बंजर कोख की अमर छांव
एक मां के सामने उसका बेटा तड़पे और वह अपने गहने बचाकर रखे, इतनी पत्थर दिल नहीं हूँ मैं।” पूरा घर सन्न रह गया। मनोरमा चाची, जो ज़िंदगी भर बड़ी मां को अपनी सौतन और दुश्मन समझती रहीं, उनके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगीं। चाचा हरिशंकर की आंखें शर्म और पश्चाताप के आंसुओं … Read more