माँ की पुरानी साड़ी – विकास श्रीवास्तव

गाँव के एक छोटे से घर में रामलाल, उनकी पत्नी सरला और उनका बेटा मोहित रहते थे। रामलाल एक साधारण किसान थे। दिन-रात मेहनत करके परिवार का पालन-पोषण करते थे। घर में पैसे कम थे, लेकिन प्यार और अपनापन बहुत था।

सरला के पास एक पुरानी नीली साड़ी थी। वही साड़ी उन्होंने अपनी शादी में पहनी थी। समय के साथ साड़ी पुरानी हो गई थी, जगह-जगह से घिस चुकी थी, लेकिन सरला उसे बड़े जतन से संभालकर रखती थीं। मोहित कई बार पूछता, “माँ, आप इस पुरानी साड़ी को क्यों संभालकर रखती हैं?”

सरला मुस्कुराकर कहतीं, “बेटा, कुछ चीज़ों की कीमत पैसों से नहीं, यादों से होती है।”

समय बीतता गया। मोहित पढ़ाई में बहुत होशियार था। रामलाल चाहते थे कि उनका बेटा खूब पढ़े और बड़ा आदमी बने। लेकिन खेती से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि उसकी पढ़ाई का खर्च आसानी से उठाया जा सके।

एक दिन स्कूल से सूचना आई कि मोहित की वार्षिक फीस तीन दिन के भीतर जमा करनी होगी। रामलाल ने बहुत कोशिश की, लेकिन कहीं से पैसे नहीं जुटा पाए। शाम को वे चुपचाप आँगन में बैठ गए। उनकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

सरला ने बिना कुछ पूछे अपनी अलमारी खोली। उसमें से वही पुरानी नीली साड़ी निकाली। साड़ी के पल्लू में एक छोटी-सी गाँठ बंधी हुई थी। उन्होंने धीरे-धीरे गाँठ खोली। उसमें कुछ पुराने नोट और सिक्के थे।

रामलाल हैरान रह गए। “ये पैसे कहाँ से आए?”

सरला बोलीं, “मैंने पिछले कई वर्षों से घर के खर्च में से थोड़ा-थोड़ा बचाकर रखे थे। सोचा था, बुढ़ापे में काम आएँगे। लेकिन हमारे लिए सबसे बड़ा सहारा तो हमारा बेटा है। उसकी पढ़ाई से बढ़कर कुछ नहीं।”

उन पैसों से फीस तो जमा हो गई, लेकिन सरला की आँखों में एक अजीब-सी चमक थी—एक माँ की संतुष्टि की चमक।

वर्षों बाद मोहित इंजीनियर बन गया। उसे शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। पहली तनख्वाह मिलने पर वह ढेर सारे उपहार लेकर गाँव पहुँचा। पिता के लिए नई घड़ी, माँ के लिए सुंदर रेशमी साड़ी और घर के लिए बहुत-सा सामान।

मोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, अब उस पुरानी साड़ी को फेंक दीजिए। अब इसकी क्या ज़रूरत?”

सरला ने साड़ी को सीने से लगाते हुए कहा, “बेटा, यह सिर्फ साड़ी नहीं है। इसमें तुम्हारे बचपन की खुशबू है, तुम्हारे पिता का संघर्ष है और एक माँ के सपनों की गर्माहट है।”

मोहित उस समय बात को पूरी तरह नहीं समझ पाया।

कुछ वर्षों बाद रामलाल इस दुनिया से चले गए। घर पहले जैसा कभी नहीं रहा। सरला अक्सर उसी पुरानी साड़ी को अपने पास रखकर बैठ जातीं, जैसे उसमें अपने पूरे जीवन की यादें समेटे हों।

एक दिन सरला भी गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। उन्होंने मोहित को अपने पास बुलाया और धीमी आवाज़ में कहा, “बेटा, मेरे जाने के बाद उस पुरानी साड़ी को कभी मत फेंकना। जब भी जीवन में मुश्किल आए, उसे अपने सीने से लगा लेना। तुम्हें लगेगा कि तुम्हारी माँ तुम्हारे साथ है।”

कुछ दिनों बाद सरला भी हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं।

माँ के जाने के बाद घर का हर कोना सूना हो गया। मोहित ने पहली बार महसूस किया कि बड़ा घर, अच्छी नौकरी और ढेर सारे पैसे भी माँ की गोद की जगह नहीं ले सकते।

एक दिन वह अलमारी साफ कर रहा था। उसे वही पुरानी नीली साड़ी मिली। उसने उसे सीने से लगाया तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। तभी साड़ी के पल्लू में एक और छोटी-सी गाँठ दिखाई दी।

जब उसने गाँठ खोली तो उसमें एक मुड़ा हुआ कागज़ था। काँपते हाथों से उसने उसे खोला। उस पर माँ की लिखावट थी—

“बेटा, अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूँ। याद रखना, माँ-बाप कभी अपने बच्चों के लिए बोझ नहीं होते। जिस दिन तुम्हें लगे कि जीवन बहुत कठिन हो गया है, उस दिन यह सोच लेना कि तुम्हारे लिए किसी ने अपनी हर खुशी हँसते-हँसते कुर्बान कर दी थी। बस इतना करना कि अपने बच्चों को वही प्यार देना, जो हमने तुम्हें दिया। यही हमारी सबसे बड़ी विरासत होगी।”

पत्र पढ़ते-पढ़ते मोहित फूट-फूटकर रो पड़ा। उसे याद आया कि कैसे माँ ने अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ छोड़कर उसकी हर ज़रूरत पूरी की थी। उसे यह भी याद आया कि उसने कितनी बार माँ से कहा था कि पुरानी चीज़ों का क्या करना।

उस दिन मोहित ने उस साड़ी को बड़े सम्मान से एक साफ कपड़े में लपेटकर अपनी अलमारी में रख दिया। अब वह साड़ी उसके लिए कोई पुराना कपड़ा नहीं थी, बल्कि माँ के त्याग, पिता के संघर्ष और परिवार के प्रेम की सबसे अनमोल निशानी थी।

कहते हैं, दुनिया की सबसे अमीर विरासत सोना-चाँदी नहीं होती, बल्कि माता-पिता का निस्वार्थ प्रेम होता है। जिस घर में उस प्रेम की कद्र होती है, वहाँ खुशियाँ कभी कम नहीं पड़तीं। और जिस दिन यह बात समझ में आती है, उस दिन अक्सर आँखों में आँसू भी होते हैं और दिल में माता-पिता के लिए असीम सम्मान भी।

विकास श्रीवास्तव

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