बरगद की छाँव और महुआ की महक

“लल्ली, मुझे कभी-कभी डर लगता था कि कहीं ये नई पीढ़ी हमारे इन रिश्तों की अहमियत भूल न जाए। पर आज जब मैंने देखा कि तेरी बहू जानकी ने कितनी श्रद्धा से मेरे पैर छुए, हेमंत ने स्टेशन पर मुझे देखते ही कैसे गले लगा लिया… मेरा सारा डर काफूर हो गया। हमारे संस्कार मरे … Read more

गुड़ की डली और सोने की थाली

उस दिन मालती के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। जिस मालती ने बचपन में भाई के हिस्से की रोटी कभी नहीं छीनी थी, आज उसी पर चोरी का इल्जाम था! उसने रो-रोकर अपने भाइयों की तरफ देखा, पर दोनों खामोश रहे। भाभी के पीछे खड़े बड़े भाई ने अपनी नजरें फेर लीं क्योंकि … Read more

परिष्कृत सोच

     निर्मला को चक्कर आ रहे थे, वह निढाल सी कुर्सी पर बैठ गई | तौलिये से पसीना पोछा ,और राकेश से बोली ‘जरा पंखे का बटन दबा दो,घबराहट हो रही है |’ निर्मला की उम्र ६० साल की थी, उसे ब्लड प्रेशर की शिकायत थी, अस्थमा भी था | राकेश ने पंखा चालू किया, और … Read more

स्मृतियों की दरार

तान्या ने आगे बढ़कर उर्मिला देवी के हाथ थाम लिए और बहुत कोमलता से कहा, “मां जी, यह घर आपका था, आपका है और हमेशा आपका ही रहेगा। हम तो बस इस छांव को और मजबूत करना चाहते थे ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसमें सुकून से रह सकें। अगर आपको लगता है कि इस … Read more

सात फेरों का सच

 नैना ने नज़रें चुराते हुए कहा, “नहीं दीदी… समर बहुत अच्छे हैं। वो मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। लेकिन समस्या वो नहीं, उनका परिवार है। मैं शादी के बाद अपनी तरह से जीना चाहती थी। मैं क्यों किसी के खाने-पीने, दवाइयों और तौर-तरीकों के हिसाब से अपनी ज़िंदगी ढालूं? सलोनी का हर वक्त घर में … Read more

धूप की छांव में खिलते रिश्ते

कविता मन ही मन सोचने लगी कि आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी परेशानियों में टूट जाते हैं, अपनों से शिकायतें करने लगते हैं और अकेलेपन का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं यह दोनों बुजुर्ग कितने आत्मविश्वासी और संतुष्ट हैं। वे अपनी ढलती उम्र को किसी लाचारी की तरह नहीं, बल्कि एक सुंदर उत्सव की … Read more

राख से उठी मशाल

 मुझे एक दिन एक अंधेरी हवेली से यह कहकर निकाल दिया गया था कि मैं सड़क पर भीख मांगूंगी। आज मैं इस मंच से सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अगर कोई औरत अपने आत्मसम्मान से समझौता न करने की ठान ले, तो किस्मत भी उसका रास्ता नहीं रोक सकती। मर्यादा किसी खानदान की दीवारों … Read more

पंखों को मिली अपनी ज़मीं

हरिप्रसाद जी की गर्दन शर्म से झुक गई। जिस बेटी को वे बोझ समझकर जल्द से जल्द विदा कर देना चाहते थे, आज वही पूरे समाज में उनका सिर गर्व से ऊँचा कर रही थी। उनकी आँखों में पहली बार अपनी संकीर्ण सोच का पश्चाताप और बेटियों के प्रति सम्मान के आँसू थे। उन्होंने कांपते … Read more

जलन – सुदर्शन सचदेवा

जलन किसी एक रिश्ते की जागीर नहीं होती। वह कभी सहेली बनकर आती है, कभी रिश्तेदार बनकर, कभी पड़ोसी बनकर और कभी-कभी तो अपने ही मन में चुपचाप बैठ जाती है। सीमा और रमा बचपन की सहेलियाँ थीं। दोनों ने साथ पढ़ाई की, साथ कॉलेज गईं और शादी के बाद भी एक-दूसरे के सुख-दुःख में … Read more

दहलीज के इस पार

 उस दिन भी जब ड्राइंग रूम में ननदों की विदाई की बातें हो रही थीं, सौम्या चुपचाप अपने कमरे में आई और अलमारी के सामने खड़ी हो गई। उसने दोनों ननदों के लिए बहुत सुंदर और कीमती साड़ियां खरीदकर रखी थीं। उसने सोचा था कि इस बार जब वे जाएंगी, तो वह खुद अपने हाथों … Read more

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