मां का आंचल

दिसंबर की सर्द शाम में जब कॉरपोरेट टावर की चौदहवीं मंजिल पर स्थित कांच के आलीशान केबिन की लाइट ऑन हुई, तो कांच की दीवारों से छनकर आती रोशनी सीधे मेज पर सजे चमचमाते ग्लास-अवॉर्ड्स पर पड़ी। उस ठंडी चमक में भी एक अजीब सा सन्नाटा और खामोशी थी। मेज के पीछे बैठी अवनि त्रिवेदी अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर उंगलियां दौड़ा रही थी। अवनि, जिसने पिछले दस वर्षों में वित्तीय जगत में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जहां तक पहुंचना कई लोगों के लिए केवल एक ख्वाब होता है। उसकी आंखें हमेशा आगे, और केवल आगे देखने की आदी थीं। उसके जीवन की डिक्शनरी में समझौते, कमजोरी या भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं था। बचपन से ही वह कुशाग्र बुद्धि वाली थी। अपने इंजीनियर पिता की तरह हर बात में नफा-नुकसान तौलना, तर्कों से सामने वाले की बात को काट देना और अपनी बात मनवा लेना उसका स्वभाव बन चुका था।

उसका छोटा भाई मयंक इसके बिल्कुल उलट था। मयंक सीधा-सादा, अंतर्मुखी और भावनाओं के सहारे जीने वाला इंसान था। जब भी घर में किसी बात पर बहस होती, अवनि अपनी अकाट्य दलीलों से मयंक को चुप करा देती। पिता भी बेटी की इस तीक्ष्ण बुद्धि पर गर्व करते थे। उन्होंने हमेशा अवनि को आत्मनिर्भर बनने का पाठ पढ़ाया था। अवनि ने इस सीख को इतनी शिद्दत से अपनाया कि जब करियर की खातिर उसने विवाह के बंधन में न बंधने और अकेले रहने का निर्णय लिया, तो परिवार का कोई भी सदस्य उसके फैसले को डिगा नहीं सका। उसने अपनी एक ऐसी दुनिया बना ली थी, जिसमें उसकी योजनाएं, उसकी प्रस्तुतियां और उसकी पदोन्नति ही सर्वोपरि थीं। वह उन्नति की सीढ़ियां चढ़ती हुई अपने गृहनगर से सैकड़ों मील दूर बेंगलुरु के एक पॉश इलाके के पेंटहाउस में जा बसी।

माता-पिता के जीवन का केंद्र अब मयंक ही था। लेकिन मयंक के विवाह के कुछ ही वर्षों बाद घर में तनाव रहने लगा। मयंक की पत्नी के साथ माता-पिता की वैचारिक दूरियां बढ़ती गईं और मयंक स्वभाव से इतना दृढ़ नहीं था कि दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य बिठा सके। पिता के आकस्मिक निधन के बाद जब मां यशोदा देवी की जिम्मेदारी पूरी तरह मयंक पर आई, तो उसकी अपनी गृहस्थी में दरारें पड़ने लगीं। मयंक ने एक दिन अवनि को एक कड़ा संदेश भेजा, “दीदी, आप हमेशा लिंग समानता और स्वावलंबन के बड़े-बड़े व्याख्यान देती आई हैं। मां जितनी मेरी हैं, उतनी ही आपकी भी हैं। पिता के जाने के बाद क्या सिर्फ मेरा ही फर्ज बनता है? यदि आप इतनी ही सशक्त हैं, तो अब मां को अपने साथ ले जाइए।”

अवनि, जो कॉरपोरेट जगत के कड़े से कड़े तर्कशास्त्रियों को निरुत्तर कर देती थी, अपने भाई के इस व्यावहारिक संदेश के आगे अवाक रह गई। उसके पास इस बात की कोई काट नहीं थी। भारी मन और अनमने भाव से वह मां यशोदा देवी को अपने पेंटहाउस ले आई।

घर में मां के आने के बाद अवनि ने उनके रहने, खाने-पीने और दवाइयों की व्यवस्था में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने मां की देखरेख के लिए एक full-time सहायिका प्रभा को रख दिया। फिजियोथेरेपिस्ट से लेकर डॉक्टर के नियमित चेकअप का पूरा खर्च वह उठा रही थी। लेकिन वह अपने भीतर वह सहज आत्मीयता और बचपन का प्यार नहीं ला पाई, जिसकी एक वृद्ध मां को सबसे अधिक दरकार होती है। मां का घर में होना अवनि को अपनी स्वतंत्रता में एक अनचाहा व्यवधान प्रतीत होता था। वह सुबह जल्दी तैयार होकर ऑफिस निकल जाती और देर रात लौटती। लौटकर बस औपचारिकतावश पूछ लेती, “मां, सब ठीक है? दवाइयां समय पर ले ली थीं?” और इसके बाद अपने कमरे में बंद होकर फाइलों या लैपटॉप में उलझ जाती।

उसने प्रभा को साफ हिदायत दे रखी थी कि मां को उसके आने से पहले ही डिनर करा दिया जाए, ताकि किसी के समय की बर्बादी न हो। मां के साथ बैठकर दो घूंट चाय पीना भी अवनि के टाइम-टेबल में शामिल नहीं था। यशोदा देवी अपनी बूढ़ी, कातर आंखों से बेटी के चेहरे को निहारतीं। वह देखतीं कि अवनि कितनी थक चुकी है, उसका चेहरा कितना रूखा हो गया है। मां समझ चुकी थीं कि उनकी बेटी अब केवल तर्कों और लक्ष्यों की मशीन बन चुकी है, जहां संवेदनाओं के तार सूख चुके हैं। मां ने भी अपनी भावनाएं समेट ली थीं। वे जानती थीं कि अवनि के अनुशासनबद्ध जीवन में उनकी किसी भी फरमाइश या बात की कोई जगह नहीं है। यशोदा देवी ने अपनी बेटी के सामने खुलकर हंसना या अपनी कोई तकलीफ बताना भी छोड़ दिया था।

जब कभी अवनि देर रात घर लौटती, यशोदा देवी का मन करता कि वह आगे बढ़कर अपनी ममतामयी हथेलियों से बेटी के माथे की थकान पोंछ दें, उससे पूछें कि क्या दिन भर में उसने कुछ खाया भी या नहीं। लेकिन अवनि का रोबोट जैसा औपचारिक चेहरा देखकर उनके पैर वहीं ठिठक जाते। अवनि का यह सूखापन मां के सीने में खामोश टीस बनकर चुभता रहता।

इसी बीच, अवनि की कंपनी ने उसे लंदन में शुरू हो रहे एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट का प्रमुख बनाने का प्रस्ताव दिया। यह उसके करियर की सबसे बड़ी छलांग थी। इस प्रोजेक्ट को स्वीकार करने का अर्थ था कि उसे कम से कम दो साल के लिए विदेश में ही रहना होगा। अवनि की पुरानी महत्वाकांक्षा उसके सारे संकोचों पर हावी हो गई। अब उसे मां की मौजूदगी एक भारी रुकावट जैसी लगने लगी। उसने तुरंत मयंक से फोन पर बात की और मां को वापस अपने पास बुलाने के लिए कहा। लेकिन मयंक ने साफ शब्दों में अपनी असमर्थता जता दी और कहा कि वह अभी अपने पारिवारिक संकट से जूझ रहा है और मां की जिम्मेदारी दोबारा नहीं ले सकता।

मयंक के इस जवाब से अवनि भीतर तक खीझ गई। उसने अपना लंदन जाना लगभग पक्का कर लिया था और बातों-बातों में मां को भी जता दिया था कि शायद उन्हें किसी अच्छे सीनियर सिटिजन होम में कुछ समय के लिए रहना पड़े। यशोदा देवी ने बेटी की यह बात चुपचाप सुन ली थी। उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई, लेकिन भीतर ही भीतर उनका आत्मसम्मान और दिल टूट चुका था। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस निर्विकार भाव से खिड़की से बाहर उड़ती धूल को देखती रहीं।

पिछले कुछ हफ्तों से यशोदा देवी की भूख कम हो गई थी और उनकी तबीयत गिरती जा रही थी। वे दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थीं। लेकिन अवनि अपने प्रोजेक्ट के प्रेजेंटेशन, वीज़ा की औपचारिकताओं और बैठकों में इस कदर अंधी हो चुकी थी कि उसे अपनी मां की फीकी पड़ती आंखें और लड़खड़ाते कदम दिखाई ही नहीं दिए। मां भी अपनी स्वाभिमानी फितरत के चलते बेटी से कुछ कह नहीं पा रही थीं।

एक दिन, जब अवनि बोर्ड रूम में एक बेहद महत्वपूर्ण डील फाइनल करने जा रही थी, प्रभा का घबराया हुआ फोन आया। प्रभा रोते हुए बोली, “दीदी, जल्दी आइए! माजी बिस्तर से नीचे गिर गई हैं और कोई जवाब नहीं दे रही हैं!”

अवनि के हाथ से पेन छूट गया। वह सब कुछ छोड़कर तुरंत घर भागी। जब वह पहुंची, तो मां बेसुध थीं, उनका शरीर ठंडा पड़ रहा था। वह आनन-फानन में उन्हें पास के एक बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल ले गई। डॉक्टरों की एक पूरी टीम ने तुरंत यशोदा देवी को आईसीयू में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें अचानक ‘साइलेंट मायोकार्डियल इन्फ्रैक्शन’ यानी धीमा दिल का दौरा पड़ा है और उनके फेफड़ों में भी पानी भर चुका है। हालत बेहद नाजुक थी।

आईसीयू के बाहर की वह सफेद, ठंडी गैलरी अवनि के जीवन की सबसे खौफनाक जगह बन गई। वह दीवार से पीठ टिकाए खड़ी थी। अंदर मशीनों की बीप-बीप की आवाजें आ रही थीं। कुछ ही देर में मुख्य डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर गहरी गंभीरता थी। डॉक्टर ने अवनि से कहा, “अवनि जी, हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति बहुत कमजोर हो चुकी है। शरीर दवाओं का उतना असर नहीं ले रहा जितना लेना चाहिए। अगले चौबीस घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आप उनके पास जाकर उनसे बात कर सकती हैं, शायद आपकी आवाज से उनके मस्तिष्क को कोई सहारा मिले।”

अवनि जब आईसीयू के भीतर दाखिल हुई, तो उसके पैर कांप रहे थे। सामने बेड पर लेटी यशोदा देवी के मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगा था, हाथों में नसों के जरिए ड्रिप चढ़ रही थी और मॉनिटर पर उनकी दिल की धड़कनें बहुत धीमी और अनियमित रेखाएं बना रही थीं।

अवनि ने आगे बढ़कर मां की कांपती, सूखी और ठंडी हथेली को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उस हथेली की त्वचा खुरदरी थी, जिस पर बरसों की मेहनत और अपनों की परवाह की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। अवनि का दिल जैसे किसी भारी पत्थर के नीचे दब गया। उसने महसूस किया कि यह वही हाथ था, जिसने बचपन में उसकी हर बीमारी में रात-रात भर उसके माथे पर गीली पट्टियां रखी थीं। यह वही हाथ था, जो जब वह पहली बार शहर जा रही थी, तो उसकी नजर उतारते हुए कांप रहा था।

“मां…” अवनि के मुंह से एक धीमी, रुंधती हुई चीख निकली। उसकी आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। पिछले दस सालों में उसने कभी खुद को रोने नहीं दिया था, लेकिन आज उसके सारे तर्क, उसकी सारी सफलताएं और उसके सारे सिद्धांत धराशायी हो चुके थे।

वह घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई और मां के उस ठंडे हाथ को अपने गालों से चिपका लिया। “मां, मुझे माफ कर दो… मैं बहुत अंधी हो गई थी। मैंने सोचा कि सिर्फ पैसे जुटाना और आगे बढ़ना ही जिंदगी है। मैंने आपको खाना दिया, दवाइयां दीं, लेकिन कभी अपना वक्त नहीं दिया। मां, मैं समझती थी कि मैं बहुत मजबूत हूं, लेकिन आपके बिना मैं कुछ भी नहीं हूं। मेरी सारी उपलब्धियां, मेरे सारे अवॉर्ड्स आपके एक आशीर्वाद के सामने कौड़ी के बराबर हैं।”

अवनि के गर्म आंसू यशोदा देवी की हथेली पर टपक रहे थे। वह बार-बार कह रही थी, “मां, प्लीज आंखें खोलो। मुझे आपका लंदन नहीं जाना, मुझे कोई प्रमोशन नहीं चाहिए। मुझे बस अपनी मां चाहिए। एक बार वापस आ जाओ, मां… मैं कभी आपको अकेला नहीं छोड़ूंगी।”

कमरे में केवल मॉनिटर की आवाज गूंज रही थी। अवनि की सिसकियों के बीच अचानक मॉनिटर की बीप की गति में थोड़ा बदलाव आया। अवनि ने चौंककर ऊपर देखा। यशोदा देवी की बंद पलकों के कोनों से दो आंसू ढुलक कर तकिए पर गिर रहे थे। और तभी, अवनि ने महसूस किया कि मां की उन ठंडी उंगलियों में एक हल्की सी हरकत हुई। मां की उंगलियों ने अपनी बची-खुची ताकत से अवनि के हाथ को धीरे से दबाने का प्रयास किया।

डॉक्टरों ने तुरंत भीतर आकर जांच की। डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है। मरीज का वाइटल पैरामीटर स्थिर हो रहा है। उन्होंने आपकी बात सुनी है और लड़ने का फैसला किया है।”

अगले तीन दिन अवनि अस्पताल की उस लॉबी से एक पल के लिए भी नहीं हटी। उसने ऑफिस को साफ ईमेल भेज दिया कि वह व्यक्तिगत कारणों से लंदन प्रोजेक्ट का नेतृत्व नहीं कर सकती और यदि संभव हो, तो वह स्थानीय स्तर पर ही अपनी जिम्मेदारियां निभाएगी। कंपनी ने उसके काम की महत्ता को देखते हुए उसे स्थानीय टीम के साथ ही जुड़े रहने की अनुमति दे दी।

एक हफ्ते बाद जब यशोदा देवी पूरी तरह खतरे से बाहर आ गईं और उन्हें घर लाया गया, तो वह पेंटहाउस पहले जैसा नहीं रह गया था। अवनि ने अब अपने जीवन की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल दी थीं। उसने अपने काम के घंटे सीमित कर दिए थे।

अब हर सुबह की शुरुआत फाइलों के साथ नहीं, बल्कि मां के साथ बालकनी में गुनगुनी धूप सेंकते हुए और अदरक वाली चाय की चुस्कियां लेते हुए होती थी। अवनि खुद अपने हाथों से मां के बालों में तेल लगाती, उनके साथ बैठकर पुरानी यादों की बातें करती और उनके बचपन के किस्से सुनती।

उसने मयंक को भी फोन किया। कोई शिकायत या तंज कसे बिना, उसने बेहद आत्मीयता से मयंक से कहा, “मयंक, तू जब भी चाहे बच्चों और भाभी के साथ यहां आ सकता है। यह सिर्फ मेरा घर नहीं है, यह मां का घर है और हम सबका घर है।” अवनि के बदले हुए लहजे ने मयंक के मन का संकोच और कड़वाहट भी धो दी।

एक शाम, जब अवनि ऑफिस से जल्दी लौट आई, तो उसने देखा कि यशोदा देवी बालकनी में बैठी मुस्कुरा रही थीं। अवनि ने जाकर अपना सिर मां की गोद में रख दिया। यशोदा देवी ने अपनी ममतामयी हथेलियों से अवनि के बालों को सहलाया और धीरे से कहा, “बेटी, तूने दुनिया जीत ली, लेकिन आज तूने अपनी मां को जीतकर अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत हासिल की है।”

अवनि ने आंखें मूंद लीं। उसे लगा कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत किसी पद, सम्मान या विदेशी प्रोजेक्ट में नहीं, बल्कि मां की इस ममतामयी छांव और आंचल की गर्माहट में ही समाई हुई है।

जीवन में कई बार हम अपने करियर और अपनी प्राथमिकताओं के इतने बड़े किले बना लेते हैं कि उसमें हमारे अपने ही बुजुर्ग बेगाने हो जाते हैं। क्या आपने कभी महसूस किया है कि हमारे माता-पिता को हमारे पैसों या सुविधाओं से ज्यादा हमारे कुछ पलों के अपनेपन की जरूरत होती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

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