अनकहे धागों की मिठास

 उधर स्वाति का मन ऐसा बुझ गया जैसे जलते हुए दीये पर किसी ने अचानक मूसलाधार बारिश कर दी हो। वह चुपचाप रसोई में लौट आई। उसकी आंखों के कोर भीगने लगे। जिस यात्रा के लिए उसने दिन-रात एक करके घर के काम निपटाए थे, जिस सुकून के लिए उसने पिछले एक साल से इंतज़ार किया था, वह एक झटके में रेत के महल की तरह ढह गया था। उसे वंदना पर बेइंतहा गुस्सा आ रहा था। क्या कोई आने से पहले एक बार फोन करके पूछ भी नहीं सकता? क्या मायके का मतलब यह होता है कि जब मन चाहा, बोरिया-बिस्तर उठाया और चल दिए?

दिन के ढलते ही जब सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के शीशों से छनकर फर्श पर उतर रही थीं, घर में एक अलग ही गहमागहमी और उत्साह का माहौल था। सूटकेस लगभग पैक हो चुके थे, बच्चों के नए कपड़े करीने से तह करके रखे जा चुके थे और रसोई से इलायची की धीमी-धीमी खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। यह सब यूं ही नहीं था; महीनों की मान-मनौवल और तमाम कोशिशों के बाद आखिरकार आलोक इस बार स्वाति और दोनों बच्चों—रोहन और पिहू—को ऊटी की हसीन वादियों में ले जाने के लिए राज़ी हुआ था।

पिछली गर्मियों में भी यही ख्वाब संजोया गया था। टिकटें बुक थीं, होटल तय था, लेकिन ऐन वक्त पर आलोक की कंपनी में एक बड़ा प्रोजेक्ट आ गया और उसे तुरंत मुंबई की फ्लाइट पकड़नी पड़ी थी। स्वाति का वह उदास चेहरा और बच्चों के बुझे हुए चेहरे आलोक के जेहन में एक कसक की तरह अटके हुए थे। इसलिए इस बार जब बच्चों की वार्षिक परीक्षाएं खत्म होने को आईं, तो स्वाति ने दो महीने पहले से ही आलोक के पीछे पड़ना शुरू कर दिया था। उसने स्पष्ट कह दिया था कि इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा, चाहे कुछ भी हो जाए। आलोक ने भी अपने बॉस के सामने हाथ जोड़कर, अतिरिक्त काम करके पूरे दस दिनों की छुट्टी मंजूर करवा ली थी।

ऊटी का चुनाव भी बहुत सोच-समझकर किया गया था। वहां आलोक के कॉलेज के दिनों का घनिष्ठ मित्र, निशांत, एक चाय बागान में बड़े पद पर कार्यरत था। निशांत का अपना बड़ा सा कॉटेज था, इसलिए न तो महंगे होटलों की मारामारी थी और न ही भीड़भाड़ में भटकने का डर। स्वाति के लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा की रसोई, बर्तनों की खनक, सास की निरंतर दवाओं की देखरेख और घर की चारदीवारी से कुछ दिन का वो सुकून था जिसके लिए हर गृहिणी भीतर ही भीतर तरसती है। उसने अपनी मनपसंद साड़ियां, बच्चों के स्वेटर, कैमरे की बैटरी—हर छोटी-बड़ी चीज़ बड़े जतन से सहेज ली थी।

परसों सुबह की ट्रेन थी। स्वाति रसोई में खड़े होकर रास्ते के लिए कुछ सूखे नाश्ते तल रही थी। चेहरे पर एक अजीब सा नूर था, मन में पहाड़ों की ठंडी हवाएं चल रही थीं। तभी ड्राइंग रूम से उसकी सास, कल्याणी देवी की कांपती और थोड़ी उत्साहित आवाज़ गूंजी, “बहू, अरे ओ स्वाति! ज़रा इधर तो आना, देखना यह किसका संदेश आया है। डाकिया अभी-अभी यह स्पीड पोस्ट दे गया है।”

स्वाति ने हाथ पोंछते हुए कहा, “आई मां जी।” वह मुस्कुराते हुए बाहर आई और लिफाफा हाथ में ले लिया। लिफाफे पर पड़े खूबसूरत और जाने-पहचाने मोतियों जैसे अक्षरों को देखते ही स्वाति के हाथ ठिठक गए। एक पल के लिए उसका दिल जोर से धड़क उठा। उसने जल्दी से लिफाफा फाड़ा और भीतर का पत्र पढ़ने लगी। जैसे-जैसे उसकी नज़रें अक्षरों पर फिसल रही थीं, उसके चेहरे की लाली उड़ती गई और वहां एक गहरा, अनचाहा सन्नाटा छा गया।

पत्र आलोक की छोटी बहन, यानी स्वाति की ननद वंदना का था। वंदना ससुराल से अपने दोनों बच्चों, आरव और मिष्टी के साथ आ रही थी। कल शाम की ही ट्रेन से।

“किसका खत है बहू? कुछ बोलती क्यों नहीं? कोई परेशानी तो नहीं है?” कल्याणी देवी ने अपनी चश्मे के ऊपर से झांकते हुए उत्सुकता से पूछा।

स्वाति ने सूखे गले से बड़ी मुश्किल से थूक निगलते हुए कहा, “मां जी, वंदना दीदी का है। वो… वो कल शाम को बच्चों के साथ आ रही हैं।”

“अरे मेरी वंदू आ रही है!” कल्याणी देवी के चेहरे पर अचानक जैसे सैकड़ों दीये एक साथ जल उठे। उनकी आंखों में सालों पुरानी चमक लौट आई। “क्या दामाद जी भी साथ आ रहे हैं?”

“नहीं मां जी, जीजा जी को बैंक से छुट्टी नहीं मिली। सिर्फ दीदी और बच्चे ही आ रहे हैं, पूरे पंद्रह दिनों के लिए।” स्वाति के स्वर में एक ऐसी सपाट उदासी थी जिसे कोई भी भांप सकता था, मगर कल्याणी देवी तो अपनी बेटी के आने की खुशी में मगन थीं।

“तभी मैं कहूं, आज सुबह से मन इतना प्रफुल्लित क्यों था! मेरी बच्ची पूरे आठ महीने बाद मायके आ रही है। भगवान भला करे, कितने दिनों से तरस रही थीं ये आंखें।” कल्याणी देवी अपने घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़ी हुईं और कमरे में चक्कर लगाने लगीं।

उधर स्वाति का मन ऐसा बुझ गया जैसे जलते हुए दीये पर किसी ने अचानक मूसलाधार बारिश कर दी हो। वह चुपचाप रसोई में लौट आई। उसकी आंखों के कोर भीगने लगे। जिस यात्रा के लिए उसने दिन-रात एक करके घर के काम निपटाए थे, जिस सुकून के लिए उसने पिछले एक साल से इंतज़ार किया था, वह एक झटके में रेत के महल की तरह ढह गया था। उसे वंदना पर बेइंतहा गुस्सा आ रहा था। क्या कोई आने से पहले एक बार फोन करके पूछ भी नहीं सकता? क्या मायके का मतलब यह होता है कि जब मन चाहा, बोरिया-बिस्तर उठाया और चल दिए? कम से कम यह तो सोचना चाहिए कि भाई का भी अपना एक परिवार है, उसकी पत्नी और बच्चों की भी अपनी कोई योजना हो सकती है। हमेशा का यही ढर्रा था—ऐन वक्त पर फरमान सुना देना और सबकी ज़िंदगी को अपने हिसाब से मोड़ देना।

शाम को जब आलोक थका-हारा दफ्तर से घर लौटा, तो उसने ड्राइंग रूम का माहौल बिल्कुल बदला हुआ पाया। मां जहां मुस्कुराते हुए माला जप रही थीं, वहीं स्वाति बेडरूम में अलमारी के सामने गुमसुम खड़ी थी। आलोक जब कमरे में आया, तो स्वाति ने बिना कुछ कहे वह पत्र उसकी तरफ बढ़ा दिया।

आलोक ने पत्र पढ़ा और फिर एक गहरी सांस ली। वह स्वाति के मन की स्थिति को बहुत अच्छी तरह समझ रहा था। उसने स्वाति के कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की, लेकिन स्वाति झटके से पीछे हट गई।

“अब क्या होगा आलोक? हमने सारे टिकट करा रखे हैं, निशांत ने वहां पूरी व्यवस्था कर दी है। क्या हम हर बार अपनी खुशियां इसी तरह कुर्बान करते रहेंगे?” स्वाति की आवाज़ में आंसुओं के साथ-साथ तीखा आक्रोश था।

आलोक ने धीमे स्वर में समझाने का प्रयास किया, “स्वाति, समझो ना। वंदना साल में एक-दो बार ही तो आती है। ऐसा करते हैं, हम वंदना और बच्चों को भी साथ ले चलते हैं। निशांत का कॉटेज बहुत बड़ा है, सब मिलकर मजे करेंगे।”

स्वाति तिलमिला उठी, “वाह! हम परिवार के साथ निजी समय बिताने जा रहे थे या कोई बारात लेकर निकल रहे हैं? और फिर मां जी का क्या? क्या उन्हें यहां अकेले छोड़कर हम सब चले जाएं? वो अपनी बेटी से मिलने को तरस रही हैं और हम उनकी बेटी को लेकर ऊटी भाग जाएं? यह कितना अजीब और शर्मनाक लगेगा!”

“तो फिर तुम ही बताओ, मैं क्या करूं?” आलोक असहाय होकर बिस्तर पर बैठ गया। “बड़ी मुश्किल से अधिकारी ने यह एक हफ्ते की छुट्टी दी थी। अगर अब रद्द की, तो दोबारा इस साल तो छुट्टी मिलने से रही।”

“मुझे कुछ नहीं पता। मैं तो बस इतना जानती हूं कि इस घर में मेरी इच्छाओं का कोई मोल नहीं है। इसलिए मैं कहती थी कि हमें अलग फ्लैट ले लेना चाहिए, कम से कम हमारी अपनी निजता तो होती। पर मेरी सुनता कौन है!” स्वाति ने भरी आंखों से अलमारी से सूटकेस बाहर निकाला और खीजते हुए सामान बाहर फेंकने लगी, “मैं अभी सारा सामान अनपैक कर देती हूं। सब खत्म।”

आलोक खामोश बैठा रहा। वह जानता था कि इस वक्त स्वाति को कोई भी तर्क समझाना आग में घी डालने जैसा होगा। रोहन और पिहू भी कमरे के दरवाजे पर आकर खड़े हो गए थे। जब उन्हें पता चला कि ऊटी की यात्रा रद्द हो गई है, तो उनके चेहरे लटक गए। लेकिन जब आलोक ने बताया कि बुआ और उनके बच्चे आरव-मिष्टी आ रहे हैं, तो बच्चों की मायूसी पल भर में आधी हो गई। बुआ उनके लिए हमेशा ढेर सारे खिलौने और अनोखे उपहार लाती थीं, और भाई-बहनों के साथ धमाचौकड़ी मचाने का ख्याल उन्हें लुभाने लगा था। लेकिन स्वाति का दिल किसी भी सांत्वना को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह रात भर करवटें बदलती रही और तकिया उसके आंसुओं से भीगता रहा।

अगली सुबह घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। कल्याणी देवी सुबह पांच बजे ही उठ गई थीं। उन्होंने पूरे घर में गंगाजल छिड़का, मंदिर की सफाई की और रसोई के चक्कर काटने लगीं।

जब आलोक तैयार होकर दफ्तर निकलने लगा, तो मां ने आवाज़ लगाई, “बेटा आलोक, भूलना मत। शाम को पांच बजे वाली इंटरसिटी से आ रही है वंदू। तू साढ़े चार बजे ही स्टेशन पहुंच जाना, गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं होता।”

“हां मां, मुझे अच्छी तरह याद है। मैं सीधे दफ्तर से ही स्टेशन निकल जाऊंगा,” आलोक ने जूते के फीते बांधते हुए कहा।

“और बहू,” मां जी ने रसोई की तरफ मुंह करके बड़े लाड़ से कहा, “वंदना को तेरे हाथ की बनाई मखाने की खीर बहुत पसंद है। ज़रा आज खीर बना लेना। और हां, देख लेना काजू-किशमिश हैं या आलोक बाज़ार से लाता जाए?”

स्वाति ने अंदर से ही एक भारी और बेमन सी आवाज़ दी, “सब है मां जी।” उसके अंदर का कड़वा घूंट और गहरा हो गया था। उसे लग रहा था कि वह इस घर में सिर्फ एक काम करने वाली बनकर रह गई है, जिसकी अपनी कोई भावनाएं नहीं हैं।

पूरा दिन स्वाति ने मशीनी अंदाज़ में काम किया। उसने खीर बनाई, पूरियां तलीं, पनीर की सब्ज़ी बनाई, लेकिन उसके मन में ज़रा भी उत्साह नहीं था। उसका हर कदम भारी था। शाम के पौने छह बजते-बजते दरवाज़े पर घंटी बजी।

दरवाज़ा खुलते ही आरव और मिष्टी दौड़ते हुए अंदर आए और रोहन-पिहू से लिपट गए। घर में अचानक बच्चों की हंसी और किलकारियों का शोर गूंज उठा। पीछे-पीछे आलोक सामान उठाए हुए आया और उसके साथ वंदना अंदर दाखिल हुई। वंदना के चेहरे पर सफर की थकान थी, लेकिन अपने मायके की चौखट पर कदम रखते ही उसकी आंखों में एक अजीब सा सुकून तैर गया। उसने सबसे पहले मां के पैर छुए। कल्याणी देवी ने उसे छाती से लगा लिया और दोनों की आंखों से ममता के आंसू बह निकले।

फिर वंदना मुड़ी और सीधे स्वाति की तरफ बढ़ी। इससे पहले कि स्वाति अपने चेहरे पर कोई औपचारिक मुस्कान ला पाती, वंदना ने आगे बढ़कर स्वाति को कसकर गले से लगा लिया।

“कैसी हो भाभी? सच कहूं, ससुराल में जब भी बहुत अकेलापन या घुटन महसूस होती है, तो बस आपका और भैया का ही ख्याल आता है। मुझे पता है कि मैं बिना बताए, ऐन वक्त पर आ धमकी हूं, आपको बहुत परेशानी हुई होगी ना?” वंदना ने बड़ी आत्मीयता से स्वाति के चेहरे को देखते हुए कहा।

स्वाति ने नज़रें चुराते हुए कहा, “नहीं दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है।”

वंदना ने अपने बैग से एक सुंदर सी रेशमी साड़ी निकाली और स्वाति के हाथों में रख दी। “भाभी, पिछले महीने जब हम बनारस गए थे, तो यह साड़ी देखते ही मुझे आपकी याद आई। इसका रंग बिल्कुल वैसा ही है जैसा आप पसंद करती हैं। मैंने अपने लिए कुछ नहीं लिया, पर आपके लिए यह ज़रूर ले आई।”

तभी आलोक ने एक तरफ रखे सूटकेस की तरफ इशारा करते हुए मज़ाक में कह दिया, “वंदना, तू सही समय पर आ गई, वरना हम तो आज रात ही ऊटी के लिए निकलने वाले थे।”

यह सुनते ही वंदना का चेहरा अचानक फक पड़ गया। उसकी मुस्कान गायब हो गई। उसने कमरे में रखे आधे खुले सूटकेस और बच्चों के चेहरे देखे। उसने आलोक और फिर स्वाति की तरफ देखा।

“क्या? आप लोग बाहर जाने वाले थे?” वंदना की आवाज़ कांप गई। “और मेरी वजह से… हे भगवान! भैया, आपने मुझे फोन पर बताया क्यों नहीं? भाभी, आपने मुझे डांटा क्यों नहीं? मैं कितनी स्वार्थी हूं! मैंने अपनी खुशी में, अपने मायके के हक में यह भी नहीं सोचा कि आप लोगों का अपना कोई कार्यक्रम हो सकता है।”

वंदना की आंखों से पछतावे के आंसू छलक पड़े। वह तुरंत अपने बच्चों से बोली, “आरव, मिष्टी, अपने बैग मत खोलो। हम कल सुबह की ट्रेन से वापस लौट रहे हैं। भैया और भाभी घूमने जा रहे हैं।”

कल्याणी देवी भी यह सुनकर अवाक रह गईं। माहौल में एक भारी सन्नाटा छा गया। वंदना का पश्चाताप और उसकी मासूमियत इतनी सच्ची थी कि स्वाति के सीने में जो बर्फ जमी हुई थी, वह एक ही पल में पिघलने लगी। स्वाति ने देखा कि वंदना कोई स्वार्थी महिला नहीं थी जो उसका हक छीनने आई थी, बल्कि वह तो एक थकी हुई बेटी और बहन थी, जो दुनिया भर की जिम्मेदारियों से कुछ दिन की राहत पाने अपने सबसे सुरक्षित ठिकाने, यानी अपने मायके आई थी। अगर वह वंदना को लौटा देती या मन में यह ज़हर पाले रखती, तो शायद वह ऊटी जाकर भी कभी खुश नहीं रह पाती।

स्वाति ने आगे बढ़कर वंदना का हाथ थाम लिया। उसने वंदना के आंसू पोंछते हुए कहा, “दीदी, यह आप क्या कह रही हैं? कोई अपनी ही बहन को घर से जाने के लिए कहता है क्या? और पहाड़ कहीं भागे तो नहीं जा रहे! ऊटी तो हम फिर कभी चले जाएंगे, लेकिन यह परिवार, यह बच्चे और आपका यह मायका… यह पल बार-बार नहीं आते।”

स्वाति ने मुड़कर आलोक की तरफ देखा और एक सच्ची, दिल से निकली मुस्कान के साथ कहा, “आलोक, आप तुरंत निशांत को फोन कीजिए और कहिए कि बुकिंग अगले महीने या दिवाली की छुट्टियों के लिए टाल दे। और हां, गाड़ी निकालिए, हम सब आज बाहर आइसक्रीम खाने चलेंगे और कल पूरा परिवार मिलकर यहीं पास के वॉटर पार्क और रिसॉर्ट में पिकनिक मनाएगा!”

रोहन, पिहू, आरव और मिष्टी खुशी से उछल पड़े और तालियां बजाने लगे। कल्याणी देवी ने स्वाति के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जीती रह मेरी बहू! तूने आज सिर्फ मेरा घर ही नहीं, मेरा दिल भी जीत लिया। जो औरत अपनों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना सीख जाती है, उसके घर में साक्षात लक्ष्मी का वास होता है।”

उस शाम, जब सब लोग ड्राइंग रूम में बैठकर स्वाति के हाथ की बनी मखाने की खीर खा रहे थे और पुरानी यादों पर ठहाके लगा रहे थे, आलोक ने हौले से स्वाति का हाथ दबाया। उसकी आंखों में स्वाति के लिए जो सम्मान और गहरा प्रेम था, वह ऊटी के किसी भी खूबसूरत नज़ारे से कहीं ज्यादा हसीन था। स्वाति ने महसूस किया कि कभी-कभी किसी योजना का टूट जाना भी ईश्वर का एक खूबसूरत फैसला होता है, क्योंकि त्याग में जो मिठास और तृप्ति है, वह केवल अपनी इच्छाएं पूरी करने में कभी नहीं मिल सकती। घर की दीवारें एक बार फिर हंसी, प्रेम और अटूट रिश्तों की गर्माहट से गूंज रही थीं।

क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों को बचाए रखने और घर में खुशियां बनाए रखने के लिए कभी-कभी अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का त्याग करना सही फैसला होता है? आपकी राय हमारे लिए बहुत मूल्यवान है, कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें!

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

error: Content is protected !!