अनकही चीख और जागते पहरेदार

 अनुराधा अपनी बेटी के आंसुओं को पोंछते हुए आगे आई। उसने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लिया और भरी आँखों से कहा, “आरुषि, बेटा… आज अपनी इस कमजोर माँ को माफ कर देना जो तेरी खामोशी को नहीं समझ सकी। लेकिन आज तू चुप नहीं रहेगी। इस हैवान को बता कि तू कमजोर नहीं है।”

आरुषि ने अपनी माँ की आँखों में देखा, जहाँ अब कोई अविश्वास नहीं था, सिर्फ सुरक्षा और संबल था। आरुषि के नन्हें हाथों में अचानक एक गजब की ताकत आ गई। उसने आगे बढ़कर पूरी ताकत से रितेश के गाल पर एक थप्पड़ रसीद किया। पूरा हॉल उस थप्पड़ की गूंज से सन्नाटे में आ गया।

खिड़की से आती ढलती शाम की रोशनी स्टडी टेबल पर रखी खुली किताबों पर तिरछी पड़ रही थी। बारह साल की आरुषि अपनी गणित की नोटबुक के पन्ने बेचैनी से पलट रही थी। उसकी उंगलियाँ हल्की-हल्की काँप रही थीं और कान ड्राइंग रूम में चल रही बातों पर लगे थे।

कमरे के बाहर उसकी माँ, अनुराधा, रसोई में चाय की केतली चढ़ाते हुए जोर से बोली, “आरुषि! फिर वही बात? जब देखो तब अपने कमरे का दरवाजा बंद करने की कोशिश करती रहती हो। रितेश भैया आ रहे हैं, जरा उठकर नमस्ते तो कर लो। जब से वे जयपुर आए हैं, तुम्हारी पढ़ाई में कितना सहारा मिला है। शहर में नौकरी ढूंढ रहे हैं, फिर भी तुम्हारे लिए दो घंटे निकालते हैं। जरा तमीज सीखो।”

आरुषि ने अपनी किताब पर उंगलियाँ कस लीं। उसका गला सूख रहा था। वह धीमे कदमों से निकलकर रसोई की चौखट पर खड़ी हो गई और धीमी, कांपती आवाज में बोली, “मम्मी… मुझे उनसे गणित नहीं पढ़ना। आप मुझे ट्यूशन मत पढ़वाइए। मुझे उनके सामने बैठना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वे जब पास बैठते हैं, तो मुझे घबराहट होती है…”

अनुराधा ने गैस की आंच धीमी की और मुड़कर बेटी को घूरते हुए बोली, “बस, अब एक शब्द और नहीं! तुम्हारे पापा के बुआ के बेटे हैं वो। खानदान का लड़का है। गांव में उनकी माली हालत ठीक नहीं थी, इसलिए तुम्हारे पापा उन्हें यहाँ अपने पास लेकर आए ताकि उनकी तैयारी भी हो जाए और तुम्हें कोई भटकाव न हो। जब देखो तब बड़ों की शिकायत लेकर बैठ जाती हो। कोई प्यार से सिर पर हाथ रख दे या कंधे पर हाथ रखकर सवाल समझा दे, तो तुम्हें चिढ़ होने लगती है? जाओ, मुंह धोकर बैठो, वे आते ही होंगे।”

आरुषि की आँखों में आँसू छलक आए, पर माँ का कठोर चेहरा देखकर वह चुपचाप अपने कमरे में लौट आई। उसने तकिए में चेहरा छुपा लिया। वह कैसे समझाती कि वह स्पर्श सिर्फ पढ़ाई का नहीं था? वह नज़रों का भारीपन, वह बेवजह छूने का बहाना, वह बनावटी मुस्कान—ये सब उसे अंदर तक झकझोर देते थे। मगर उसकी आवाज माँ के ‘रिश्तों के मान’ के आगे खो गई थी।

अनुराधा और उसके पति, आलोक, एक मध्यमवर्गीय संजीदा परिवार थे। आलोक बैंक में शाखा प्रबंधक थे और अनुराधा ने आरुषि की देखभाल के लिए एक निजी स्कूल की अपनी नौकरी कुछ साल पहले छोड़ दी थी। परिवार में सब कुछ शांत और सुव्यवस्थित चल रहा था, जब तक आलोक के बुआ के बेटे रितेश का उनके घर में नियमित आना-जाना नहीं शुरू हुआ। रितेश ग्रेजुएट था, बातें बनाने में चतुर और बाहर से बेहद आज्ञाकारी दिखता था। आलोक ने सोचा था कि रिश्तेदार का सहारा भी हो जाएगा और आरुषि को घर पर ही मार्गदर्शन मिल जाएगा। उन्होंने अपने ही अपार्टमेंट के ग्राउंड फ्लोर पर रितेश को एक कमरा किराए पर दिलवा दिया था और खाने-पीने का जिम्मा खुद उठा लिया था।

रितेश ने धीरे-धीरे आस-पड़ोस के कुछ और बच्चों को भी शाम के वक्त पढ़ाना शुरू कर दिया था। मोहल्ले में उसकी छवि एक सीधे-सादे, मेहनती लड़के की बन गई थी। लेकिन इस मुखौटे के पीछे एक बेहद घिनौनी सोच छुपी थी, जिसे सिर्फ आरुषि की मासूम सहज बुद्धि ही भाँप पा रही थी। जब बाकी बच्चे सवालों में उलझे होते, रितेश आरुषि के बेहद करीब खिसक आता। वह उसके बालों को छूने, पीठ थपथपाने के बहाने गैर-जरूरी हरकतें करता। आरुषि जब भी पीछे हटती, वह ऐसे मुस्कुराता जैसे कुछ हुआ ही न हो।

एक दिन आलोक को किसी काम से अहमदाबाद के दौरे पर जाना पड़ा। उसी दिन अनुराधा को भी कॉलोनी की महिला समिति के एक जरूरी चैरिटी कार्यक्रम के सिलसिले में कुछ घंटों के लिए बाहर निकलना था। अनुराधा ने सोचा कि आरुषि को अकेला छोड़ने से बेहतर है कि रितेश को ऊपर बुला लिया जाए।

उसने बालकनी से नीचे आवाज दी, “रितेश! जरा ऊपर आना। मुझे दो घंटे के लिए मार्केट और क्लब जाना है। आरुषि घर पर है, तुम यहीं बैठकर अपनी पढ़ाई कर लो और इस पर भी नजर रखना।”

रितेश की आँखों में एक अजीब सी चमक कौंध गई। उसने चेहरे पर संजीदगी का भाव लाते हुए कहा, “जी भाभी, आप बेफिक्र होकर जाइए। मैं यहीं बैठा हूँ।”

आरुषि जो अपने कमरे में ड्राइंग बना रही थी, उसने जैसे ही यह सुना, उसके हाथ से रंग की पेंसिल छूट गई। वह बदहवास होकर दौड़ी और उसने माँ का पल्लू पकड़ लिया, “मम्मी, प्लीज मुझे साथ ले चलो! मैं कार में बैठ जाऊँगी, बाहर खड़ी रहूँगी, पर मुझे घर पर मत छोड़ो।”

अनुराधा ने झल्लाकर उसका हाथ छुड़ाया, “पागल हो गई हो क्या? धूप में क्यों घूमोगी? घर में बैठो, पढ़ाई करो।”

तभी दरवाजे की घंटी बजी। संयोग से उसी वक्त आलोक का दौरा एक दिन के लिए टल गया था और वे अचानक घर लौट आए थे। आलोक को देखते ही आरुषि दौड़कर उनके गले लग गई। उसकी सांसें फूल रही थीं और वह थर-थर कांप रही थी।

आलोक ने हैरान होकर पूछा, “क्या हुआ गुड़िया? इतनी घबराई हुई क्यों हो? तबीयत ठीक नहीं है क्या?”

अनुराधा ने हाथ में पर्स संभालते हुए कहा, “कुछ नहीं जी, बस नखरे हैं इसके। जब से रितेश भैया आए हैं, यह अजीब-अजीब बहाने बनाती है। मैं जा रही हूँ, आप आ ही गए हैं तो देख लीजिएगा।”

आलोक ने आरुषि के माथे को चूमा और सोफे पर बैठ गए। तभी रितेश कमरे में दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक महंगी पेस्ट्री का डिब्बा था। उसने बड़ी आत्मीयता से कहा, “अरे भैया, आप आ गए! देखिए, मैं आरुषि के लिए उसकी पसंदीदा चॉकलेट पेस्ट्री लाया था। बच्ची आजकल बहुत गुमसुम रहती है, सोचा मूड अच्छा हो जाएगा।”

आरुषि ने पेस्ट्री के डिब्बे को देखते ही नफरत से हाथ झटक दिया। डिब्बा फर्श पर गिर गया।

आलोक का पारा चढ़ गया। उन्होंने डांटते हुए कहा, “आरुषि! यह क्या बदतमीजी है? भैया तुम्हारे लिए प्यार से लाए हैं और तुम ऐसे फेंक रही हो? माफी मांगो उनसे!”

आरुषि की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने रोते हुए कहा, “पापा, मुझे इनकी कोई चीज नहीं चाहिए! मुझे इनसे डर लगता है! आप इन्हें यहाँ से जाने के लिए कहिए!”

रितेश ने तुरंत चेहरे पर मासूमियत और आहत होने का मुखौटा ओढ़ लिया। उसने बनावटी हंसी हंसते हुए कहा, “कोई बात नहीं भैया, बच्ची है। शायद पढ़ाई का दबाव ज्यादा है, इसलिए चिढ़ रही है। आप उस पर गुस्सा मत कीजिए।”

आलोक ने एक गहरी सांस ली। वे अपनी बेटी के इस अचानक बदले व्यवहार से परेशान थे, लेकिन उन्हें लगा कि शायद यह उम्र का कोई मिजाज है या पढ़ाई से जी चुराने का बहाना। उन्होंने बात को वहीं रफा-दफा कर दिया।

चार दिन बाद आरुषि का तेरहवां जन्मदिन था। आलोक और अनुराधा ने सोसाइटी के कम्युनिटी हॉल में एक छोटी सी पार्टी रखी थी। पूरे हॉल को नीले और सफेद गुब्बारों से सजाया गया था। आरुषि ने एक सुंदर नीली फ्रॉक पहनी थी, पर उसके चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो किसी बच्चे के जन्मदिन पर होनी चाहिए। वह बार-बार दरवाजे की तरफ देखती और जब भी रितेश उस तरफ आता दिखता, वह अपनी सहेली नव्या के पीछे छुप जाती।

नव्या, जो आरुषि की सहपाठी और सबसे अच्छी दोस्त थी, उसने आरुषि की घबराहट को महसूस किया। केक काटने के बाद जब सभी मेहमान संगीत और खाने-पीने में व्यस्त हो गए, तो नव्या ने आरुषि से पूछा, “आरुषि, तू इतनी डरी हुई क्यों है? तेरे अंकल तुझे घूर क्यों रहे हैं?”

आरुषि की आँखों में आँसू भर आए। उसने फुसफुसाते हुए कहा, “नव्या, मुझे बहुत डर लग रहा है। वे अच्छे नहीं हैं। मम्मी-पापा मेरी बात नहीं सुनते।”

नव्या ने अपनी दोस्त का हाथ मजबूती से थाम लिया और कहा, “तू चिंता मत कर, मैं तेरे साथ हूँ।”

तभी सोसाइटी की मेन लाइन में कोई तकनीकी खराबी आई और पूरा हॉल कुछ सेकंड के लिए अंधेरे में डूब गया। हालांकि जनरेटर तुरंत चालू हो गया, लेकिन पीछे वाले कॉरिडोर और कम्युनिटी हॉल के स्टोर रूम की तरफ की बत्तियाँ बंद ही रह गईं।

आरुषि अपना गिफ्ट बैग रखने के लिए हॉल के पीछे वाले कमरे की तरफ गई थी। नव्या उसके पीछे-पीछे जा ही रही थी कि उसने देखा रितेश भी दबे पाँव उसी गलियारे की तरफ बढ़ा। नव्या को कुछ अनहोनी का अंदेशा हुआ।

अचानक अंधेरे गलियारे से आरुषि की दबी हुई चीख और कुछ गिरने की आवाज आई। नव्या बिना एक पल गंवाए भागी और उसने सीधे हॉल में खड़े आलोक और अनुराधा को आवाज दी, “अंकल! आंटी! जल्दी चलिए! आरुषि स्टोर रूम की तरफ है और वो चिल्ला रही है!”

अनुराधा के हाथ से कोल्ड ड्रिंक का गिलास छूटकर गिर पड़ा। आलोक के चेहरे का रंग उड़ गया। दोनों बदहवास होकर पीछे के गलियारे की ओर दौड़े। आलोक ने देखा कि कॉरिडोर का सब-मीटर का स्विच किसी ने जानबूझकर नीचे गिरा दिया था। आलोक ने झटके से स्विच ऊपर किया। लाइट जल उठी।

सामने का दृश्य देखकर आलोक और अनुराधा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

स्टोर रूम का आधा खुला दरवाजा था। अंदर रितेश ने आरुषि का मुंह अपने एक हाथ से दबा रखा था और दूसरे हाथ से उसे दीवार की तरफ धकेल रहा था। आरुषि की आँखें खौफ से फटी हुई थीं और वह खुद को छुड़ाने के लिए छटपटा रही थी। रोशनी होते ही रितेश सकपका गया और उसने झटके से हाथ पीछे खींच लिए।

कमरे में सन्नाटा छा गया, जिसे सिर्फ आरुषि की हिचकियों ने तोड़ा। वह भागकर अपनी माँ से लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी।

अनुराधा का पूरा शरीर कांपने लगा। उसे अपने वे सारे शब्द याद आने लगे जो उसने बेटी को डांटते हुए कहे थे—”तुम बड़ों की शिकायत करती हो”, “संस्कार सीखो”, “वह तुम्हारा भाई जैसा है”। आत्मग्लानि की एक असहनीय लहर ने उसके दिल को चीर दिया।

आलोक की आँखों में खून उतर आया। जो इंसान रिश्तेदारी, शराफत और दया के नाम पर उनके घर में पनाह लिए बैठा था, वह उनकी सबसे अनमोल धरोहर पर गंदी नजर गड़ाए बैठा था। आलोक ने बिना कुछ बोले रितेश का कॉलर पकड़ा और एक जोरदार तमाचा उसके चेहरे पर जड़ दिया।

रितेश लड़खड़ाकर नीचे गिरा। हॉल के बाकी मेहमान और सोसाइटी के लोग भी शोर सुनकर वहाँ जमा हो चुके थे।

रितेश हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, “भैया… मुझे माफ कर दीजिए… मेरा वो मतलब नहीं था… बच्ची गिर रही थी, मैं बस संभाल रहा था…”

“खामोश!” आलोक की आवाज हॉल में गूंज उठी। उन्होंने रितेश को कॉलर से खींचकर खड़ा किया। “संभाल नहीं रहे थे, अपनी दरिंदगी छुपा रहे थे! मैंने तुम्हें अपना भाई समझा, अपने घर की दहलीज पर बिठाया और तुमने मेरी ही बच्ची की मासूमियत को रौंदने की कोशिश की?”

अनुराधा अपनी बेटी के आंसुओं को पोंछते हुए आगे आई। उसने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लिया और भरी आँखों से कहा, “आरुषि, बेटा… आज अपनी इस कमजोर माँ को माफ कर देना जो तेरी खामोशी को नहीं समझ सकी। लेकिन आज तू चुप नहीं रहेगी। इस हैवान को बता कि तू कमजोर नहीं है।”

आरुषि ने अपनी माँ की आँखों में देखा, जहाँ अब कोई अविश्वास नहीं था, सिर्फ सुरक्षा और संबल था। आरुषि के नन्हें हाथों में अचानक एक गजब की ताकत आ गई। उसने आगे बढ़कर पूरी ताकत से रितेश के गाल पर एक थप्पड़ रसीद किया। पूरा हॉल उस थप्पड़ की गूंज से सन्नाटे में आ गया।

आलोक ने तुरंत अपना फोन निकाला और पुलिस को कॉल किया। उन्होंने किसी रिश्तेदारी की परवाह नहीं की, न ही किसी लोक-लाज के डर से बात को दबाने की कोशिश की। उन्होंने सीधे पुलिस को बुलाया और रितेश को उनके हवाले कर दिया। जाते-जाते आलोक ने सख्त लहजे में कहा, “रिश्ते खून से नहीं, नीयत और भरोसे से बनते हैं। ऐसे गंदे इंसान के लिए हमारे जीवन में कोई जगह नहीं है, इसे कानून ही सबक सिखाएगा।”

जब पुलिस रितेश को ले गई, तो आलोक और अनुराधा ने नव्या को गले से लगा लिया।

अनुराधा ने नव्या का माथा चूमते हुए कहा, “थैंक यू बेटा! अगर आज तुम्हारी समझदारी और सजगता न होती, तो शायद हम जिंदगी भर खुद को कभी माफ नहीं कर पाते।”

उस रात, घर लौटने के बाद, माहौल पूरी तरह बदल चुका था। आलोक और अनुराधा आरुषि के कमरे में फर्श पर बैठ गए। उन्होंने आरुषि को अपने सीने से लगा लिया।

अनुराधा की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे, “बेटा, हमें माफ कर दो। हमने समाज, रिश्तों और औपचारिकता को तुम्हारे सच से बड़ा मान लिया था। आज हम वादा करते हैं, आगे से तुम्हारी हर छोटी-बड़ी बात, तुम्हारी हर असहजता हमारे लिए सबसे ऊपर होगी।”

आलोक ने आरुषि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “और याद रखना आरुषि, कभी किसी गलत बात से डरना नहीं। आवाज उठाना गलत नहीं होता। तुम्हारा शरीर, तुम्हारा आत्मसम्मान सिर्फ तुम्हारा है और उसकी हिफाजत करना हमारा पहला फर्ज है।”

आरुषि ने पहली बार खुद को पूरी तरह सुरक्षित और हल्का महसूस किया। उसके चेहरे पर से डर का वह साया हमेशा के लिए हट चुका था। उसने अपने माता-पिता के आंसुओं को पोछा और मुस्कुरा दी। यह सिर्फ एक घटना का अंत नहीं था, बल्कि उस परिवार के लिए एक नई शुरुआत थी—जहाँ अब संवाद की कोई दीवार नहीं थी, और जहाँ बच्चे की आवाज को किसी भी रिश्ते से ज्यादा अहमियत मिल चुकी थी।

बच्चे जब भी किसी स्पर्श, किसी व्यक्ति या किसी माहौल से असहज महसूस करें, तो उनकी बात को ‘वहम’ या ‘बचपना’ समझकर खारिज मत कीजिए। कई बार अपनों के नकाब में ही सबसे खतरनाक चेहरे छुपे होते हैं। एक सजग अभिभावक बनिए और अपने बच्चों को यह भरोसा दिलाइए कि उनका सच हर रिश्ते से बड़ा है। आपके अनुसार, जब बच्चे अपनी असहजता बयां करें, तो माता-पिता का सबसे पहला कदम क्या होना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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