्रवेश की बारी आई, तो फीस की बड़ी समस्या सामने खड़ी हो गई। उस समय दीनानाथ जी की तबीयत भी ढल रही थी और काम भी पहले जैसा नहीं रहा था। परंतु अपने प्रिय शिष्य के भविष्य के लिए दीनानाथ जी ने अपनी सबसे प्रिय और पुरानी सोने की चेन गिरवी रखकर राघव के दाखिले का प्रबंध कर दिया। उन्होंने राघव के सिर पर हाथ रखकर कहा, “जा बेटा, विद्या और हुनर की वह ऊंचाई छूकर आ, जिसे यह बूढ़ा कभी सपनों में ही देखता था।”

राघव ने अपने गुरु के विश्वास को कभी डिगने नहीं दिया। तकनीकी शिल्प संस्थान में उसने दिन-रात एक कर दिया। जहाँ अन्य लड़के मौज-मस्ती में समय गंवाते, राघव पुस्तकालय में बैठकर पुरानी स्थापत्य कला की पुस्तकें पढ़ता या कार्यशाला में जाकर छेनी-हथौड़ी चलाता। उसने स्वर्ण पदक के साथ अपनी उपाधि पूरी की।

उपाधि मिलते ही उसे शहर के सबसे बड़े डिजाइनिंग और शिल्प संस्थान में वरिष्ठ शिल्पकार और प्रशिक्षक का पद मिल गया। पदभार संभालते ही राघव के जीवन का केवल एक ही लक्ष्य था—दीनानाथ जी के देखे सपने को सच्चाई में बदलना और उस कला को नई पीढ़ी तक निस्वार्थ भाव से पहुँचाना।

कुछ ही वर्षों के भीतर राघव की प्रसिद्धि पूरे राज्य में फैल गई। एक कुशल शिल्पी के साथ-साथ वह एक अत्यंत समर्पित शिक्षक और मार्गदर्शक बन गया। संस्थान में वह सबसे पहले पहुँचने वाला और सबसे अंत में कार्यशाला की बत्ती बुझाकर बाहर निकलने वाला व्यक्ति था। लकड़ी की नक्काशी और ज्यामिति के कठिन से कठिन सिद्धांतों पर उसकी ऐसी पकड़ थी कि बड़े-बड़े अनुभवी इंजीनियर भी जब किसी डिजाइन में उलझते, तो समाधान के लिए राघव के पास दौड़े चले आते थे। ज्यामिति के जटिल रेखाचित्रों को वह चुटकियों में ऐसे समझा देता था मानो कोई बच्चों का खेल हो।

राघव का मानना था कि हुनर किसी बंद कमरे का मोहताज नहीं होता। रविवार के दिन, जब संस्थान बंद रहता, राघव अपने घर के बाहर बड़े बरगद के पेड़ के नीचे एक खुली पाठशाला लगाता। गाँव और शहर के गरीब, अनाथ और हुनर सीखने के इच्छुक बच्चे वहाँ जमा होते। बरगद की ठंडी, सुखद छांव में राघव घंटों बैठकर उन बच्चों को लकड़ी पर आकृतियां उकेरना, नाप-तोल करना और गणित के कठिन सूत्र हल करना सिखाता। वह एक सच्चे कर्मयोगी की तरह धूप-छांव की परवाह किए बिना अपनी साधना में लीन रहता।

उसकी कक्षा में कोई भेद-भाव नहीं था। न कोई अमीर, न कोई गरीब। ज्ञान के प्यासे विद्यार्थी उसकी एक-एक बात को मंत्र की तरह सुनते थे। रविवार की उस विशेष कक्षा को कोई भी छात्र छोड़ना नहीं चाहता था। दूसरे जिलों से भी लोग अपने बच्चों को केवल इस बात के लिए भेजते थे कि राघव का सान्निध्य पाकर उनका बच्चा हुनरमंद और संस्कारी बन सके।

पढ़ाने और तराशने के अलावा, राघव को सुलेख और रेखाचित्र बनाने में अद्भुत महारत हासिल थी। जब वह श्वेत पन्ने पर काली रोशनाई की कलम चलाता, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो सफेद मखमल पर मोतियों की लड़ियां सजा दी गई हों। उसने बाँस की खपच्चियों, चीड़ की पतली तीलियों और मोरपंख की नलियों से स्वयं विभिन्न प्रकार की बारीक कलमें तैयार की थीं। जो भी उन कलमों से लिखे अक्षरों को देखता, वह देखता ही रह जाता। जब भी किसी बड़े राजकीय समारोह या प्रदर्शनी का आयोजन होता, तो स्वागत पत्र और मानपत्र लिखने का दायित्व राघव को ही सौंपा जाता था। राज्य के बड़े-बड़े अधिकारी और विदेशी मेहमान भी उसके हाथ के लिखे अक्षरों और काष्ठ-शिल्प के नमूनों को देखकर दांतों तले उंगली दबा लेते थे। राघव अपनी इस सुंदर कला को भी हर उस बच्चे को सिखाने का निरंतर प्रयास करता, जिसकी इसमें रुचि होती।

विद्या और हुनर का यह दान राघव पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से करता था। उसने कभी किसी गरीब छात्र से एक पैसा भी शुल्क के रूप में नहीं लिया। यदि कोई संपन्न परिवार का छात्र फीस देने की बहुत ज़िद करता, तो राघव विनम्रता से हाथ जोड़कर मना कर देता।

राघव की अपनी आदतें भी बहुत सादगीपूर्ण थीं। उसे ग्रामीण जीवन और पारंपरिक खान-पान से गहरा लगाव था। बाजरे की ताज़ा रोटी, मिट्टी की हांड़ी में पकी कढ़ी और जामुन के सिरके से उसे विशेष प्रेम था। यदि कोई छात्र या उसका परिवार अपनी श्रद्धा से कुछ भेंट करना ही चाहता, तो राघव केवल प्रेमपूर्वक घर के खेत से लाई गई बाजरे की रोटी, घर का बना थोड़ा सा मक्खन या कढ़ी ही स्वीकार करता। इसके अतिरिक्त किसी का कोई कीमती उपहार वह कभी हाथ में भी नहीं लेता था।

सफेद सूती खादी का कुर्ता और धोती उसकी स्थाई वेशभूषा थी। सर्दियों के दिनों में वह खादी की ही एक सदरी और गले में ऊनी मफलर डाल लेता था। उसकी सादगी ही उसका सबसे बड़ा आभूषण थी। उसके हाथ में हमेशा बाँस की एक तराशी हुई छोटी सी छड़ी रहती थी। यह छड़ी किसी को मारने के लिए नहीं, बल्कि कार्यशाला में लकड़ी की सीध नापने और उद्दंड, कामचोर या अनुशासनहीन छात्रों को केवल सचेत करने के लिए होती थी। संस्थान में उसके अनुशासन का ऐसा प्रभाव था कि उसकी छड़ी की हल्की सी खटखटाहट सुनते ही शोरगुल करती पूरी कार्यशाला में एकदम शांति छा जाती थी।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। दीनानाथ जी अब बहुत वृद्ध हो चुके थे और चारपाई पर ही रहते थे। एक दिन राज्य सरकार द्वारा राघव को ‘शिल्प गुरु’ के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा हुई। सम्मान समारोह राजभवन के भव्य सभागार में आयोजित किया गया था। शहर के तमाम गणमान्य लोग, बड़े-बड़े शिल्पी, अधिकारी और मीडिया के लोग वहाँ उपस्थित थे।

जब मंच से राघव का नाम पुकारा गया, तो पूरा सभागार करतल ध्वनि से गूंज उठा। राज्यपाल महोदय ने जैसे ही स्वर्ण पदक और प्रशस्ति पत्र राघव के हाथों में थमाना चाहा, राघव ने बहुत ही विनम्रतापूर्वक अपने दोनों हाथ पीछे खींच लिए। सभागार में सन्नाटा छा गया। सब अचरज में पड़ गए कि इतना बड़ा सम्मान लेने से यह युवक क्यों हिचक रहा है।

राघव ने मंच पर लगे माइक को अपने हाथ में लिया और भरे गले से कहा, “मान्यवर, यह पदक, यह सम्मान और यह ख्याति मेरी नहीं है। यह उस निस्वार्थ तपस्या का फल है, जिसने एक अनाथ, भटके हुए और साधनहीन बालक को अपनी छत्रछाया में समेटा। अगर उस तूफानी रात में दीनानाथ बाबूजी ने मुझे अपनी चौखट पर सहारा न दिया होता, अगर उन्होंने अपनी भूख मारकर मुझे हुनर की रोटी न खिलाई होती, तो आज मैं किसी सड़क के किनारे गुमनाम भटक रहा होता। इस सम्मान का वास्तविक हकदार अगर कोई है, तो वह मेरे पूज्य गुरु और पिता समान दीनानाथ जी हैं।”

राघव मंच से नीचे उतरा और दर्शकों की सबसे अगली कतार में व्हीलचेयर पर बैठे दीनानाथ जी के पास गया। उसने झुककर पहले उनके चरण छुए और फिर राज्यपाल द्वारा दिए जा रहे उस स्वर्ण पदक को दीनानाथ जी के गले में पहना दिया और प्रशस्ति पत्र उनकी गोद में रख दिया।

दीनानाथ जी की आँखें एक बार फिर भर आईं, पर आज उन आंसुओं में बुढ़ापे की बेबसी या लाचारी नहीं थी, बल्कि एक पिता का गर्व और एक गुरु की सार्थकता छलक रही थी। उन्होंने कांपते हाथों से राघव का सिर उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। पूरे सभागार में उपस्थित लोग खड़े हो गए और तालियों की गड़गड़ाहट से वह विशाल भवन गूंज उठा।

राघव ने सिद्ध कर दिया था कि गुरु का दिया हुआ ज्ञान और संस्कार कभी व्यर्थ नहीं जाते। उसने न केवल दीनानाथ जी के ऋण को एक सच्चे बेटे की तरह अपनी कृतज्ञता से चुकाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह मिसाल भी कायम कर दी कि हुनर तभी सार्थक होता है जब उसमें सेवा, समर्पण और कृतज्ञता की आत्मा बसती हो। उसका जीवन अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के हर उस बच्चे के लिए एक प्रकाश स्तंभ बन चुका था जो अभावों के अंधेरे में अपनी राह तलाश रहा था।

सच्चा गुरु वही है जो साधारण मिट्टी को भी सोना बना दे और सच्चा शिष्य वही है जो शोहरत के शिखर पर पहुँचकर भी अपने गुरु के चरणों को न भूले। अगर आपको राघव और दीनानाथ जी के इस पावन रिश्ते में अपने किसी शिक्षक या अभिभावक का अक्स नज़र आया हो, तो अपने विचार हमें नीचे ज़रूर बताएं।

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लेखिका : नीरा आहूजा

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