विरासत के धागे – सुधा जैन

जैसे ही राघवेंद्र नित्या को लेकर हवेली की चौखट पर पहुंचे, कौशल्या देवी और शालिनी का चेहरा उतर गया। दोनों को उम्मीद थी कि राघवेंद्र किसी तरह कोई लड़का ही लाएंगे। कौशल्या देवी ने उसी वक्त अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि एक पराई लड़की उनके खानदान की वारिस कैसे बन सकती है? लड़कियां … Read more

लहू के रंग

 इतना सुनते ही दीनदयाल का पत्थर सा दिखने वाला चेहरा पिघलने लगा। उसकी आँखों के किनारे भीग गए। उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अपनी आँखें पोंछीं और रुंधे हुए गले से बोला, “आपने सब सच पता कर लिया वकील साहब। हाँ, मेरा भाई बहुत बड़ा आदमी है। उसके पास आज गाड़ियां हैं, नौकर-चाकर हैं, … Read more

फ़र्ज़ की वेदी

शाम के धुंधलके ने अभी घर के आँगन में कदम ही रखा था कि तभी अंदर के कमरे से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। मीरा दौड़कर अपनी सास, शांति देवी के कमरे में पहुँची। शांति देवी ज़मीन पर बेसुध पड़ी थीं। उनके हाथ से पानी का गिलास छूटकर टूट चुका था। मीरा की साँसें जैसे गले … Read more

कच्चे धागे

रिया के इन कड़वे और जहरीले शब्दों ने डाइनिंग टेबल पर एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया। हर कोई सन्न रह गया। मीरा, जिसने हमेशा अमन को अपने छोटे भाई या यूं कहें कि अपने बेटे की तरह माना था, उसके लिए यह आरोप किसी खंजर के घोंपे जाने से कम नहीं था। उसकी आँखों से … Read more

प्रतिष्ठा का मुखौटा

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए … Read more

आखिरी पड़ाव का दु:ख

पिछले कुछ दिनों से मुआं पेशाब बहुत आ रहा है। रात को दो-तीन बार मुझे उठना पड़ता है। घुटनों के दर्द के कारण जान निकल जाती है मेरी ! मन करता है, कमरे के बाहर वाली नाली पर ही बैठ जाऊँ, पर बहू की झिड़कों से डरती नहीं बैठती। एक बार बैठी थी तो अगली … Read more

अनुपमा का प्रेम

  ”चाहै जिसे हाथ पकड़ा देने का नाम ही विवाह नहीं है। मन का मिलन न होने पर विवाह करना भूल है !” बड़ी बहू चकित होकर अनुपमा के मुंह की ओर देखती हुई बोली, ” हाथ पकड़ा देना क्या बात होती है? पकड़ा नहीं देंगे तो क्या ल़ड़कियां स्वयं ही देख-सुनकर पसंद करने के बाद … Read more

कड़ियां

राज के बाल सुलभ मन पर दादाजी की पहली छवि यह बनी थी कि दादाजी उसे अपने साथ नहीं रखना चाहते। आख़िर क्यों?       दफ़्तर के लिए तैयार होने लगा राज। उसका मन कुछ उचाट-सा हो रहा था। रह-रहकर एक ही बात उसके दिमाग में घुमड़ रही थी कि दादाजी के जीवन में … Read more

घीसू

संध्या की कालिमा और निर्जनता  में किसी कुँए पर नगर के बाहर खड़ी प्यारी स्वर लहरी गूंजने लगती। घीसू को गाने का चस्का था, परन्तु जब कोई न सुने? वह अपनी बूटी अपने लिए घोटता और आप ही पीता। जब उसकी रसीली तान दो चार को पास बुला लेती, वह चुप हो जाता। अपनी बटुई … Read more

तपिश

 आशिक मिज़ाज लगते हैं ज़नाब?  “ “  नहीं भाई, लोफर किस्म का आदमी नहीं हूँ मैं।  बरसों बाद मुल्क लौटा हूं, इसलिए चप्पा-चप्पा आंखों में भर लेना चाहता हूँ। “  मेरे लिए  अब अपनी सफाई में कुछ कहना बहुत ही ज़रूरी हो चला था, पर जाने क्या था उन भेदती छोटी-छोटी, सलेटी और  मटमैली पड़ती  … Read more

error: Content is protected !!