हरिशंकर जी ने आंखें बंद कर लीं। उन्हें लगा कि शायद अब जीवन की इस यात्रा का अंतिम पड़ाव आ गया है। बंद पलकों के पीछे उन्हें अपने बाबूजी का मुस्कुराता चेहरा दिखाई दिया। बाबूजी हाथ हिला रहे थे, जैसे कह रहे हों, “आ जा बबुआ, बहुत थक गया है तू।” हरिशंकर जी के मन में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं बचा था। उन्हें लगा कि यही तो संसार का चक्र है। जो उन्होंने कभी अपने पिता के साथ अनजाने में किया, आज वही उनके साथ दोहराया जा रहा था। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से बेटे की सलामती की प्रार्थना की और एक गहरी सांस खींची।
खिड़की के कांच से छनकर आती गुनगुनी धूप फर्श पर एक चौकोर टुकड़ा बना रही थी। उस चौकोर घेरे में हवा में तैरते धूल के बारीक कण किसी पुराने खेल की तरह नाच रहे थे। बिस्तर पर लेटे हरिशंकर जी की नज़रें उसी धूप के टुकड़े पर टिकी थीं। वे अपनी सूखी उंगलियों को मोड़कर धूप को मुट्ठी में बांधने की कोशिश करते, पर हर बार उंगलियों के बीच की दरार से रोशनी फिसल जाती। शरीर कमजोर हो चुका था, लेकिन स्मृतियों का वेग इतना तेज़ था कि उम्र की सारी दीवारें पलक झपकते ही ढह जाती थीं।
कमरे के एक कोने में रखी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी सहायिका मालती मोबाइल फोन की स्क्रीन पर उंगलियां फिरा रही थी। पंखे की हल्की घरघराहट के बीच फोन से निकलने वाली मद्धिम आवाज़ें कमरे के सन्नाटे को और गहरा कर रही थीं। हरिशंकर जी ने करवट बदलने की कोशिश की, तो रीढ़ की हड्डी में हल्की टीस उठी। उनके मुंह से एक धीमी कराह निकली।
मालती ने फोन किनारे रखा और चेहरे पर बनावटी तत्परता लाकर उनके पास आई, “अरे दादाजी, फिर हिलने लगे! डॉक्टर साहब ने सीधे लेटने को कहा है न। अभी तो बीपी की गोली दी थी। कुछ चाहिए क्या? पानी पीना है?”
हरिशंकर जी ने धीमे से अपनी गर्दन हिलाई, पर उनके सूखे होंठ हिलकर सिर्फ इतना बुदबुदाए, “सत्तू… थोड़ा सा…”
मालती ने माथे पर बल डालते हुए कहा, “क्या दादाजी, आप भी! इस उम्र में सत्तू पचेगा? फिर पेट खराब होगा तो मुझे ही सुनना पड़ेगा। भइया जी ने सख्त मना किया है बाहर का या ऐसा-वैसा कुछ भी देने से। चुपचाप लेटिए, मैं रेडियो पर कुछ धीमा संगीत लगा देती हूं।”
उसने टेबल पर रखा छोटा सा पुराना रेडियो ऑन कर दिया। कमरे में बांसुरी की एक शांत धुन तैरने लगी। उस धुन के कानों में पड़ते ही हरिशंकर जी की आंखें मुंद गईं और वे समय के उस पार चले गए, जहां जीवन का हर रंग आज से कहीं ज्यादा गहरा और सच्चा था।
गोरखपुर के उस छोटे से कस्बे वाले पुश्तैनी मकान के आंगन में तब नीम का घना पेड़ हुआ करता था। जेठ की तपती दुपहरी में जब गर्म हवाएं थपेड़े मारती थीं, तब उनके बाबूजी, पं. शिवशंकर जी, खाट पर बैठते ही आवाज़ लगाते थे, “अरे हरि! दौड़ के आ बबुआ, देख माई ने प्याज और हरी मिर्च कूटकर भुने चने का सत्तू घोला है। दो घूंट मारेगा तो लू छू भी नहीं पाएगी।”
हरिशंकर तब सातवीं कक्षा में पढ़ते थे। नए-नए अंग्रेजी स्कूल में दाखिला हुआ था। शहर के अमीर बच्चों के साथ उठना-बैठना शुरू हुआ था, तो मन में एक अजीब सी हीनभावना और दिखावे का अंकुर फूट रहा था। एक दिन जब बाबूजी साइकिल पर पुराना चमड़े का थैला टांगे, घुटनों से थोड़ी ऊंची धोती और बंडी पहने बारिश के मौसम में उन्हें छाता देने स्कूल के फाटक तक पहुंच गए थे, तो हरिशंकर का चेहरा शर्म से लाल हो गया था। सारे सहपाठी हंस पड़े थे। घर लौटकर हरिशंकर ने बस्ता पटकते हुए चीखकर कहा था, “बाबूजी! आपको कितनी बार कहा है कि मेरे स्कूल मत आया कीजिए इस वेशभूषा में! सब मुझे गवार समझते हैं। आप पतलून क्यों नहीं पहनते दूसरों के पिताओं की तरह?”
उस दिन शिवशंकर जी तनिक भी क्रोधित नहीं हुए थे। उन्होंने बस अपनी भीगी पगड़ी उतारी थी, मंद-मंद मुस्कुराए थे और अपने खुरदुरे हाथों से बेटे के बाल सहलाते हुए बोले थे, “अरे मेरा बबुआ साहब बनेगा तो हम भी पतलून सिलवा लेंगे। पर अभी तो इस धोती की जेब में तेरे इम्तिहान की फीस बंधी है। तू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जा, फिर हम तेरे कंधे पर हाथ रखकर शान से घूमेंगे।” उस दिन बाबूजी ने अपनी थाली की रोटी का बड़ा हिस्सा उनके कटोरे में चुपके से सरका दिया था।
रेडियो की धुन धीमी हुई और कमरे का दरवाज़ा खुलने की हल्की सी खटखटाहट से हरिशंकर जी की तंद्रा टूटी। उनका बेटा, अनुराग, कमरे में दाखिल हुआ था। औपचारिक सूट, हाथ में लैपटॉप का बैग और चेहरे पर दिनभर की थकान व व्यापारिक भागदौड़ की लकीरें। अनुराग शहर की एक बड़ी आईटी कंपनी में वरिष्ठ अधिकारी था। मकान बड़ा था, सुख-सुविधाएं भरपूर थीं, लेकिन समय की बेहद तंगी थी।
अनुराग ने पलंग के पास आकर उनके माथे पर हाथ रखा, “पापा, कैसे हैं आज? मालती, इन्होंने समय पर दवाइयां लीं?”
मालती तुरंत सीधी खड़ी हो गई, “जी भइया, सब समय पर दे दिया है। बस बीच-बीच में कुछ-कुछ खाने की ज़िद करते हैं।”
अनुराग ने पिता की ओर देखा और हल्की सी झुंझलाहट भरे स्वर में कहा, “पापा, आप बच्चों जैसी ज़िद क्यों करते हैं? आपकी सेहत का ख्याल रखने के लिए ही तो हमने इतनी महंगी सहायिका रखी है। ऑफिस में मेरे सिर पर सौ जिम्मेदारियां रहती हैं, कम से कम आप यहां आराम से रहकर सहयोग कीजिए।”
हरिशंकर जी ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से अनुराग की कलाई को छूना चाहा। वे कहना चाहते थे कि उन्हें किसी महंगे तीमारदार की नहीं, बल्कि दिन में बस दस मिनट अपने बेटे की बातों की ज़रूरत है। वे पूछना चाहते थे कि क्या उसे याद है जब वह बचपन में साइकिल से गिर गया था और घुटने छिल गए थे, तो कैसे पूरी रात हरिशंकर जी ने उसे अपनी छाती से चिपकाए रखा था? लेकिन शब्द होंठों तक आकर सूख गए।
अनुराग ने धीरे से अपनी कलाई छुड़ाई, जेब से फोन निकाला जो लगातार बज रहा था, और बोला, “पापा, एक ज़रूरी क्लाइंट की कॉल है, मुझे स्टडी रूम में जाना होगा। आप सो जाइए।”
अनुराग कमरे से बाहर निकल गया। उसका पदचाप सीढ़ियों की तरफ जाते हुए धीमा होता गया। हरिशंकर जी की खुली हथेली बिस्तर की चादर पर खाली रह गई। उन्हें लगा जैसे वे दो सिरों के बीच झूल रहे हों। एक सिरा अतीत का था, जहां एक पिता अपने फटे जूतों के बावजूद बेटे के नए जूतों के लिए मुस्कुराते हुए अपनी ज़रूरतें कुर्बान कर देता था; और दूसरा सिरा वर्तमान का था, जहां हर सुख-सुविधा होने के बावजूद एक पिता अपने ही बेटे के समय का एक कतरा पाने को तरस रहा था।
रात गहराने लगी। घर के सभी कमरों की बत्तियां एक-एक करके बुझ गईं। बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर भी थम चुका था। कमरे में केवल दीवार घड़ी की टिक-टिक गूंज रही थी। हरिशंकर जी को सीने में भारीपन सा महसूस होने लगा। सांस थोड़ी उखड़ने लगी। उन्होंने पास रखी घंटी बजाने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन दुर्बलता के कारण घंटी फर्श पर गिरकर लुढ़क गई। मालती बाहर वाले कमरे में गहरी नींद में थी।
हरिशंकर जी ने आंखें बंद कर लीं। उन्हें लगा कि शायद अब जीवन की इस यात्रा का अंतिम पड़ाव आ गया है। बंद पलकों के पीछे उन्हें अपने बाबूजी का मुस्कुराता चेहरा दिखाई दिया। बाबूजी हाथ हिला रहे थे, जैसे कह रहे हों, “आ जा बबुआ, बहुत थक गया है तू।” हरिशंकर जी के मन में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं बचा था। उन्हें लगा कि यही तो संसार का चक्र है। जो उन्होंने कभी अपने पिता के साथ अनजाने में किया, आज वही उनके साथ दोहराया जा रहा था। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से बेटे की सलामती की प्रार्थना की और एक गहरी सांस खींची।
उधर, स्टडी रूम में काम कर रहे अनुराग को अचानक एक अजीब सी बेचैनी ने घेर लिया। लैपटॉप की स्क्रीन पर दौड़ते आंकड़ों के बीच उसका ध्यान बार-बार पिता के उस बुझे हुए चेहरे और कांपते हाथों की ओर जा रहा था, जिसने थोड़ी देर पहले उसकी कलाई थामनी चाही थी। अनुराग ने अपनी कलाई को देखा। वहां पिता के स्पर्श की हल्की सी गर्माहट अब भी बाकी थी।
अचानक उसकी नज़र टेबल के कोने पर रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी। वह डायरी हरिशंकर जी की थी, जो शायद पिछले हफ्ते सफाई के दौरान वहां छूट गई थी। अनुराग ने यूं ही पन्ने पलटे। पन्नों के बीच से एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज का टुकड़ा गिरा। वह अनुराग के बचपन के एक रिपोर्ट कार्ड की रसीद थी और उसके पीछे हरिशंकर जी की सुंदर लिखावट में कुछ पंक्तियां लिखी थीं:
“आज अनुराग ने पूरे स्कूल में पहला स्थान पाया। स्कूल के प्रधानाचार्य ने मंच पर बुलाकर उसकी तारीफ की। आज मेरे पास उसे कोई बड़ा तोहफा देने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए अपनी पुरानी घड़ी बेचकर उसके लिए उसकी मनपसंद फाउंटेन पेन खरीदी। जब उसने उस पेन को सीने से लगाया, तो लगा कि मैंने दुनिया की सबसे बड़ी दौलत पा ली है। मेरा बेटा बहुत आगे जाएगा, बस वह कभी अकेला महसूस न करे, यही ईश्वर से विनती है।”
उन पंक्तियों को पढ़ते ही अनुराग के सीने में जैसे कोई भारी पत्थर टूटकर बिखर गया। उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसे याद आया कि जब वह बीमार पड़ता था, तो पिता कई रातों तक अपनी पलकें नहीं झपकाते थे। जब उसे उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर जाना था, तो पिता ने अपनी पीएफ की सारी जमा पूंजी बिना एक पल सोचे उसके खाते में डाल दी थी। और आज? आज जब पिता को सबसे ज्यादा सहारे की, प्यार की और सिर्फ दो मीठे बोलों की ज़रूरत थी, तो उसने उन्हें एक सहायिका के हवाले करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था? उसने पैसे को कर्तव्य का विकल्प समझ लिया था।
अनुराग कुर्सी से उठा और बदहवास सा पिता के कमरे की ओर दौड़ा।
कमरे का दरवाज़ा खोलते ही उसने देखा कि पिता की सांसें तेज चल रही थीं और उनका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। फर्श पर घंटी गिरी हुई थी। अनुराग का कलेजा मुंह को आ गया। उसने तुरंत दौड़कर पिता को अपनी बांहों में समेट लिया, “पापा! पापा, आंखें खोलिए! देखिए मैं आ गया।”
उसने मालती को आवाज़ लगाई, पानी मंगाया और पिता के तलवों को दोनों हाथों से रगड़ने लगा। पिता के ठंडे पड़ रहे हाथों को अपने आंसुओं से भीगते गालों से छुआते हुए वह बच्चों की तरह रो पड़ा, “पापा, मुझे माफ कर दीजिए। मैं भूल गया था कि आपने मुझे चलना सिखाया था, आज जब आपके कदम डगमगाए तो मैंने अपना हाथ खींच लिया। प्लीज़ पापा, मुझे छोड़कर मत जाइए।”
बेटे के गर्म आंसुओं की बूंदें जब हरिशंकर जी के गालों पर गिरीं, तो चेतना की धीमी पड़ती लौ अचानक फिर से फड़फड़ा उठी। दूर आसमान की ओर खिंचती उनकी रूह जैसे किसी अपने की पुकार सुनकर वापस लौट आई। हरिशंकर जी ने बहुत धीमे से अपनी पलकें उठाईं।
सामने कोई परछाईं नहीं थी, उनका अपना बेटा था—पूरी तरह टूटा हुआ, रोता हुआ और उनका हाथ थामे हुए।
अनुराग ने कांपते हाथों से पिता को सहारा देकर थोड़ा ऊपर उठाया और अपने सीने से लगा लिया। उसने मालती से कहा, “मालती, अब तुम्हें रात में यहां रुकने की ज़रूरत नहीं है। तुम जाकर आराम करो। आज से मेरे पापा के पास मैं रहूंगा।”
मालती चुपचाप कमरे से बाहर चली गई। कमरे में अब केवल पिता और पुत्र थे। घड़ी की सुइयां अब भी चल रही थीं, लेकिन कमरे का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। वहां अब कोई उपेक्षा नहीं थी, केवल एक गहरा, पवित्र पश्चाताप और असीम अपनत्व था।
अनुराग ने आंचल से पिता के होंठ पोंछे और धीमी आवाज़ में कहा, “पापा, कल सुबह ऑफिस से लंबी छुट्टी ले रहा हूं। कहीं नहीं जाऊंगा। कल हम दोनों बालकनी में बैठेंगे, मैं आपके लिए वही पुराना भुने चने का सत्तू बनाऊंगा जो आप कह रहे थे। और हां, आप मुझे अपने बचपन की कहानियां सुनाएंगे… वही गोरखपुर वाली, जो आप हमेशा सुनाना चाहते थे।”
हरिशंकर जी के कमजोर चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान तैर गई, जिसने उनके चेहरे की झुर्रियों को रोशनी से भर दिया। उनकी उंगलियों ने, जो कुछ देर पहले छूटने को बेताब थीं, पूरी ताकत बटोरकर अनुराग के सिर पर अपना आशीष रख दिया। पिता ने महसूस किया कि जीवन की सार्थकता किसी अंत में नहीं, बल्कि अपनों के बीच उस खोए हुए रिश्ते को फिर से पा लेने में है। धूप का जो टुकड़ा फर्श पर फिसल रहा था, वह अब कमरे की खिड़की से निकलकर सीधे उनके दिलों को गर्म कर रहा था। उस रात एक पिता को उसका बेटा वापस मिल गया था, और एक बेटे को अपनी असली दुनिया।
माता-पिता हमारी जड़ों की तरह होते हैं; हम शाखाओं की तरह चाहे जितने ऊंचे उठ जाएं, अगर जड़ों में प्यार और समय का पानी न दिया जाए तो पूरा अस्तित्व सूख जाता है। क्या आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम भी अपने बुजुर्गों को केवल सुविधाओं के सहारे छोड़कर उनके हिस्से का समय उनसे छीन तो नहीं रहे हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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