निशांत ने आगे बढ़कर अपने ससुर के दोनों हाथ थाम लिए और बहुत ही आदर से कहा कि बाबूजी, हमने पुणे केवल अपने करियर के लिए नहीं चुना है। हमने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि हम जानते हैं कि इस उम्र में आपको हमारी और हमें आपके साए की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। आप दोनों अब इस बड़े और सूने घर में अकेले नहीं रहेंगे। आप हमारे साथ चलेंगे। हमारे उस नए घर में आपका कमरा सबसे आगे और सबसे बड़ा है।
सत्य प्रकाश जी की आंखें भर आईं। वे संकोच में बोले कि बेटा निशांत, यह तुम क्या कह रहे हो? समाज क्या कहेगा? दामाद और बेटी के घर में माता-पिता का रहना हमारे संस्कारों में ठीक नहीं माना जाता। लोग कहेंगे कि बेटा होते हुए भी बेटी के घर पड़े हैं।
पुणे की एक बेहद शांत और आधुनिक रिहायशी सोसाइटी ‘गुलमोहर हाइट्स’ के बी-विंग में सुबह का सन्नाटा रोज़ की तरह पसरा हुआ था। इसी इमारत के तीसरे माले पर रहने वाले सत्य प्रकाश जी अपनी बालकनी में लगे पौधों को पानी दे रहे थे। सत्तर पार कर चुके सत्य प्रकाश जी वन विभाग के उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए थे। स्वभाव से गंभीर लेकिन दिल से बेहद कोमल। उनकी धर्मपत्नी उर्मिला जी, जो लगभग अड़सठ वर्ष की थीं, रसोई में चाय की केतली चढ़ाए कुछ गुनगुना रही थीं। फ्लैट बहुत बड़ा था—चार कमरों का शानदार आशियाना, जिसमें हर आधुनिक सुविधा मौजूद थी। इटैलियन मार्बल, विदेशी झूमर, और सलीके से सजा हुआ बैठक कक्ष। लेकिन उस विशाल घर में गूंजने वाली अगर कोई चीज़ थी, तो वह थी उन दोनों बुज़ुर्गों के कदमों की धीमी आहट और घड़ी के पेंडुलम की टिकटिक।
सत्य प्रकाश जी के दो बच्चे थे—बड़ा बेटा अर्णव और छोटी बेटी तान्या। अर्णव को बचपन से ही उन्होंने सर्वश्रेष्ठ शिक्षा दी थी। अपनी जमा-पूंजी और पेंशन का एक बड़ा हिस्सा लगाकर उसे लंदन के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा दिलाई। अर्णव होनहार था, उसने वहीं नौकरी हासिल की, फिर वहीं की एक कंपनी में बड़े पैकेज पर सेटल हो गया। कुछ ही वर्षों में उसने वहां की स्थायी नागरिकता भी ले ली और लंदन की ही एक भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत लड़की रिया से विवाह कर लिया। वहीं तान्या, जो हमेशा से अपने पिता की लाडली थी, उसकी शादी बेंगलुरु में एक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट निशांत से हुई थी।
सत्य प्रकाश जी और उर्मिला जी का जीवन एक तय ढर्रे पर चल रहा था। साल के छह महीने वे लंदन में अर्णव के पास बिताते और बाकी के छह महीने भारत में। जब वे भारत में होते, तो अपनी सोसाइटी के लोगों से मिलना-जुलना, शाम को पार्क में टहलना और अपने पुराने साथियों के साथ समय बिताना उनकी दिनचर्या थी। उनके सामने वाले फ्लैट में रहने वाले हरीश जी, जो बैंक से रिटायर थे, सत्य प्रकाश जी के सबसे घनिष्ठ मित्र थे। दोनों अक्सर शाम को साथ बैठकर देश-दुनिया की बातें करते, शतरंज खेलते और पुराने दिनों की यादें ताज़ा करते। हरीश जी हमेशा कहते कि सत्य प्रकाश भाई, आपकी औलाद तो विदेशों में नाम कमा रही है, बड़ा गर्व होता होगा। सत्य प्रकाश जी मुस्कुरा देते, लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक अजीब सा खालीपन छिपा रहता।
सत्य प्रकाश जी हरीश जी से अक्सर कहते थे कि जब तक हम लोगों के बीच आते-जाते हैं, मन हल्का रहता है। चार बातें उनसे कीं, चार अपनी सुनाईं, तो दिन का भार उतर जाता है। लेकिन जैसे ही घर का दरवाज़ा बंद होता है, यह बड़ा सा घर किसी सन्नाटे की गुफा जैसा लगने लगता है। लंदन जाने की तारीखें जब नज़दीक आतीं, तो उर्मिला जी महीनों पहले से तैयारी शुरू कर देतीं—अर्णव की पसंद की भुनी हुई मठरी, घर का बना आम का अचार, बेसन के लड्डू और न जाने क्या-क्या।
परंतु पिछले दो-तीन वर्षों से लंदन जाने का उत्साह धीरे-धीरे कम होने लगा था। वहां का भव्य जीवन, सजी-धजी सड़कें और गाड़ियों की चमक भी उनके अंदर की तन्हाई को नहीं भर पाती थी। अर्णव और रिया दोनों सुबह सात बजे काम पर निकल जाते और शाम को आठ बजे से पहले कभी नहीं लौटते। शनिवार और रविवार को उनकी अपनी पार्टियां, वीकेंड ट्रिप्स या फिर दोस्तों के साथ आउटिंग तय होती थी। सत्य प्रकाश जी और उर्मिला जी दिनभर उस कांच की खिड़की से बाहर गिरती बर्फ या बारिश को देखते रहते। वहां किसी से बात करने की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि आसपास कोई किसी को पहचानता तक नहीं था। एक दिन सत्य प्रकाश जी ने अर्णव से कहा था कि बेटा, तूने इतनी तरक्की कर ली है, अब तो भारत में भी बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ्तर हैं। तू वापस क्यों नहीं आ जाता? हमारे पास जो कुछ है, वो सब तेरा ही तो है। यहां परदेस में पूरा दिन कटता ही नहीं।
अर्णव ने उस समय एक फीकी हंसी हंसकर कहा था कि पापा, आप भी कैसी बातें करते हैं। यहां की लाइफस्टाइल, यहां का वर्क कल्चर भारत में कहां मिलेगा? और फिर आप लोग साल में छह महीने यहां आ ही तो जाते हैं। वहां भी तो आपके पास सब कुछ है—नौकर-चाकर हैं, बड़ी गाड़ी है, पेंशन है, किसी चीज़ की कमी तो नहीं है। सत्य प्रकाश जी कुछ कह न सके। वे कहना चाहते थे कि बेटा, सब कुछ है पर तू नहीं है, लेकिन वे चुप रह गए। माता-पिता अक्सर अपनी संतानों की व्यस्तताओं के आगे अपने अरमानों का गला घोंट देते हैं।
इस बार जब सत्य प्रकाश जी और उर्मिला जी लंदन से लौटे, तो वे तय समय से दो महीने पहले ही वापस आ गए थे। उनके चेहरे की चमक गायब थी और आंखों के नीचे गहरी चिंता की लकीरें थीं। हरीश जी ने जब उन्हें देखा, तो तुरंत भांप गए कि कुछ तो गलत हुआ है। शाम को जब दोनों पार्क की बेंच पर बैठे, तो हरीश जी ने आत्मीयता से पूछा कि सत्य प्रकाश जी, इस बार आप बहुत जल्दी लौट आए और चेहरा भी बुझा-बुझा सा है, क्या बात है? सब कुशल तो है ना?
सत्य प्रकाश जी बहुत देर तक चुप रहे। उनकी नज़रें ज़मीन पर टिकी थीं। फिर एक गहरी सांस लेकर उन्होंने कहा कि हरीश भाई, बेटी तो अपने ससुराल की हो जाती है, उस पर हमारा कोई ज़ोर या हक़ नहीं रहता। बेटा हमारा अपना था, जिसके लिए हमने सब कुछ दांव पर लगा दिया। पर इस बार लंदन में मुझे समझ आया कि हम उनके जीवन में प्यार नहीं, बल्कि एक भारी-भरकम रुकावट बन चुके हैं।
हरीश जी ने चौंक कर पूछा कि यह आप क्या कह रहे हैं?
सत्य प्रकाश जी की आवाज़ भर्रा गई। उन्होंने बताया कि लौटने से दो दिन पहले रात के वक्त वे पानी पीने रसोई की तरफ गए थे। ड्रॉइंग रूम में अर्णव और रिया धीमी आवाज़ में बहस कर रहे थे। रिया कह रही थी कि अर्णव, तुम्हारे पेरेंट्स हर साल छह महीने के लिए यहां आकर जम जाते हैं। हमारी पर्सनल लाइफ पूरी तरह खत्म हो जाती है। मैं पूरे हफ्ते काम के बाद वीकेंड पर रिलैक्स करना चाहती हूं, दोस्तों को बुलाना चाहती हूं, अपनी मर्ज़ी से जीना चाहती हूं। पर इनके आते ही सब पर पाबंदी लग जाती है। इनका खाना अलग, इनकी दवाइयों का ध्यान रखो। जब उन्हें अकेला रहने की आदत नहीं है, तो तुम वहीं भारत में उनके लिए कोई अच्छा सा केयरटेकर रख दो, पैसे ज़्यादा भेज दिया करो। हर साल इतनी लंबी छुट्टी लेकर यहां आने का क्या तुक है?
और अर्णव? अर्णव ने अपनी पत्नी का विरोध करने के बजाय दबी ज़बान में कहा था कि रिया, मैं तुम्हारी बात समझता हूं, मुझे भी बहुत अनकंफर्टेबल लगता है, पर मैं सीधे-सीधे पापा को कैसे बोलूं? थोड़ा सब्र करो, इस बार मैं उन्हें बातों-बातों में समझा दूंगा कि वे अगली बार से कम दिनों के लिए आएं।
सत्य प्रकाश जी ने कहा कि हरीश भाई, उस रात मुझे लगा जैसे मेरी छाती पर किसी ने भारी पत्थर रख दिया हो। जिस बेटे को अपनी बांहों में पालकर बड़ा किया, जिसके एक बार खांसने पर हम रात-रात भर जागते थे, आज उसे हमारी मौजूदगी अपने जीवन में बंधन लगने लगी थी। हम अगले ही दिन का टिकट करवाकर चुपचाप चले आए। अर्णव या बहू ने एक बार भी ज़िद करके नहीं पूछा कि आप इतनी जल्दी क्यों जा रहे हैं। बस एयरपोर्ट छोड़ दिया और अपनी औपचारिकता पूरी कर ली।
उस दिन के बाद से सत्य प्रकाश जी गुमसुम रहने लगे। शरीर तो बुढ़ापे की मार झेल ही रहा था, मन भी जवाब देने लगा था। वे सोचते कि जब तक दोनों साथ हैं, तब तक तो किसी तरह कट रहा है, पर अगर इनमें से कोई एक पहले चला गया, तो दूसरा इस अकेलेपन के भयानक समंदर में कैसे तैरेगा? क्या औलाद को केवल पैसे भेज देने से माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेनी चाहिए? क्या यही वह आधुनिकता है जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी झोंक दी थी?
एक दिन दोपहर को सत्य प्रकाश जी को अचानक सीने में भयानक दर्द उठा। वे सोफे पर गिर पड़े और पसीने से तरबतर हो गए। उर्मिला जी घबरा गईं। हाथ-पांव कांपने लगे। उन्होंने थरथराते हाथों से सबसे पहले हरीश जी को फोन लगाया। हरीश जी ने बिना एक पल गंवाए अपनी गाड़ी निकाली और सत्य प्रकाश जी को लेकर शहर के सबसे बड़े हृदय रोग अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों ने तुरंत उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया। डॉक्टरों का कहना था कि यह गंभीर दिल का दौरा था, अगर पंद्रह मिनट की भी देरी होती तो कुछ भी अनहोनी हो सकती थी।
हरीश जी पूरे तीन दिन अस्पताल में डटे रहे। दवाइयों की व्यवस्था, डॉक्टरों से बात करना, उर्मिला जी को ढांढस बंधाना—सब उन्होंने एक सगे भाई की तरह संभाला। जब अर्णव को फोन पर इस बात की सूचना दी गई, तो उसने बेहद घबराए हुए लहज़े में मां से कहा कि मम्मा, यह कैसे हो गया? पापा को तुरंत बेस्ट ट्रीटमेंट दिलवाइए। मैं यहां से तुरंत पैसे ट्रांसफर कर रहा हूं। कोई भी सुपर स्पेशलिस्ट चाहिए तो बुलाइए।
उर्मिला जी ने एक ठंडी सांस ली और बेहद शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा कि बेटा, पैसों की कोई कमी नहीं है तेरे पापा की पेंशन और बचत से सब हो रहा है। और यहां हरीश भाई हैं, उन्होंने सब संभाल लिया है। तू अपने काम में व्यस्त रह, चिंता मत कर। और उन्होंने फोन काट दिया। अर्णव ने यह तक नहीं कहा कि वह पहली फ्लाइट पकड़कर भारत आ रहा है। उसने बस अपने कर्तव्य का दायरा पैसों तक सीमित मान लिया था।
परंतु जैसे ही यह खबर बेंगलुरु में तान्या को मिली, वह अपने पति निशांत के साथ अगली ही सुबह पुणे पहुंच गई। अस्पताल के गलियारे में जब तान्या ने अपने पिता को बेड पर कमज़ोर और लाचार देखा, तो वह फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने अपने पिता का हाथ अपने माथे से लगा लिया और बोली कि पापा, आप इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं? आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?
तान्या के आने के बाद सत्य प्रकाश जी के चेहरे पर जो सुकून आया, वह किसी भी महंगी दवा से कहीं अधिक असरदार था। तान्या ने पूरे दस दिन अस्पताल और घर में रहकर अपने माता-पिता की दिन-रात सेवा की। वह अपने हाथों से दलिया बनाकर खिलाती, समय पर दवाइयां देती और अपने पिता को कहानियां सुनाकर उनका मन बहलाती। दस दिन बाद जब निशांत का ऑफिस का काम आया, तो तान्या को वापस जाना पड़ा। जाते समय उर्मिला जी और सत्य प्रकाश जी के चेहरे पर फिर वही पुराना डर और तन्हाई तैरने लगी।
सत्य प्रकाश जी की तबीयत अब पहले जैसी नहीं रही थी। वे अक्सर कमज़ोर महसूस करते थे। अर्णव हर रविवार को फोन करके अपनी औपचारिकता पूरी कर लेता था। वह मां को हिदायतें देता कि पापा को बाहर मत जाने देना, यह गोली समय पर देना, डाइट का ध्यान रखना। लेकिन छह महीने बीत जाने के बाद भी उसने एक बार भी भारत आने की ज़हमत नहीं उठाई।
इसी बीच, एक दिन तान्या का अचानक फोन आया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा उत्साह था। उसने कहा कि पापा, निशांत को उनकी कंपनी ने पुणे के नए सेंटर का हेड बना दिया है और उनका ट्रांसफर पर्मानेंटली पुणे हो गया है। हम लोग अगले हफ्ते हमेशा के लिए पुणे शिफ्ट हो रहे हैं!
सत्य प्रकाश जी और उर्मिला जी की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। अगले ही हफ्ते तान्या और निशांत पुणे आ गए। उन्होंने शहर के दूसरे छोर पर एक बड़ा मकान किराए पर लिया था। घर का सारा सामान सेट करने के बाद, एक दिन रविवार की सुबह तान्या और निशांत अपनी गाड़ी लेकर गुलमोहर हाइट्स पहुंचे।
तान्या ने सीधे अंदर आकर अपनी मां से कहा कि मां, अपनी और पापा की अलमारियां खाली कीजिए और सारा ज़रूरी सामान पैक कर लीजिए।
सत्य प्रकाश जी ने चकित होकर पूछा कि बेटा, यह क्या कह रही हो? सामान क्यों पैक करना है?
निशांत ने आगे बढ़कर अपने ससुर के दोनों हाथ थाम लिए और बहुत ही आदर से कहा कि बाबूजी, हमने पुणे केवल अपने करियर के लिए नहीं चुना है। हमने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि हम जानते हैं कि इस उम्र में आपको हमारी और हमें आपके साए की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। आप दोनों अब इस बड़े और सूने घर में अकेले नहीं रहेंगे। आप हमारे साथ चलेंगे। हमारे उस नए घर में आपका कमरा सबसे आगे और सबसे बड़ा है।
सत्य प्रकाश जी की आंखें भर आईं। वे संकोच में बोले कि बेटा निशांत, यह तुम क्या कह रहे हो? समाज क्या कहेगा? दामाद और बेटी के घर में माता-पिता का रहना हमारे संस्कारों में ठीक नहीं माना जाता। लोग कहेंगे कि बेटा होते हुए भी बेटी के घर पड़े हैं।
निशांत ने मुस्कुराते हुए बड़ी शालीनता से कहा कि बाबूजी, संस्कार अपनों को सहारा देना सिखाते हैं, अकेलेपन में घुट-घुट कर मरने के लिए छोड़ देना नहीं। और समाज तब कहां था जब आप अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे थे? अगर एक बेटा अपने मां-बाप को अपनी आज़ादी में रुकावट समझकर छोड़ सकता है, तो एक दामाद को बेटा बनकर अपने मां-बाप की सेवा करने का हक़ क्यों नहीं हो सकता? तान्या आपकी बेटी है, तो मैं भी आपका बेटा हूं। अब कोई बहस नहीं होगी।
तान्या ने अपनी मां के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए उनका सूटकेस पैक करने लगी। घर के सभी खिड़की-दरवाज़े बंद किए गए, मुख्य दरवाज़े पर ताला लगाया गया।
निकलने से ठीक पहले, सत्य प्रकाश जी सामने वाले फ्लैट में हरीश जी से मिलने गए। उन्होंने हरीश जी को गले लगाया। सत्य प्रकाश जी की आंखों में इस बार उदासी के नहीं, बल्कि तृप्ति और कृतज्ञता के आंसू थे। उन्होंने हरीश जी से कहा कि भाई हरीश, आज ज़िंदगी ने मुझे एक बहुत बड़ा सबक दिया है। हम माता-पिता बच्चों को दुनिया की सबसे बेहतरीन सुख-सुविधाएं, डिग्रियां और ऊंची उड़ान देने की चाह में यह भूल जाते हैं कि उन्हें इंसानियत और अपनेपन के संस्कार भी दें। जब बच्चों को अकेले रहने की आदत हो जाती है, तो उन्हें बड़े-बुजुर्गों का प्यार भी एक बंधन और पाबंदी लगने लगता है। पर ईश्वर का शुक्र है कि उसने हमारे जीवन में अंधेरा नहीं होने दिया। आज मुझे समझ आया कि बेटा हो या बेटी, जो सुख-दुख में आपके साथ खड़ा रहे, वही आपकी असली औलाद है।
सत्य प्रकाश जी और उर्मिला जी जब तान्या और निशांत के साथ उस नई गाड़ी में बैठे, तो उनका मन हल्का था। शहर की सड़कें वही थीं, धूप भी वही थी, लेकिन अब उस सूनेपन की जगह अपने बच्चों की आत्मीयता की ठंडी छांव थी। एक बिखरता हुआ परिवार फिर से एक खुशहाल घोंसले में तब्दील हो चुका था, जहां प्यार का कोई बंधन नहीं, बल्कि अपनों के होने का अटूट सुकून था।
माता-पिता हमारी ज़िंदगी की वो मज़बूत जड़ें होते हैं जिनके दम पर हम फलते-फूलते हैं। जब वही जड़ें कमज़ोर होने लगें, तो उन्हें सींचना हमारा कर्तव्य बन जाता है। आधुनिक जीवनशैली और आज़ादी की चाह में अक्सर लोग यह भूल जाते हैं कि जिस आज़ादी का वे आनंद ले रहे हैं, वह उनके मां-बाप के अनगिनत समझौतों की बदौलत मिली है। क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में बेटी और दामाद भी बेटों से बढ़कर सहारा बन सकते हैं? और क्या अकेलेपन से जूझते बुज़ुर्गों के प्रति समाज की सोच अब बदलनी चाहिए? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखक : बालेश्वर गुप्ता