विद्याधर जी की आँखें भर आईं। उन्होंने कबीर को उठाकर गले से लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “जीते रहो मेरे लाल। आज तुमने पत्तियों के साथ जो मर्यादा और आदर मुझे दिया है, यही इस कुल का असली सोना है। जब तक घर के बच्चों में अपनी जड़ों के प्रति ऐसा आदर रहेगा, इस परिवार की संपन्नता को कोई रावण कभी चुरा नहीं सकता।”
सुबह की गुलाबी धूप अभी आँगन में पूरी तरह फैली भी नहीं थी कि रसोई से बर्तनों के खटकने और तेल में पूरियाँ तलने की सोंधी खुशबू हवा में घुलने लगी। घर के बड़े से दालान में चहल-पहल तो थी, लेकिन उस चहल-पहल में एक अजीब सी जल्दबाजी और थकान भी घुली हुई थी। शारदीय नवरात्र के पूरे नौ दिनों तक चले कलश स्थापन, दुर्गा सप्तशती के पाठ, देवी के नौ रूपों की कठिन साधना और फिर कल नवमी के दिन कन्या भोज की भारी तैयारी के बाद आज पूरा रघुवंशी परिवार गहरी नींद और सुस्ती के आगोश में समाया हुआ था। घर की बड़ी बहू, सरिता, माथे से पसीना पोंछते हुए हाथ में चाय की केतली लिए कमरों के चक्कर काट रही थी। उसकी आवाज में एक साथ प्यार, शिकायत और त्योहार का उत्साह साफ छलक रहा था।
“अरे ओ कबीर! अवनि! कब तक सोओगे दोनों? सूरज सिर पर चढ़ आया है। पूरे नौ दिन माता रानी की सेवा में जो जागे, सो जागे, पर आज तो विजयदशमी है! आज के दिन आलस किया तो समझो साल भर आलस ही पीछे पड़ा रहेगा। उठो जल्दी, अभी द्वार पर वंदनवार लगाना है, रंगोली सजनी है, और दोपहर की पूजा का तो अभी आधा सामान भी तैयार नहीं हुआ है!” सरिता ने बच्चों के कमरे में दाखिल होते हुए दोनों के ऊपर से चादर झटके से खींच ली।
सोलह साल का कबीर नींद में ही करवट बदलते हुए तकिए में मुँह छिपाने लगा, “मम्मी, बस पाँच मिनट और। कल रात देर तक मोहल्ले के दुर्गा पंडाल में जागरण देख रहे थे। आँखें जल रही हैं। इतनी जल्दी क्या है, रावण तो शाम को जलेगा ना!”
पास वाले बिस्तर पर लेटी उसकी छोटी बहन अवनि ने भी रजाई का कोना ढूँढ़ते हुए झल्लाकर कहा, “हाँ मम्मी, दशहरा तो शाम का पर्व होता है। अभी से इतनी सुबह-सुबह क्यों शोर मचा रही हैं आप? पापा भी तो अभी तक सोए ही हैं।”
तभी दालान से होकर गुजरते हुए गृहस्वामी, देवेश जी, जिनकी आँखों में अभी भी नींद की लाली थी, हँसते हुए बोले, “लो भाई, बच्चों ने मुझे भी अपनी आलस मंडली में शामिल कर लिया! सरिता, सच कहूँ तो नौ दिन के फलाहार और कल के हलवे-चने ने शरीर को भारी कर दिया है। लेकिन आज तो मर्यादा पुरुषोत्तम का दिन है, सोए कैसे रहा जा सकता है।” उनके पीछे-पीछे घर के सबसे बुजुर्ग, पंडित विद्याधर जी, सफेद धोती-कुर्ता पहने, हाथ में तांबे का लोटा लिए तुलसी के चबूतरे की ओर बढ़ रहे थे। उनकी सफेद मूँछों के नीचे एक सौम्य मुस्कान तैर रही थी।
विद्याधर जी ने गंभीर परंतु स्नेहिल स्वर में कहा, “अरे भाई, जो सोएगा वो खोएगा। विजयदशमी का प्रभात तो संकल्प का प्रभात होता है। देवेश, तुम नहा-धोकर बैठक साफ करो और द्वार पर आम के पल्लवों का तोरण लगाओ। और कबीर, बेटा, ज़रा जल्दी फुर्ती दिखाओ। आज तुम्हें अपनी दादी के साथ उस पुराने परकोटे के पास चलना है।”
कबीर ने आँखें मलते हुए उठकर बैठते हुए पूछा, “पुराने परकोटे पर? दादाजी, वहाँ इस सुबह-सुबह क्या करने जाना है? वहाँ तो झाड़-झंखाड़ के सिवा कुछ नहीं है।”
रसोई से हाथ पोंछती हुई दादी कल्याणी देवी बाहर आईं। उनके चेहरे पर उम्र की झुर्रियों के साथ-साथ एक अनूठी गरिमा थी। उन्होंने कबीर के बिखरे बालों को सहलाते हुए कहा, “वहाँ हमारे पुरखों का लगाया शमी का पेड़ है लल्ला। आज दशहरे के दिन बिना ‘सोन चिरैया’ और बिना ‘स्वर्ण पत्र’ के पूजा पूरी नहीं होती। आज हमें वहाँ से सोने के पत्ते तोड़कर लाने हैं।”
“सोने के पत्ते?” अवनि भी झटके से उठकर बैठ गई। उसकी आँखों में कौतूहल तैरने लगा। “दादी, पेड़ पर भला सोना कैसे उग सकता है? आप भी न बस बच्चों जैसी कहानियाँ बनाती रहती हैं।”
कल्याणी देवी मंद-मंद मुस्कुराईं और बोलीं, “कहानियाँ सच होती हैं बिटिया, बस देखने वाली आँखें और समझने वाला दिल चाहिए। पहले दोनों भाई-बहन तैयार हो जाओ, फिर जब हम साथ चलेंगे, तब इस सोने का असली राज़ तुम्हें समझाऊँगी।”
घर में अचानक से ऊर्जा का संचार हो गया। सरिता ने झटपट आँगन बुहार कर गोबर और गेरू से लीपा। विद्याधर जी ने दालान के एक कोने में परंपरा के अनुसार शुद्ध मिट्टी और गाय के गोबर से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के छोटे-छोटे प्रतीकात्मक पुतले बनाने शुरू किए, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘दशहरा बनाना’ कहा जाता था। देवेश जी ने बाज़ार जाकर गेंदे के ताजे फूलों की मालाएँ, खील-बताशे, और जलेबियाँ लाने की तैयारी कर ली।
आधे घंटे के भीतर कबीर हल्के पीले रंग का कुरता-पायजामा पहनकर तैयार हो गया। उसके साथ अवनि भी अपनी नई चुनरी संभालती हुई दादी का हाथ पकड़ने आ खड़ी हुई। तीनों घर से निकलकर गाँव की पुरानी सीमा की ओर चल पड़े, जहाँ खेतों के मुहाने पर एक बहुत ही पुराना, फैला हुआ शमी का वृक्ष खड़ा था। उसकी छाल खुरदुरी थी, काँटे तीखे थे, लेकिन उसकी छोटी-छोटी हरी पत्तियाँ सुबह की ओस की बूँदों से चमक रही थीं।
कबीर ने पेड़ की ओर देखकर अचरज से कहा, “दादी, यह काँटों वाला पेड़? इसकी पत्तियाँ तो इमली जैसी बहुत छोटी-छोटी हैं। इसमें सोना कहाँ है? यह तो बिल्कुल साधारण सा, बल्कि थोड़ा रूखा सा पेड़ लग रहा है।”
दादी कल्याणी देवी ने पेड़ के सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाया, फिर आदरपूर्वक उसके तने को छुआ। उन्होंने कबीर और अवनि को भी प्रणाम करने का इशारा किया। दोनों बच्चों ने संकोच से झुककर प्रणाम किया। फिर दादी ने बहुत ही नफासत से कुछ हरी पत्तियों की टहनियाँ तोड़ीं और एक साफ सूती रुमाल में सहेज लीं।
वापस लौटते हुए अवनि ने दादी का आँचल खींचते हुए कहा, “अब बताइए भी दादी, आपने हमें इतनी दूर पैदल चलाया, इन काँटों के बीच से पत्तियाँ तुड़वाईं, पर यह तो बताइए कि इन्हें स्वर्ण पत्र या सोन पत्र क्यों कहते हैं? क्या इनका कोई पौराणिक संदर्भ है या यह सिर्फ गाँव-देहात की कोई मनगढ़ंत बात है?”
दादी ने दोनों को अपने करीब खींचते हुए बड़े शांत भाव से कहना शुरू किया, “सुनो बच्चों, हमारी सनातन संस्कृति में कोई भी परंपरा बिना अर्थ के नहीं गढ़ी गई। जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम रावण से युद्ध करने लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी विजय की कामना के लिए इसी शमी वृक्ष की आराधना की थी। शमी का वृक्ष कोई साधारण वृक्ष नहीं है। इसे ‘अपराजिता’ भी कहा जाता है, यानी जिसे कभी कोई पराजित न कर सके। भगवान राम ने इसके सामने शीश नवाकर विजय का वरदान माँगा था।”
कबीर ने उत्सुकता से पूछा, “लेकिन दादी, पेड़ की पूजा से विजय कैसे मिल सकती है?”
“यही तो बात है बेटा,” दादी ने आगे कहा, “महाभारत काल में भी जब पांडवों को एक वर्ष का अज्ञातवास मिला था, तब उन्होंने अपने सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र इसी शमी के विशाल पेड़ की कोटरों में छिपा कर रखे थे। अर्जुन का गांडीव धनुष इसी पेड़ की शाखाओं के बीच सुरक्षित रहा था। जब एक वर्ष बाद पांडव लौटे, तो उनके शस्त्र वैसे के वैसे ही तेज और सुरक्षित मिले। उन्होंने पुनः शमी वृक्ष का पूजन करके अपने अस्त्र धारण किए और फिर कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में अधर्म पर विजय प्राप्त की। इसीलिए दशहरे यानी विजयदशमी के दिन शमी के वृक्ष की पूजा विजय, पराक्रम और सामर्थ्य का प्रतीक बन गई।”
अवनि ने पत्तियों को हाथ में लेकर उलट-पुलट कर देखा और पूछा, “पर इन्हें सोना क्यों कहा गया दादी? सोने का तो धातु से संबंध है, इन हरी पत्तियों से क्या नाता?”
दादी के चेहरे पर एक गहरा, दार्शनिक भाव उभर आया। वे बोलीं, “पुराने समय में एक कथा आती है कि एक शिष्य, वरतंतु ऋषि के आश्रम में शिक्षा पूरी करके जब गुरु दक्षिणा देने की जिद करने लगा, तो गुरु ने उसकी परीक्षा लेने के लिए चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांग लीं। वह बालक राजा रघु के पास गया। राजा रघु उस समय सर्वमेध यज्ञ करके अपना सब कुछ दान कर चुके थे। एक याचक को खाली हाथ न लौटाने के संकल्प के कारण राजा रघु ने धन के देवता कुबेर पर चढ़ाई करने का निश्चय किया। कुबेर भयभीत हो गए और उन्होंने रात ही रात में शमी के एक विशाल वृक्ष के पत्तों को सोने में बदल दिया। राजा रघु ने वह सारा सोना उस शिष्य को दे दिया, लेकिन शिष्य ने केवल चौदह करोड़ मुद्राएं ही लीं, बाकी बची स्वर्ण मुद्राएं अयोध्या की प्रजा ने आदरपूर्वक आपस में बाँट लीं। वह दिन विजयादशमी का ही था।”
दादी ने एक पल रुककर दोनों बच्चों की आँखों में झाँका और फिर बोलीं, “लेकिन इस पौराणिक कथा के पीछे का असली दर्शन समझो बच्चों। सोना केवल वही नहीं होता जो तिजोरी में बंद रहता है। सोना वह है जो जीवन को संपन्न और अमर बनाए। हमारे पूर्वजों ने शमी को सोना इसलिए कहा क्योंकि प्रकृति ही मनुष्य का सबसे बड़ा धन है। इन पत्तियों को एक-दूसरे को भेंट करने का अर्थ यह होता है कि हम सामने वाले को कह रहे हैं—’आपके जीवन में सोने जैसी आभा, अखंड धैर्य और अटूट समृद्धि आए।’ जब हम किसी को सोन पत्र देते हैं, तो हम अपनी ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार का त्याग करके केवल प्रेम और मंगल की कामना सौंपते हैं।”
कबीर काफी देर तक खामोश रहा। फिर उसने पूछा, “दादी, क्या इसका कोई व्यावहारिक या वैज्ञानिक पहलू भी है? क्योंकि हमारे विज्ञान के शिक्षक कहते हैं कि भारत के हर त्योहार में पर्यावरण का विज्ञान छिपा है।”
दादी मुस्कुरा उठीं, “बिल्कुल सही कहा तुम्हारे शिक्षक ने। शमी एक ऐसा वृक्ष है जो भयंकर सूखे और मरुस्थल में भी हरा-भरा रहता है। इसकी जड़ें ज़मीन में इतनी गहराई तक जाती हैं कि यह पाताल से जल खींच लेती हैं। जब भीषण अकाल पड़ता है और दूर-दूर तक कोई चारा नहीं होता, तब शमी की हरी पत्तियाँ मवेशियों की जान बचाती हैं। इसकी छाल औषधीय गुणों से भरी होती है जो त्वचा रोग और श्वसन तंत्र की बीमारियों में रामबाण काम करती है। हमारे किसान पुरखे शमी के पत्तों के रंग और उसके अंकुरण को देखकर यह अनुमान लगा लेते थे कि आने वाले साल में बारिश कैसी होगी और रबी की फसल कितनी उपजेगी। जो वृक्ष अकाल में प्राण बचाए, जो धरती को बंजर होने से रोके, जो औषधियों का भंडार हो, क्या वह मनुष्य जाति के लिए सोने से भी अधिक मूल्यवान नहीं है?”
अवनि की आँखें चमक उठीं। उसने कहा, “वाह दादी! हम तो इन छोटी-छोटी बातों को जानते ही नहीं थे। हम बस रावण का पुतला जलते देखते थे और सोचते थे कि दशहरा केवल मेले और पटाखों का नाम है। पर यह तो प्रकृति, इतिहास और रिश्तों को एक सूत्र में पिरोने वाला दिन है।”
जब वे घर पहुँचे, तो आँगन का दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। बीच आँगन में गोबर से बनाए गए रावण और उसके दरबार की सुंदर आकृतियों को गेरू, चूने और फूलों से सजाया गया था। पास ही एक थाली में जवारे, यानी नवरात्र के पहले दिन बोए गए जौ के हरे-भरे अंकुर रखे थे।
देवेश जी बाज़ार से ताज़ा जलेबियाँ और मिष्ठान्न लेकर आ चुके थे। सरिता ने सबको हाथ-पैर धोकर पूजा में बैठने का आग्रह किया। पूरा परिवार एक साथ दरी पर बैठ गया। विद्याधर जी ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा प्रारंभ की। उन्होंने सबसे पहले कुल-परंपरा के अनुसार शस्त्र और लेखनी का पूजन किया, फिर रावण के प्रतीकात्मक रूप की पूजा हुई। यह पूजा रावण के अहंकार की नहीं, बल्कि उसके प्रकांड ज्ञान और इस संकल्प की थी कि हम अपने भीतर के दस विकारों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्स्य, स्वार्थ, अन्याय, अमानवीयता और अहंकार का दहन करेंगे।
पूजा के समापन पर सरिता ने एक सुंदर पीतल की थाली आगे बढ़ाई, जिसमें शमी के पत्ते, रोली, अक्षत और जवारे रखे हुए थे। विद्याधर जी ने सबसे पहले देवेश और कबीर के माथे पर रोली-चंदन का त्रिपुंड लगाया, अक्षत लगाए और उनके कानों के पीछे जौ के हरे-हरे जवारे खोंसे।
फिर कल्याणी देवी ने कबीर और अवनि के हाथों में शमी के पत्ते, यानी वे ‘सोन पत्र’ दिए। उन्होंने कहा, “जाओ बच्चों, अपने दादाजी और पिताजी को यह स्वर्ण पत्र भेंट करो और उनका आशीर्वाद लो।”
कबीर ने बहुत ही विनीत भाव से झुककर अपने दादाजी के चरणों में वे पत्तियाँ अर्पित कीं और कहा, “दादाजी, यह सोन पत्र स्वीकार कीजिए। हमें ऐसा ज्ञान और संस्कार दीजिए कि हम भी शमी के पेड़ की तरह हर परिस्थिति में अडिग रह सकें।”
विद्याधर जी की आँखें भर आईं। उन्होंने कबीर को उठाकर गले से लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “जीते रहो मेरे लाल। आज तुमने पत्तियों के साथ जो मर्यादा और आदर मुझे दिया है, यही इस कुल का असली सोना है। जब तक घर के बच्चों में अपनी जड़ों के प्रति ऐसा आदर रहेगा, इस परिवार की संपन्नता को कोई रावण कभी चुरा नहीं सकता।”
इसके बाद अवनि ने अपने पिता देवेश जी और माँ सरिता को सोन पत्र दिए। देवेश जी ने अपनी जेब से कुछ शगुन के रुपए निकालकर दोनों बच्चों के हाथ में दिए, लेकिन अवनि ने हंसते हुए कहा, “पापा, दादी ने आज हमें सिखाया है कि असली सोना तो ये पत्तियाँ और आपका आशीर्वाद है। रुपए तो हाथ का मैल हैं, पर यह संस्कार हमारे साथ जीवन भर रहेंगे।”
सरिता ने अपनी बेटी को छाती से चिपका लिया। घर का कोना-कोना एक दिव्य शांति और आत्मीयता से भर गया था। जो थकान सुबह चेहरे पर दिख रही थी, वह अब तृप्ति और आनंद की चमक में बदल चुकी थी। कबीर और अवनि ने फिर एक-दूसरे को भी सोन पत्र दिए और मुस्कुराते हुए एक-दूसरे से गले मिले। उनके बीच की रोज़-रोज़ की नोक-झोंक उस पावन क्षण में प्यार के निर्मल जल में धुल गई थी।
बाहर दूर किसी मैदान से रावण दहन की तैयारियों के ढोल-नगाड़ों की आवाजें गूँज रही थीं, लेकिन रघुवंशी निवास के उस छोटे से आँगन में, अधर्म पर धर्म की, अज्ञान पर ज्ञान की और औपचारिकता पर आत्मिक प्रेम की असली विजयदशमी मन चुकी थी। परंपरा ने एक बार फिर अपनी सार्थकता सिद्ध कर दी थी—काँटों भरे पेड़ की चंद पत्तियों ने बिखरते हुए आधुनिक मन को अपनी शाश्वत संस्कृति के अखंड सोने से जोड़ दिया था।
क्या आपके घर में भी विजयदशमी पर शमी के पत्तों (सोन पत्र) को बड़ों को देकर आशीर्वाद लेने की यह पावन परंपरा निभाई जाती है? आज के आधुनिक दौर में हमारी इन प्राचीन वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रीतियों को जीवित रखना कितना जरूरी है? अपनी राय और अपने परिवार के दशहरे के अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका
ऋतु अग्रवाल, मेरठ