थाली को मेज पर एक झटके से रखते हुए जब रीता ने कहा, “खाना रख दिया है, ठंडा होने से पहले निगल लेना,” तो कमरे की ठंडी और उदास हवा में एक असहज सन्नाटा पसर गया। खाट के कोने पर सिमटे बैठे पैंसठ वर्षीय विश्वंभर जी ने कंपकपाते हाथों से अपनी सफेद चादर को ठीक किया और धीमी, भर्राई हुई आवाज़ में बोले, “बहू, मैं तुम्हारे ससुर समान जेठ हूँ… उम्र का यह पड़ाव है, कम से कम बोलते समय थोड़ी मर्यादा का ध्यान तो रख लिया करो।”
रीता की आँखें क्रोध और नफरत से भर उठीं। उसने तिरस्कार भरी नज़र से उस लाचार वृद्ध की ओर देखा और व्यंग्य भरे स्वर में बोली, “मर्यादा की बात उस मुख से शोभा नहीं देती, जिसने अपनी ही करनी से कुल की सारी लाज को धूल में मिला दिया हो। अगर कर्म सम्मान के योग्य होते, तो मैं खुद आपके चरण धोकर पीती। मगर आपने जो किया, उसके बाद इस घर में दो जून की रोटी मिल रही है, इसे ही अपना भाग्य समझिए।” इतना कहकर रीता ने एक पल भी वहां रुकना गवारा नहीं किया और पैर पटकती हुई उस सीलन भरे बाहरी कमरे से बाहर निकल गई। दरवाज़ा पीछे से हल्की चरमराहट के साथ बंद हुआ, मानो उस वृद्ध के अतीत और वर्तमान के बीच एक अमिट खाई खींच गया हो।
एक ज़माना था जब पूरे इलाके में विश्वंभर जी के नाम का सिक्का चलता था। कम उम्र में ही जब माता-पिता अचानक महामारी की भेंट चढ़ गए, तो पूरे परिवार और पचास बीघे पुश्तैनी खेती की बागडोर विश्वंभर के युवा कंधों पर आ गई थी। उस समय उनका छोटा भाई हेमंत बहुत छोटा था। विश्वंभर ने अपनी सारी खुशियाँ, अपनी सारी इच्छाएँ उस नन्हे भाई के भविष्य के लिए न्योछावर कर दीं। कड़ी धूप में पसीना बहाकर, खेतों की मेड़ पर रातें काटकर उन्होंने हेमंत को पढ़ाया-लिखाया। विश्वंभर की पत्नी सावित्री भी साक्षात अन्नपूर्णा का रूप थीं। वह पूरे घर को अपने स्नेह से सींचती थीं।
ईश्वर ने सब कुछ दिया था, लेकिन विश्वंभर और सावित्री की झोली संतान के सुख से खाली रह गई थी। सावित्री ने समाज के तानों से दुखी होकर कई बार अपने पति से कहा था कि वे दूसरा ब्याह कर लें ताकि वंश आगे बढ़ सके, लेकिन विश्वंभर ने सावित्री का हाथ थामकर हमेशा एक ही बात कही, “हेमंत सिर्फ मेरा भाई नहीं, मेरा बेटा है। जब तक वह है, हमें किसी और संतान की क्या आवश्यकता?”
हेमंत ने भी अपने बड़े भाई के त्याग का मान रखा। उसने पास के ज़िले के महाविद्यालय से कृषि विज्ञान में स्नातक किया और शहर की चकाचौंध को ठुकराकर गाँव लौट आया ताकि भाई के कांधे से कांधा मिलाकर आधुनिक तरीके से खेती को आगे बढ़ा सके। सावित्री ने अपने ही मायके के पास के एक संभ्रांत परिवार की सुलक्षणा कन्या रीता से हेमंत का ब्याह रचा दिया। शादी के करीब दो वर्ष बाद जब रीता की कोख से एक सुंदर बालक ने जन्म लिया, तो सावित्री की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। सावित्री उस बच्चे पर अपनी ममता लुटाती, उसे नहलाती, रात-रात भर जागकर उसे अपनी छाती से लगाकर लोरी सुनाती। विश्वंभर और सावित्री का खाली आंगन बच्चे की हंसी से गूंज उठा था।
परंतु नियति का क्रूर चक्र कब किसके जीवन को उलट-पुलट कर दे, कोई नहीं जानता। बच्चे के तीसरे जन्मदिन के कुछ ही महीनों बाद सावित्री को अचानक तेज़ बुखार और पेट की गंभीर बीमारी ने घेर लिया। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया और देखते ही देखते मात्र तीन महीनों के भीतर सावित्री संसार त्याग कर चली गईं। जिस दिन सावित्री की अर्थी उठी, विश्वंभर पागलों की तरह उस बेजान देह से लिपटकर चीख पड़े थे। ऐसा लगा जैसे उनके जीवन का सारा संबल, सारी शांति सावित्री अपने साथ ही समेटकर ले गई हों।
पत्नी के जाने के बाद विश्वंभर भीतर से बिल्कुल टूट गए। घर की दीवारों में सावित्री की यादें उन्हें काटने दौड़ती थीं। इस अकेलेपन और शून्य से भागने के लिए उन्होंने घर में बैठना छोड़ दिया और अपना अधिकांश समय बाग और दूर खेतों में बने नलकूप वाले कमरे पर ही बिताने लगे। दिन ढल जाता, रात घिर आती, लेकिन विश्वंभर वहीं सुनसान में शून्य को ताकते रहते। उम्र ढल रही थी और मन का खालीपन एक भयंकर मानसिक भटकाव का रूप लेने लगा था।
इसी बीच, खेतों पर काम करने वाली एक मजदूर महिला कमली एक दोपहर रोती हुई घर आई और रीता से बोली, “छोटी मालकिन, बड़े मालिक का बर्ताव आजकल हम काम करने वाली औरतों के प्रति ठीक नहीं है। जब भी हम उस कमरे के पास जाती हैं, वो बुरी नीयत से…” रीता ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही उसे फटकार दिया, “कमली, अपनी ज़बान संभालकर बात कर! बड़े भैया देवता समान हैं। अपनी उम्र का तो लिहाज़ कर, उन पर ऐसा घिनौना कीचड़ उछालते हुए तेरी ज़बान नहीं कांपी? चुपचाप जाकर अपना काम कर, दोबारा ऐसी बकवास की तो काम से निकाल दूंगी।” कमली चुपचाप रोते हुए चली गई। कुछ दिनों बाद एक अन्य मजदूरिन ने भी दबी ज़बान से ऐसी ही शिकायत की, लेकिन रीता ने सोचा कि शायद पैसों के लालच में या मजदूरी बढ़ाने के लिए ये लोग झूठे किस्से गढ़ रहे हैं।
लेकिन सच्चाई बहुत दिनों तक पर्दों के पीछे नहीं छिप सकती। वैशाख की एक तपती दुपहरी को जब खेतों में गेहूँ की गहाई चल रही थी, रीता दोपहर का भोजन लेकर नलकूप की ओर गई। वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने सोचा कि शायद बड़े भैया कमरे में विश्राम कर रहे होंगे। उसने आगे बढ़कर कमरे के किवाड़ को धकेला, जो अंदर से पूरी तरह बंद नहीं था। जैसे ही किवाड़ खुला, अंदर का दृश्य देखकर रीता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
विश्वंभर एक कामगार महिला के बिल्कुल करीब खड़े थे और वह महिला बदहवास होकर अपने कपड़े ठीक करते हुए घबराहट में पीछे हट रही थी। रीता को देखकर विश्वंभर के चेहरे का रंग उड़ गया, उनके हाथ कांपने लगे और वह थरथराते हुए बोले, “रीता… बहू… तुम गलत समझ रही हो…”
रीता का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसकी आँखों से नफरत की चिंगारियां फूट रही थीं। वह चीख पड़ी, “गलत समझ रही हूँ? काश कि मेरी आँखें फूट गई होतीं और मुझे यह दिन न देखना पड़ता! जिस इंसान को मैं भगवान समझती थी, जिसके त्याग की कहानियाँ सुनकर मैं इस घर में आई थी, वह अंदर से इतना पतित और चरित्रहीन निकलेगा, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था! अगर आप मेरे पति के बड़े भाई न होते, तो आज ही आपको पूरे गाँव के सामने बेनकाब कर देती!”
विश्वंभर ने हाथ जोड़कर कांपते हुए कहा, “बहू, मुझसे भारी भूल हो गई… मन भटक गया था… खानदान की पगड़ी को मत उछालो, किसी से कुछ मत कहना…”
रीता ने नफरत से अपना मुंह फेर लिया और बोली, “जिसकी नीयत में ही खोट आ जाए, उसकी कैसी पगड़ी और कैसा मान? आज आप मेरी ही नहीं, पूरे परिवार की नज़रों से हमेशा के लिए गिर चुके हैं।” वह पैर पटकती हुई उल्टे पाँव घर लौट आई।
उस दिन के बाद से घर की व्यवस्था पूरी तरह बदल गई। रीता ने विश्वंभर का खेतों और बाग में जाना पूरी तरह बंद करवा दिया। उनका सामान उठाकर घर के बाहरी हिस्से में बने एक छोटे और अंधेरे कमरे में रखवा दिया गया। हेमंत को जब सारी बात पता चली, तो वह शर्म और ग्लानि से गड़ गया। वह अपने पूज्य भाई से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों भाइयों के बीच मीलों की दूरी बन गई। घर का नौकर ही उस बाहरी कमरे में जाकर विश्वंभर को खाना-पानी दे आता था। विश्वंभर जीवित तो थे, लेकिन एक ज़िंदा लाश की तरह, जो अपनी ही आत्मग्लानि और पश्चाताप की आग में हर पल जल रही थी।
कई महीने इसी घुटन भरे माहौल में बीत गए। एक दिन नौकर अचानक तेज बुखार के कारण नहीं आया। मजबूरी में रीता को ही दोपहर का खाना लेकर उस कमरे में जाना पड़ा था, जहाँ उसने वही कड़वे शब्द कहे थे। रीता के जाने के बाद विश्वंभर ने उस थाली की तरफ देखा भी नहीं। उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। वे अपने अतीत को याद करने लगे—वह त्याग, वह मेहनत, और फिर बुढ़ापे के इस अकेलेपन में हुआ वह अक्षम्य नैतिक पतन। वे मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगे कि या तो उन्हें इस ग्लानि से मुक्ति दे दें या फिर उन्हें अपने इस पाप का प्रायश्चित करने का कोई मार्ग दिखाएं।
उसी शाम, जब हेमंत खेतों की ओर जाने के लिए अपनी साइकिल निकाल रहा था, तो विश्वंभर उस बाहरी कमरे की चौखट पर आकर खड़े हो गए। उनकी कमर झुक चुकी थी, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे बन गए थे। उन्होंने बहुत संकोच और गिड़गिड़ाते हुए कहा, “हेमंत… छोटे… क्या आज मुझे अपने साथ खेतों की ओर ले चलेगा? मैं बस दूर से अपनी धरती को देखना चाहता हूँ… मैं कमरे के भीतर नहीं जाऊंगा, बस खुली हवा में सांस लेना चाहता हूँ।”
हेमंत ने अपनी नज़रें फेर लीं। उसने कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन मौन रहकर साइकिल आगे बढ़ा दी और विश्वंभर धीरे-धीरे उनके पीछे-पीछे पैदल ही चल पड़े। जब वे खेतों की मेड़ पर पहुंचे, तो वहां काम कर रहे मजदूरों और गाँव के लोगों की नज़रें विश्वंभर पर पड़ीं। उन नज़रों में न तो पहले जैसा आदर था, न श्रद्धा। उनमें केवल उपहास, कानाफूसी और घृणा थी। मजदूर औरतें उन्हें देखकर अपना पल्लू खींचकर दूसरी ओर मुड़ गईं। विश्वंभर का सीना छलनी हो गया। उन्हें यह कटु सत्य पूरी तरह समझ आ गया कि धन, संपत्ति या प्रतिष्ठा खोने पर तो वापस पाई जा सकती है, लेकिन जब कोई इंसान चरित्र खोकर अपनों और समाज की नज़रों से गिर जाता है, तो उस खाई को पाटना असंभव हो जाता है। वे चुपचाप अपना सिर झुकाए उल्टे पैरों उस वीरान कमरे में लौट आए।
उस रात विश्वंभर ने एक बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने तय किया कि वे अब केवल घुट-घुटकर मरने का इंतजार नहीं करेंगे। यदि उनसे पाप हुआ है, तो उसका प्रायश्चित भी उन्हें ही करना होगा। शब्दों से मांगी गई माफी कभी दिल के घावों को नहीं भर सकती, उसके लिए कर्मों का शुद्धिकरण आवश्यक है।
अगले दिन सुबह के चार बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सोया था, विश्वंभर चुपचाप उठे। उन्होंने अपना पुराना फावड़ा उठाया और गाँव के छोर पर स्थित उस बंजर ज़मीन की ओर चल पड़े, जो सालों से कटीली झाड़ियों और पत्थरों से पटी पड़ी थी और जहाँ से गाँव के गरीब बच्चों को पाठशाला जाने के लिए लंबा और कीचड़ भरा रास्ता तय करना पड़ता था। विश्वंभर ने उस बंजर ज़मीन को समतल करना और उस रास्ते के गड्ढों को भरना शुरू किया।
दोपहर की चिलचिलाती धूप हो या सुबह की ठंडी ओस, विश्वंभर बिना किसी से कुछ कहे, बिना किसी से एक घूंट पानी मांगे, अकेले ही उस पथरीली ज़मीन पर पसीना बहाते रहते। शुरुआत में गाँव वालों ने समझा कि बुढ़ापे में इनका दिमाग फिर गया है। कुछ लोग उन पर तंज कसते, कुछ हँसते, लेकिन विश्वंभर ने किसी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उनका पूरा ध्यान केवल अपने श्रम पर था। दोपहर को जब रीता का नौकर खाना लेकर आता, तो वे आधा खाना किसी भूखे जानवर को खिला देते और रूखी-सूखी रोटी खाकर फिर से काम में जुट जाते।
सप्ताह बीतते गए और महीने गुजरने लगे। विश्वंभर का शरीर सूखकर कांटा हो गया था, हाथों में बड़े-बड़े छाले पड़कर फूट चुके थे और हथेलियाँ पत्थर जैसी सख्त हो गई थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सा शांत संकल्प था। उन्होंने न केवल उस पूरे रास्ते को समतल और चलने योग्य बना दिया, बल्कि उस बंजर पड़ी सार्वजनिक ज़मीन पर सैकड़ों फलदार और छायादार पौधे भी रोप दिए। वे रोज़ दूर कुएँ से घड़ों में पानी भरकर लाते और उन पौधों को अपने आंसुओं और पसीने से सींचते।
समय बीतता गया और वर्षा ऋतु का आगमन हुआ। एक दिन मूसलाधार बारिश शुरू हो गई, जो तीन दिनों तक लगातार होती रही। गाँव की पुरानी नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा। गाँव के निचले हिस्से में, जहाँ ज्यादातर गरीब मजदूरों और कामगारों की कच्ची झोपड़ियाँ थीं, पानी घुसने का खतरा पैदा हो गया। उस कच्चे बाँध में एक बड़ा रिसाव हो गया था, जिससे मिट्टी धीरे-धीरे कट रही थी। यदि वह बाँध टूट जाता, तो दर्जनों झोपड़ियाँ बह जातीं और कई मासूम जानें खतरे में पड़ जातीं।
गाँव में हाहाकार मच गया। लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर भागने लगे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उस उफनती धारा के बीच जाकर उस चौड़े होते कटाव को रोके। ठीक उसी समय, वृद्ध विश्वंभर ने उस हाहाकार को सुना। वे बिना एक पल गंवाए, अपनी जान की परवाह किए बिना उस उफनते पानी की ओर दौड़ पड़े।
जब वे बाँध पर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि बाँध का एक बड़ा हिस्सा ढहने ही वाला है। विश्वंभर ने भारी-भारी पत्थरों और मिट्टी से भरी बोरियों को अपने बूढ़े कंधों पर उठाना शुरू किया। पानी का बहाव इतना तेज़ था कि वह पत्थरों को बहा ले जा रहा था। यह देखकर विश्वंभर ने एक खूंटे से खुद को रस्सी से बांधा और उस बहते हुए पानी के गड्ढे में खुद कूद पड़े और अपने शरीर को उस टूटे हुए हिस्से की ढाल बना दिया, ताकि पीछे रखी बोरियाँ बह न सकें।
उनके पैरों से खून बह रहा था, ठंडे पानी से उनका बदन नीला पड़ रहा था, लेकिन वे चट्टान की तरह वहीं डटे रहे और चिल्लाकर बोले, “अरे खड़े होकर क्या देख रहे हो! आगे आओ और बोरियाँ डालो, नहीं तो पूरा गाँव डूब जाएगा!”
गाँव के नौजवानों और हेमंत ने जब उस वृद्ध को मौत के मुंह में इस तरह समाज की रक्षा करते देखा, तो उनका भी खून खौल उठा। हेमंत, रीता और गाँव के अन्य लोग दौड़े। सभी ने मिलकर पत्थरों और बोरियों का ऐसा अंबार लगाया कि कुछ ही घंटों की मशक्कत के बाद बाँध का रिसाव पूरी तरह बंद हो गया और गाँव एक बड़ी तबाही से बच गया।
जब विश्वंभर को उस कीचड़ और मटमैले पानी से बाहर निकाला गया, तो वे अत्यधिक ठंड और थकान के कारण बेहोश हो चुके थे। उनका शरीर कांप रहा था और सांसें बहुत धीमी चल रही थीं। हेमंत फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपने भाई को अपनी बाहों में उठा लिया और घर की ओर भागा।
पूरा गाँव उस दिन विश्वंभर के घर के बाहर इकट्ठा हो गया था। वही मजदूर औरतें, जिन्होंने कभी घृणा से मुँह मोड़ लिया था, आज हाथ जोड़कर उस वृद्ध के जीवन की दुआ मांग रही थीं। कमली रोते हुए कह रही थी, “भगवान हमारे बड़े मालिक को बचा ले, आज अगर ये न होते तो हमारे बाल-बच्चे पानी में समा गए होते।”
गाँव के डॉक्टर को बुलाया गया। दवाइयाँ दी गईं, कंबल ओढ़ाए गए। रीता खुद अपने हाथों से काढ़ा बनाकर लाई और विश्वंभर के सिरहाने बैठकर उनकी सेवा करने लगी। उसकी आँखों से पश्चाताप के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने देखा कि इस वृद्ध ने अपनी एक भूल की कितनी भारी कीमत चुकाई थी। उन्होंने बिना कोई सफाई दिए, बिना कोई शिकायत किए, अपने अस्तित्व को ही सेवा और प्रायश्चित की अग्नि में झोंक दिया था।
अगले दिन भोर के समय जब पूरब का आकाश सिंदूरी हो रहा था, विश्वंभर ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उन्होंने देखा कि वे उस अंधेरे बाहरी कमरे में नहीं, बल्कि घर के मुख्य और साफ-सुथरे कमरे में लेटे हुए हैं। उनके सिरहाने हेमंत बैठा था और उनके चरणों के पास रीता बैठी उनके पैर दबा रही थी।
विश्वंभर ने भर्राए गले से कहा, “बहू… मुझे उस बाहरी कमरे में छोड़ आओ… मैं इस घर के योग्य नहीं हूँ…”
रीता का सब्र टूट गया। वह फफक-फफक कर रो पड़ी और विश्वंभर के चरणों पर अपना सिर रखकर बोली, “नहीं बड़े भैया, ऐसा मत कहिए। आपने जो तपस्या की है, जो प्रायश्चित किया है, उसने आपके हर दाग को धो दिया है। इंसान से भूल हो सकती है, लेकिन जो अपनी भूल को स्वीकार कर इस तरह अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे, वह इंसान नहीं देवता बन जाता है। कल तक आप मेरी नज़रों से गिरे हुए थे, लेकिन आज आपका स्थान मेरी नज़रों में हिमालय से भी ऊंचा हो गया है। मुझे माफ कर दीजिए, मैंने आपको समझने में बहुत देर कर दी।”
हेमंत ने अपने बड़े भाई के हाथ को थामकर अपने माथे से लगा लिया और बोला, “भैया, यह घर आपका था, आपका है और हमेशा आपका ही रहेगा। आपने हमें सिर्फ पाला ही नहीं, आज यह भी सिखा दिया कि सच्चा प्रायश्चित क्या होता है।”
विश्वंभर की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उनका मन हल्का हो चुका था। खिड़की से आती सुबह की पहली सुनहरी किरण उनके चेहरे पर पड़ रही थी, मानो प्रकृति भी उनके इस नए, निष्पाप और गरिमामय जीवन का स्वागत कर रही हो। बरसों से जमी बर्फ पिघल चुकी थी और उस आंगन में एक बार फिर प्रेम, सम्मान और विश्वास का दीप प्रज्वलित हो उठा था।
पाठकों से एक आत्मीय संवाद:
इंसान गलतियों का पुतला है, लेकिन क्या समाज और परिवार को किसी की एक भूल पर उसे जीवन भर के लिए त्याग देना चाहिए? या फिर यदि कोई सच्चे मन से प्रायश्चित करना चाहे, तो उसे सुधार और सम्मान का दूसरा अवसर मिलना चाहिए? आपकी इस विषय में क्या राय है, हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता