निहारिका के माता-पिता कमरे में आए। पिताजी के चेहरे पर एक ऐसी राहत और खुशी थी, जो निहारिका ने बहुत समय बाद देखी थी। उन्होंने निहारिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारे लिए एक बहुत ही होनहार लड़के का रिश्ता आया है। नाम सुमेध है। एक बड़ी आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। परिवार बहुत सुलझा हुआ और संस्कारी है।”
निहारिका के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी। बाहर से तो उसने अपनी भावनाएं छिपा लीं, लेकिन अंदर ही अंदर एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। बात सुमेध के बुरे होने की नहीं थी, बात यह थी कि निहारिका के दिलो-दिमाग पर कोई और कब्ज़ा जमाए बैठा था।
अपनी कॉलेज की सबसे अच्छी दोस्त श्रुति के बड़े भाई के शादी समारोह में उसने कबीर को देखा था। कबीर, जो श्रुति के चचेरे भाई का दोस्त था। छह फुट का कद, गज़ब का आत्मविश्वास, और हर किसी को अपनी बातों से मोह लेने वाला अंदाज़।
उस शादी के तीन दिनों में कबीर की नज़रें भी कई बार निहारिका से टकराई थीं। उन नज़रों में ऐसा जादू था कि निहारिका मन ही मन उसे अपना सब कुछ मान बैठी थी। श्रुति भी अक्सर मज़ाक में कहती थी, “देख लेना, एक दिन कबीर जीजाजी बनकर ही मानेंगे।”
इन हसीन ख्यालों और सपनों के बीच अचानक सुमेध के रिश्ते का आना निहारिका को बेचैन कर रहा था। लेकिन मध्यवर्गीय परिवार की लड़की होने के नाते, और अपने माता-पिता के आंसुओं और उम्मीदों के आगे वो कोई विरोध नहीं कर पाई। कबीर से उसका कोई सीधा संपर्क नहीं था, और ना ही कोई पक्का वादा। बस एक मौन आकर्षण था, जिसे वो सच्चा प्यार समझ बैठी थी।
अगले रविवार सुमेध और उसका परिवार निहारिका को देखने आए। निहारिका को जब ड्राइंग रूम में बुलाया गया, तो उसने तिरछी नज़रों से सुमेध को देखा। सुमेध बहुत ही सादे मिज़ाज का, चश्मे वाला, शांत स्वभाव का लड़का था। ना कोई ख़ास चमक, ना ही बातों में कबीर जैसी वह जादूगरी। वो एक बेहद आम इंसान लग रहा था।
निहारिका, जो खुद को किसी अप्सरा से कम नहीं समझती थी, उसे लगा कि उसके साथ यह बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है। ‘कहां मेरी जैसी खूबसूरत लड़की और कहां यह बिल्कुल साधारण सा लड़का,’ उसने मन ही मन सोचा।
दोनों को कुछ देर छत पर अकेले बात करने के लिए भेजा गया। सुमेध बहुत ही संकोच के साथ अपनी नौकरी और अपनी पसंद-नापसंद के बारे में बता रहा था। निहारिका बस ‘हां’ और ‘हूं’ में जवाब देती रही। सुमेध उसकी खामोशी को शर्म समझता रहा, जबकि निहारिका बस यही सोच रही थी कि कैसे यह मुलाकात जल्दी खत्म हो।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। सुमेध के परिवार ने बिना किसी दहेज की मांग के रिश्ते के लिए हां कर दी। निहारिका के माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं था। देखते ही देखते शादी की तारीख भी तय हो गई और निहारिका सुमेध की जीवनसंगिनी बनकर उसके घर आ गई।
शादी के बाद सुमेध और निहारिका पुणे शिफ्ट हो गए, जहां सुमेध का ऑफिस था। सुमेध ने एक बहुत ही खूबसूरत अपार्टमेंट किराए पर लिया था, जिसे उसने निहारिका की पसंद के हिसाब से सजाया था। घर में हर तरह की सुख-सुविधा थी। एक कामवाली बाई सारा काम कर देती थी, निहारिका को बस आराम करना होता था। सुमेध हर वीकेंड निहारिका को नई जगहों पर घुमाने ले जाता, उसकी हर छोटी-बड़ी पसंद का ख्याल रखता।
पर निहारिका की हालत उस पंछी की तरह थी, जिसे सोने का पिंजरा तो मिल गया था, लेकिन वह अभी भी अपनी पुरानी उड़ान के सपने देख रही थी। वह सुमेध के साथ खुश रहने का दिखावा तो करती, लेकिन अंदर ही अंदर वह अभी भी कबीर के उस आकर्षक चेहरे और अंदाज़ से सुमेध की तुलना करती रहती।
कभी सुमेध के सादे कपड़ों पर चिढ़ जाती, तो कभी उसकी शांत प्रकृति को बोरिंग समझ बैठती। सुमेध उसकी हर चिड़चिड़ाहट, हर नखरे को यह सोचकर हंस कर टाल देता कि शायद नया शहर और नया माहौल होने के कारण निहारिका एडजस्ट नहीं कर पा रही है।
सुमेध की यही अच्छाई निहारिका को कभी-कभी आत्मग्लानि से भर देती, लेकिन फिर भी वो अपने मन के किसी कोने में दबे उस ‘आदर्श पुरुष’ की छवि को मिटा नहीं पा रही थी।
वक्त अपनी रफ्तार से गुज़रता रहा। पांच सालों में बहुत कुछ बदल गया। निहारिका अब एक प्यारी सी बेटी, मायरा की मां बन चुकी थी। मां बनने के बाद ज़िम्मेदारियां बढ़ गई थीं। इन सालों में निहारिका ने सुमेध का एक और रूप देखा—एक बेहतरीन पिता का रूप।
रात को जब बच्ची रोती, तो सुमेध बिना कुछ कहे उठकर उसे संभालता ताकि निहारिका सो सके। जब निहारिका बीमार होती,
तो वह ऑफिस से छुट्टी लेकर पूरे घर और बच्ची दोनों की ज़िम्मेदारी अकेले उठा लेता। निहारिका धीरे-धीरे यह महसूस करने लगी थी कि सुमेध भले ही दिखने में किसी फिल्मी हीरो जैसा ना हो, लेकिन इंसान के रूप में वह किसी फरिश्ते से कम नहीं है।
इसी बीच निहारिका के घर से बुलावा आया। उसकी छोटी बहन की शादी तय हो गई थी। शादी की तैयारियों के लिए मां ने निहारिका को एक महीने पहले ही बुला लिया था। सुमेध ने सहर्ष उसे जाने की अनुमति दे दी और कहा, “तुम मायरा को लेकर जाओ और आराम से शादी का सारा काम संभालो। मैं बस शादी वाले दिन ही आ पाऊंगा क्योंकि ऑफिस में एक ज़रूरी प्रोजेक्ट चल रहा है।”
निहारिका मायके पहुंची तो घर में जश्न का माहौल था। शादी की शॉपिंग, रिश्तेदारों का आना-जाना, सब बहुत मज़ेदार लग रहा था। सुमेध ने निहारिका के अकाउंट में अच्छे खासे पैसे ट्रांसफर कर दिए थे ताकि वो अपनी बहन और पूरे परिवार के लिए अपनी पसंद के शानदार तोहफे खरीद सके। एक दोपहर, जब घर की सभी औरतें बैठी बातें कर रही थीं, तब निहारिका की मां ने बताया कि उसकी पुरानी दोस्त श्रुति भी इसी शहर में वापस आ गई है।
श्रुति का नाम सुनते ही निहारिका के मन में एक अजीब सी हलचल हुई। श्रुति का खयाल आते ही बरसों पुरानी कबीर की वह छवि उसकी आंखों के सामने तैर गई। एक तरफ वो कबीर को देखने की उस दबी हुई इच्छा को नज़रअंदाज़ करना चाहती थी, तो दूसरी तरफ उसका मन एक बार उस अतीत से रूबरू होने को बेचैन हो उठा। उसने श्रुति का नंबर निकालकर उसे फोन किया और अगले दिन उससे मिलने का वादा कर लिया।
अगले दिन सुबह, निहारिका ने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहने। न जाने क्यों, उसके मन में आज भी वही पुरानी होड़ चल रही थी। वह श्रुति के घर पहुंची। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। जैसे ही निहारिका ने अंदर कदम रखा, उसे कुछ ऐसा दिखा जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
घर के हॉल में कबीर खड़ा था। लेकिन यह वो कबीर नहीं था जिसे निहारिका ने सपनों में सजाया था। उसके चेहरे का नूर गायब था, आंखों में एक अजीब सा अहंकार और गुस्सा भरा था। वह अपनी पत्नी पर बुरी तरह चिल्ला रहा था, और गालियां दे रहा था। बात सिर्फ इतनी सी थी कि पत्नी ने उसकी शर्ट पर ठीक से प्रेस नहीं की थी। जब श्रुति के माता-पिता ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो कबीर ने अपने ही बूढ़े माता-पिता के साथ इतनी बदसलूकी से बात की और सामान उठाकर ज़मीन पर पटक दिया, कि निहारिका सन्न रह गई।
उसी दौरान कबीर की नज़र दरवाज़े पर खड़ी निहारिका पर पड़ी। अपनी इस शर्मनाक हरकत पर लज्जित होने के बजाय, उसने निहारिका को ऊपर से नीचे तक एक बहुत ही भद्दी और अजीब सी नज़र से देखा। उस नज़र में इतनी गंदी सोच और बेशर्मी थी कि निहारिका को उल्टी सी महसूस होने लगी।
वह बिना कुछ कहे, उल्टे पांव वहां से भाग खड़ी हुई। रास्ते भर उसकी आंखों से आंसू बहते रहे। यह आंसू किसी दुख के नहीं थे, बल्कि अपनी बेवकूफी पर पछतावे के थे। वह कितनी नादान थी! जिस बाहरी आकर्षण को वो प्यार समझ बैठी थी, उसके पीछे एक इतना घटिया, संवेदनहीन और घमंडी इंसान छिपा था। उसे उस कबीर के लिए अफसोस हो रहा था, और खुद पर शर्म आ रही थी कि उसने उस छलावे के लिए अपने उस पति को कभी पूरे दिल से स्वीकार नहीं किया, जो उसे पलकों पर बिठाकर रखता था।
घर पहुंचते ही निहारिका ने सबसे पहले अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और रोते हुए सुमेध को फोन लगाया।
“सुमेध,” निहारिका की आवाज़ कांप रही थी।
“क्या हुआ निहारिका? तुम रो क्यों रही हो? मायरा ठीक है ना? घर पर सब ठीक है?” सुमेध की आवाज़ में एक पल में ही दुनिया भर की चिंता झलकने लगी।
निहारिका सिसकते हुए बोली, “सब ठीक है सुमेध… बस, मुझे आपकी बहुत याद आ रही है। आप जल्दी आ जाइए… मुझे आपके बिना अब एक पल भी अच्छा नहीं लग रहा।”
सुमेध कुछ समझ नहीं पाया, पर उसने प्यार से उसे चुप कराया और कहा, “पगली, मैं भी तो तुम्हें बहुत मिस कर रहा हूं। बस कुछ दिन और, फिर मैं तुम्हारे पास होऊंगा।”
फोन रखने के बाद निहारिका आईने के सामने खड़ी हुई। आज उसे अपनी बाहरी खूबसूरती पर कोई गुमान नहीं था। उसे एहसास हो चुका था कि असली खूबसूरती इंसान के चेहरे में नहीं, उसके चरित्र में होती है। सुमेध का शांत स्वभाव, उसका सम्मान देना, उसकी परवाह करना—यही असल सुंदरता थी, जिसे निहारिका अब तक नज़रअंदाज़ करती आ रही थी। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया, जिसने उसे एक गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया और एक ऐसा जीवनसाथी दिया जो वास्तव में एक सच्चा और बेहतरीन इंसान था।
उस दिन के बाद से निहारिका की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उसने अपने अतीत की सभी बेड़ियों को तोड़ दिया और अपने पति सुमेध को वो प्यार और सम्मान दिया, जिसका वो हमेशा से हकदार था। अब उनके घर में सिर्फ सुख-सुविधाएं ही नहीं थीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए अथाह प्रेम और सुकून भी था।
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लेखिका : रमा शुक्ला