इस बार नहीं – श्वेता अग्रवाल

अपनी माँ की बात सुनते ही निरवी स्तब्ध रह गई। उसके मुँह से कोई शब्द ही नहीं निकला।

वह चुपचाप बुत बनी आँखें फाड़े अपनी माँ की ओर देखती ही रह गई।

तभी पास में खड़ी उसकी छोटी बहन आध्या ने उसके बगल में सोए नन्हे से प्रत्यय की ओर अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन निरवी ने ‘शायद जिंदगी में पहली बार’ उसका बढ़ा हुआ हाथ रोक दिया।

यह देखकर आध्या और उसकी माँ दोनों ही अचंभित रह गईं।

आध्या अपना हाथ छुड़ाते हुए गुस्से से चिल्लाई—

“दीदी, यह क्या बदतमीजी है!”

यह सुनकर निरवी ने शांत मगर मजबूत शब्दों में जवाब दिया, “आध्या तुम प्रत्यय को नहीं ले सकती।”

यह सुनते ही निरवी की माँ ने तेज नजरों से उसकी ओर देखते हुए कहा—

“निरवी, हाथ हटा। प्रत्यय को आध्या को दे दे। तेरे पास तो निलय है। अगर प्रत्यय को इसकी गोदी में डाल देगी तो आध्या की भी सूनी गोद भर जाएगी। इसमें तुझे क्या दिक्कत है?”

निरवी ने प्रत्यय को उठाकर अपने सीने से लगा लिया। फिर अपनी माँ की ओर देखकर वो बोली—

“माँ, इस बार नहीं!”

“यह कोई सामान नहीं जो आध्या को पसंद आ गया और मैंने उठा कर दे दिया।”

“बड़ी बहन होकर अपनी छोटी बहन की खुशियों के बारे में नहीं सोच रही। कैसी बहन है तू?” उसकी माँ ने गुस्से से उबलते हुए कहा।

“दीदी यह क्या पागलपन है, दे दो मुझे!” कहते हुए आध्या ने प्रत्यय को अपनी गोद में लेने की कोशिश की, लेकिन निरवी बच्चे को सीने से चिपकाए बेड के कोने में सिमट कर बैठ गई।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और अनिकेत हाथ में दवाइयों की थैली लिए अंदर आया। निरवी को इस तरह सहमी और बच्चे को सीने से भींचे देख उसने पूछा, “निरवी, क्या हुआ? ऐसे क्यों बैठी हो?”

अनिकेत को देखते ही माँ ने तुरंत कहा, “देख लो दामाद जी, यह तो प्रत्यय को आध्या को देने से साफ इनकार कर रही है!”

यह सुनते ही निरवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने अविश्वास से माँ की ओर देखा, “माँ, आपने अनिकेत से बात कर ली और मुझसे पूछना तक जरूरी नहीं समझा?”

माँ ने बेपरवाही से मुँह बनाते हुए कहा, “इसमें पूछने वाली क्या बात है? तू अपनी बहन को मना करेगी क्या?”

माँ की बात सुनकर निरवी का कलेजा फट पड़ा। वह तड़पकर अनिकेत की ओर मुड़ी और भीगी आँखों में ढेर सारा रोष और शिकवा भरकर बोली—

“और आपने अनिकेत? आपने भी मुझे बताना ज़रूरी नहीं समझा? आपने अपने-आप हाँ कैसे कर दी? क्या इस बच्चे पर सिर्फ आपका हक़ है, मेरा कुछ भी नहीं? नौ महीने मैंने इसे अपनी कोख में पाला है, आप होते कौन हैं इसे किसी को देने का फैसला करने वाले?”

निरवी की यह तल्खी और अविश्वास देखकर अनिकेत एक पल के लिए सन्न रह गया, फिर उसने आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा—

“निरवी, शांत हो जाओ। मैंने कोई हाँ नहीं की है। माँ जी ने बात ज़रूर की थी, लेकिन मैंने उसी वक़्त साफ़ कह दिया था कि यह फैसला केवल और केवल तुम्हारा होगा, मेरा या किसी और का नहीं।”

अनिकेत की बात सुनकर निरवी आश्चर्य से अपनी मां की ओर देखने लगी। बचपन से उसके अंदर जमा हुआ सारा दर्द आँसू बनकर बह निकला।

निरवी और आध्या दोनों जुड़वा बहनें। निरवी आध्या से मात्र 5 मिनट बड़ी थी।

लेकिन, इस 5 मिनट की बड़ी ने उसे इतना बड़ा बना दिया कि उसकी हर चीज़ पर आध्या अपना हक ही समझने लगी। ‘जिद करना आध्या का और समझौता करना निरवी का स्वभाव ही बन गया।’

आज से 25 साल पहले का समय उसकी आँखों के सामने तैर गया। जब वह बाज़ार से पापा के साथ एक सुंदर सी गुड़िया खरीद कर लाई थी। वह खुशी से उछलते हुए गुड़िया लेकर घर में घुसी और अभी उसने उस गुड़िया से खेलना भी शुरू नहीं किया था कि आध्या अंदर कमरे से दौड़ते हुए आई और गुड़िया देखकर पैर पटक-पटक कर रोने लगी। “मुझे यह चाहिए। मुझे यह चाहिए।”

उसे यूँ रोते देखकर पापा ने निरवी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा था—

“बेटा, अपनी छोटी बहन को गुड़िया दे दो।”

निरवी ने अपना मन मसोस कर वह गुड़िया आध्या की ओर बढ़ा दी थी। आध्या को खुश देखकर उसके पापा के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी।

लेकिन किसी की भी नज़र निरवी के उदास और मायूस चेहरे पर नहीं गई। फिर तो यह सिलसिला ही चल पड़ा। आध्या ज़रा सा रो देती या जिद करती और उसका सामान आध्या को दिलवा दिया जाता। चाहे वह निरवी के लिए लाई हुई नई ड्रेस होती या स्कूल का नया बैग। निरवी की जो भी चीज़ आध्या को पसंद आ जाती वह उसी की हो जाती।

एक दिवाली पर दोनों ने अपनी-अपनी पसंद की ड्रेस खरीदी थी। आध्या ने रेड कलर का गाउन खरीदा और निरवी ने लाइट ग्रीन कलर का लहंगा।

जब निरवी लाइट ग्रीन कलर का लहंगा पहनकर तैयार हुई तो आध्या ने जिद पकड़ ली और तब तक नहीं शांत हुई जब तक कि निरवी ने वह लहंगा उसे नहीं दिया।

निरवी ने तब पहली बार मना करने की कोशिश भी की थी, तब माँ ने उसे यह कहकर चुप कर दिया था कि “तू अपनी छोटी बहन की खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकती? क्या हो जाएगा अगर तू गाउन पहन लेगी और आध्या लहंगा। आखिर छोटी बहन है तेरी।”

माँ की बात सुनकर आध्या ने तुरंत उसके हाथ से वह ग्रीन लहंगा छीन लिया और खुशी से उछलने लगी थी।

यह देखकर उसकी माँ ने हँसते हुए कहा था, “निरवी देख इस लहंगे को लेते ही तेरी छोटी बहन कितनी खुश हो गई है।”

लेकिन मेरी खुशियों का क्या, यह सोचते हुए निरवी चुपचाप उसे ग्रीन लहंगा ले जाते देखती रह गई थी।

धीरे-धीरे आध्या और जिद्दी होती गई और निरवी ज़रूरत से ज्यादा सहनशील और समझौतावादी।

इसी तरह समय बीतता गया। एक दिन निरवी को लड़के वाले देखने आए। गोरे-चिट्टे, हैंडसम डॉक्टर आर्यन को देखते ही आध्या का दिल उस पर आ गया। उसने जिद पकड़ ली कि वह तो आर्यन से ही शादी करेगी।

“माँ दीदी के लिए कोई दूसरा रिश्ता खोज दो ना। मुझे तो आर्यन के साथ ही शादी करनी है, वैसे भी आर्यन की जोड़ी मेरे साथ ही अच्छी लगेगी।”

यह सुनकर निरवी को बहुत गुस्सा आया था। लेकिन इससे भी बड़ा झटका उसे तब लगा था जब माँ-पापा ने उसकी बात पर सहमति जताई।

“हाँ बात तो आध्या की ठीक है। आर्यन की जोड़ी जितनी आध्या के साथ जमेगी उतनी निरवी के साथ नहीं। आर्यन का संबंध आध्या के साथ ही पक्का कर देते हैं। निरवी के लिए दूसरा रिश्ता खोज कर दोनों की शादी एक ही साथ कर देंगे।”

किसी ने निरवी से कुछ पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा था। किसी को भी उसके आँसुओं से कोई सरोकार न था।

पापा ने बस उसके सर पर हाथ फेरते हुए इतना ही कहकर, “निरवी बेटा देखना तेरे लिए इससे भी बढ़िया संबंध खोजकर लाएँगे। मेरी रानी बिटिया के लिए लड़कों की कोई कमी थोड़ी ना है,” अपना कर्तव्य पूरा कर लिया था।

लड़के वाले तो तुरंत आध्या के साथ आर्यन का संबंध करने के लिए तैयार हो गए, आखिर आध्या निरवी से ज्यादा गोरी-चिट्टी और सुंदर जो थी और उम्र में भी बस 5 मिनट का फासला था।

कुछ समय बाद निरवी का संबंध भी अनिकेत के साथ पक्का हो गया। वो एक बड़ी कंपनी में डायरेक्टर था। भले ही वह आर्यन की तरह तड़क-भड़क वाला नहीं था लेकिन स्वभाव का हीरा था।

उसने निरवी को इतना प्यार और इतना सम्मान दिया जो उसे बचपन से आज तक नहीं मिला था। साल भर होते ही निरवी की गोद हरी हो गई और प्यारा सा निलय उसकी झोली में आ गया। निरवी अनिकेत और निलय के साथ अपने छोटे से संसार में बहुत खुश थी, लेकिन आध्या की गोद अभी तक सूनी थी।

तमाम उपायों और इलाज के बावजूद भी अभी तक उसे मातृत्व सुख की प्राप्ति नहीं हुई थी। इसी कारण उसके और आर्यन के संबंधों में भी कड़वाहट आने लग गई थी।

तभी निरवी ने फिर से माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त किया और प्रत्यय उसकी गोद में आया, तब उसकी माॅं ने बिना उसकी मर्ज़ी जाने यह तय कर लिया कि प्रत्यय को वे आध्या को दे देंगी और आज जब वे निरवी से अस्पताल में मिलने आई तब उन्होंने उसे अपना यह फैसला सुनाते हुए कहा कि “प्रत्यय को आध्या को दे दो।” 

उन्हें पूरा यकीन था कि हर बार की तरह इस बार भी निरवी मान जाएगी। लेकिन, अब बात उसके अंश की थी । उसके जिगर के टुकड़े की। इसलिए इस बार निरवी किसी भी तरह का समझौता नहीं करने वाली थी।

उसे अफ़सोस हो रहा था कि उसने बचपन से ही अपने अधिकारों का गला घोंटकर आध्या की हर गलत जिद के आगे झुकने की आदत क्यों डाल ली थी। 

तभी उसके कानों में अनिकेत की तेज आवाज पड़ी।

“सासू माँ, आपने मुझसे बात की थी और मैंने आपको उसी वक्त कहा था कि इस बारे में निरवी से पूछिए। अब जब निरवी ने साफ इनकार कर दिया है, तो बात यहीं खत्म होती है। हम अपना बच्चा किसी को नहीं दे सकते। इस बार जो निरवी चाहेगी, वही होगा।”

अनिकेत ने आगे कहा, “रही बात आध्या की सूनी गोद की, तो हम सब कल ही अनाथ आश्रम चलेंगे और वहाँ से एक प्यारे से बच्चे को गोद लेकर आध्या की सूनी गोद भर देंगे। इससे किसी बेसहारा बच्चे का जीवन भी संवर जाएगा और आध्या भी माँ बन जाएगी।”

यह सुनकर आध्या का मुँह उतर गया और माँ के पास अब बोलने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था।

अनिकेत ने प्यार से निरवी को सहारा देकर सुलाया और प्रत्यय को उसके पास लिटा दिया।

निरवी ने आँसू भरी आँखों से सम्मान से अनिकेत को देखा। आज पहली बार किसी ने उसके हक और उसकी ममता के लिए खड़े होने का हौसला दिखाया था।

उसने प्रत्यय को अपने सीने से लगा लिया और आँखें बंद कर लीं।

देर से ही सही लेकिन उसने आखिर समझ ही लिया था 

“हर बार समझौता करना ही सही नहीं होता… कभी-कभी अपने हक के लिए खड़ा होना भी जरूरी होता है।”

धन्यवाद 

साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता- #अफ़सोस 

शीर्षक- इस बार नहीं 

लेखिका- श्वेता अग्रवाल, धनबाद झारखंड।

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