“मैं यह क्या कर बैठा…” अंकुर की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगा। “राधिका! हमने क्या कर दिया? वो आज़ादी किस काम की जो हमें अपने ही भगवान जैसे मां-बाप से अलग कर दे? हम इतने अंधे कैसे हो गए?”
राधिका भी अब अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी। आधुनिकता और आज़ादी के झूठे अहंकार का जो पर्दा उसकी आंखों पर पड़ा था, वह इस मार्मिक चिट्ठी ने एक झटके में फाड़ दिया था।
पुणे के एक बेहद शांत और पॉश इलाके की गगनचुंबी इमारत के दसवें माले पर सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी फैली हुई थी। बालकनी में हल्की ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन फ्लैट नंबर 1004 के अंदर का माहौल काफी गर्म था। राधिका घड़ी की सुइयों को देख-देखकर अपनी कामवाली कांता बाई पर लगातार हिदायतें बरसा रही थी। उसके चेहरे पर ऑफिस की मीटिंग से ज़्यादा घर में पैदा होने वाली संभावित उथल-पुथल की घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।
“कांता, ध्यान से सुन लो! वो जो गेस्ट रूम है, उसकी खिड़कियों के पर्दे बदल देना और अलमारी के ऊपर जमी धूल पूरी तरह साफ होनी चाहिए। पिछली बार तुमने जाले छोड़ दिए थे। और हां, लिविंग रूम के सेंटर टेबल पर जो क्रिस्टल के शोपीस रखे हैं, उन्हें उठाकर अंदर मेरे बेडरूम की अलमारी में रख दो। बूढ़े लोगों का कोई भरोसा नहीं होता, कब किसका हाथ लग जाए और हज़ारों का सामान चकनाचूर हो जाए।”
कांता चुपचाप सिर हिलाती रही। राधिका का पर्स कंधे पर लटक चुका था और वह गाड़ी की चाबी हाथ में घुमाते हुए मुख्य दरवाज़े तक पहुंच ही चुकी थी कि अचानक उसे कुछ याद आया। वह उल्टे कदमों से वापस किचन की तरफ मुड़ी।
“अरे कांता, एक बात तो मैं बिल्कुल भूल ही गई थी। वो साइड वाले छोटे बार कैबिनेट में जो वाइन और व्हिस्की की बोतलें रखी हैं, उन्हें उठाकर स्टोर रूम के सबसे ऊपरी रैक पर छुपा दो। अंकुर! ओ अंकुर, सुन रहे हो तुम?”
लिविंग रूम के सोफे पर बैठा अंकुर अपने लैपटॉप पर आंखें गड़ाए कॉफी की चुस्कियां ले रहा था। दोनों बच्चे, आरव और अन्वया, सुबह ही स्कूल बस पकड़कर जा चुके थे। अंकुर ने चश्मे के ऊपर से देखते हुए पूछा, “क्या हुआ राधिका? सुबह-सुबह इतना हाइपर क्यों हो रही हो? सब कुछ ठीक तो है ना?”
“ठीक कैसे होगा अंकुर? तुम तो आराम से बैठे हो! तुम्हें याद है ना कि आज दोपहर की ट्रेन से तुम्हारे मम्मी-पापा रतलाम से आ रहे हैं? पूरे पंद्रह दिनों के लिए! अगर उन्होंने वो बोतलें देख लीं, तो तुम्हारा तो कुछ नहीं जाएगा, दिन-रात मुझे ही संस्कारों और रीति-रिवाजों का भाषण सुनना पड़ेगा। मैं ऑफिस जा रही हूं, शाम को जल्दी आने की कोशिश करूंगी। तुम स्टेशन चले जाना उन्हें लेने।”
राधिका तेज़ी से दरवाज़ा बंद करके निकल गई। कांता ने झाड़ू थामते हुए दबी ज़बान में कहा, “भैया जी, अम्मा-बाबूजी आ रहे हैं तो काम तो बहुत बढ़ जाएगा। दो टाइम का खाना, गरम पानी, बार-बार की चाय… मुझे तो अपनी दोपहर की छुट्टी जाती दिख रही है।”
अंकुर ने बिना सिर उठाए कहा, “कांता, जो काम है वो करो। ज़्यादा मत बोलो। पैसे तो पूरे मिलते हैं ना तुम्हें?” पर मन ही मन अंकुर भी एक अनचाही बंदिश महसूस कर रहा था। पिछले सात सालों से इस शहर में अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीने की जो आदत पड़ी थी, उसमें माता-पिता का दखल उसे भी अखरने लगा था।
दोपहर करीब ढाई बजे अंकुर रेलवे स्टेशन से अपने पिता सत्यनारायण जी और मां सुशीला देवी को लेकर घर पहुंचा। दोनों के चेहरे पर लंबे सफर की थकान से ज़्यादा अपने बेटे और पोते-पोती से मिलने की असीम चमक थी। सुशीला जी के हाथ में कपड़े के दो बड़े-बड़े थैले थे, जिनमें गांव की शुद्ध चीज़ें भरी हुई थीं। जैसे ही घर का दरवाज़ा खुला, राधिका अभी-अभी ऑफिस से लौटकर सोफे पर ही बैठी थी।
सुशीला जी ने बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर कहा, “बहू, कैसी है तू?”
राधिका ने अपनी जगह से उठकर केवल औपचारिकता निभाते हुए दोनों के घुटनों को ऊपर-ऊपर से छुआ और फीकी मुस्कान के साथ बोली, “नमस्ते मम्मी जी, नमस्ते पापा जी। सफर में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
सत्यनारायण जी ने स्नेहमयी नज़रों से बहू को देखा और बोले, “नहीं बेटा, सब कुशल-मंगल रहा। बस अपने बच्चों से मिलने की आस थी, सो रास्ता कट गया।”
अंकुर ने सामान अंदर रखते हुए कहा, “मम्मी, पापा, आप लोग पहले गेस्ट रूम में जाइए और नहा-धोकर फ्रेश हो लीजिए। सफर से थक गए होंगे।”
सुशीला जी ने एक बड़ा थैला खोलते हुए उत्साह से कहा, “अरे अंकुर, रुक तो सही लल्ला! देख, मैं तेरे लिए क्या लाई हूं। वो जो हमारे खेत के पास वाले कुएं की देसी ककड़ी होती है ना, वो और हाथ से कुटा हुआ घर का शुद्ध बेसन। तू बचपन में बेसन के लड्डू कितने चाव से खाता था! मैंने अपने हाथों से दो डिब्बे भरकर बनाए हैं। और राधिका, तेरे लिए वो जो सूती साड़ियां रतलाम में बहुत अच्छी मिलती हैं ना, वो भी लेकर आई हूं।”
अंकुर ने झेंपते हुए कहा, “मम्मी, ये सब सामान बाद में देखेंगे। अभी आप अंदर चलिए, घर बिखरा हुआ अच्छा नहीं लगता।”
सुशीला जी का बढ़ा हुआ हाथ वहीं ठिठक गया। उन्होंने चुपचाप डिब्बे को वापस थैले में रख दिया।
शाम को जब डाइनिंग टेबल पर खाना लगा, तो टेबल पर पास्ता, गार्लिक ब्रेड और चीज़ से भरी हुई भारी डिशेज़ रखी थीं, जो राधिका ने एक महंगे रेस्टोरेंट से मंगवाई थीं। सत्यनारायण जी और सुशीला जी पूरी ज़िंदगी सादा दाल-रोटी, हरी सब्ज़ी और मट्ठे पर रहे थे।
सत्यनारायण जी ने थाली को देखते हुए धीमे स्वर में कहा, “बेटा, हमारे लिए थोड़ा सादा खाना मिल जाता तो अच्छा होता। रात को ये सब पचने में भारी पड़ेगा। कोई सादी रोटी और थोड़ी सी पतली दाल हो तो दे दो।”
राधिका ने चम्मच पटकते हुए अंकुर की तरफ देखा और बुदबुदाई, “शहर आने से पहले सोचना चाहिए था कि यहां का लाइफस्टाइल अलग होता है। अब इस वक्त कोई अलग से चूल्हा तो नहीं जलाएगा। हर चीज़ में मीन-मेख निकालना तो आदत बन गई है।”
सुशीला जी ने बहू की कड़वाहट को भांप लिया। उन्होंने तुरंत बात संभालते हुए कहा, “कोई बात नहीं बेटा, तू परेशान मत हो। हम दोनों गर्म पानी पीकर सो जाएंगे। सफर की वजह से वैसे भी भूख नहीं है।”
उस रात दोनों बुज़ुर्ग अपने कमरे में भूखे पेट ही लेट गए। सत्यनारायण जी छत के पंखे को घूमते हुए देख रहे थे और सुशीला जी की आंखों से आंसुओं की दो बूंदें तकिए में समा रही थीं।
“गायत्री… मेरा मतलब, सुशीला, रो मत,” सत्यनारायण जी ने अपनी पत्नी के कांपते हाथों को थामते हुए कहा। “जब बच्चे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं और नए माहौल में ढल जाते हैं, तो पुराने दरख्तों की छांव भी उन्हें धूप जैसी लगने लगती है। हमने सोचा था कि पोते-पोती के साथ खेलेंगे, बेटे के साथ चार बातें करेंगे। पर लगता है, हम यहां बेवक्त के मेहमान हैं।”
“नहीं जी, ऐसा मत कहिए। हमारा अंकुर दिल का बुरा नहीं है। बस शहर की भागदौड़ में थोड़ा उलझ गया होगा,” सुशीला जी ने अपने बेटे की तरफदारी करते हुए अपने दिल को दिलासा दिया।
अगले दो दिन भी इसी घुटन और बेरुखी के साए में गुज़रे। बच्चे स्कूल और ट्यूशन में इतने व्यस्त थे कि दादा-दादी के पास बैठने का उनके पास समय ही नहीं था। राधिका दिनभर अपने लैपटॉप और फोन में व्यस्त रहती, और जब भी बात करती, उसकी आवाज़ में एक अनचाहा खिंचाव होता। अंकुर भी शाम को ऑफिस से आकर अपने कमरे में बंद हो जाता।
तीसरे दिन की शाम को सत्यनारायण जी की तबीयत कुछ बिगड़ने लगी। उनका ब्लड प्रेशर बढ़ गया था और सिर में भारीपन था। उन्होंने सोचा कि रसोई से थोड़ा सा गुनगुना पानी और उनकी दवाई की डिबिया ले आएं। जब वे दबे पांव गैलरी से गुज़र रहे थे, तभी अंकुर और राधिका के बेडरूम का दरवाज़ा अधखुला था और अंदर से तीखी बहस की आवाज़ आ रही थी।
“अंकुर, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती!” राधिका की आवाज़ काफी तेज़ थी। “तुम्हारे मां-बाप के आने के बाद से मेरे घर की पूरी आज़ादी छिन गई है। न मैं अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहन सकती हूं, न दोस्तों को घर पर बुला सकती हूं। शाम को जो हम थोड़ी देर ड्रिंक करके रिलैक्स करते थे, वो भी बंद है। पूरा घर किसी धर्मशाला जैसा लगने लगा है। तुम सीधे-सीधे उनसे क्यों नहीं कह देते कि वे वापस लौट जाएं? पूरे पंद्रह दिन मैं इस घुटन में नहीं रह सकती!”
सत्यनारायण जी के कदम वहीं जम गए। उनके कानों में पिघला हुआ सीसा उतर रहा था। उन्हें सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उनके अपने बेटे, उनके कलेजे के टुकड़े अंकुर की आवाज़ आई:
“राधिका, तुम समझती क्यों नहीं? मुझे भी बहुत इरिटेशन हो रही है। सुबह से शाम तक बस वही पुराने ढर्रे की बातें। मेरी भी पूरी फ्रीडम खत्म हो गई है। लेकिन मैं मुंह पर कैसे बोलूं? थोड़ा सब्र रखो, दो-चार दिन में मैं खुद ही कोई बहाना बना दूंगा कि हमें ऑफिस के काम से बैंगलोर जाना है, तो वे खुद ही समझकर चले जाएंगे।”
सत्यनारायण जी का सिर चकरा गया। उन्होंने दीवार का सहारा लिया और लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे में लौट आए। सुशीला जी ने जब उनका पीला पड़ा चेहरा देखा, तो घबराकर उठ बैठीं, “क्या हुआ जी? आपकी तबीयत तो ठीक है ना?”
सत्यनारायण जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ठहरा हुआ सन्नाटा था। उन्होंने सुशीला जी से कहा, “सुशीला, अपनी पोटली बांध लो। अब इस घर में हमारा एक पल भी रुकना हमारे आत्मसम्मान की हत्या होगी। जिन बच्चों की आज़ादी और सुकून के लिए हमने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी, आज उन्हीं बच्चों की आज़ादी में हम सबसे बड़ी बेड़ी बन गए हैं।”
सुशीला जी ने सब कुछ समझ लिया। मां का दिल तार-तार हो गया, लेकिन उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा। अगली सुबह सूरज निकलने से पहले, जब पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था और अंकुर व राधिका गहरी नींद में सो रहे थे, दोनों बुज़ुर्गों ने चुपचाप अपने पुराने सूटकेस उठाए।
निकलने से पहले, सत्यनारायण जी ने डाइनिंग टेबल पर रखे एक सफेद कागज़ पर अपनी कांपती उंगलियों से कुछ शब्द लिखे। उसके साथ अपनी पेंशन के पैसों से ख़रीदे हुए बच्चों के कुछ खिलौने और राधिका के लिए लाई गई वो सूती साड़ियां वहीं करीने से रख दीं। मुख्य दरवाज़े को बिना कोई आवाज़ किए धीरे से बंद करके, दोनों बुज़ुर्ग भारी मन से स्टेशन की ओर निकल पड़े।
सुबह करीब आठ बजे जब अंकुर की नींद खुली, तो घर में अजीब सी खामोशी थी। आमतौर पर सुबह के समय सुशीला जी की हल्की भजनों की गुनगुनाहट या पूजा की घंटी की आवाज़ सुनाई देती थी, लेकिन आज सब कुछ बिल्कुल शांत था। अंकुर गेस्ट रूम की तरफ गया तो देखा कि दरवाज़ा खुला था, बिस्तर की चादरें बिल्कुल सलीके से तह की हुई थीं और कमरा पूरी तरह खाली था।
अंकुर के दिल में एक अनजाना सा डर कौंधा। वह तेज़ी से लिविंग रूम की तरफ भागा। डाइनिंग टेबल पर नज़र पड़ते ही उसे वो कागज़ दिखाई दिया। उसने कांपते हाथों से वो चिट्ठी उठाई। उसमें लिखा था:
“प्रिय अंकुर और राधिका,
हम दोनों अपनी मर्ज़ी से वापस अपने घर जा रहे हैं। कल रात अनजाने में ही सही, तुम्हारे बेडरूम के बाहर से गुज़रते हुए तुम्हारी बातें हमारे कानों में पड़ गईं। हमें यह जानकर गहरा दुख हुआ कि हमारे अपने ही बेटे और बहू को हमारी मौजूदगी एक बंधन लगने लगी थी।
बेटा अंकुर, हमने तो तुम्हें उंगली पकड़कर चलना इसलिए सिखाया था ताकि तुम बड़े होकर खुले आसमान में उड़ सको, इसलिए नहीं कि तुम्हारे पंख फैलते ही हमारे वजूद से तुम्हें घुटन होने लगे। पर शायद वक्त का यही दस्तूर है। हमने हमेशा तुम्हारी खुशी चाही है, और अगर हमारी गैर-मौजूदगी ही तुम्हें तुम्हारी मनचाही ‘आज़ादी’ दे सकती है, तो हम हंसते-हंसते यह बंधन भी तोड़ते हैं।
आज हम तुम्हें अपने सारे रिश्तों, सारे दायित्वों और हमारी देख-रेख के हर बोझ से हमेशा के लिए आज़ाद करते हैं। खुश रहना अपने आशियाने में।
— तुम्हारे मां और बाबूजी।”
उस पत्र का एक-एक शब्द अंकुर के सीने में खंजर की तरह उतर गया। उसके हाथ से कागज़ छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। राधिका भी कमरे से बाहर आ चुकी थी। जब उसने वो चिट्ठी पढ़ी, तो उसका चेहरा भी शर्म और पछतावे से सफेद पड़ गया।
अचानक अंकुर के सामने अपने बचपन की सारी तस्वीरें किसी फिल्म के रीलों की तरह घूमने लगीं। कैसे जब उसे टाइफाइड हुआ था, तो यही बाबूजी पूरी-पूरी रात जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखते थे। कैसे यही मां अपनी पुरानी फटी साड़ियों में गुज़ारा कर लेती थी ताकि अंकुर की इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस समय पर भरी जा सके। जब शहर में पहली बार फ्लैट खरीदने के लिए डाउन पेमेंट कम पड़ रहा था, तो बाबूजी ने बिना एक पल सोचे गांव की अपनी पुरखों की ज़मीन बेचकर पैसे भेज दिए थे।
“मैं यह क्या कर बैठा…” अंकुर की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगा। “राधिका! हमने क्या कर दिया? वो आज़ादी किस काम की जो हमें अपने ही भगवान जैसे मां-बाप से अलग कर दे? हम इतने अंधे कैसे हो गए?”
राधिका भी अब अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी। आधुनिकता और आज़ादी के झूठे अहंकार का जो पर्दा उसकी आंखों पर पड़ा था, वह इस मार्मिक चिट्ठी ने एक झटके में फाड़ दिया था। उसने अंकुर का कंधा पकड़ा और रुंधे हुए गले से बोली, “अंकुर, रोने का वक्त नहीं है! अभी स्टेशन जाओ। ट्रेन छूटने मत देना। अगर आज वो चले गए, तो हम कभी खुद को माफ नहीं कर पाएंगे। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई अंकुर… मुझे अपनी गलती सुधारने का एक मौका दो।”
अंकुर ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने न जूते बदले, न गाड़ी की चाबी की परवाह की; सीधे लिफ्ट से नीचे उतरकर अपनी गाड़ी निकाली और पागलों की तरह रेलवे स्टेशन की ओर दौड़ पड़ा।
पुणे स्टेशन पर भारी भीड़ थी। प्लेटफॉर्म नंबर दो पर रतलाम जाने वाली पैसेंजर ट्रेन खड़ी थी और उसका हॉर्न बज चुका था। अंकुर पागलों की तरह हर डिब्बे में झांकता हुआ दौड़ रहा था। उसकी सांसें फूल रही थीं, पसीने से लथपथ उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था।
तभी जनरल डिब्बे की एक खिड़की के पास उसे अपनी मां का वही पुराना सूती आंचल दिखाई दिया। सत्यनारायण जी खिड़की के सहारे सिर टिकाए शून्य में ताक रहे थे और सुशीला जी अपनी साड़ी के पल्लू से बार-बार अपनी आंखें पोंछ रही थीं।
ट्रेन धीरे-धीरे सरकने ही वाली थी कि अंकुर डिब्बे के दरवाज़े पर चढ़ गया और भीड़ को चीरते हुए सीधा अपने माता-पिता के कदमों में गिर पड़ा। पूरे डिब्बे के लोग अवाक होकर देखने लगे।
“बाबूजी! मां! मुझे माफ कर दीजिए… मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दीजिए!” अंकुर दोनों हाथ जोड़कर बच्चों की तरह बिलख रहा था। उसने अपने पिता के दोनों पैर पकड़ लिए थे। “मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया बाबूजी। मैं भूल गया था कि मेरी इस आज़ादी की ज़मीन आपके त्याग पर खड़ी है। अगर आप चले गए, तो मेरा यह घर, मेरी यह तरक्की सब बंजर हो जाएगी।”
सत्यनारायण जी ने अपनी आंखें फेरने की कोशिश की, लेकिन एक बाप का दिल अपनी औलाद को इस कदर टूटते हुए कैसे देख सकता था। सुशीला जी तो तुरंत आगे बढ़ीं और अपने बेटे का सिर उठाकर अपने सीने से लगा लिया, “अंकुर… मेरे लल्ला, उठ… ऐसे मत कर।”
तभी भीड़ के पीछे से हांफती हुई राधिका भी वहां पहुंच गई। उसने बिना किसी झिझक के, वहीं डिब्बे के फर्श पर झुककर सत्यनारायण जी और सुशीला जी के पैर पूरी श्रद्धा से पकड़ लिए।
“मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए,” राधिका के आंसू सुशीला जी के पैरों पर गिर रहे थे। “मैं आधुनिक बनने की होड़ में रिश्तों की कीमत भूल गई थी। जिस घर में बड़ों का आशीर्वाद न हो, वो घर नहीं सिर्फ ईंट-पत्थरों का एक मकान होता है। आप हमारे बंधन नहीं, हमारी जड़ों की मज़बूती हैं। अगर आप नहीं लौटे, तो हम कभी सिर उठाकर जी नहीं पाएंगे। चलिए घर… आपकी बहू हाथ जोड़कर आपसे भीख मांगती है।”
डिब्बे में खड़े यात्रियों की आंखें भी नम हो गईं। सत्यनारायण जी ने देखा कि बहू के शब्दों में कोई बनावट नहीं थी, बल्कि सच्चा पश्चाताप था। उनके कठोर हो चुके चेहरे की लकीरें पिघल गईं। उन्होंने दोनों के सिर पर अपने कांपते हुए हाथ रख दिए।
“पगलो, मां-बाप कभी अपने बच्चों से नाराज़ होकर उन्हें छोड़ नहीं सकते। बस कभी-कभी दिल पर चोट गहरी लग जाती है,” सत्यनारायण जी की आवाज़ भर्रा गई।
अंकुर ने तुरंत दोनों सूटकेस अपने हाथों में उठा लिए। जब वे चारों स्टेशन से बाहर निकले, तो सुबह की धूप अब बेहद खिली हुई और सुखद लग रही थी।
घर लौटकर राधिका ने सबसे पहले अपने हाथों से सत्यनारायण जी के लिए तुलसी वाली सादी चाय बनाई और सुशीला जी के हाथ के बने बेसन के लड्डू निकालकर पूरे आदर के साथ सबके सामने रखे। घर के लिविंग रूम में अब कोई सन्नाटा या घुटन नहीं थी; वहां बच्चों की खिलखिलाहट, सुशीला जी का वात्सल्य और सत्यनारायण जी की गंभीर हंसी गूंज रही थी। अंकुर और राधिका को समझ आ गया था कि असली आज़ादी रिश्तों से भागने में नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान के साथ उन्हें एक धागे में पिरोकर रखने में है।
माता-पिता की सेवा और उनका सत्कार कोई अहसान नहीं, बल्कि हमारा सबसे बड़ा सौभाग्य है। अक्सर आज की युवा पीढ़ी अपनी तथाकथित आज़ादी और आधुनिक जीवनशैली के चक्कर में उन बुज़ुर्गों की अनदेखी कर देती है जिन्होंने उनके सुनहरे भविष्य के लिए अपने सपनों की आहुति दे दी। क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारे पारंपरिक पारिवारिक मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं? अपने बुजुर्गों के प्रति हमारी क्या ज़िम्मेदारी होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका : ख़ुशी