“चुप कर मुर्ख!” दीदी ने माधव की बात बीच में ही काट दी। उन्होंने अपने पल्लू की गांठ खोली और उसमें से एक छोटी सी कपड़े की पोटली निकाली। वो पोटली उन्होंने माधव के हाथों में रख दी। “इसमें मेरी कुछ एफडी (Fixed Deposit) के कागज़ात हैं और मेरे कुछ पुराने गहने हैं जो मैंने इसी दिन के लिए सहेज कर रखे थे। कल सुबह जाकर इन्हें बैंक से निकाल लेना। और खबरदार जो एक भी शब्द कहा।”
माधव के हाथ कांपने लगे। “नहीं दीदी, ये आपकी उम्र भर की जमा पूंजी है। आपके बुढ़ापे का सहारा है, मैं इसे कैसे ले सकता हूँ? ये मैं नहीं…”
रात के दो बज चुके थे। दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी की ‘टिक-टिक’ के अलावा पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। माधव की आँखों से नींद ऐसे गायब हो गई थी जैसे किसी ने उसे चुरा लिया हो। वह करवटें बदल-बदल कर थक चुका था, इसलिए अब बस सीधा लेटा हुआ छत के उस पंखे को घूर रहा था जो अपनी ही लय में घूम रहा था। माधव के दिमाग में भी विचारों का एक पंखा इसी तेजी से घूम रहा था, लेकिन वह उसे ठंडक देने के बजाय अंदर ही अंदर झुलसा रहा था।
जब हम छोटे होते हैं, तो दुनिया बहुत सरल लगती है। माधव को अपना वो बचपन याद आने लगा। एक छोटा सा आंगन, मिट्टी की खुशबू और रसोई से आती हुई गर्म रोटियों की महक। उसकी माँ, जिन्हें सब ‘अम्मा’ कहते थे, पूरे घर की धुरी थीं। अम्मा स्वभाव से बहुत कड़क थीं, लेकिन उनका दिल मक्खन से भी ज्यादा नरम था। बचपन में जब भी माधव या उसकी बड़ी बहन कमला कोई भी शैतानी करते, मिट्टी में कपड़े सान कर आते या आपस में लड़ते, तो अम्मा रसोई से अपना लोहे का चिमटा हवा में लहराते हुए बाहर आतीं और ज़ोर से चिल्लातीं, “रुक जाओ दोनों के दोनों शैतान, अभी इसी चिमटे से तुम दोनों की आरती उतारती हूँ!”
अम्मा का वो ‘चिमटे से आरती उतारना’ कभी हकीकत में नहीं बदला। वो बस उनका एक तकिया कलाम था, एक ऐसा खौफ जो बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए काफी था। अम्मा कभी किसी पर हाथ नहीं उठाती थीं, लेकिन उनका वो वाक्य सुनकर माधव और कमला तुरंत शांत हो जाते थे। आज इतने सालों बाद, जब अम्मा इस दुनिया में नहीं हैं, तो माधव को समझ में आता है कि वो डराने वाला वाक्य दरअसल उनका प्यार था, उनकी फिक्र थी। समय का पहिया अपनी निर्बाध गति से घूमता रहा। अम्मा चली गईं, बाबूजी चले गए, कमला दीदी की शादी हो गई और वो अपने ससुराल चली गईं। और माधव? माधव शहर की एक तंग गली में एक छोटी सी सिलाई की दुकान चलाने लगा।
‘माधव टेलर्स’ नाम की उस छोटी सी दुकान में कपड़ों की कतरनों के बीच माधव ने अपनी पूरी जवानी निकाल दी। सिलाई मशीन के पैडल पर चलते उसके पैरों ने उसके परिवार की गाड़ी को कभी रुकने नहीं दिया। उसकी पत्नी सुमित्रा और उसकी इकलौती बेटी नंदिनी, यही माधव की पूरी दुनिया थी। नंदिनी अब बड़ी हो गई थी। देखते ही देखते वो फ्रॉक पहनने वाली बच्ची कब सूट और साड़ियों में इतनी सयानी लगने लगी, माधव को पता ही नहीं चला। और फिर वो दिन भी आ गया जिसका हर पिता को इंतज़ार भी होता है और डर भी। नंदिनी का रिश्ता तय हो गया था। अगले ही महीने उसकी शादी थी। लड़का अच्छा था, परिवार शरीफ था और उन्होंने किसी तरह के दहेज की कोई मांग नहीं की थी। लेकिन एक बाप होने के नाते, अपनी बेटी को इज्जत के साथ विदा करना, बारातियों का स्वागत करना, टेंट, खाना, ज़ेवर और कपड़े—इन सबका खर्च तो माधव को ही उठाना था।
माधव ने जीवन भर पाई-पाई जोड़कर जो थोड़ी बहुत बचत की थी, वो शादी के शुरुआती इंतज़ामों में ही खत्म हो गई। जैसे-जैसे शादी की तारीख करीब आ रही थी, खर्चों का पहाड़ बढ़ता जा रहा था। अपनी उस छोटी सी सिलाई की दुकान की आमदनी से उसने घर तो चला लिया था, लेकिन शादी जैसा बड़ा आयोजन उसके लिए किसी चक्रव्यूह से कम नहीं था। माधव ने अपने कुछ रिश्तेदारों और जानकारों से उधार मांगने की कोशिश की, लेकिन किसी ने मीठी बातों से टाल दिया तो किसी ने अपनी मजबूरी बता दी। बैंक से लोन लेना उसके बस की बात नहीं थी क्योंकि उसके पास गिरवी रखने के लिए कुछ था ही नहीं।
अब रातों की नींद उड़ना लाज़मी था। माधव हर रात एक पुरानी डायरी लेकर बैठता, उसमें खर्चों का हिसाब लगाता और हर बार टोटल करने पर जो रकम कम पड़ती, वो उसके माथे की लकीरों को और गहरा कर देती। वह अंदर ही अंदर घुटने लगा था। सुमित्रा को भी महसूस होने लगा था कि माधव तनाव में है। उसका खाना-पीना कम हो गया था, वो दुकान से देर से लौटता और अक्सर खामोश रहता। लेकिन जब भी सुमित्रा पूछती, तो वो झूठी मुस्कान के साथ कह देता, “अरे कुछ नहीं, शादी वाले घर में भागदौड़ तो होती ही है, बस थोड़ी थकावट है।” माधव किसी को अपनी चिंता में साझीदार नहीं बनाना चाहता था। वो एक पिता था, और समाज ने पिताओं को ये सिखाया है कि उन्हें अपने आँसू और अपनी परेशानियां अकेले ही पीनी होती हैं।
शादी में सिर्फ बीस दिन बचे थे। घर में रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू होने वाला था। तभी एक दिन सुबह-सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई। माधव ने दरवाज़ा खोला तो सामने कमला दीदी खड़ी थीं। हाथों में दो बड़े-बड़े झोले, चेहरे पर वही पुरानी ममता भरी मुस्कान और माथे पर लाल बिंदी। कमला दीदी माधव से पाँच साल बड़ी थीं और उसे बिल्कुल अपने बेटे की तरह मानती थीं।
“क्या रे माधव, अपनी इकलौती भानजी की शादी में मुझे सबसे आखिर में बुलाने का इरादा था क्या?” कमला दीदी ने अंदर आते ही प्यार भरा उलाहना दिया।
माधव के सूखे चेहरे पर अचानक एक रौनक आ गई। उसने आगे बढ़कर दीदी के पैर छुए। “कैसी बात करती हो दीदी, तुम्हारे बिना तो इस घर का कोई काम शुरू ही नहीं हो सकता। तुम आ गई हो, तो समझो अब सब ठीक हो जाएगा।”
कमला दीदी के आने से घर में एक अजीब सी ऊर्जा आ गई थी। वो सुबह से लेकर रात तक शादी की तैयारियों में सुमित्रा का हाथ बंटातीं, नंदिनी के साथ बैठकर उसके कपड़ों की फिटिंग देखतीं और हंसी-मज़ाक से पूरे घर का माहौल हल्का कर देतीं। लेकिन एक बड़ी बहन की आँखें अपने छोटे भाई का दर्द पढ़ने में कभी धोखा नहीं खा सकतीं। कमला दीदी ने दो ही दिन में भांप लिया था कि माधव खुश होने का सिर्फ नाटक कर रहा है। उसकी हंसी आँखों तक नहीं पहुँच रही थी।
एक रात, जब पूरा घर सो रहा था, कमला दीदी की आँख खुली तो उन्होंने देखा कि माधव का बिस्तर खाली है। वो दबे पाँव छत पर गईं। वहां माधव मुंडेर पर सिर टिकाए खड़ा था और उसकी उंगलियों में वही हिसाब वाली पुरानी डायरी दबी थी। हल्की चाँदनी में दीदी ने देखा कि माधव की आँखें नम थीं और वो चुपचाप अपने आँसू पोंछ रहा था।
कमला दीदी धीरे से उसके पीछे गईं और उसके कंधे पर हाथ रखा। माधव एकदम से चौंक गया।
“क्या बात है मेरे लाल? ये रात के अंधेरे में कौन सा हिसाब जोड़ा जा रहा है जो पूरा नहीं हो पा रहा?” दीदी की आवाज़ में वही पुरानी गर्माहट थी।
माधव ने हड़बड़ा कर डायरी छुपाने की कोशिश की। “कु.. कुछ नहीं दीदी, बस ऐसे ही टेंट वाले का हिसाब देख रहा था। आप सोई नहीं अभी तक?”
कमला दीदी ने डायरी उसके हाथ से खींच ली। बिना खोले ही वो समझ गईं कि इसमें क्या लिखा है। “तू मुझसे झूठ बोलेगा माधव? मैंने तुझे अपनी गोदी में खिलाया है। तेरे चेहरे की हर सिलवट का मतलब जानती हूँ मैं। बता मुझे, क्या बात है? पैसों की कमी पड़ रही है न?”
माधव अब और खुद को संभाल नहीं पाया। उसका संयम टूट गया और वो दीदी के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। “हाँ दीदी, मैं हार गया हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अपनी बच्ची की विदाई कैसे करूँगा। हलवाई का एडवांस देना है, टेंट वाले का आधा पैसा बाकी है, नंदिनी के ससुराल वालों के लिए कपड़े लेने हैं। मेरे पास कुछ नहीं बचा है दीदी। मेरी दुकान से जो भी आता था, वो कब का खत्म हो गया। मैंने सब जगह हाथ पैर मार लिए, कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही। मैं अपनी बेटी की नज़रों में गिर जाऊंगा दीदी…”
कमला दीदी ने उसे वैसे ही रोने दिया। जब उसका गुबार थोड़ा कम हुआ, तो उन्होंने उसे अपने से अलग किया और उसके आँसू पोंछे। “तू पागल हो गया है क्या माधव? तू इतना बड़ा हो गया है कि अपनी परेशानी अपनी दीदी से छुपाने लगा? क्या नंदिनी मेरी बेटी नहीं है? क्या उस पर सिर्फ तेरा हक़ है?”
माधव ने रुंधे गले से कहा, “मैं जानता हूँ दीदी आप उससे बहुत प्यार करती हो। लेकिन आपके भी तो अपने खर्चे हैं। जीजा जी के जाने के बाद आपने अकेले अपने बच्चों को पाला है। मैं आपका पैसा कैसे…”
“चुप कर मुर्ख!” दीदी ने माधव की बात बीच में ही काट दी। उन्होंने अपने पल्लू की गांठ खोली और उसमें से एक छोटी सी कपड़े की पोटली निकाली। वो पोटली उन्होंने माधव के हाथों में रख दी। “इसमें मेरी कुछ एफडी (Fixed Deposit) के कागज़ात हैं और मेरे कुछ पुराने गहने हैं जो मैंने इसी दिन के लिए सहेज कर रखे थे। कल सुबह जाकर इन्हें बैंक से निकाल लेना। और खबरदार जो एक भी शब्द कहा।”
माधव के हाथ कांपने लगे। “नहीं दीदी, ये आपकी उम्र भर की जमा पूंजी है। आपके बुढ़ापे का सहारा है, मैं इसे कैसे ले सकता हूँ? ये मैं नहीं…”
माधव अभी आगे कुछ और बोलता कि कमला दीदी ने उसे घूर कर देखा। उनकी आँखों में वो ही पुराना बचपन वाला रौब था। उन्होंने अपना दायां हाथ हवा में उठाया, तर्जनी उंगली माधव की तरफ की और नकली गुस्से से बोलीं, “ज़्यादा बहस मत कर मेरे सामने, नहीं तो अभी जाकर रसोई से अम्मा का चिमटा लाऊंगी और तेरी आरती उतार दूंगी!”
ये वाक्य सुनना था कि माधव सन्न रह गया। ‘चिमटे से आरती’… वो बचपन का डर, वो अम्मा की डांट, वो प्यार… सब कुछ एक झटके में उसकी आँखों के सामने आ गया। वो समझ गया कि इस डांट के पीछे कितना गहरा और निस्वार्थ प्रेम छुपा है। वो उस प्यार के आगे नतमस्तक हो गया।
माधव कुछ बोल नहीं पाया, बस उसने आगे बढ़कर अपनी बड़ी बहन को कसकर गले लगा लिया। उसकी आँखों से अब जो आँसू बह रहे थे, वो बेबसी के नहीं, बल्कि सुकून और उस रिश्ते की जीत के आँसू थे। उस रात माधव को सालों बाद बिना करवटें बदले एक गहरी और मीठी नींद आई, क्योंकि वो जान चुका था कि जब तक परिवार के प्यार की छांव उसके सिर पर है, दुनिया की कोई भी धूप उसे झुलसा नहीं सकती।
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लेखक : मुकेश पटेल