लंदन के एक प्रतिष्ठित अस्पताल से कार्डियोलॉजी में अपनी मास्टर्स की डिग्री और गोल्ड मेडल हासिल करने के बाद, जब डॉक्टर सुशांत पूरे छह साल बाद भारत लौट रहे थे, तो उनके घर में किसी बड़े त्योहार जैसा माहौल था। सुशांत की माँ, कावेरी देवी की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी। हो भी क्यों न, उनका इकलोटा बेटा अब शहर का सबसे बड़ा हार्ट स्पेशलिस्ट बनकर जो लौट रहा था। पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटी जा रही थीं, घर को फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया गया था। रिश्तेदारों का तांता लगा हुआ था और हर कोई बस सुशांत की एक झलक पाने को बेताब था। कावेरी देवी ने तो अपने बेटे की इस अपार सफलता के लिए शहर के सबसे बड़े और प्राचीन मंदिर में एक विशेष अनुष्ठान और छप्पन भोग का संकल्प भी ले रखा था। उनके लिए यह सिर्फ एक पूजा नहीं थी, बल्कि समाज और रिश्तेदारों के सामने अपनी हैसियत और अपने बेटे की कामयाबी का प्रदर्शन करने का एक मौका भी था।
अगली सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ ही कावेरी देवी ने अपनी सबसे महंगी बनारसी साड़ी पहनी और पूजा की एक बड़ी सी थाली सजा ली। उस थाली में मेवे, फल, मिठाई और भगवान को चढ़ाने के लिए एक सोने का छत्र रखा हुआ था। उन्होंने सुशांत के कमरे का दरवाजा खटखटाया और उत्साह से बोलीं, “सुशांत बेटा! जल्दी से तैयार हो जा। आज हमें शहर के सबसे बड़े मंदिर जाना है। मैंने तेरी कामयाबी के लिए वहां विशेष पूजा रखवाई है। भगवान के आशीर्वाद से ही तो तू आज इतने बड़े मुकाम पर पहुँचा है। चल, सबसे पहले उनका आशीर्वाद ले आएं, उसके बाद ही घर में कोई और काम होगा।”
सुशांत, जो पहले से ही नहा-धोकर सफेद कुर्ते-पायजामे में तैयार खड़ा था, मुस्कुराया और अपनी माँ के पास आकर उनके पैर छुए। फिर उसने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “हाँ माँ, बिल्कुल चलेंगे। भगवान का आशीर्वाद तो सबसे ज्यादा जरूरी है। लेकिन माँ, मैं उस मंदिर में जाने से पहले अपने एक और मंदिर जाना चाहता हूँ। मैं सबसे पहले अपने उस ‘तीर्थ’ का आशीर्वाद लेना चाहता हूँ, जिसके बिना मेरा इस मुकाम तक पहुँचना तो दूर, मेरा वजूद ही मिट गया होता।”
कावेरी देवी के चेहरे पर एक पल के लिए उलझन के भाव उभर आए। उन्होंने अपनी सजी हुई पूजा की थाली को मेज पर रखते हुए आश्चर्य से पूछा, “तेरा मंदिर? बेटा, क्या तेरा भगवान और मेरा भगवान अलग-अलग है? इस शहर के सबसे बड़े मंदिर से बढ़कर भला और कौन सा तीर्थ हो सकता है? खैर, तू इतने सालों बाद विदेश से लौटा है, तेरा जहाँ मन हो वहाँ चलेंगे। बता, कौन से मंदिर जाना है तुझे? कोई नया भव्य मंदिर बना है क्या शहर के बाहर? मैं भी तेरे साथ उसी मंदिर में चलती हूँ।”
सुशांत ने बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ हामी भरी। माँ-बेटे दोनों अपनी आलीशान कार में बैठे और निकल पड़े। कावेरी देवी को लग रहा था कि शायद शहर के बाहरी इलाके में बने किसी नए, विशाल और चमचमाते मंदिर में उनका बेटा उन्हें ले जा रहा है। कार शहर की चौड़ी और साफ-सुथरी सड़कों पर दौड़ रही थी। लेकिन कुछ ही देर बाद, सुशांत ने ड्राइवर को एक ऐसी दिशा में मोड़ लेने को कहा जो शहर के सबसे पिछड़े और पुराने मोहल्ले की तरफ जाती थी। चौड़ी सड़कें अब संकरी, धूल भरी और ऊबड़-खाबड़ गलियों में तब्दील हो चुकी थीं। आस-पास कच्चे मकान, बहती हुई नालियां और बेतरतीब भीड़ थी।
कावेरी देवी असहज हो उठीं। उन्होंने अपनी नाक पर साड़ी का पल्लू रखते हुए पूछा, “सुशांत! यह हम कहाँ आ गए? यहाँ इतनी गंदगी और बदबू है। मुझे तो दूर-दूर तक कोई मंदिर का शिखर दिखाई नहीं दे रहा। तू रास्ता तो नहीं भूल गया बेटा?”
सुशांत ने बहुत ही इत्मीनान से जवाब दिया, “नहीं माँ, मैं रास्ता नहीं भूला हूँ। बल्कि यही वो रास्ता है जिसने मुझे मेरी असल मंजिल तक पहुँचाया है। बस हम पहुँचने ही वाले हैं।”
थोड़ी दूर और चलने के बाद कार एक बहुत ही पुराने, जर्जर और खपरैल वाले मकान के सामने जाकर रुक गई। उस मकान की दीवारें जगह-जगह से दरक चुकी थीं, रंग-रोगन उखड़ चुका था और सामने एक जंग लगा हुआ लोहे का छोटा सा गेट था। मकान के बाहर एक पुरानी सी तख्ती लटकी थी जिस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था- ‘मास्टर रमाकांत विद्यामन्दिर’।
सुशांत ने कार का दरवाज़ा खोला और नीचे उतर गया। कावेरी देवी ने चकित होकर, फटी-फटी आँखों से उस खंडहर नुमा मकान को देखा। वह कार से बाहर निकलीं और झल्लाते हुए बोलीं, “सुशांत! क्या पागलपन है यह? यह कौन सी जगह है? तू मुझे यहाँ इस झोपड़पट्टी में क्यों ले आया है? कहाँ है तेरा वो मंदिर जिसके बारे में तू बात कर रहा था? यहाँ तो मुझे सिर्फ गरीबी और लाचारी दिख रही है।”
सुशांत ने अपनी माँ की आँखों में झांकते हुए बहुत ही भावुक स्वर में कहा, “माँ, जब पिता जी का देहांत हुआ था, तब मैं सिर्फ बारह साल का था। आपको याद है हमारे रिश्तेदारों ने हमारा कैसा साथ छोड़ दिया था? घर में दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए थे और मेरी पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई थी। आपने लोगों के घरों में काम करके मुझे पालने की सोची थी। उस वक्त मैं स्कूल छोड़कर एक चाय की दुकान पर बर्तन धोने जाने वाला था। तब यही वो इंसान थे, यही वो देवता थे, जिन्होंने मेरा हाथ थामा था।”
सुशांत की आँखें नम हो गई थीं, वह आगे बोला, “रमाकांत सर सिर्फ मेरे गणित के शिक्षक नहीं थे, वो मेरे भगवान बनकर आए थे। जब उन्हें पता चला कि मैं स्कूल छोड़ रहा हूँ, तो वो खुद चलकर हमारे घर आए थे। आपको याद है माँ? उन्होंने मेरी पूरी स्कूल की फीस अपनी मामूली सी तनख्वाह से भरी थी। और सिर्फ स्कूल ही नहीं, जब मेरा मेडिकल कॉलेज में सिलेक्शन हुआ था और हमारे पास एडमिशन के लिए पैसे नहीं थे, तब रमाकांत सर ने अपनी पत्नी के आखिरी गहने गिरवी रखकर मेरी फीस जमा की थी। उन्होंने अपने लिए कभी एक नया कोट नहीं सिलाया, ताकि वो मेरे लिए मेडिकल की महंगी किताबें खरीद सकें। माँ, पत्थरों के मंदिर में तो हम तब जाते हैं जब हमारे पास सब कुछ होता है, लेकिन जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब मेरे लिए हर दुआ इसी चौखट से कुबूल हुई थी। इसलिए मेरे जीवन के इस नए अध्याय की शुरुआत, इस असली तीर्थ के दर्शन के बिना अधूरी है।”
कावेरी देवी सन्न रह गईं। उनके दिमाग में सालों पुरानी वो यादें किसी फिल्म की तरह चलने लगीं जिन्हें वह बेटे की कामयाबी के शोर में कहीं बहुत पीछे छोड़ आई थीं। उन्हें याद आया कि कैसे मास्टर रमाकांत कड़कड़ाती ठंड में अपनी पुरानी साइकिल पर आकर सुशांत को मुफ्त में ट्यूशन पढ़ाया करते थे। कैसे उस बूढ़े इंसान ने अपनी जरूरतों को मारकर उनके बेटे का भविष्य संवारा था।
सुशांत ने वो जंग लगा हुआ गेट खोला और अंदर दाखिल हुआ। आंगन में एक टूटी हुई चारपाई पर एक बेहद बुजुर्ग और कमजोर इंसान लेटा हुआ था। आँखों पर मोटा चश्मा, चेहरे पर अनगिनत झुर्रियां और शरीर जैसे सिर्फ हड्डियों का ढांचा भर रह गया था। वह रमाकांत सर थे।
सुशांत धीरे से उनके पास गया और अपने घुटनों के बल जमीन पर बैठ गया। उसने उस बूढ़े शिक्षक के दोनों पैरों को अपने हाथों में लिया और अपना माथा उनके धूल भरे पैरों पर रख दिया।
रमाकांत सर ने अपनी कमजोर आँखों को सिकोड़ते हुए देखने की कोशिश की, “कौन है भाई?”
सुशांत की आँखों से आंसू बहने लगे, “सर, मैं आपका सुशांत। आपका बेटा… लंदन से लौट आया हूँ सर। डॉक्टर बन गया हूँ।”
यह सुनते ही मास्टर रमाकांत के चेहरे पर जो चमक उठी, वो किसी भी करोड़पति के चेहरे के नूर से ज्यादा कीमती थी। उन्होंने कांपते हाथों से सुशांत का माथा चूमा और उसे गले लगा लिया। उनके आंसू सुशांत के सफेद कुर्ते पर गिर रहे थे। “जीते रहो मेरे लाल! मुझे पता था मेरा सुशांत एक दिन आसमान जरूर छुएगा। आज मेरी जिंदगी की सारी तपस्या सफल हो गई।”
बाहर खड़ी कावेरी देवी यह सब देख रही थीं। उनके हाथ में मौजूद सोने का छत्र और पूजा की थाली उन्हें अचानक बहुत छोटी और अर्थहीन लगने लगी। उनका अहंकार, उनकी हैसियत का गुरूर सब कुछ उन आंसुओं में बह गया। वे धीरे-धीरे चलकर अंदर आईं और बिना एक पल गँवाए, उस बूढ़े, फटेहाल शिक्षक के चरणों में झुक गईं।
रमाकांत सर घबरा गए, “अरे बहन जी, यह आप क्या कर रही हैं?”
कावेरी देवी रोते हुए बोलीं, “मास्टर जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं धन और सफलता के नशे में अंधी हो गई थी। मैं अपने बेटे की कामयाबी का शुक्रिया उस भगवान को अदा करने जा रही थी जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं, और उस भगवान को भूल गई थी जिसने मेरे बेटे को इंसान से देवता बना दिया। आपने अपना सर्वस्व लुटाकर मेरे बेटे को जीवन दान दिया है। आज मुझे समझ आ गया कि दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर, सबसे बड़ा तीर्थ यही चौखट है जहाँ निःस्वार्थ भाव से किसी का जीवन संवारा जाता है।”
सुशांत ने अपनी माँ को उठाया और गले लगा लिया। उस दिन कावेरी देवी ने पूजा की वो पूरी थाली, वो मेवे और वो सोने का छत्र मंदिर की दान पेटी की बजाय मास्टर रमाकांत के चरणों में समर्पित कर दिया। उन्हें एहसास हो गया था कि सच्ची प्रार्थना और सच्ची पूजा किसी भव्य इमारत में नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रति कृतज्ञता में बसती है, जिन्होंने हमारे अंधेरों में अपने हिस्से का दीपक जलाया हो। सुशांत ने न सिर्फ अपने गुरु का जीवन भर का खर्च उठाने की कसम खाई, बल्कि उसी मोहल्ले में मास्टर रमाकांत के नाम से एक मुफ्त डिस्पेंसरी खोलने का भी ऐलान किया, ताकि कोई भी गरीब बच्चा बीमारी के कारण अपने सपनों से महरूम न रह जाए।
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लेखिका : गरिमा चौधरी